भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
आनन्दपूर्वक निभय होकर वहाँ साथ-साथ ही निवास करते थे। उन तपस्यारत मुनियोंको दर्शन देनेके व्याजसे भगवान् शंकरने एक वृद्ध ब्राह्मणका वेश बना लिया। जर्जर-देहवाले वे वृद्ध ब्राह्मण हाथमें डंडा लिये काँपते हुए उस स्थानपर आये। जगन्माता पार्वती भी सुन्दर सवत्सा गौका रूप धारणकर वहाँ उपस्थित हुई।
पार्थ! गौका जो स्वरूप है, उसे आप सुनें— प्राचीन कालमें क्षीरसागरके मन्थनके समय अमृतके साथ पाँच गौएँ उत्पन्न हुईं—नन्दा, सुभद्रा, सुरभि, सुशीला तथा बहुला। इन्हें लोकमाता कहा गया है। इनका आविर्भाव लोकोपकार तथा देवताओंकी तृप्तिके लिये हुआ है। देवताओंने अभीष्ट कामनाओंकी पूर्ति करनेवाली इन पाँच गौओंको महर्षि जमदग्नि, भरद्वाज, वसिष्ठ, असित तथा गौतममुनिको प्रदान किया और इन महाभागोंने इन्हें ग्रहण किया। गौओंके छः अङ्ग—गोमय, रोचना, मूत्र, दुग्ध, दधि और घृत—ये अत्यन्त पवित्र और संशुद्धिके साधन भी हैं। गोमयसे शिवप्रिय श्रीमान् बिल्बवृक्ष उत्पन्न हुआ, उसमें पद्महस्ता श्रीलक्ष्मी विद्यमान हैं, इसीलिये इसे श्रीवृक्ष कहा जाता है। गोमयसे ही कमलके बीज उत्पन्न हुए हैं। गोरोचन अतिशय मङ्गलमय है, यह पवित्र और सर्वार्थसाधक है। गोमूत्रसे गुगुलकी उत्पत्ति हुई है, जो देखनेमें
प्रिय और सुगन्धियुक्त है। यह गुगुल सभी देवोंका आहार है। विशेषरूपसे शिवका आहार है। संसारमें जो कुछ भी मूलभूत बीज हैं, वे सभी गोदुग्धसे उत्पन्न हैं। प्रयोजनकी सिद्धिके लिये सभी माङ्गलिक पदार्थ दधिसे उत्पन्न हैं। घृतसे अमृत उत्पन्न होता है, जो देवोंकी तृप्तिका साधन है। ब्राह्मण और गौ एक ही कुलके दो भाग हैं। ब्राह्मणोंके हृदयमें तो वेदमन्त्र निवास करते हैं और गौओंके हृदयमें हवि रहती है। गायसे ही यज्ञ प्रवृत्त होता है और गौमें ही सभी देवगण प्रतिष्ठित हैं। गायमें ही छः अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेद समाहित हैं*।
गौओंके सींगकी जड़में सदा ब्रह्मा और विष्णु प्रतिष्ठित हैं। शृङ्गके अग्रभागमें सभी चराचर एवं समस्त तीर्थ प्रतिष्ठित हैं। सभी कारणोंके कारणस्वरूप महादेव शिव मध्यमें प्रतिष्ठित हैं। गौके ललाटमें गौरी, नासिकामें कार्तिकेय और नासिकाके दोनों पुटोंमें कम्बल तथा अक्षर ये दो नाग प्रतिष्ठित हैं। दोनों कानोंमें अश्विनीकुमार, नेत्रोंमें चन्द्र और सूर्य, दाँतोंमें आठों वसुगण, जिह्वामें वरुण, कुहरमें सरस्वती, गण्डस्थलोंमें यम और यक्ष, ओष्ठोंमें दोनों संध्याएँ, ग्रीवामें इन्द्र, ककुद (मौर)-में राक्षस, पाष्णि-भागमें द्यौ और जंघाओंमें चारों चरणोंसे धर्म सदा विराजमान रहता है। खुरोंके मध्यमें गन्धर्व, अग्रभागमें सर्प एवं पश्चिमभागमें
- क्षीरोदतोयसम्भूता याः पुरामृतमन्थने । पञ्च गावः शुभाः पार्थ पञ्चलोकस्य मातरः ॥ नन्दा सुभद्रा सुरभिः सुशीला बहुला इति । एता लोकोपकाराय देवानां तर्पणाय च ॥ जमदग्निभरद्वाजवसिष्ठासितगौतमाः । जगुहः कामदाः पञ्च गावो दत्ताः सूरस्ततः ॥ गोमयं रोचनां मूत्रं क्षीरं दधिं घृतं गवाम् । षडङ्गानि पवित्राणि संशुद्धिकरणानि च ॥ गोमयादुत्थितः श्रीमान् बिल्बवृक्षः शिवप्रियः । तत्रास्ते पद्महस्ता श्रीः श्रीवृक्षस्तेन स स्मृतः । वीजान्युत्पलपद्यानां पुनर्जातानि गोमयात् ॥ गोरोचना च माङ्गल्या पवित्रा सर्वसाधिका । गोमूत्राद् गुगुलुर्जातः सुगन्धिः प्रियदर्शनः । आहारः सर्वदेवानां शिवस्य च विशेषतः ॥ यद्गीजं जगतः किंचित् तन्त्रेयं क्षीरसम्भवम् । दधिजातानि सर्वाणि मङ्गलान्यर्थसिद्धये । घृतादमृतमुत्पन्नं देवानां तृप्तिकारणम् ॥ ब्राह्मणाश्वेव गावश्च कुलमेकं द्विधा कृतम् । एकत्र मन्त्रास्तिष्ठन्ति हविरन्वत्र तिष्ठति ॥ गोषु यज्ञाः प्रवर्तन्ते गोषु देवाः प्रतिष्ठिताः । गोषु वेदाः समुत्कीर्णाः सपङ्कङ्कपदक्रमाः ॥ (उत्तरपर्व ६९। १६-२४)
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