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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ
  • उत्तरपर्व *

५०९

हो इन्द्रके भवनमें प्रविष्ट हो गया। शंकुकर्णको देखकर इन्द्र भयभीत होकर छिप गये और वह इन्द्रके आसनपर बैठ गया। उसी समय देवताओंके साथ विष्णु भी वहाँ आये। भगवान्को देखकर शंकुकर्ण अत्यन्त प्रसन्न हो गया और उसने बड़े स्नेहसे भगवान्का आलिङ्गन किया। भगवान् उसकी नियतको समझ रहे थे, अतः उन्होंने भी उसका आलिङ्गन कर ऐसा निष्पीडन किया कि उसके सब अस्थिपञ्जर चूर-चूर हो गये और वह घोर शब्द करता हुआ मृत्युको प्राप्त हो गया। दैत्यको मरा जानकर इन्द्र भी उपस्थित हो गये और विष्णुभगवान्की स्तुति करने लगे।'

साम्भरायणीने पुनः कहा—देवराज! यह वृत्तान्त मैंने अपने नेत्रोंसे देखा था।

इन्द्रने साम्भरायणीसे पूछा—देवि! इतने प्राचीन वृत्तान्तको आप कैसे जानती हैं?

साम्भरायणीने कहा—देवेन्द्र! स्वर्गका कोई

ऐसा वृत्तान्त नहीं है, जो मैं न जानती होंऊँ।

इन्द्रने पूछा—धर्मज्ञे! आपने ऐसा कौन-सा सत्कर्म किया है, जिसके प्रभावसे आपको अक्षय स्वर्ग प्राप्त हुआ?

साम्भरायणी बोली—मैंने प्रतिमास मास-नक्षत्रोंमें सात वर्षपर्यन्त भगवान् अच्युतका विधिवत् पूजन और उपवास किया है। यह सब उसी पुण्य-कर्मका फल है। जो पुरुष अक्षय स्वर्गवास, इन्द्रपद, ऐश्वर्य, संतति आदिकी इच्छा करे, उसे अवश्य ही भगवान् विष्णुकी आराधना करनी चाहिये। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों पदार्थ भगवान् विष्णुकी आराधनासे प्राप्त होते हैं। इतना सुनकर देवगुरु बृहस्पति और देवराज इन्द्र साम्भरायणीपर बहुत प्रसन्न हुए और दोनों भक्तिपूर्वक उसके द्वारा बताये गये मास-नक्षत्र-व्रतका पालन करने लगे।

(अध्याय १०७)

वैष्णव एवं शैव नक्षत्रपुरुष-व्रतोंका विधान

राजा युधिष्ठिरने पूछा—यदुसत्तम! पुरुष और स्त्रियोंको उत्तम रूप किस कर्मके करनेसे प्राप्त होता है? आप सर्वाङ्गसुन्दर श्रेष्ठ रूपकी प्राप्तिका उपाय बताइये।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! यही बात अरुन्धती वसिष्ठजीसे पूछी थीं और महर्षि वसिष्ठने उनसे कहा था—'प्रिये! विष्णुभगवान्की बिना आराधना और पूजन किये उत्तम रूप प्राप्त नहीं हो सकता। जो पुरुष अथवा स्त्री उत्तम रूप, ऐश्वर्य और संतानकी अभिलाषा करे, उसे नक्षत्रपुरुषरूप भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये।' इसपर अरुन्धतीने नक्षत्रपुरुष-व्रतका विधान पूछा। वसिष्ठजीने कहा—'प्रिये! चैत्र माससे लेकर भगवान्के पाद आदि अङ्गोंका

