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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 518, कुल 654 में से

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  • उत्तरपर्व *

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करे। इस विधिसे जो इस अनन्तव्रतको सम्पन्न करता है, वह सभी अभीष्ट फलोंको प्राप्त करता है। शीलधने! यदि तुम उत्तम पुत्रकी इच्छा रखती हो तो विधिपूर्वक श्रद्धासे इस अनन्तव्रतको करो।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! इस प्रकार मैत्रेयीसे उपदेश प्राप्त कर शीलधना भक्तिपूर्वक व्रत करने लगी। व्रतके प्रभावसे भगवान् अनन्त संतुष्ट हुए और उन्होंने उसे एक श्रेष्ठ पुत्र प्रदान किया। पुत्रके जन्म होते ही आकाश निर्मल हो गया। आनन्ददायक वायु प्रवाहित होने लगी। देवगण दुन्दुभि बजाने लगे। पुष्पवृष्टि होने लगी, सारे जगत्में मङ्गल होने लगा। गन्धर्व गाने लगे और अप्सर्राएँ नृत्य करने लगीं। सभी लोगोंका मन धर्ममें आसक्त हो गया। राजा कृतवीर्यने अपने पुत्रका नाम अर्जुन रखा। कृतवीर्यका पुत्र होनेसे वही अर्जुन कार्तवीर्य कहलाया। कार्तवीर्यार्जुनने कठिन तप किया और विष्णुभगवान्के अवतार

श्रीदत्तात्रेयजीकी आराधना की। भगवान् दत्तात्रेयने यह वर दिया कि 'अर्जुन! तुम चक्रवर्ती सप्राद होओगे। जो व्यक्ति सार्यकाल और प्रातः 'नमोऽस्तु कार्तवीर्याय' यह वाक्य उच्चारण करेगा, उसे प्रस्थभर तिल-दानका पुण्य प्राप्त होगा और जो तुम्हारा स्मरण करेंगे, उन पुरुषोंका द्रव्य कभी नष्ट नहीं होगा।' भगवान्से वर प्राप्त कर राजा कार्तवीर्य धर्मपूर्वक सप्तद्वीपा वसुमतीका पालन करने लगे। उन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञ सम्पन्न किये और शत्रुओंपर विजय प्राप्त की। इस तरह रानी शीलधनाने अनन्तव्रतके प्रभावसे अति उत्तम पुत्र प्राप्त किया, पिताको पुत्रजनित कोई भी दुःख नहीं हुआ। जो पुरुष अथवा स्त्री इस कार्तवीर्यके जन्मको श्रवण करते हैं, वे सात जन्मपर्यन्त संतानका दुःख प्राप्त नहीं करते। जो इस अनन्त-व्रतको भक्तिसे करता है, वह उत्तम संतान और ऐश्वर्यको प्राप्त करता है। (अध्याय १०६)

मास-नक्षत्र-व्रतके माहात्म्यमें साम्भरायणीकी कथा

राजा युधिष्ठिरने कहा—प्रभो! ऐश्वर्य आदिके प्राप्त न होनेसे इतना कष्ट नहीं होता, जितना प्राप्त होकर नष्ट हो जानेसे होता है। इसलिये आप ऐसा कोई व्रत बतायें, जिसके करनेसे ऐश्वर्य-भ्रंश और इष्ट-वियोग न हो।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! यह बड़ा भारी दुःख है कि प्राप्त हुए सुखका फिर नाश हो जाता है। इसके लिये श्रेष्ठ पुरुषोंको चाहिये कि वे बारह मासोंके बारह नक्षत्रोंमें भगवान् अच्युतकी विविध उपचारोंसे पूजा करें। इस नक्षत्र-व्रतको प्रथम कार्तिक मासकी कृत्तिकामें करना चाहिये। इसी प्रकार मार्गशीर्ष मासके मृगशिरा नक्षत्रमें, पौष मासके पुष्य नक्षत्रमें तथा माघ मासके मघा नक्षत्रमें करना चाहिये। कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष

तथा माघ—इन चार महीनोंमें खिचड़ीका भोग लगाये और यही ब्राह्मणको भोजन भी कराये। फाल्गुन आदि चार महीनोंके नक्षत्रोंमें संयाव (गोझिया)—का नैवेद्य लगाये और आषाढ़ आदि चार महीनोंके नक्षत्रोंमें पायसका नैवेद्य लगाये। पञ्चगव्यका प्राशन करे और भक्तिसे नारायणका अर्चन कर इस प्रकार प्रार्थना करे—

नमो नमस्तेऽच्युत मे श्योऽस्तु पापस्य वृद्धिं समुपैतु पुण्यम्। ऐश्वर्यवितादि तथाऽक्षयं मे श्रयं च मा संततिरभ्युपैतु॥ यथाच्युतस्तवं परतः परस्मात् स ब्रह्मभूतः परतः परात्मा। तथाच्युतं मे कुरु वाच्छ्रुतं त्वं हरस्व पापं च तथाप्रमेय॥

अच्युतानन्त गोविन्द प्रसीद यदभीप्सितम्।

तदक्षयममेयात्मन् कुरुष्व पुरुषोत्तम॥

(उत्तरपर्व १०७। १२-१४)

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