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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 519, कुल 654 में से

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पृष्ठ 519

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

‘अच्युत! आपको बार-बार नमस्कार है। मेरे पापोंका नाश हो जाय, पुण्यकी वृद्धि हो, मेरे ऐश्वर्य, वित्त आदि अक्षय हों तथा मेरी संतति कभी नष्ट न हो। जिस प्रकारसे आप परसे परे ब्रह्मभूत और उससे भी परे अच्युत परमात्मा हैं, उसी प्रकार आप मुझे अच्युत कर दें। अप्रमेय! आप मेरे पापोंको नष्ट कर दें। पुरुषोत्तम! अच्युत, अनन्त, गोविन्द, अमेयात्मन्! मेरी समस्त अभिलाषाओंको पूर्ण करें, मेरे ऊपर आप प्रसन्न हों।’

अनन्तर रात्रिके समय भगवान्का प्रसाद ग्रहण करे। वर्ष पूरा होनेपर जब भगवान् अच्युत जग जायें, तब घृतपूर्ण ताम्रपात्र और दक्षिणा ब्राह्मणको देकर ‘अच्युतः प्रीयताम्’ यह वाक्य कहे। इस प्रकार सात वर्षतक नक्षत्र-व्रत करके सुवर्णकी अच्युतकी प्रतिमा बनवाकर स्थापित करे और उसके सामने भगवान्की परम भक्ता और पतिव्रता साम्भरायणी ब्राह्मणीकी चाँदीकी मूर्ति बनाकर स्थापित करे। फिर उन दोनोंकी गन्ध-पुष्पादि उपचारोंसे पूजा कर क्षमा-प्रार्थना करे और सब सामग्री ब्राह्मणको दान कर दे। इस विधिसे जो श्रद्धापूर्वक व्रत करता है और भगवान् अच्युतका पूजन करता है, उसके धन, संतति, ऐश्वर्य आदिका कभी क्षय नहीं होता। उसकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं। अतः मनुष्यको चाहिये कि सर्वथा अक्षय होनेके लिये इस मास-नक्षत्र-व्रतका पालन करे।

युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! आपने साम्भरायणीकी प्रतिमा बनाकर पूजन करनेको कहा है, ये साम्भरायणीदेवी कौन हैं? आप इसे बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज! ऐसा सुना जाता है कि स्वर्गमें साम्भरायणी नामकी एक तपोधना कठिन व्रतोंका आचरण करनेवाली प्रख्यात

सिद्धा नारी थी, जो देवताओंकी भी शंकाओंका समाधान कर देती थी। एक समय देवराज इन्द्रने देवगुरु बृहस्पतिसे पूछा—‘भगवन्! हमारे पहले जितने इन्द्र हो गये हैं, उनका क्या आचरण और चरित्र था, आप कृपाकर इसका वर्णन कीजिये।’

देवगुरु बृहस्पति बोले— ‘देवेन्द्र! सब इन्द्रोंका वृत्तान्त तो मुझे नहीं मालूम, केवल अपने समयमें हुए इन्द्रोंके विषयमें मुझे जानकारी है।’ इन्द्रने कहा—‘गुरो! आपके बिना हम यह वृत्तान्त किससे पूछें।’ बृहस्पति कुछ काल विचारकर कहने लगे—‘पुरन्दर! इस विषयको तपस्विनी धर्मज्ञा साम्भरायणी- देवीसे ही पूछो।’ यह सुनकर बृहस्पतिको साथ लेकर देवराज इन्द्र साम्भरायणीके पास गये। साम्भरायणीने बड़े सत्कारसे उनको बैठाया और अध्यादिसे पूजन कर विनयपूर्वक आगमनका प्रयोजन पूछा। इसपर बृहस्पतिजी बोले—‘साम्भरायणि! देवराज इन्द्रको प्राचीन वृत्तान्त सुननेका बड़ा कौतूहल है। यदि आप विगत इन्द्रोंका चरित्र जानती हों तो उसे बतायें।’

साम्भरायणी बोली— ‘देवगुरो! जितने इन्द्र हो चुके हैं, सबका वृत्तान्त मैं अच्छी तरह जानती हूँ। मैंने बहुत-से मनुओं, देवसृष्टियों और सप्तर्षियोंको देखा है। मनुपुत्रोंको भी जानती हूँ और सब मन्वन्तरोंका चरित्र मुझे ज्ञात है। जो आप पूछें, वही मैं बताऊँगी। साम्भरायणीका यह वचन सुनकर देवराज इन्द्र और देवगुरु बृहस्पतिने स्वायम्भुव, स्वारीचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष आदि मनुओं, मन्वन्तरों और व्यतीत इन्द्रोंका वृत्तान्त उससे पूछा। साम्भरायणीने सम्पूर्ण वृत्तान्तोंका यथार्थ वर्णन किया। राजन्! उसने एक अत्यन्त आश्चर्यकी बात यह बतलायी कि पूर्वकालमें शंकुकर्ण नामका एक बड़ा प्रतापी दैत्य हुआ। वह लोकपालोंको जीतकर स्वर्गमें इन्द्रको जीतने आया और निर्भय

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