भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 474, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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दीप, उड़दके बड़े, पुष्पों तथा पुष्पमालाओंद्वारा इस मन्त्रसे पूजा करे—
ॐ माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः। प्र नु वीचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ठ नमो नमः स्वाहा ॥ (ऋ० ८।१०१।१५)
इस प्रकार पूजाकर गौको ग्रास प्रदान करे और निम्नलिखित मन्त्रसे गौका स्पर्श करते हुए प्रार्थना एवं क्षमा-याचना करे—
ॐ सर्वदेवमये देवि लोकानां शुभनन्दनि।
मातर्ममाभिलषितं सफलं कुरु नन्दनि ॥
(उत्तरपर्व ६९।८५)
इस प्रकार गौकी पूजाकर जलसे उसका पर्युक्षण करके भक्तिपूर्वक गौको प्रणाम करे। उस दिन तवापर पकाया हुआ भोजन न करे और ब्रह्मचर्यपूर्वक पृथ्वीपर शयन करे। इस व्रतके प्रभावसे व्रती सभी सुखोंको भोगते हुए अन्तमें गौके जितने रोंयें हैं, उतने वर्षातक गोलोकमें वास करता है, इसमें संदेह नहीं है।
(अध्याय ६९)
देवशयनी एवं देवोत्थानी द्वादशीव्रतोंका विधान
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! अब मैं गोविन्द-शयन नामक व्रतका वर्णन कर रहा हूँ और कटिदान, समुत्थान एवं चातुर्मास्यव्रतका भी वर्णन करता हूँ, उसे आप सुनें।
युधिष्ठिरने पूछा—महाराज! यह देव-शयन क्या है? जब देवता भी सो जाते हैं, तब संसार कैसे चलता है? देव क्यों सोते हैं? और इस व्रतका क्या विधान है—इसे कहें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—भगवान् सूर्यके मिथुन राशिमें आनेपर भगवान् मधुसूदनकी मूर्तिको शयन करा दे और तुलाराशिमें सूर्यके जानेपर पुनः भगवान् जनार्दनको शयनसे उठाये। अधिमास आनेपर भी यही विधि है। अन्य प्रकारसे न तो हरिको शयन कराये और न उन्हें निद्रासे उठाये। आषाढ़ मासके शुक्ल पक्षकी देवशयनी एकादशीको उपवास करे। भक्तिमान् पुरुष शुक्ल वस्त्रसे आच्छादित तकियेसे युक्त उत्तम शय्यापर पीताम्बरधारी, सौम्य, शङ्खु, चक्र, गदाधारी भगवान् विष्णुको शयन कराये। इतिहास और पुराणवेत्ता विष्णुभक्त पुरुष दही, दूध, शहद, घी और जलसे भगवान्की प्रतिमाको स्नान कराकर गन्ध, धूप, कुंकुम तथा
वस्त्रोंसे अलंकृत कर निम्नलिखित मन्त्रसे प्रार्थना करे—
सुमे त्वयि जगन्नाथ जगत् सुमं भवेद्विदम्।
विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत् सर्वं चराचरम् ॥
(उत्तरपर्व ७०।१०)
‘हे जगन्नाथ! आपके सो जानेपर यह सारा जगत् सुस हो जाता है और आपके जग जानेपर सम्पूर्ण चराचर जगत् प्रबुद्ध हो जाता है।’
महाराज! इस प्रकार भगवान् विष्णुकी प्रतिमाको शय्यापर स्थापित कर उसीके सम्मुख वाणीपर नियन्त्रण रखनेका और अन्य नियमोंका व्रत ग्रहण करे। वर्षके चार मासतक देवाधिदेवके शयन और उसके बाद उत्थापनकी विधि कही गयी है।
राजन्! इस व्रतके त्यागने एवं ग्रहण करने योग्य पदार्थोंके अलग-अलग नियमोंको आप सुनें। गुड़का परित्याग करनेसे व्रती अगले जन्ममें मधुर वाणीवाला राजा होता है। इसी प्रकार चार मासतक तेलका परित्याग करनेवाला सुन्दर शरीरवाला होता है। कटु तेलका त्याग करनेसे उसके शत्रुओंका नाश होता है। महूएके तेलका त्याग करनेसे अतुल सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। पुष्प आदिके भोगका
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