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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 486, कुल 654 में से

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पृष्ठ 486
  • उत्तरपर्व *

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मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको स्नानकर जनार्दन भगवान्का भक्तिपूर्वक पूजन कर उपवास रखना चाहिये और नारायणका सतत स्मरण करते रहना चाहिये। जितेन्द्रिय पुरुष पञ्चगव्यमिश्रित जलसे स्नान करके जौ और ब्रीहि (धान)-से भरा पात्र ब्राह्मणको दान करे और फिर भगवान्से यह प्रार्थना करे —

समजन्मनि यत्किंचिन्मया खण्डव्रतं कृतम्। भगवन् त्वत्प्रसादेन तदखण्डमिहास्तु मे॥ यथाखण्डं जगत् सर्वं त्वयैव पुरुषोत्तम। तथाखिला न्यखण्डानि व्रतानि मम सन्तु वै॥

(उत्तरपर्व ७९।१४-१५)

‘भगवन्! मुझसे सात जन्मोंमें जो भी व्रत करनेमें न्यूनता हुई हो, वह सब आपके अनुग्रहसे परिपूर्ण हो जाय। पुरुषोत्तम! जिस प्रकार आपसे यह सारा जगत् परिपूर्ण है, उसी प्रकार मेरे खण्डित सभी व्रत पूर्ण हो जायें।’

इस व्रतमें चार महीनेमें व्रतकी पारणा करनी चाहिये। चैत्रादि चार मासके अनन्तर दूसरी पारणा कर सत्-पात्र ब्राह्मणको देनेका विधान है। श्रावणादि चार मासके अनन्तर तीसरा पारण कर नारायणका पूजन करते हुए अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्ण, चाँदी, मृत्तिका अथवा पलाश-पत्रके पात्रमें घृत-दान करना चाहिये। संवत्सर पूर्ण होनेपर जितेन्द्रिय बारह ब्राह्मणोंको खीरका भोजन कराकर वस्त्राभूषण देकर वृत्तियोंके लिये क्षमा माँगनी चाहिये। इसमें आचार्यका विधिपूर्वक पूजन करनेका भी विधान है। इस तरहसे जो अखण्ड-द्वादशीका व्रत करता है, उसके सात जन्मतक किये हुए व्रत सम्पूर्ण फलदायक हो जाते हैं। अतः स्त्री-पुरुषोंको व्रतोंका वैकल्प्य दूर करनेके लिये अवश्य ही इस व्रतको सम्पादित करना चाहिये।

भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा— महाराज! स्त्री अथवा पुरुष दोनोंको फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी एकादशीको उपवास कर जगत्पति भगवान्का पूजन-

भजन और उठते-बैठते नित्य हरिका स्मरण करते रहना चाहिये। द्वादशीके दिन प्रभातमें ही स्नान-पूजन तथा घृतसे हवनके बाद ब्राह्मणको दक्षिणा देनेका विधान है। तदनन्तर भगवान्से अपने अभीष्ट मनोरथोंकी संसिद्धिके लिये प्रार्थना करनी चाहिये। तत्पश्चात् हविष्य-भोजन ग्रहण करना चाहिये। इस व्रतमें फाल्गुनसे ज्येष्ठतक प्रथम चार महीनोंमें रक्त पुष्प, गुग्गुल-धूप और हविष्यान्न-नैवेद्यसे भगवान्की पूजा-अर्चनाके बाद गोशुद्धछालित जल तथा हविष्यान्न ग्रहण करनेका विधान है। फिर आषाढ़से आश्विनतक चार महीनोंमें चमेलीके पुष्प, धूप और शाल्यन्न (साठी धान) आदिके नैवेद्योंद्वारा भगवान्की पूजा-स्तुति करनेके बाद कुशोदकका प्राशन तथा निवेदित नैवेद्य भक्षण करना चाहिये। कार्तिकसे माघ मासतक तीसरी पारणामें जपापुष्प (अड़हुल), उत्तम धूप और कसारके नैवेद्यसे नारायणके पूजोपरान्त गोमूत्र-प्राशन तथा कसार-भक्षण करनेका विधान है। प्रतिमास ब्राह्मणोंको दक्षिणा देनी चाहिये। वर्षके अन्तमें एक कर्ष (माशा) सुवर्णकी भगवान् नारायणकी प्रतिमाका पूजन कर, दो वस्त्र और दक्षिणासहित ब्राह्मणको निवेदित करना चाहिये। इसीके साथ बारह ब्राह्मणोंको भी भोजन कराकर प्रत्येकको अन्न, जलका घट, छतरी, जूता, वस्त्र और दक्षिणा देनी चाहिये। इस द्वादशी-व्रतके करनेसे सभी मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। इसीसे इसका नाम मनोरथ-द्वादशी है। इन्द्रको त्रैलोक्यका राज्य भी इसी व्रतके परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ है। शुक्लाचार्यने धन तथा महर्षि धौम्यने निर्विघ्न विद्या प्राप्त की है। अन्य श्रेष्ठ पुरुषोंने तथा स्त्रियोंने भी इस व्रतके प्रभावसे अपने अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त किया है। जो कोई भी जिस-किसी अभिलाषासे इस व्रतको करता है, वह अवश्य पूर्ण होती है। जो पुरुष भगवान् पुरुषोत्तमका पूजन नहीं करते, गौ, ब्राह्मण आदिकी सेवा नहीं करते और मनोरथ-द्वादशीका

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