भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 473, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
जब व्याघ्रसे सवत्सा गौ भयभीत हो रही थी, तब मुनियोंने क्रुद्ध होकर ब्रह्मासे प्राप्त भयंकर शब्द करनेवाले घंटेको बजाना प्रारम्भ किया। उस शब्दसे व्याघ्र भी सवत्सा गौको छोड़कर चला गया। ब्राह्मणोंने उसका नाम रखा ढुण्डागिरि। हे पार्थ! जो मानव उसका दर्शन करते हैं, वे रुद्रस्वरूप ही हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है। कुछ ही क्षणोंमें भगवान् शंकर व्याघ्ररूपको छोड़कर वहाँ साक्षात् प्रकट हो गये। वे वृषभपर आरूढ़ थे, भगवती उमा उनके वाम भागमें विराजमान थीं तथा विनायक, कार्तिकेयके साथ नन्दी, महाकाल, भृङ्गी, वीरभद्रा, चामुण्डा, घण्टाकर्णा आदिसे परिवृत और मातृका, भूतसमूह, यक्ष, राक्षस, गृह्यक, देव, दानव, गन्धर्व, मुनि, विद्याधर एवं नाग तथा उनकी पत्नियोंसे वे पूजित थे। सनकादि भी उनकी पूजा कर रहे थे।
राजन्! कार्तिक मासके शुक्ल पक्ष (मतान्तरसे कृष्ण पक्ष) की द्वादशी तिथिमें ब्रह्मवादी ऋषियोंने सवत्सा गौरूपधारिणी उमादेवीकी नन्दिनी नामसे भक्तिपूर्वक पूजा की थी। इसीलिये इस दिन गोवत्सद्वादशी-व्रत किया जाता है। तभीसे उस व्रतका पृथ्वीतलपर प्रचार हुआ। राजा उत्तानपादने जिस प्रकार इस व्रतको पृथ्वीपर प्रचारित किया उसे आप सुनें—
उत्तानपाद नामक एक क्षत्रिय राजा थे। जिनकी सुरुचि और शुद्धी (सुनीति) नामकी दो रानियाँ थीं। सुनीतिसे ध्रुव नामका पुत्र हुआ। सुनीतिने अपने उस पुत्रको सुरुचिको सौंप दिया और कहा—‘हे सखि! तुम इसकी रक्षा करो। मैं सदा स्वयं सेवामें तत्पर रहूँगी।’ सुरुचि सदा गृहकार्य सँभालती और पतिव्रता सुनीति सदा पतिकी सेवा करती थी। सपत्नी-द्वेषके कारण किसी समय क्रोध और मात्सर्यसे सुरुचिने सुनीतिके शिशुको
मार डाला, किंतु वह तत्क्षण ही जीवित होकर हँसता हुआ माँकी गोदमें स्थित हो गया। इसी प्रकार सुरुचिने कई बार यह कुकृत्य किया, किंतु वह बालक बार-बार जीवित हो उठता। उसको जीवित देखकर आश्चर्यचकित हो सुरुचिने सुनीतिसे पूछा—‘देवि! यह कैसी विचित्र घटना है और यह किस व्रतका फल है, तुमने किस हवन या व्रतका अनुष्ठान किया है? जिससे तुम्हारा पुत्र बार-बार जीवित हो जाता है। क्या तुम्हें मृतसंजीवनी विद्या सिद्ध है? रत्न, महारत्न या कौन-सी विशिष्ट विद्या तुम्हारे पास है—यह सत्य-सत्य बताओ।’
सुनीतिने कहा—बहन! मैंने कार्तिक मासकी द्वादशीके दिन गोवत्सव्रत किया है, उसीके प्रभावसे मेरा पुत्र पुनः-पुनः जीवित हो जाता है। जब-जब मैं उसका स्मरण करती हूँ, वह मेरे पास ही आ जाता है। प्रवासमें रहनेपर भी इस व्रतके प्रभावसे पुत्र प्राप्त हो जाता है। इस गोवत्सद्वादशी-व्रतके करनेसे हे सुरुचि! तुम्हें भी सब कुछ प्राप्त हो जायगा और तुम्हारा कल्याण होगा। सुनीतिके कहनेपर सुरुचिने भी इस व्रतका पालन किया, जिससे उसे पुत्र, धन तथा सुख प्राप्त हुआ। सृष्टिकर्ता ब्रह्मने सुरुचिको उसके पति उत्तानपादके साथ प्रतिष्ठित कर दिया और आज भी वह आनन्दित हो रही है। दस नक्षत्रोंसे युक्त ध्रुव आज भी आकाशमें दिखायी देते हैं। ध्रुव नक्षत्रको देखनेसे सभी पापोंसे विमुक्ति हो जाती है।
युधिष्ठिरने कहा—हे भगवन्! इस व्रतकी विधि भी बतायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—हे कुरुश्रेष्ठ! कार्तिक मासमें शुक्ल पक्षकी द्वादशीको संकल्पपूर्वक श्रेष्ठ जलाशयमें स्नान कर पुरुष या स्त्री एक समय ही भोजन करे। अनन्तर मध्याह्नके समय वत्ससमन्वित गौकी गन्ध, पुष्प, अक्षत, कुंकुम, अलकक,
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