भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 470, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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सोमराज नमस्तुभ्यं रोहिण्यै ते नमो नमः। महासति महादेवि सम्पादय ममैप्सितम्॥
(उत्तरपर्व ६७।८)
अनन्तर 'सोमो मे प्रीयताम्' तथा 'देवी रोहिणी मे प्रीयताम्' ऐसा कहते हुए पूजन-द्रव्य ब्राह्मणके लिये निवेदित कर दे। अनन्तर कमरतक जलमें उतरकर मनमें रोहिणीसहित चन्द्रमाका ध्यान करते हुए उन इन्द्रुरिकाओंका भक्षण कर ले। अनन्तर जलसे बाहर आकर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा दे। प्रतिवर्ष इस विधिसे जो स्त्री अथवा पुरुष भक्तिपूर्वक व्रत करता है, वह धन-धान्य, पुत्र-पौत्रादिसे परिपूर्ण होकर बहुत दिनोंतक सुख भोगकर तीर्थ-स्थानमें मृत्युको प्राप्त करता है और ब्रह्मलोकको जाता है, अनन्तर विष्णुलोक, तदनन्तर शिवलोकमें जाता है।
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आप यह बतायें कि अवियोगव्रत किस विधिसे किया जाता है?
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अवियोगव्रत सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ है, मैं उसका विधान बतलाता
हूँ, आप ध्यानपूर्वक सुनें।
भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको प्रातः उठकर जलाशयपर जाकर स्नान करे, शुद्ध शुक्ल वस्त्र धारणकर सुन्दर लिपे-पुते स्थानपर गोबरसे एक मण्डलका निर्माण कर, उसमें लक्ष्मीसहित विष्णु, गौरीसहित शिव, सावित्रीसहित ब्रह्मा, राज्ञी सहित सूर्यनारायणकी प्रतिमा स्थापितकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि उपचारोंसे इन चारों देवदम्पतियोंके पृथक्-पृथक् नाम-मन्त्रोंसे आदिमें 'ॐ' कार तथा अन्तमें 'नमः' पदकी योजनाकर पूजा एवं प्रार्थना करे। अनन्तर ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। फिर विविध दान देकर स्वयं भी भोजन करना चाहिये। इस अवियोगव्रतको जो करता है, उसका कभी भी इष्टजनों (मित्र, पुत्र, पत्नी आदि)-से वियोग नहीं होता और बहुत समयतक वह सांसारिक सुखोंका भोगकर क्रमशः विष्णु, शिव, ब्रह्मा और सूर्यलोकमें निवास कर अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है। जो स्त्री इस व्रतको करती है, वह भी अपने सभी अभीष्ट फलोंको प्राप्त कर विष्णुलोकको प्राप्त करती है। (अध्याय ६७-६८)
गोवत्सद्वादशीका विधान, गौओंका माहात्म्य, मुनियों और राजा उत्तानपादकी कथा
महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! मेरे राज्यकी प्रासिके लिये अट्टारह अक्षौहिणी सेनाएँ नष्ट हुई हैं, इस पापसे मेरे चित्तमें बहुत घृणा उत्पन्न हो गयी है। उसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र आदि सभी मारे गये हैं। भीष्म, द्रोण, कलिंगराज, कर्ण, शल्य, दुर्योधन आदिके मरनेसे मेरे हृदयमें महान् क्लेश है। हे जगत्पते! इन पापोंसे छुटकारा पानेके लिये किसी धर्मका आप वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—हे पार्थ! गोवत्सद्वादशी नामका व्रत अतीव पुण्य प्रदान करनेवाला है।
युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! यह गोवत्सद्वादशी
कौन-सा व्रत है? इसके करनेका क्या विधान है? इसकी कब और कैसे उत्पत्ति हुई है? मैं नरकार्णवमें डूब रहा हूँ, प्रभो! आप मेरी रक्षा कीजिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—पार्थ! सत्ययुगमें पुण्यशाली जम्बूमार्ग (भड़ौच)-में नामव्रतधरा नामक पर्वतके टंटावि नामक रमणीय शिखरपर भगवान् शंकरके दर्शन करनेकी इच्छासे करोड़ों मुनिगण तपस्या कर रहे थे। वह तपोवन अतुलनीय दिव्य काननोंसे मण्डित था। वह महर्षि भृगुका आश्रममण्डल था। विविध मृगगण और बंदरोंसे समन्वित था। सिंह आदि सभी जंगली पशु,
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