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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 520, कुल 654 में से

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पृष्ठ 520
  • उत्तरपर्व *

५०९

हो इन्द्रके भवनमें प्रविष्ट हो गया। शंकुकर्णको देखकर इन्द्र भयभीत होकर छिप गये और वह इन्द्रके आसनपर बैठ गया। उसी समय देवताओंके साथ विष्णु भी वहाँ आये। भगवान्को देखकर शंकुकर्ण अत्यन्त प्रसन्न हो गया और उसने बड़े स्नेहसे भगवान्का आलिङ्गन किया। भगवान् उसकी नियतको समझ रहे थे, अतः उन्होंने भी उसका आलिङ्गन कर ऐसा निष्पीडन किया कि उसके सब अस्थिपञ्जर चूर-चूर हो गये और वह घोर शब्द करता हुआ मृत्युको प्राप्त हो गया। दैत्यको मरा जानकर इन्द्र भी उपस्थित हो गये और विष्णुभगवान्की स्तुति करने लगे।'

साम्भरायणीने पुनः कहा—देवराज! यह वृत्तान्त मैंने अपने नेत्रोंसे देखा था।

इन्द्रने साम्भरायणीसे पूछा—देवि! इतने प्राचीन वृत्तान्तको आप कैसे जानती हैं?

साम्भरायणीने कहा—देवेन्द्र! स्वर्गका कोई

ऐसा वृत्तान्त नहीं है, जो मैं न जानती होंऊँ।

इन्द्रने पूछा—धर्मज्ञे! आपने ऐसा कौन-सा सत्कर्म किया है, जिसके प्रभावसे आपको अक्षय स्वर्ग प्राप्त हुआ?

साम्भरायणी बोली—मैंने प्रतिमास मास-नक्षत्रोंमें सात वर्षपर्यन्त भगवान् अच्युतका विधिवत् पूजन और उपवास किया है। यह सब उसी पुण्य-कर्मका फल है। जो पुरुष अक्षय स्वर्गवास, इन्द्रपद, ऐश्वर्य, संतति आदिकी इच्छा करे, उसे अवश्य ही भगवान् विष्णुकी आराधना करनी चाहिये। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों पदार्थ भगवान् विष्णुकी आराधनासे प्राप्त होते हैं। इतना सुनकर देवगुरु बृहस्पति और देवराज इन्द्र साम्भरायणीपर बहुत प्रसन्न हुए और दोनों भक्तिपूर्वक उसके द्वारा बताये गये मास-नक्षत्र-व्रतका पालन करने लगे।

(अध्याय १०७)

वैष्णव एवं शैव नक्षत्रपुरुष-व्रतोंका विधान

राजा युधिष्ठिरने पूछा—यदुसत्तम! पुरुष और स्त्रियोंको उत्तम रूप किस कर्मके करनेसे प्राप्त होता है? आप सर्वाङ्गसुन्दर श्रेष्ठ रूपकी प्राप्तिका उपाय बताइये।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! यही बात अरुन्धती वसिष्ठजीसे पूछी थीं और महर्षि वसिष्ठने उनसे कहा था—'प्रिये! विष्णुभगवान्की बिना आराधना और पूजन किये उत्तम रूप प्राप्त नहीं हो सकता। जो पुरुष अथवा स्त्री उत्तम रूप, ऐश्वर्य और संतानकी अभिलाषा करे, उसे नक्षत्रपुरुषरूप भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये।' इसपर अरुन्धतीने नक्षत्रपुरुष-व्रतका विधान पूछा। वसिष्ठजीने कहा—'प्रिये! चैत्र माससे लेकर भगवान्के पाद आदि अङ्गोंका

उपवासपूर्वक पूजन करे। स्नानादिसे पवित्र होकर नक्षत्रपुरुषरूपी भगवान् विष्णुकी प्रतिमा बनाकर उनके पादसे सिरतकके अङ्गोंका इस विधिसे पूजन करे। मूल नक्षत्रमें दोनों पैर, रोहिणी नक्षत्रमें दोनों जंघा, अश्विनीमें दोनों घुटनों, आषाढमें दोनों ऊरुओं, दोनों फाल्गुनीमें गुह्यस्थान, कृत्तिकामें कटिप्रदेश, दोनों भाद्रपदाओंमें पार्श्वभाग और टखना, रेवतीमें दोनों कुक्षि, अनुराधामें वक्षःस्थल, धनिष्ठामें पीठ, विशाखामें दोनों भुजाएँ, हस्तमें दोनों हाथ, पुनर्वसुमें अंगुली, आश्लेषामें नख, ज्येष्ठामें ग्रीवा, श्रवणमें कर्ण, पुष्यमें मुख, स्वातीमें दाँत, शतभिषामें मुख, मघामें नासिका, मृगशिरामें नेत्र, चित्रामें ललाट, भरणीमें सिर और आर्द्रामें केशोंका पूजन करे। उपवासके दिन

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