भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 500, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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प्राप्त होता है तथा वह सौ वर्षतक सुखी जीवन व्यतीत करता है। श्रावणमें 'उमापति' नामसे पूजन कर तिलोंका प्राशन करे, इससे पौण्डरीक-यज्ञका फल प्राप्त होता है। भाद्रपद मासमें 'सद्योजात' नामसे पूजन कर अगुरुका प्राशन करे, इससे वह भूमिपर सबका गुरु बनता है और पुत्र-पौत्र, धन आदि प्राप्त कर बहुत दिन संसारमें सुख भोगकर अन्तमें विष्णुलोकमें पूजित होता है। आश्विन मासमें 'त्रिदशाधिपति' नामसे पूजन कर स्वर्णादकका प्राशन करे तो व्रती उत्तम रूप, सौभाग्य, प्रगल्भता और करोड़ों निष्कंदनका फल प्राप्त करता है। कार्तिकमें 'विश्वेश्वर' नामसे पूजन कर दमन (दौना) फलका प्राशन करे तो व्रती अपने बाहुबलसे समस्त संसारका स्वामी होता है और अन्तमें
शिवलोकमें निवास करता है।
इस प्रकार वर्षभर इस उत्तम व्रतका पालन कर पारणा करनी चाहिये। फिर कलश स्थापित कर उसके ऊपर ताम्रपात्र और उसके ऊपर शिवकी प्रतिमा स्थापित कर श्वेत वस्त्रसे आच्छादित करे। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उसका पूजन कर उसे शिवभक्त ब्राह्मणको प्रदान कर दे। साथ ही पयस्विनी सवत्सा गौ, छाता और यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। इस प्रकार जो इस अनङ्ग-त्रयोदशी-व्रतको करता है और व्रत-पारणाके समय महान् उत्सव करता है वह निष्कण्टक राज्य, आयुष्य, बल, यश तथा सौभाग्य प्राप्त करता है और अन्तमें शिवलोकमें निवास करता है।
(अध्याय ९०)
पाली-व्रत१ एवं रम्भा (कदली)-व्रत
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! श्रेष्ठ स्त्रियाँ जलपूर्ण तडागों और सरोवरोंमें किस निमित्त स्नान-दान आदि कर्म करती हैं? इसे आप बतायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीको बावली, कुएँ, पुष्करिणी तथा बड़े-बड़े जलाशयों आदिके पास पवित्र होकर भगवान् वरुणदेवको अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि तडागके तटपर जाकर फल, पुष्प, वस्त्र, दीप, चन्दन, महावर, ससधान्य, बिना अग्निके स्पर्शसे पका हुआ अन्न, तिल, चावल, खजूर, नारिकेल, बिजौरा नीबू, नारंगी, अंगूर, दाड़िम, सुपारी आदि उपचारोंसे वारुणीसहित वरुणदेवकी एवं जलाशयकी विधिपूर्वक पूजा करे और उन्हें अर्घ्य प्रदान कर इस प्रकार
उनकी प्रार्थना करे—
वरुणाय नमस्तुभ्यं नमस्ते यादसाम्यते। अपाम्यते नमस्तेऽस्तु रसानाम्यतये नमः॥ मा क्लेदं मा च दीर्गन्ध्यं विरस्यं मा मुखेऽस्तु मे। वरुणो वारुणीभर्ता वरदोऽस्तु सदा मम॥
(उत्तरपर्व ११।७-८)
'जलचर जीवोंके स्वामी वरुणदेव! आपको नमस्कार है। सभी जल एवं जलसे उत्पन्न रस-द्रव्योंके स्वामी वरुणदेव! आपको नमस्कार है। मेरे शरीरमें पसीना, दुर्गन्ध या विरसता२ आदि मेरे मुखमें न हों। वारुणीदेवीके स्वामी वरुणदेव! आप मेरे लिये सदा प्रसन्न एवं वरदायक बने रहें।'
व्रतीको चाहिये कि इस दिन बिना अग्निके पके हुए भोजन अर्थात् फल आदिका भोजन करे।
१-'पाली' शब्द जटिल है, यह कोशोंमें प्रायः नहीं मिलता। इसका अर्थ कूप, तडाग आदि जलाशयोंको रक्षाके लिये बने घेरेसे है। उसीपर बैठकर स्त्रियाँ इस व्रतको सम्पन्न करती हैं। वरुणदेव चूँकि सभी जलोंमें रहते हैं, अतः इसे वहाँ बैठकर करना चाहिये।
२-च्वर आदिसे मुखका स्वाद बिगड़ जाता है, उसे विरसता कहते हैं।
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