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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 654 में से

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  • उत्तरपर्व *

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नैवेद्यसे पूजन करे। कृष्णाण्ड, नारियल, ककड़ी, तुरई, खजूर, कैथ, अनार, जामुन, जम्बीर, नारंगी, अखरोट, कटहल, गुड़, लवण, जीरा, अंकुरित अन्न, ससधान्य तथा गलेका डोरा (सावित्री-सूत्र) आदि सब पदार्थ बाँसके पात्रमें रखकर सावित्रीदेवीको अर्पण कर दे। रात्रिके समय जागरण करे। गीत, वाद्य, नृत्य आदिका उत्सव करे। ब्राह्मण सावित्रीकी कथा कहें। इस प्रकार सारी रात्रि उत्सवपूर्वक व्यतीतकर प्रातः व्रती नारी सब सामग्रीसहित सावित्रीकी प्रतिमा श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मणको दान कर दे। यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराकर स्वयं भी हविष्यान्न-भोजन करे।

राजन्! इसी प्रकार ज्येष्ठ मासकी अमावास्याको वटवृक्षके नीचे काष्ठभारसहित सत्यवान् और महासती

सावित्रीकी प्रतिमा स्थापित कर उनका विधिवत् पूजन करना चाहिये। रात्रिको जागरण आदि कर प्रातः वह प्रतिमा ब्राह्मणको दान कर दे। इस विधानसे जो स्त्रियाँ यह सावित्री-व्रत करती हैं, वे पुत्र-पौत्र-धन आदि पदार्थोंको प्राप्तकर चिर-कालतक पृथ्वीपर सब सुख भोगकर पतिके साथ ब्रह्मलोकको प्राप्त करती हैं। यह व्रत स्त्रियोंके लिये पुण्यवर्धक, पापहारक, दुःखप्रणाशक और धन प्रदान करनेवाला है। जो नारी भक्तिसे इस व्रतको करती है, वह सावित्रीकी भाँति दोनों कुलोंका उद्धार कर पतिसहित चिरकालतक सुख भोगती है। जो इस माहात्म्यको पढ़ते अथवा सुनते हैं, वे भी मनोवाञ्छित फल प्राप्त करते हैं।

(अध्याय १०२)

महाकार्तिकी-व्रतके प्रसंगमें रानी कलिंगभद्राका आख्यान

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! पूर्वकालमें मध्य देशके वृषस्थल नामक स्थानमें महाराज दिलीपकी कलिंगभद्रा नामकी एक सर्वगुणसम्पन्ना महारानी थी। वह सदा ब्राह्मणोंको दान देती तथा देवार्चन करती रहती। एक समय उसने कार्तिक मासमें छः महीनेका कृत्तिका-व्रतका संकल्प लिया। वह प्रत्येक पारणामें नित्य पूजन, दान, ब्राह्मण-भोजन, हवन आदिमें तत्पर रहती। एक बार व्रतमें जब किंचित् कालावशेष था, तब वह रात्रिमें अपने पतिके साथ विश्राम कर रही थी। उसी समय अचानक एक भयंकर सर्पने उसे डँस लिया। फलस्वरूप उसके प्राण निकल गये और वह जन्मान्तरमें बकरी बनी, परंतु व्रतके प्रभावसे उसे अपने पूर्वजन्मकी स्मृति बनी हुई थी। उसने अपना कृत्तिका-व्रत फिर ग्रहण किया। वह अपने यूथसे अलग होकर उपवास करने लगी।

एक बार कार्तिक मासमें किसी दूसरेके खेतमें

जब वह चर रही थी, तब उस खेतका स्वामी उसे पकड़कर अपने घर ले आया। जातिस्मर अग्नि ऋषिने उस बकरीको देखा और यह जान लिया कि यह रानी कलिंगभद्रा है। दयाकर उन्होंने उसे बन्धनसे मुक्त करा दिया। वहाँसे छूटकर उसने बेरके पत्ते खाकर शीतल जल पिया और कृत्तिका-व्रतका पारण किया। ऋषि अग्नि उसे योगज्ञानका उपदेश देकर अपने आश्रमको चले गये और वह योगेश्वरी अपने व्रतमें पुनः तत्पर हो गयी तथा कुछ कालके अनन्तर उसने योगबलसे अपने प्राण त्याग दिये। तदनन्तर वह गौतम ऋषिकी पत्नी अहल्याके गर्भसे उत्पन्न हुई। उस समय उसका नाम योगलक्ष्मी हुआ। गौतममुनिने महर्षि शाण्डिल्यमुनिसे योगलक्ष्मीका विवाह कर दिया। वह भी शाण्डिल्यके घरमें सरस्वती, स्वाहा, शची, अरुन्धती, गौरी, राज्ञी, गायत्री, महालक्ष्मी तथा महासतीकी भाँति सुशोभित हुई। वह देवता,

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