उपवासपूर्वक पूजन करे। स्नानादिसे पवित्र होकर नक्षत्रपुरुषरूपी भगवान् विष्णुकी प्रतिमा बनाकर उनके पादसे सिरतकके अङ्गोंका इस विधिसे पूजन करे। मूल नक्षत्रमें दोनों पैर, रोहिणी नक्षत्रमें दोनों जंघा, अश्विनीमें दोनों घुटनों, आषाढमें दोनों ऊरुओं, दोनों फाल्गुनीमें गुह्यस्थान, कृत्तिकामें कटिप्रदेश, दोनों भाद्रपदाओंमें पार्श्वभाग और टखना, रेवतीमें दोनों कुक्षि, अनुराधामें वक्षःस्थल, धनिष्ठामें पीठ, विशाखामें दोनों भुजाएँ, हस्तमें दोनों हाथ, पुनर्वसुमें अंगुली, आश्लेषामें नख, ज्येष्ठामें ग्रीवा, श्रवणमें कर्ण, पुष्यमें मुख, स्वातीमें दाँत, शतभिषामें मुख, मघामें नासिका, मृगशिरामें नेत्र, चित्रामें ललाट, भरणीमें सिर और आर्द्रामें केशोंका पूजन करे। उपवासके दिन

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

तैलाभ्यङ्ग न करे। नक्षत्रके देवताओं और नक्षत्रराज चन्द्रमाका भी प्रति नक्षत्रमें पूजन करे और विद्वान् ब्राह्मणको भोजन कराये। यदि व्रतमें अशौच आदि हो जाय तो दूसरे नक्षत्रमें उपवास कर पूजन करे। इस प्रकार माघ मासमें व्रत पूरा हो जानेपर उद्यापन करे। अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णका नक्षत्रपुरुष बनाकर उसे अलंकृत करे, एक उत्तम शय्यापर प्रतिमा स्थापित करे और ब्राह्मण-दम्पतिको शय्यापर बैठाकर वस्त्राभूषण आदिसे उनका पूजन कर सप्तधान्य, सवत्सा गौ, छतरी, जूता, घृतपात्र और दक्षिणासहित वह नक्षत्रपुरुषकी प्रतिमा उन्हें दान कर दे। श्रद्धापूर्वक इस व्रतके करनेसे सर्वाङ्गसुन्दर रूप, मनकी प्रसन्नता, आरोग्य, उत्तम संतान, मधुर वाणी और जन्म-जन्मान्तरतक अखण्ड ऐश्वर्य प्राप्त होता है और सभी पाप निवृत्त हो जाते हैं। इतनी कथा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण बोले—‘महाराज! इस प्रकार नक्षत्रपुरुष-व्रतका विधान वसिष्ठजीने अरुन्धतीको बतलाया। वही मैंने आपको सुनाया। जो इस विधिसे नक्षत्ररूप भगवान्का पूजन करते हैं, वे अवश्य ही उत्तम रूप पाते हैं।’

राजा युधिष्ठिरने पुनः पूछा—भगवन्! शिवभक्तोंके कल्याणके लिये आप शैवनक्षत्रपुरुष-व्रतका विधान बतायें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! शैवनक्षत्र-पुरुष-व्रतके दिन भगवान् शंकरके अङ्गोंका पूजन और उपवास अथवा नक्तव्रत करना चाहिये। फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षसे जब हस्त नक्षत्र हो,

उस दिनसे शैवनक्षत्रपुरुष-व्रतका नियम ग्रहण करना चाहिये और रातमें भगवान् शिवका पूजन करना चाहिये। हस्त आदि संताईस नक्षत्रोंमें भगवान् शंकरके संताईस नामोंसे उनके चरणसे लेकर सिरतककी क्रमशः अङ्ग-पूजा करनी चाहिये। रात्रिके समय तैल-क्षाररहित भोजन करे। प्रतिनक्षत्रमें सेरभर शालि-चावल और घृतपात्र ब्राह्मणको प्रदान करे। दो नक्षत्र एक दिन हो जायें तो दो अङ्गोंका दो नामोंसे एक ही दिन पूजन करे। इस प्रकार व्रतकर पारणामें ब्राह्मणोंको भोजन, दक्षिणा आदिसे संतुष्ट करना चाहिये। सुवर्णकी शिव-पार्वतीकी प्रतिमा बनाकर उसे उत्तम शय्यापर स्थापित करे। बादमें सभी उपचारोंसे पूजनकर कपिला गौ, बर्तन, छत्र, चामर, दर्पण, जूता, वस्त्र, आभूषण, अनुलेपन आदिसहित वह प्रतिमा ब्राह्मणको निवेदित कर दे। बादमें प्रदक्षिणा कर विसर्जन करे और शय्या, गौ आदि सब सामग्री ब्राह्मणके घर पहुँचा दे। महाराज! दुश्शील, दाम्भिक, कुतार्किक, निन्दक, लोभी आदिको यह व्रत नहीं बताना चाहिये। शान्त-स्वभाव, सदगुणी, शिवभक्त इस व्रतके अधिकारी हैं। इस व्रतके करनेसे महापातक भी निवृत्त हो जाते हैं। जो स्त्री पतिकी आज्ञा प्राप्त कर इस व्रतको सम्पन्न करती है, उसे कभी इष्ट-वियोग नहीं होता। जो इस व्रतके माहात्म्यको पढ़ता अथवा श्रवण करता है, उसके भी पितरोंका नरकसे उद्धार हो जाता है।

