भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 487, कुल 654 में से

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पृष्ठ 487

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

व्रत नहीं रखते, वे किसी भी प्रकारसे अपना अभीष्ट-फल प्राप्त नहीं कर सकते।

राजा युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! थोड़े-से परिश्रमसे अथवा स्वल्पदानसे सभी पाप कट जायँ ऐसा कोई उपाय आप बतलायँ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! तिल-द्रादशी नामक एक व्रत है, जो परम पवित्र है और सभी पापोंका नाश करनेवाला है। माघ मासके कृष्ण पक्षकी द्रादशीको जब मूल अथवा पूर्वाषाढ़ नक्षत्र प्राप्त हो, तब उसके एक दिन पूर्व अर्थात् एकादशीको उपवास रखकर व्रत ग्रहण करना चाहिये। द्रादशीको भगवान् श्रीकृष्णका पूजन कर ब्राह्मणको कृष्ण तिलोंका दान करना चाहिये। व्रतीको भी

स्नानकर काले तिलका ही भोजन करना चाहिये। इस प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक कृष्ण द्रादशीमें व्रतकर अन्तमें तिलोंसे पूर्ण कृष्णवर्णके कुम्भ, पकवान, छत्र, जूता, वस्त्र और दक्षिणा बारह ब्राह्मणोंको देना चाहिये। उन तिलोंके बोनसे जितने तिल उत्पन्न होते हैं, उतने वर्षपर्यन्त इस व्रतको करनेवाला स्वर्गमें पूजित होता है और किसी जन्ममें अंध, बधिर, कुष्ठ आदि नहीं होता, सदा नीरोग रहता है। इस तिल-दानसे बड़े-बड़े पाप कट जाते हैं। इस व्रतमें न बहुत परिश्रम है और न ही बहुत अधिक व्यय। इसमें तिलोंसे ही स्नान, तिल-दान और तिल ही भोजन करनेपर अवश्य सद्गति मिलती है*। (अध्याय ७९—८१)

सुकृत-द्रादशीके प्रसंगमें सीरभद्र वैश्यकी कथा

राजा युधिष्ठिरने पूछा—श्रीकृष्णचन्द्र! ऐसा कौन-सा कर्म है, जिसके करनेसे सभी कष्ट दूर हो जायँ तथा कोई संताप भी न हो।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! आपने जो पूछा है, उस विषयमें एक आख्यानका वर्णन करता हूँ। पूर्वकालमें विदिशा (भेलसा) नगरीमें सीरभद्र नामक एक वैश्य रहता था। वह पुत्र-पौत्र, कन्या, स्त्री आदिके भरण-पोषणमें ही लगा रहता था, फलस्वरूप स्वप्नमें भी उसे परलोककी चिन्ता नहीं होती थी। वह न्याय-अन्याय हर तरहसे धनका ही उपार्जन करता, कभी दान, हवन, देवपूजन आदि कर्मका नाम भी नहीं लेता था। नित्य-नैमित्तिक कर्मोंका लोप उसने स्वयं कर लिया था। कुछ कालके अनन्तर वह वैश्य मृत्युको प्राप्त हुआ और विन्ध्यारण्यमें यातना-देहमें प्रेतरूपसे रहने लगा। एक दिन ग्रीष्म-ऋतुमें विपीत नामके वेदवेत्ता ब्राह्मणने उस प्रेतको देखा कि वह सूर्य-किरणोंसे संतप्त नदीके

बालूमें लोट रहा है, उसके सब अङ्गोंमें छाले पड़ गये हैं। प्याससे कण्ठ सूख रहा है और जिह्वा लटक गयी है। वह लम्बी-लम्बी साँस ले रहा है। उसकी यह दशा देखकर ब्राह्मणको बड़ी दया आयी और उसने उसका वृत्तान्त पूछा।

प्रेत कहने लगा—ब्रह्मन्! मैं पूर्व-जन्ममें परलोकके लिये किसी प्रकारके कर्म न करनेके कारण ही दग्ध हो रहा हूँ। मैं निरन्तर धन, घर, खेत, पुत्र, स्त्री आदिकी चिन्तामें ही आसक्त रहता था और मैंने अपने वास्तविक हितका चिन्तन कभी नहीं किया। इसीसे यह कष्ट भोग रहा हूँ। 'यह काम कर लिया और यह काम करना है'—इसी उधेड़बुनमें सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करनेका ही यह फल है। लोभवश मैं शीत-उष्ण सभी प्रकारके कष्टोंको झेल रहा हूँ। मैंने धर्मके लिये किंचित् भी कष्ट नहीं झेला, उससे अब पछताता हूँ। देवता, पित्र, अतिथि आदिका मैंने कभी पूजन नहीं किया और यही

  • यह कथा ब्रह्मपुराणमें भी आयी है।

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