भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • उत्तरपर्व *

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है। इस व्रतमें एक सुन्दर कलशकी विधिवत् स्थापना कर उसमें भगवान् विष्णुकी प्रतिमा यथाविधि स्थापित करनी चाहिये। अनन्तर भगवान्की अङ्गपूजा करनी चाहिये। रात्रिमें जागरण करे। प्रभातकालमें स्नानकर गरुडध्वजकी पूजा करे और पुष्पाञ्जलि देकर इस प्रकार प्रार्थना करे—

नमो नमस्ते गोविन्द बुधश्रवणसंज्ञक।

अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव॥

(उत्तरपर्व ७५।१५)

अनन्तर वेदज्ञ एवं पुराणज्ञ ब्राह्मणोंकी पूजा करे और प्रतिमा आदि सब पदार्थ 'प्रीयतां मे जनार्दनः' कहकर ब्राह्मणको निवेदित कर दे।

श्रीकृष्णने पुनः कहा— महाराज! इस व्रतके प्रसंगमें एक प्राचीन आख्यान है, उसे आप सुने—दशार्ण देशके पश्चिम भागमें सम्पूर्ण प्राणियोंको भय देनेवाला एक मरुदेश है। वहाँके भूमिकी बालू निरन्तर तपती रहती है, यत्र-तत्र भयंकर साँप घूमते रहते हैं। वहाँ छाया बहुत कम है। वृक्षोंमें पत्ते कम रहते हैं। प्राणी प्रायः मरे-जैसे ही रहते हैं। शमी, खैर, पलाश, करील, पीलू आदि कँटीले वृक्ष वहाँ हैं। वहाँ अन्न और जल बहुत कम मिलता है। वृक्षोंके कोटरोंमें छोटे-छोटे पक्षी प्यासे ही मर जाते हैं। वहाँके प्यासे हरिण मरुभूमिमें जलकी इच्छासे दौड़ लगाते रहते हैं और जल न मिलनेसे मर जाते हैं।

उस मरुस्थलमें दैववश एक वणिक् पहुँच गया। वह अपने साथियोंसे बिछुड़ गया था। उसने इधर-उधर घूमते हुए भयंकर पिशाचोंको वहाँ देखा। वह वणिक् भूख-प्याससे व्याकुल होकर इधर-उधर घूमने लगा। कहने लगा—क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कहाँसे मुझे अन्न-जल प्राप्त हो। तदनन्तर उसने एक प्रेतके स्कन्धप्रदेशपर बैठे एक प्रेतको देखा। जिसे चारों ओरसे अन्य प्रेत घेरे हुए थे।

कन्धेपर चढ़ा हुआ वह प्रेत वणिक्को देखकर उसके पास आया और कहने लगा—'तुम इस निर्जल प्रदेशमें कैसे आ गये?' उसने बताया—'मेरे साथी छूट गये हैं, मैं अपने किसी पूर्व-कुकृत्यके फलसे या संयोगसे यहाँ पहुँच गया हूँ। भूख और प्याससे मेरे प्राण निकल रहे हैं। मैं अपने जीनेका कोई उपाय नहीं देख रहा हूँ।' इसपर वह प्रेत बोला—'तुम इस पुत्राग-वृक्षके पास क्षणमात्र प्रतीक्षा करो। यहाँ तुम्हें अभीष्ट लाभ होगा, इसके बाद तुम यथेच्छ चले जाना।' वणिक् वहीं ठहर गया। दोपहरके समय कोई व्यक्ति पुत्राग-वृक्षसे एक कसोरेंमें जल तथा दूसरे कसोरेंमें दही और भात लेकर प्रकट हुआ और उसने वह वणिक्को प्रदान किया। वणिक् उसे ग्रहणकर संतुष्ट हुआ। उसी व्यक्तिने प्रेत-समुदायको भी जल और दही-भात दिया, इससे वे सभी संतुष्ट हो गये। शेष भागको उस व्यक्तिने स्वयं भी ग्रहण किया। इसपर आश्चर्यचकित होकर वणिक्ने उस प्रेताधिपसे पूछा—'ऐसे दुर्गम स्थानमें अन्न-जलकी प्राप्ति आपको कहाँसे होती है? थोड़ेसे ही अन्न-जलसे बहुतसे लोग कैसे तृप्त हो जाते हैं। मुझे सहारा देनेवाले इस स्थानमें आप कैसे मिल गये? हे शुभव्रत! आप यह बतलायें कि ग्रासमात्रसे ही आपको संतुष्टि कैसे हो गयी? इस घोर अटवीमें आपने अपना स्थान कहाँ बनाया है? मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है, मेरा संशय आप दूर करें।'

प्रेताधिपने कहा— हे भद्र! मैंने पहले बहुत दुष्कृत किया था। दुष्ट बुद्धिवाला मैं पहले रमणीय शाकल नगरमें रहता था। व्यापारमें ही मैंने अपना अधिकांश जीवन बिता दिया। प्रमादवश मैंने धनके लोभसे कभी भी भूखेको न अन्न दिया और न प्यासेकी प्यास ही बुझायी। मेरे ही घरके पास एक गुणवान् ब्राह्मण रहता था। वह

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