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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 499, कुल 654 में से

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पृष्ठ 499

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

इसी प्रकार वर्षभरतक व्रत करे। कोई मानव यदि आदरपूर्वक एक बार भी इस व्रतको कर ले तो वह मेरे यमलोकका दर्शन नहीं करता। वह मेरी मायासे अदृष्ट रहता है, अन्तमें विमानद्वारा अर्कमण्डलमें प्रवेश कर वह विष्णुपुर और शिवपुरको प्राप्त करता है। यमदूतो! उस राजा मुद्दलने इस त्रयोदशी-व्रतको पहले किया था, इसीलिये तुम सब उस क्षत्रिय-श्रेष्ठका दर्शन नहीं कर पाये।

श्रीकृष्ण! उसी क्षण मेरी मूर्च्छा दूर हो गयी और मैं स्वस्थ हो गया। भगवन्! मैं आपके

दर्शनकी इच्छासे यहाँ आया था, जैसा पहले वृत्तान्त हुआ, वह सब मैंने आपको बतलाया।

भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—राजन्! वे मुनि मुझसे इतना कहकर अपने स्थानको चले गये। कौन्तेय! आप भी इस व्रतको करें। इससे आपको यमलोक नहीं जाना पड़ेगा। इसी प्रकार जो कोई स्त्री-पुरुष इस त्रयोदशी-व्रतका श्रद्धापूर्वक आचरण करेंगे, वे सभी पापोंसे मुक्त होकर अपने पुण्य-कर्मके प्रभावसे स्वर्गमें पूजित होंगे और उन्हें कभी यमयातना नहीं सहनी पड़ेगी। (अध्याय ८९)

अनङ्ग-त्रयोदशी-व्रत

युधिष्ठिरने पूछा—संसारसे उद्धार करनेवाले स्वामिन्! आप रूप एवं सौभाग्य प्रदान करनेवाला कोई व्रत बतायें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! शरीरको क्लेश देनेवाले बहुत-से व्रतोंके करनेसे क्या लाभ? अकेले अनङ्ग-त्रयोदशी ही सब दोषोंका शमन एवं समस्त मङ्गलोंकी वृद्धि करनेवाली है। आप इसकी विधि सुनें।

पहले जब भगवान् शंकरने कामदेवको दग्ध कर दिया, तब वह बिना अङ्गके ही सबके शरीरमें निवास करने लगा। कामदेवने इस व्रतको किया था, इसीसे इसका नाम अनङ्ग-त्रयोदशी पड़ा। इस व्रतमें मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको नदी, तडाग आदिमें स्नान कर, जितेन्द्रिय हो, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और कालोद्भूत फलोंसे भगवान् शंकरका 'शशिशेखर' नामसे पूजन करे तथा तिलसहित अक्षतोंसे हवन करे। रात्रिको मधु-प्राशन कर सो जाय। इससे व्रती कामदेवके समान ही सुन्दर हो जाता है और दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। इसी प्रकार पौष मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीमें भगवान् शंकरका

'योगेश्वर' नामसे पूजन कर चन्दनका प्राशन करे तो शरीरमें चन्दनके समान गन्ध हो जाती है और व्रती राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त करता है। माघ मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको भगवान् शंकरका 'महेश्वर' नामसे पूजन कर मोतीका चूर्ण भक्षण करे तो उत्तम सौभाग्य प्राप्त करता है। इसी प्रकार फाल्गुनमें 'हरेश्वर' नामसे पूजन कर कंकोलका प्राशन करनेसे अतुल सौन्दर्य प्राप्त होता है। चैत्रमें 'सुरूपक' नामसे पूजन करने और कर्पूर-प्राशन करनेसे व्रती चन्द्रके तुल्य मनोहर हो जाता है एवं महान् सौभाग्य प्राप्त करता है। वैशाखमें 'महारूप' नामसे पूजन कर जातीफल (जायफल)-का प्राशन करे, इससे उत्तम कुलकी प्राप्ति होती है और उसके सब काम सफल हो जाते हैं तथा वह सहस्र गोदानका फल प्राप्त कर ब्रह्मलोकमें निवास करता है। ज्येष्ठमें 'प्रद्युम्न' नामसे पूजन करे और लवंगका प्राशन करे, इससे उत्तम स्थान, श्रेष्ठ लक्ष्मी और सभी सुख-सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं तथा वह एक सौ आठ वाजपेय-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। आषाढ़में 'उमाभर्ता' नामसे पूजन कर तिलोदकका प्राशन करे। इससे उत्तम रूप

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