भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 488, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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कारण है कि अब मुझे अन्न-जलतक नहीं मिल रहा है। अन्यायके द्वारा एकत्र किये गये धनका उपभोग दूसरे लोग कर रहे होंगे, यह सोच-सोचकर मुझे चैन नहीं मिलता। मैंने कभी ब्राह्मणोंका पूजन नहीं किया और न ही कभी देवार्चन ही किया। फलस्वरूप मेरी ऐसी दशा हुई है। चूँकि मैंने पापोंका ही संचय किया, अतः मैं उसके फलको अकेले ही भोग रहा हूँ। मैं अपने किये दुष्कर्मोंका ही फल भोग रहा हूँ। अतः हे मुनीश्वर ! यदि ऐसा कोई उपाय हो तो आप उसे बतायें, जिससे इस दुर्गतिसे मेरा उद्धार हो।
विपीतमुनि बोले—सीरभद्र ! दस जन्म पहले तुमने भगवान् अच्युतकी आराधनाकी इच्छासे सुकृत-द्रादशीका उपवास किया था, उसके प्रभावसे इस पापके बहुत बड़े भागका क्षय हो गया है, अब तुम्हें अल्पकालमें ही उत्तम गति प्राप्त होगी। यह द्रादशी-व्रत पापोंका क्षय तथा पुण्यका संचार करनेवाला है, इसी कारण इसका नाम सुकृत-द्रादशी है। इस तरह सीरभद्रको आश्वस्त कर विपीतमुनि अपने आश्रमको चले गये और सीरभद्र भी द्रादशीव्रतके फलस्वरूप थोड़े कालके अनन्तर मोक्षको प्राप्त हो गया।
इतना कहकर श्रीकृष्णभगवान् बोले—हे महाराज ! यह उपवासका प्रभाव है कि इतना पाप थोड़े ही कालमें क्षय हुआ, इसलिये मनुष्यको पुण्यके लिये सदा यत्न करना चाहिये और अपने कल्याणके लिये उपवासादि करते रहना चाहिये।
राजा युधिष्ठिरने पूछा—श्रीकृष्णचन्द्र ! पापोंसे अति दारुण नरककी यातना भोगनी पड़ती है।
ऐसा कौन-सा व्रत है, जिससे सब पाप नष्ट हो जायँ और मोक्ष प्राप्त हो।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज ! फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी एकादशीको उपवास कर काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ आदिका त्यागकर संसारकी असारताकी भावना करता हुआ 'ॐ नमो नारायणाय' इस अष्टाक्षर-मन्त्रका जप करना चाहिये और इसी भाँति द्रादशीको भी भगवान् मधुसूदनकी पूजा आदि करनी चाहिये। प्रथम चार (फाल्गुनसे ज्येष्ठ) मासके पारणमें चाँदी, ताँबे अथवा मृत्तिकाके पात्रोंमें यव भरकर ब्राह्मणोंको देना चाहिये। आषाढ़ादि द्वितीय पारणमें घृतपात्र देना चाहिये और कार्तिकदि चार मासमें तिलपात्र ब्राह्मणोंको अर्पण करना चाहिये। भगवान्की पूजाके अनन्तर उनके अनुग्रहकी प्राप्तिके लिये प्रार्थना करनी चाहिये। तदनन्तर भोजन करना चाहिये। वर्ष पूरा होनेपर सुवर्णकी विष्णु-प्रतिमा बनवाकर उसे पूजित कर वस्त्र, सुवर्ण, दक्षिणासहित सवत्साधेनु ब्राह्मणोंको देना चाहिये। इस विधिसे जो पुरुष अथवा स्त्री इस सुकृत-द्रादशीका व्रत करता है, वह कभी नरकको नहीं प्राप्त होता। नारायणके भक्तको कभी नरककी बाधा नहीं होती। विष्णुका नाम उच्चारण करते ही समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, फिर नरकके भयका तो प्रश्न ही नहीं उठता। इसी प्रकार वासुदेव नारायणके नामोंका उच्चारण करनेवाला कभी भी यमका मुख नहीं देखता। अतः भगवान्के पवित्र नामोंका उच्चारण करना चाहिये। (अध्याय ८२)
धरणी-व्रत ( अर्चावतार-व्रत )
राजा युधिष्ठिरने कहा—भगवन् ! वेदोंमें यह कहा गया है कि विधिपूर्वक यज्ञ करने, बड़े-बड़े दान देने और कठिन परिश्रम करनेसे परमेश्वरकी प्राप्ति होती है, किंतु कलियुगके
प्राणी, जो न दान दे सकते हैं और न ही यज्ञ करनेमें समर्थ हैं, उनकी मुक्ति किस प्रकार हो सकती है, यदि कोई उपाय हो तो आप उसे बतायें।
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