(अध्याय १०८-१०९)

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  • उत्तरपर्व *

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भग्न-व्रतकी प्रायश्चित्त-विधि तथा पण्यस्त्री-व्रत

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! यदि मनुष्य नक्षत्रपुरुष-व्रतको ग्रहण कर उसे न कर सके तो किस कर्मके द्वारा वह चीर्ण (कृत) माना जाता है, इसे बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! यह अत्यन्त रहस्यपूर्ण बात है। आपके आग्रहसे मैं इसे बतला रहा हूँ। अनेक प्रकारके उपद्रव, मद, मोह या असावधानी आदिसे यदि व्रत-भग्न हो जायें तो उनकी पूर्णताके लिये यह व्रत करना चाहिये। इस व्रतके करनेसे खण्डित-व्रत पूर्ण फल देनेवाले हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं। जिस देवी-देवताका व्रत-भग्न हो जाय, उसकी सुवर्ण अथवा चाँदीकी प्रतिमा बनाकर उस व्रतके दिन ब्राह्मणको बुलाकर प्रतिमाको पञ्चामृतसे स्नान कराये, बादमें जलपूर्ण कलशके ऊपर प्रतिमाको प्रतिष्ठितकर गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, वस्त्र, आभूषण तथा नैवेद्य आदिसे उनका पूजन करे। अनन्तर देवताके उद्देश्यसे नाममन्त्र (ॐ अमुक देवाय नमः) द्वारा अर्घ्य प्रदान करे तथा फिर व्रतकी पूर्णता एवं व्रत-भङ्गदोषकी निवृत्तिके लिये इस प्रकार क्षमा-प्रार्थना करे और भगवान्की शरण ग्रहण करे—

उपसन्नस्य दीनस्य प्रायश्चित्तकृताञ्जलेः।

शरणं च प्रपन्नस्य कुरुष्वाद्य दयां प्रभो॥

परन्न भयभीतस्य भग्नखण्डव्रतस्य च।

कुरु प्रसादं सम्पूर्णं व्रतं सम्पूर्णमस्तु मे॥

तपश्छिद्रं व्रतच्छिद्रं यच्छिद्रं भग्नके व्रते।

तव प्रसादादिवेश सर्वमच्छिद्रमस्तु नः॥

(उत्तरपर्व ११०।१३—१५)

तात्पर्य यह है कि 'प्रभो! मैं आपकी शरण हूँ, मुझपर आप दया करें। किसी भी प्रकारसे मेरे द्वारा किये गये व्रत, तप इत्यादि कर्मोंमें जो कोई भी त्रुटि, अपराध एवं च्युति हो गयी हो,

हे देवदेवेश! आपके अनुग्रहसे वे सब दोष दूर हो जायें और मेरा व्रत पूर्ण हो जाय। आपको नमस्कार है।'

तदनन्तर दिक्पालोंको अर्घ्य प्रदान कर मुख्य देवताकी अङ्ग-पूजा करे और अन्तमें फिर प्रार्थना करे। ब्राह्मणका पूजन करे और ब्राह्मण भी व्रतकी पूर्णताके लिये इस प्रकार आशीर्वाद प्रदान करे—

