भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
सम्प्राप्ति-द्वादशी एवं गोविन्द-द्वादशीव्रत
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—पौष मासके कृष्ण पक्षकी द्वादशीसे ज्येष्ठ मासकी द्वादशीतक प्रत्येक मासकी कृष्ण द्वादशीको षण्मासिक सम्प्राप्ति-द्वादशीव्रत किया जाता है। प्रत्येक मासमें क्रमशः पुण्डरीकाक्ष, माधव, विश्वरूप, पुरुषोत्तम, अच्युत तथा जय—इन नामोंसे उपवासपूर्वक भगवान्की पूजा करनी चाहिये। पुनः आषाढ़ कृष्ण द्वादशीसे व्रत ग्रहणकर मार्गशीर्षतक व्रतका नियम लेना चाहिये। पूर्वविधानसे उपवासपूर्वक उन्हीं नामोंसे क्रमशः भगवान्का पूजन करना चाहिये। प्रतिमास ब्राह्मणको भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये। तेल एवं क्षार पदार्थ नहीं ग्रहण करने चाहिये। इस प्रकार एक वर्षतक इस व्रतके करनेसे सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और अन्तमें वह भगवान्के अनुग्रहसे उनके लोकको प्राप्त कर लेता है।
भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा—महाराज! इसी प्रकार गोविन्द-द्वादशी नामका एक अन्य व्रत है, जिसके करनेसे सभी अभीष्ट सिद्ध हो जाते हैं। पौष मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको उपवास कर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे कमलनयन भगवान्
गोविन्दका पूजनकर अन्तर्मनमें भी इसी नामका उच्चारण करते रहना चाहिये। इस दिन पाखण्डियोंसे बात नहीं करनी चाहिये। ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। व्रतीको गोमूत्र, गोमय, दधि अथवा गोदुग्धका प्राशन करना चाहिये। दूसरे दिन स्नानकर उसी विधिसे गोविन्दका पूजन कर ब्राह्मणको भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करना चाहिये। इसके साथ ही इस दिन गौको तृसिपूर्वक भोजन कराना चाहिये। इसी प्रकार प्रतिमास व्रत करते हुए वर्ष समाप्त होनेपर भगवती लक्ष्मीके साथ सुवर्णकी भगवान् गोविन्दकी प्रतिमा बनवाकर पुष्प, धूप, दीप, माला, नैवेद्य आदिसे उसका पूजनकर सवत्सा गौसहित ब्राह्मणोंको देना चाहिये। प्रतिमास गौओंकी पूजा तथा उन्हें ग्रासादिसे तृप्त करना चाहिये। पारणाके दिन विशेषरूपसे उनकी सेवा-भक्ति करनी चाहिये। इस व्रतको करनेसे वही फल प्राप्त होता है जो सुवर्णशृङ्गी सौ गोओंके साथ एक उत्तम वृषका दान देनेसे होता है। इस व्रतको सम्यक्-रूपसे करनेवाला सब सुख भोगकर अन्तमें गोलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय ७७-७८)
अखण्ड-द्वादशी, मनोरथ-द्वादशी एवं तिल-द्वादशी-व्रतोंका विधान
राजा युधिष्ठिरने पूछा—श्रीकृष्ण! व्रतोपवास, दान, धर्म आदिमें जो कुछ वैकल्प्य अर्थात् किसी बातकी न्यूनता रह जाय तो क्या फल होता है? इसे आप बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! राज्य पाकर भी जो निर्धन, उत्तम रूप पाकर भी काने, अंधे, लँगड़े हो जाते हैं, वे सब धर्म-वैकल्प्यके प्रभावसे ही होते हैं। धर्म-वैकल्प्यसे ही स्त्री-पुरुषोंमें वियोग एवं दुर्भाग्य होता है, उत्तम कुलमें जन्म पाकर भी लोग दुःशील हो जाते हैं, धनाढ्य होकर भी
धनका भोग तथा दान नहीं कर सकते तथा वस्त्र-आभूषणोंसे हीन रहते हैं। वे सुख प्राप्त नहीं कर पाते। अतः यज्ञमें, व्रतमें और भी अन्य धर्म-कृत्योंमें कभी कोई त्रुटि नहीं होने देनी चाहिये।
युधिष्ठिरने पुनः कहा—भगवन्! यदि कदाचित् उपवास आदिमें कोई त्रुटि हो ही जाय तो उसके निवारणार्थ क्या करना चाहिये?
श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अखण्ड-द्वादशी-व्रत करनेसे सभी प्रकारकी धार्मिक त्रुटियाँ दूर हो जाती हैं। अब आप उसका भी विधान सुनें। मार्गशीर्ष
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