भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 481, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

को निम्नमन्त्रका पाठ करते हुए भगवान्को प्रणामपूर्वक अपने सिरपर धारण करना चाहिये—

नमस्ते देवदेवेश नमस्ते भुवनेश्वर।

व्रतेनानेन मां पाहि परमात्मन् नमोऽस्तु ते॥

(उत्तरपर्व ७४।४२)

उस समय ब्राह्मणोंको चारों दिशाओंके कुण्डोंमें हवन करना चाहिये। साथ ही शान्तिकाध्याय और विष्णूसूक्तका पाठ किया जाना चाहिये। शङ्ख-ध्वनि करनी चाहिये। भाँति-भाँतिके वाद्योंको बजाना चाहिये। पुण्य-जयघोष करना चाहिये। माङ्गलिक स्तुति-पाठ करना चाहिये। इस तरहके माङ्गलिक कार्य करते हुए यजमानको हरिवंश, सौपर्णिक (सुपर्णसूक्त) आख्यान और महाभारत आदिका श्रवण करते हुए जागरणपूर्वक रात्रि व्यतीत करनी चाहिये। भगवान्के ऊपर गिरती हुई वसोर्धारा समस्त सिद्धियोंको प्रदान करनेवाली है। दूसरे दिन प्रातः यजमान ब्राह्मणोंके साथ किसी पुण्य जलाशय अथवा नदी आदिमें स्नानकर शुक्ल वस्त्र पहनकर प्रसन्नचित्तसे भगवान् भास्करको अर्घ्य दे। पुष्प, धूप, दीप आदि उपचारोंसे भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करे। हवन करके भक्तिपूर्वक पूर्णाहुति दे। यज्ञमें उपस्थित सभी ब्राह्मणोंका शय्या, भोजन, गोदान, वस्त्र, आभूषण आदिद्वारा पूजन करे और आचार्यकी विशेषरूपसे पूजा करे।

जैसे ब्राह्मण एवं आचार्य संतुष्ट हों वैसे यज्ञ करे, क्योंकि आचार्य साक्षात् देवतुल्य गुरु है। दीनों, अनाथों तथा अभ्यागतोंको भी संतुष्ट करे। अनन्तर स्वयं भी हविष्यका भोजन करे।

राजन्! इस प्रकार मैंने इस भीमद्वादशी-व्रतका विधान बतलाया, इससे पापिष्ठ व्यक्ति भी पापमुक्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं। यह विष्णुयाग सैकड़ों वाजपेय एवं अतिरात्र यागोंसे विशेष फलदायी है। इस भीमद्वादशीका व्रत करनेवाले स्त्री-पुरुष सात जन्मोंतक अखण्ड सौभाग्य, आयु, आरोग्य तथा सभी सम्पदाओंको प्राप्त करते हैं। अनन्तर मृत्युके बाद क्रमशः विष्णुपुर, रुद्रलोक तथा ब्रह्मलोकको प्राप्त करते हैं। इस पृथ्वीलोकमें आकर पुनः वह सम्पूर्ण पृथ्वीका अधिपति एवं चक्रवर्ती धार्मिक राजा होता है।

इस व्रतको प्राचीन कालमें महात्मा सगर, अज, धृंधुमार, दिलीप, ययाति तथा अन्य महान् श्रेष्ठ राजाओंने किया था और स्त्री, वैश्य एवं शूद्रोंने भी धर्मकी कामनासे इस व्रतको किया था। भृगु आदि मुनियों और सभी वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा भी इसका अनुष्ठान हुआ था। हे राजन्! आपके पृष्ठनेपर मैंने इसे बतलाया है, अतः आजसे यह द्वादशी आपके (भीमद्वादशी) नामसे पृथ्वीपर ख्याति प्राप्त करेगी। (अध्याय ७३-७४)

श्रवणद्वादशी-व्रतके प्रसंगमें एक वणिक्की कथा

युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! जो व्यक्ति दीर्घ उपवास करनेमें असमर्थ हो उसके लिये कौन-सा व्रत है? इसे आप बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—राजन्! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथि यदि श्रवण नक्षत्रसे युक्त हो तो इसमें व्रत करनेसे सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। यह परम पवित्र एवं

महान् फल देनेवाली द्वादशी है। इस व्रतमें प्रातःकाल नदी-संगममें जाकर स्नान करके द्वादशीमें उपवास करना चाहिये। एकमात्र इस श्रवणद्वादशीके व्रत कर लेनेसे द्वादश द्वादशी-व्रतोंका फल प्राप्त हो जाता है। यदि इस तिथिमें बुधवारका भी योग हो जाय तो इसमें किये गये समस्त कर्म अक्षय हो जाते हैं। इस व्रतसे गङ्गास्नानका लाभ होता

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