वाक्सम्पूर्णं मनः पूर्णं पूर्णं कायव्रतेन ते।

सम्पूर्णस्य प्रसादेन भव पूर्णमनोरथः॥

ब्राह्मणा यत्प्रभाषन्ते हनुमोदन्ति देवताः।

सर्वदेवमया विप्रा नैतद्वचनमन्यथा॥

जलधिः क्षारतां नीतः पावकः सर्वभक्षताम्।

सहस्रनेत्रः शक्रोऽपि कृतो विप्रैर्महात्मभिः॥

ब्राह्मणानां तु वचनाद् ब्रह्महत्या प्रणश्यति।

अश्वमेधफलं साग्रं प्राप्यते नात्र संशयः॥

व्यासवाल्मीकिवचनाद् ब्राह्मणवचनाच्च गर्गगौतम-पराशरधौम्याङ्गिरसवसिष्ठनारदादिमुनिवचनात् सम्पूर्णं भवतु ते व्रतम्॥ (उत्तरपर्व ११०।२३—२७)

यजमान भी ब्राह्मणको बिदा कर सब सामग्री उसके घर भेज दे। पीछे पञ्चयज्ञ कर भोजन करे। इस सम्पूर्ण व्रतको जो एक बार भी भक्तिसे करता है, वह खण्डित-व्रतका सम्पूर्ण फल प्राप्त कर लेता है और व्रत-भग्नके पापसे मुक्त हो जाता है। इस व्रतको जो करता है, वह धन, रूप, आरोग्य, कीर्ति आदि प्राप्त कर सौ वर्षपर्यन्त भूमिपर सुख भोगकर स्वर्ग प्राप्त करता है और अन्तमें मोक्षको प्राप्त होता है। महाराज! प्रायश्चित्तरूप इस सम्पूर्ण व्रतको प्रसन्न हो महर्षि गर्गजीने मुझे बताया था और बाल्यावस्थामें मैंने भी इसे किया था। इसलिये राजन्! आप भी इस व्रतको करें, जिससे जन्मान्तरोंमें भी किये खण्डित व्रत पूर्ण हो जायें।

राजन्! इसी प्रकार एक अन्य पण्यस्त्री-व्रत

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

है, जो रविवारको हस्त, पुष्प अथवा पुनर्वसु नक्षत्र आनेपर प्रारम्भ किया जाता है तथा उसमें विधिपूर्वक विष्णुस्वरूप कामदेवका पूजन किया जाता है, अन्तमें सभी उपकरणोंसे युक्त शय्या तथा विष्णुप्रतिमा ब्राह्मणको दान कर दी जाती

है। व्रती स्त्रीको चाहिये कि वह सदाचारके नियमोंका पालन करती रहे। इस व्रतके करनेसे पण्यस्त्रियों-जैसी अधम स्त्रियोंका भी उद्धार हो जाता है।

(अध्याय ११०-१११)

वृत्ताक-त्याग एवं ग्रह-नक्षत्र-व्रतकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब मैं वृत्ताक (बैगन)-के त्यागकी विधि बता रहा हूँ। व्रतीको चाहिये कि एक वर्ष, छः मास अथवा तीन मास वृत्ताकका त्याग कर उद्यापन करे। उसके बाद संकल्पपूर्वक भरणी अथवा मघा नक्षत्रमें उपवासकर एक स्थण्डिल बनाकर उसपर अक्षत-पुष्पोंसे यमराजका तथा उनके परिकरोंका आवाहन कर गन्ध, पुष्प, नैवेद्य आदि उपचारोंसे यम, काल, नील, चित्रगुप्त, वैवस्वत, मृत्यु तथा परमेष्ठी—इन पृथक्-पृथक् नामोंसे विधिपूर्वक पूजन करे। तदनन्तर अग्निस्थापन कर तिल और घीसे इन्हीं नाम-मन्त्रोंके द्वारा हवन करे। तदनन्तर स्विष्टकृत एवं प्रायश्चित्त होम करे। आभूषण, वस्त्र, छाता, जूता, काला कम्बल, काला बैल, काली गाय और दक्षिणाके साथ सोनेका बना हुआ वृत्ताक ब्राह्मणको दान कर दे और अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मण-भोजन कराये। ऐसा करनेसे पौण्डरीक-यज्ञका फल प्राप्त होता है। साथ ही व्रतीको सात जन्मतक यमका दर्शन नहीं करना पड़ता और वह दीर्घ समयतक स्वर्गमें समादृत होकर निवास करता है।

भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा—महाराज! अब मैं ग्रह-नक्षत्र-व्रतकी विधि बतलाता हूँ, जिसके करनेसे सभी क्रूर ग्रह शान्त हो जाते हैं और लक्ष्मी, धृति, तुष्टि तथा पुष्टिकी प्राप्ति होती है। जिस रविवारको हस्त नक्षत्र हो उस दिन भगवान् सूर्यका पूजन कर नक्तव्रत करना चाहिये।

इस नक्तव्रतको सात रविवारतक भक्तिपूर्वक करके अन्तमें भगवान् सूर्यकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनाकर ताम्रपात्रमें स्थापित करे। फिर उसे घीसे स्नान कराकर रक्त चन्दन, रक्त पुष्प, रक्त वस्त्र, धूप, दीप आदिसे पूजनकर लड्डूका भोग लगाये। जूता, छाता, दो लाल वस्त्र और दक्षिणाके साथ वह प्रतिमा ब्राह्मणको दे। इस व्रतको करनेसे आरोग्य, सम्पत्ति और संतानकी प्राप्ति होती है।

चित्रा नक्षत्रसे युक्त सोमवारसे आरम्भ कर सात सोमवारतक नक्तव्रत करके अन्तमें चन्द्रमाकी चाँदीकी प्रतिमा बनाकर, चाँदी अथवा काँसेके पात्रमें स्थापित कर श्वेत पुष्प, श्वेत वस्त्र आदिसे उनका पूजन करे। दध्योदनका भोग लगाकर जूता, छाता तथा दक्षिणासहित वह मूर्ति ब्राह्मणको प्रदान करे। यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराये, इससे चन्द्रमा प्रसन्न होते हैं। उनके प्रसन्न होनेसे दूसरे सभी ग्रह प्रसन्न हो जाते हैं।

स्वाती नक्षत्रसे युक्त भौमवारसे आरम्भ कर सात भौमवारतक नक्तव्रत करके अन्तमें सुवर्णकी भौमकी प्रतिमा बनाकर ताम्रपात्रमें स्थापित कर रक्त चन्दन, रक्त वस्त्र आदिसे पूजनकर घीयुक्त कसारका भोग लगाकर सब सामग्री ब्राह्मणको दे। इसी प्रकार विशाखायुक्त बुधवारको बुधका पूजन कर उद्यापनमें स्वर्णमयी बुधकी प्रतिमा ब्राह्मणको प्रदान कर दे। अनुराधा नक्षत्रसे युक्त बृहस्पतिवारके दिनसे सात बृहस्पतिवारतक नक्तव्रत करके अन्तमें

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  • उत्तरपर्व *

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सुवर्णकी देवगुरु बृहस्पतिकी मूर्ति बनाकर सुवर्णपात्रमें स्थापित करे। तदनन्तर गन्ध, पीत पुष्प, पीत वस्त्र, यज्ञोपवीत आदिसे उनकी पूजा करके खाँड़का भोग लगाकर सब सामग्री एवं मूर्ति ब्राह्मणको प्रदान कर दे। इसी प्रकार ज्येष्ठायुक्त शुक्रवारको व्रतका आरम्भ कर सात शुक्रवारतक नक्तव्रत करके अन्तमें सुवर्णकी शुक्रकी प्रतिमा बनाकर चाँदी अथवा बाँसके पात्रमें स्थापित कर श्वेत चन्दन, श्वेत वस्त्र आदिसे पूजनकर घी और पायसका भोग लगाये। सब पदार्थ एवं प्रतिमा ब्राह्मणको प्रदान करे।

