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भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 515, कुल 654 में से

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पृष्ठ 515

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

पितर और अतिथियोंके सत्कारमें नित्य लगी रहती। ब्राह्मणोंको भोजन कराती।

एक दिन महर्षि वहाँ आये और उन्होंने योगबलसे सारा वृत्तान्त जान लिया और पूछा—‘महाभागे योगलक्ष्मि! कृतिकाएँ कितनी हैं?’ यह सुनकर महासती योगलक्ष्मीको भी पूर्ववृत्त स्मरण हो आया और उसने कहा—‘महायोगिन्! कृतिकाएँ छः हैं।’ यह सुनकर दयालु अत्रिमुनिने पुनः उसे मन्त्र और कृतिका-व्रतका उपदेश दिया, जिसके करनेसे उसने चिरकालतक संसारका सुख भोगकर मोक्ष प्राप्त कर लिया।

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! कृतिका-व्रतकी क्या विधि है? इसे आप बतायें।

भगवान् कहने लगे—महाराज! कार्तिककी पूर्णिमाको कृतिका नक्षत्रमें बृहस्पति या सोमवार होनेपर महाकार्तिकीका योग होता है। महाकार्तिकी तो बहुत वर्षोंमें और बड़े पुण्यसे प्राप्त होती है। इसलिये साधारण कार्तिकी पूर्णिमाको भी उपवास करे। कार्तिकी पूर्णिमाको प्रातः ही दन्तधावन आदि कर नक्तव्रतका अथवा उपवासका नियम ग्रहण करे। पुष्कर, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, नैमिष, शालग्राम, कुशावर्त, मूलस्थान, सकुन्तल, गोकर्ण, अर्बुद, अमरकण्टक आदि किसी पवित्र तीर्थमें अथवा अपने घरमें ही स्नान करे। फिर देवता, ऋषि, पितर और अतिथिका पूजन कर हवन करे।

सायंकालके समय घृत और दुग्धसे पूर्ण छः पात्रोंमें सुवर्ण, चाँदी, रत्न, नवनीत, अन्नकण तथा पिष्टसे छः कृतिकाओंकी मूर्ति बनाकर स्थापित करे। फिर उन्हें रक्तसूत्रसे आवेष्टित कर सिंदूर, कुंकुम, चन्दन, चमेलीके पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उनका पूजन कर कृतिकाओंकी मूर्तियोंको ब्राह्मणको दान कर दे। दान करते समय यह मन्त्र पढ़े—

ॐ सप्तर्षिदारा ह्यनलस्य वल्लभा

या ब्रह्मणा रक्षितयेति युक्ताः।

तुष्टाः कुमारस्य यथार्थमातरो

ममापि सुप्रीततरा भवन्तु॥

(उत्तरपर्व १०३।३७)

ब्राह्मण भी मूर्ति ग्रहण करते समय इस प्रकार मन्त्रोच्चारण करे—

धर्मदाः कामदाः सन्तु इमा नक्षत्रमातरः।

कृतिका दुर्गसंसारता तारयन्त्वावयोः कुलम्॥

(उत्तरपर्व १०३।३९)

तदनन्तर ब्राह्मण सब सामग्री लेकर घर जाय और छः कदमतक यजमान उसके पीछे चले। इस प्रकार जो पुरुष कृतिका-व्रत करता है, वह सूर्यके समान प्रकाशमान विमानमें बैठकर नक्षत्रलोकमें जाता है। जो स्त्री इस व्रतको करती है, वह भी अपने पतिसहित नक्षत्रलोकमें जाकर बहुत कालतक दिव्य भोगोंका उपभोग करती है। (अध्याय १०३)

मनोरथपूर्णिमा तथा अशोकपूर्णिमाव्रत-विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! फाल्गुनकी पूर्णिमासे संवत्सरपर्यन्त किया जानेवाला एक व्रत है, जो मनोरथपूर्णिमाके नामसे विख्यात है। इस व्रतके करनेसे व्रतीके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। व्रतीको चाहिये कि वह फाल्गुन मासकी पूर्णिमाको स्नान आदि कर लक्ष्मीसहित भगवान् जनार्दनका

पूजन करे और चलते-फिरते, उठते-बैठते हर समय जनार्दनका स्मरण करता रहे और पाखण्ड, पतित, नास्तिक, चाण्डाल आदिसे सम्भाषण न करे, जितेन्द्रिय रहे। रात्रिके समय चन्द्रमामें नारायण और लक्ष्मीकी भावना कर अर्घ्य प्रदान करे। बादमें तैल एवं लवणरहित भोजन करे। इसी प्रकार चैत्र, वैशाख,

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