भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 517, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अनन्तव्रत-माहात्म्यमें कार्तवीर्यके आविर्भावका वृत्तान्त
राजा युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! भक्तिपूर्वक नारायणकी आराधना करनेसे सभी मनोवाञ्छित फल प्राप्त हो जाते हैं, किंतु स्त्री-पुरुषोंके लिये संतानहीन होनेसे अधिक कोई दुःख और शोक नहीं है, परंतु कुपुत्रता तो और भी महान् दुःखका कारण है। योग्य संतान सब सुखोंका हेतु है। जगत्में वे धन्य हैं, जो सर्वगुणसम्पन्न, आरोग्य, बलवान्, धर्मज्ञ, शास्त्रवेत्ता, दीन-अनाथोंके आश्रय, भाग्यवान्, हृदयको आनन्द देनेवाले और दीर्घायु पुत्र प्राप्त करते हैं। प्रभो! मैं ऐसा व्रत सुनना चाहता हूँ कि जिसके करनेसे ऐसे शुभ लक्षणोंसे युक्त पुत्र उत्पन्न हों।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! इस सम्बन्धमें एक प्राचीन इतिहास प्रसिद्ध है। हैहयवंशमें माहिष्मती (महेश्वर) नगरीमें कृतवीर्य नामका एक महान् राजा हुआ। उसकी एक हजार रानियोंमें प्रधान तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न शीलधना नामकी एक रानी थी। उसने एक दिन पुत्र-प्राप्तिके लिये ब्रह्मवादिनी मैत्रेयीसे पूछा। मैत्रेयीने उसको श्रेष्ठ अनन्तव्रतका उपदेश दिया और कहा—‘शीलधने! स्त्री या पुरुष जो कोई भी भगवान् जनार्दनकी आराधना करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। मार्गशीर्ष मासमें जिस दिन मृगशिरा नक्षत्र हो उस दिन स्नान कर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदिसे अनन्तभगवान्के वाम चरणका पूजन करे और प्रार्थना कर एकाग्रचित्त हो बारम्बार प्रणाम कर ब्राह्मणको दक्षिणा दे। रात्रिके समय तैल-क्षारवर्जित भोजन करे। इसी विधिसे पौष मासमें पुष्य नक्षत्रमें भगवान्के बायें कटिप्रदेशका पूजन करे। माघ मासमें मघा नक्षत्रमें भगवान्की बायें भुजाका पूजन करे। फाल्गुनमें फाल्गुनी नक्षत्रमें बायें स्कन्धका पूजन करे। इन
चार महीनोंमें गोमूत्रका प्राशन करे और सुवर्णसहित तिल ब्राह्मणको दान दे।’
चैत्रमें चित्रा नक्षत्रमें भगवान्के दाहिने कन्धेका पूजन करे, वैशाखमें विशाखा नक्षत्रमें दाहिनी भुजाका पूजन करे, ज्येष्ठमें ज्येष्ठा नक्षत्रमें दाहिने कटिप्रदेशका पूजन करे। इसी प्रकार आषाढ़ मासमें आषाढ़ा नक्षत्रमें दाहिने पैरका पूजन करे। इन चार महीनोंमें पञ्चगव्यका प्राशन करे। ब्राह्मणको सुवर्ण-दान दे और रात्रिको भोजन करे।
श्रावण मासमें श्रवण नक्षत्रमें भगवान् विष्णुके दोनों चरणोंका पूजन करे। भाद्रपद मासमें उत्तराभाद्रपद नक्षत्रमें गुह्य-स्थानका पूजन करे। आश्विनमें अश्विनी नक्षत्रमें हृदयका पूजन करे और कार्तिक मासमें कृतिका नक्षत्रमें अनन्तभगवान्के सिरका पूजन करे। इन चार महीनोंमें घृतका प्राशन करे और घृत ही ब्राह्मणको दान दे।
मार्गशीर्ष आदि प्रथम चार मासोंमें घृतसे, द्वितीय चैत्र आदि चार मासोंमें शालिधान्यसे और तृतीय श्रावण आदि चार मासोंमें अनन्तभगवान्की प्रीतिके लिये दुग्धसे हवन करे। हविष्यान्नका भोजन करना सभी मासोंमें प्रशस्त माना गया है। इस प्रकार बारह महीनोंमें तीन पारणा कर वर्षके अन्तमें सुवर्णकी अनन्तभगवान्की मूर्ति और चाँदीके हल-मूसल बनाये। बादमें मूर्तिको ताम्रपीठपर स्थापित कर दोनों ओर हल, मूसल रखकर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि उपचारोंसे पूजन करे। नक्षत्र, देवता, मास, संवत्सर और नक्षत्रोंके अधिपति चन्द्रमाका भी विधिपूर्वक पूजन करे। अनन्तर पुराणवेत्ता, धर्मज्ञ, शान्तिप्रिय ब्राह्मणका वस्त्र-आभूषण आदिसे पूजन कर यह सब सामग्री उसे अर्पण कर दे और ‘अनन्तः प्रीयताम्’ यह वाक्य कहे। पीछे अन्य ब्राह्मणोंको भी भोजन, दक्षिणा आदि देकर संतुष्ट
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