इसी विधिसे मूल नक्षत्रयुक्त शनिवारसे आरम्भ

कर सात शनिवारतक नक्तव्रत करके अन्तमें शनि, राहु और केतुका पूजन करना चाहिये और तिल तथा घीसे ग्रहोंके नाम-मन्त्रोंसे हवन करके नवग्रहोंकी समिधाओंसे प्रत्येक ग्रहको क्रमसे एक सौ आठ अथवा अट्टाईस बार आहुति दे। शनैश्चर आदिकी प्रतिमा लौह अथवा सुवर्णकी बनाये। कृशरात्रका भोग लगाकर सब सामग्रीसहित वे प्रतिमाएँ ब्राह्मणको प्रदान कर दे। इससे सभी ग्रहोंकी पीड़ा शान्त हो जाती है। इस व्रतको विधिपूर्वक करनेसे क्रूर ग्रह भी सौम्य एवं अनुकूल हो जाते हैं और उसे शान्ति प्रदान करते हैं। (अध्याय ११२-११३)

शनैश्चर-व्रतके प्रसंगमें महामुनि पिप्पलादका आख्यान

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! एक बार त्रेतायुगमें अनावृष्टिके कारण भयंकर दुर्भिक्ष पड़ गया। उस घोर अकालमें कौशिकमुनि अपनी स्त्री तथा पुत्रोंके साथ अपना निवास-स्थान छोड़कर दूसरे प्रदेशमें निवास करने निकल पड़े। कुटुम्बका भरण-पोषण दूभर हो जानेके कारण बड़े कष्टसे उन्होंने अपने एक बालकको मार्गमें ही छोड़ दिया। वह बालक अकेला भूख-प्याससे तड़पता हुआ रोने लगा। उसे अकस्मात् एक पीपलका वृक्ष दिखायी पड़ा। उसके समीप ही एक बावड़ी भी थी। बालकने पीपलके फलोंको खाकर ठंडा जल पी लिया और अपनेको स्वस्थ पाकर वह वहीं कठिन तपस्या करने लगा तथा नित्यप्रति पीपलके फलोंको खाकर समय व्यतीत करने लगा। अचानक वहाँ एक दिन देवर्षि नारद पथारे, उन्हें देखकर बालकने प्रणाम किया और आदरपूर्वक बैठाया। दयालु नारदजी उसकी अवस्था, विनय और नम्रताको देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होंने बालकका मौझीबन्धन आदि सब संस्कार कर पद-क्रम-रहस्यसहित वेदका अध्ययन कराया

तथा साथ ही द्वादशाक्षर वैष्णवमन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय)-का उपदेश दिया।

अब वह प्रतिदिन विष्णुभगवान्का ध्यान और मन्त्रका जप करने लगा। नारदजी भी वहीं रहे। थोड़े समयमें ही बालकके तपसे संतुष्ट होकर भगवान् विष्णु गरुड़पर सवार हो वहाँ पहुँचे। देवर्षि नारदके वचनसे बालकने उन्हें पहचान लिया, तब उसने भगवान्में दृढ़ भक्तिकी माँग की। भगवान्ने प्रसन्न होकर ज्ञान और योगका उपदेश प्रदान किया और अपनेमें भक्तिका आशीर्वाद देकर वे अन्तर्धान हो गये। भगवान्के उपदेशसे वह बालक महाज्ञानी महर्षि हो गया।

एक दिन बालकने नारदजीसे पूछा—‘महाराज! यह किस कर्मका फल है जो मुझे इतना कष्ट उठाना पड़ा। इतनी छोटी अवस्थामें भी मैं क्यों ग्रहोंद्वारा पीड़ित हो रहा हूँ। मेरे माता-पिताका कुछ भी पता नहीं, वे कहाँ हैं। फिर भी मैं अत्यन्त कष्टसे जी रहा हूँ। द्विजोत्तम! सौभाग्यवश आपने दया करके मेरा संस्कार किया और मुझे ब्राह्मणत्व प्रदान किया।’ नारदजी यह वचन सुनकर बोले—

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

‘बालक! शनैश्चरग्रहने तुम्हें बहुत पीड़ा पहुँचायी और आज यह सम्पूर्ण देश उसके मन्दगतिसे चलनेके कारण उत्पीड़ित है। देखो, वह अभिमानी शनैश्चर-ग्रह आकाशमें प्रज्वलित दिखायी पड़ रहा है।’

