भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • उत्तरपर्व *

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राक्षसगण प्रतिष्ठित हैं। गौके पृष्ठदेशमें एकादश रुद्र, सभी संधियोंमें वरुण, श्रोणि तट (कमर)-में पितर, कपोलोंमें मानव तथा अपानमें स्वाहारूप अलंकारको आश्रित कर श्री अवस्थित हैं। आदित्यरश्मियाँ केशसमूहोंमें पिण्डीभूत हो अवस्थित हैं। गोमूत्रमें साक्षात् गङ्गा और गोमयमें यमुना स्थित हैं। रोमसमूहमें तैत्तीस करोड़ देवगण प्रतिष्ठित हैं। उदरमें पर्वत और जंगलोंके साथ पृथ्वी अवस्थित है। चारों पयोधरोंमें चारों महासमुद्र स्थित हैं। क्षीरधाराओंमें मेघ, वृष्टि एवं जलविन्दु हैं, जठरमें गार्हपत्याग्नि, हृदयमें दक्षिणाग्नि, कण्ठमें आहवनीयाग्नि और तालुमें सभ्याग्नि स्थित है। गौओंकी अस्थियोंमें पर्वत और मज्जाओंमें यज्ञ स्थित हैं। सभी वेद भी गौओंमें प्रतिष्ठित हैं*।

हे युधिष्ठिर! भगवती उमाने उन सुरभियोंके रूपका स्मरणकर अपना भी रूप वैसा ही बना लिया। छः स्थानोंसे उन्नत, पाँच स्थानोंसे निम्न, मण्डूकनेत्रा, सुन्दर पूँछवाली, ताम्रके समान रक्त स्तनवाली, चाँदीके समान उज्ज्वल कटिभागवाली, सुन्दर खुर एवं सुन्दर मुखवाली, श्वेतवर्णा, सुशीला, पुत्रस्नेहवती, मधुर दूधवाली, शोभन पयोधरवाली—इस प्रकार सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न सवत्त्सा गोरूपधारिणी उस उमाको वृद्ध विप्ररूपधारी भगवान्

शंकर प्रसन्नचित्त होकर चरा रहे थे। हे पार्थ! धीरे-धीरे वे उस आश्रममें गये और कुलपति भृगुके पास जाकर उन्होंने उस गायको न्यासरूपमें दो दिनतक उसकी सुरक्षा करनेके लिये उन्हें दे दिया और कहा—‘मुने! मैं यहाँ स्नानकर जम्बूक्षेत्रमें जाऊँगा और दो दिन बाद लौटूँगा, तबतक आप इस गायकी रक्षा करें।’ मुनियोंने भी उस गौकी सभी प्रकारसे रक्षा करनेकी प्रतिज्ञा की। भगवान् शिव वहाँ अन्तर्हित हो गये और फिर थोड़ी देर बाद वे एक व्याघ्र-रूपमें प्रकट हो गये तथा बछड़ेसहित गौको डराने लगे। ऋषिगण भी व्याघ्रके भयसे आक्रान्त हो आर्तनाद करने लगे और यथासम्भव व्याघ्रको हटानेके उपाय करने लगे। व्याघ्रके भयसे सवत्त्सा वह गौ भी कूद-कूदकर रँभाने लगी। युधिष्ठिर! व्याघ्रके भयसे डरी हुई गौके भागनेपर चारों खुरोंका चिह्न शिला-मध्यमें पड़ गया। आकाशमें देवताओं एवं किन्नरोंने व्याघ्र (भगवान् शंकर) और सवत्त्सा गौ (माता पार्वती)-की वन्दना की। शिलाका वह चिह्न आज भी सुस्पष्ट दीखता है। वह नर्मदाजीका उत्तम तीर्थ है। यहाँ शम्भुतीर्थके शिवलिङ्गका जो स्पर्श करता है, वह गोहत्यासे मुक्त हो जाता है। राजन्! जम्बूमार्गमें स्थित उस महातीर्थमें स्नान कर ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्ति मिल जाती है।

  • शृङ्गमूले गवां नित्यं ब्रह्मा विष्णुश्च संस्थितौ । शृङ्गाग्रे सर्वतीर्थानि स्थावराणि चराणि च ॥ शिवो मध्ये महादेवः सर्वकारणकारणम् । ललाटे संस्थिता गौरी नासावंशे च पण्मुखः ॥ कम्बलाक्षतरो नागौ नासापुटसमाश्रितौ । कर्णयोरश्चनौ देवौ चक्षुर्भ्यां शशिभास्करौ ॥ दन्तेषु वसवः सर्वे जिह्वायां वरुणः स्थितः । सरस्वती च कुहरे यमयक्षौ च गण्डयोः ॥ संध्याद्वयं तथोष्णाभ्यां ग्रीवायां च पुरन्दरः । रक्षांसि ककुदे घोश्च पाणिंकाये व्यवस्थिता ॥ चतुष्पात्सकलो धर्मां नित्यं जह्नासु तिष्ठति । खुरमध्येषु गन्धर्वाः खुराग्रेषु च पन्नगाः ॥ खुराणां पश्चिमे भागे राक्षसाः सम्प्रतिष्ठिताः । रुद्रा एकादश पृष्ठे वरुणः सर्वसन्धिषु ॥ श्रोणीतटस्थाः पितरः कपोलेषु च मानवाः । श्रीरपाने गवां नित्यं स्वाहालंकारमाश्रिताः ॥ आदित्या रश्मयो बालाः पिण्डीभूताव्यवस्थिताः । साक्षाद्गङ्गा च गोमूत्रे गोमये यमुना स्थिता ॥ त्रयसिंशशङ् देवकोट्यो रोमकृपे व्यवस्थिताः । उदरे युधिवी सर्वा सशैलवनकानना ॥ चत्वारः सागराः प्रोक्ता गवां ये तु पयोधराः । पर्जन्यः क्षीरधारासु मेघा विन्दुव्यवस्थिताः ॥ जठरे गार्हपत्योऽग्निर्दक्षिणाग्निर्हृदि स्थितः । कण्ठे आहवनीयोऽग्निः सभ्योऽग्निस्तालुनि स्थितः ॥ अस्थिव्यवस्थिताः शैला मज्जासु ऋतवः स्थिताः । ऋग्वेदोऽथर्ववेदश्च सामवेदो यजुस्तथा ॥ (उत्तरपर्व ६१।२५—३७)

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