भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 516, कुल 654 में से
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ज्येष्ठ—इन तीन महीनोंमें भी पूजन एवं अर्घ्य प्रदान कर व्रती प्रथम पारणा करे। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन—इन चार महीनोंकी पूर्णिमाको श्रीसहित भगवान् श्रीधरका पूजन कर चन्द्रमाको अर्घ्य प्रदान करे और पूर्ववत् दूसरी पारणा करे। कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष तथा माघ—इन चार महीनोंमें भूतिसहित भगवान् केशवका पूजन कर चन्द्रमाको अर्घ्य प्रदान करे और तीसरी पारणा सम्पन्न करे। प्रत्येक पारणाके अन्तमें ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। प्रथम पारणाके चार महीनोंमें पञ्चगव्य, दूसरी पारणाके चार महीनोंमें कुशोदक और तीसरी पारणामें सूर्यकिरणोंसे तप्त जलका प्राशन करे। रात्रिके समय गीत-वाद्यद्वारा भगवान्का कीर्तन करे। प्रतिमास जलकुम्भ, जूता, छतरी, सुवर्ण, वस्त्र, भोजन और दक्षिणा ब्राह्मणको दान करे। देवताओंके स्वामी भगवान्की मार्गशीर्ष आदि बारह महीनोंमें क्रमशः केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर या हृषीकेश, राम, पद्मनाभ अथवा दामोदर और देवदेवेश—इन नामोंका कीर्तन करनेवाला व्यक्ति दुर्गतिसे उद्धार पा जाता है। यदि प्रतिमास दान देनेमें समर्थ न हो तो वर्षके अन्तमें यथाशक्ति सुवर्णका चन्द्रबिम्ब बनाकर फल, वस्त्र आदिसे उसका पूजन कर ब्राह्मणको निवेदित कर दे। इस प्रकार व्रत करनेवाले पुरुषको अनेक जन्मपर्यन्त इष्टका वियोग नहीं होता। उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं और वह पुरुष नारायणका स्मरण करता हुआ दिव्यलोक प्राप्त करता है।
भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा—महाराज! अब मैं अशोकपूर्णिमा-व्रतका वर्णन करता हूँ।
इस व्रतको करनेसे मनुष्यको कभी शोक नहीं होता। फाल्गुनकी पूर्णिमाको अङ्गोंमें मृत्तिका लगाकर नदी आदिमें स्नान करे। मृत्तिकाकी एक वेदी बनाकर उसपर भगवान् भूधर और अशोका नामसे धरणीदेवीका पुष्प, नैवेद्य आदि उपचारोंसे पूजन करे। पूजनके अनन्तर हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रार्थना करे—‘धरणीदेवि! आप सम्पूर्ण चराचर जगत्को धारण करनेवाली हैं। आपको जिस प्रकार भगवान् जनार्दनने रसातलसे लाकर प्रतिष्ठित करके शोकरहित किया है, उसी प्रकार आप मुझे भी सभी शोकोंसे मुक्त कर दें और मेरी समस्त कामनाओंको पूर्ण करें। इस प्रकार प्रार्थना कर रात्रिमें चन्द्रमाको अर्घ्य प्रदान करे। उस दिन उपवास रखे अथवा रात्रिके समय तैल-क्षाररहित भोजन करे। फाल्गुन आदि चार-चार मासमें एक-एक पारणा करे और प्रत्येक पारणाके अन्तमें विशेष पूजा और जागरण करे। प्रथम पारणामें धरणी, द्वितीयमें मेदिनी और तृतीयमें वसुन्धरा नामसे पूजन करे। वर्षके अन्तमें सवत्सा गौ, भूमि, वस्त्र, आभूषण आदि ब्राह्मणोंको दान करे। यह व्रत पातालमें स्थित धरणीदेवीने किया था, तब भगवान्ने वाराह रूप धारण कर उनका उद्धार किया और प्रसन्न होकर कहा कि ‘धरणीदेवि! तुम्हारे इस व्रतसे मैं परम संतुष्ट हूँ, जो कोई भी पुरुष-स्त्री भक्तिसे इस व्रतको करते हुए मेरा पूजन करेंगे और यथाविधि पारणा करेंगे, वे जन्म-जन्ममें सब प्रकारके क्लेशोंसे मुक्त हो जायेंगे और तुम्हारे समान ही कल्याणके भाजन हो जायेंगे।’ (अध्याय १०४-१०५)
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