यह सुनकर बालक क्रोधसे अग्निके समान उद्दीप्त हो उठा। उसने उग्र दृष्टिसे देखकर शनैश्चरको आकाशसे भूमिपर गिरा दिया। शनैश्चर एक पर्वतपर गिरे और उनका पैर टूट गया, जिससे वे पंगु हो गये। देवर्षि नारद भूमिपर गिरे हुए शनैश्चरको देखकर अत्यन्त प्रसन्नतासे नाच उठे। उन्होंने सभी देवताओंको बुलाया। ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, अग्नि आदि देवता वहाँ आये और नारदजीने शनैश्चरकी दुर्गति सबको दिखायी।

ब्रह्माजीने बालकसे कहा—महाभाग! तुमने पीपलके फल भक्षण कर कठिन तप किया है। अतः नारदजीने तुम्हारा पिप्पलाद१ नाम उचित ही रखा है। तुम आजसे इसी नामसे संसारमें विख्यात होओगे। जो कोई भी शनिवारको तुम्हारा भक्तिभावसे पूजन करेगे अथवा ‘पिप्पलाद’ इस नामका स्मरण करेंगे, उन्हें सात जन्मतक शनिकी पीड़ा नहीं सहन करनी पड़ेगी और वे पुत्र-पौत्रसे युक्त होंगे। अब तुम शनैश्चरको पूर्ववत् आकाशमें स्थापित कर दो; क्योंकि इनका वस्तुतः कोई अपराध नहीं है। ग्रहोंकी पीड़ासे छुटकारा पानेके लिये नैवेद्य निवेदन, हवन, नमस्कार आदि करना चाहिये। ग्रहोंका अनादर नहीं करना चाहिये।

पूजित होनेपर ये शान्ति प्रदान करते हैं२।

शनिकी ग्रहजन्य पीड़ाकी निवृत्तिके लिये शनिवारको स्वयं तैलाभ्यङ्ग करके ब्राह्मणोंको भी अभ्यङ्गके लिये तैल देना चाहिये। शनिकी लौह-प्रतिमा बनाकर तैलयुक्त लौह-पात्रमें रखकर एक वर्षतक प्रति शनिवारको पूजन करनेके बाद कृष्ण पुष्प, दो कृष्ण वस्त्र, कसार, तिल, भात आदिसे उनका पूजन कर काली गाय, काला कम्बल, तिलका तेल और दक्षिणासहित सब पदार्थ ब्राह्मणको प्रदान करना चाहिये। पूजन आदिमें शनिके इस मन्त्रका प्रयोग करना चाहिये—

शं नो देवीरभिष्टुय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु नः॥ (यजु० ३६।१२)

राज्य नष्ट हुए राजा नलको शनिदेवने स्वप्नमें अपने एक प्रार्थना-मन्त्रका उपदेश दिया था। उसी नाम-स्तुतिसे उन्हें पुनः राज्य उपलब्ध हुआ था। उस स्तुतिसे शनिकी प्रार्थना करनी चाहिये। सर्वकामप्रद वह स्तुति इस प्रकार है—

क्रोडं नीलाञ्जनप्रख्यं नीलवर्णसमस्त्रजम्।

छायामार्तण्डसम्भूतं नमस्यामि शनैश्चरम्॥

नमोऽर्कपुत्राय शनैश्चराय

नीहारवर्णाञ्जनमेचकाय ।

श्रुत्वा रहस्यं भवकामदश्च

फलप्रदो मे भव सूर्यपुत्र॥

नमोऽस्तु प्रेतराजाय कृष्णदेहाय वै नमः।

शनैश्चराय कुराय शुद्धबुद्धिप्रदायिने॥

१-यहाँ यह कथा बड़ी सुन्दर है। इसके पढ़नेसे शनिग्रहकी पीड़ा भी शान्त हो जाती है। ये महर्षि अथर्वण पैप्पलादसंहिताके द्रष्टा हैं। इनकी कथा प्रायः अनेक व्रत-माहात्म्य एवं स्कन्द आदि पुराणोंमें मिलती है। पर अन्तर यह है कि अन्यत्र सर्वत्र इन्हें दधीचि ऋषिका पुत्र बताया गया है। माताके नाममें भी थोड़ा अन्तर है, कहीं प्रातिथेयीका और कहीं सुवर्चाका नाम मिलता है, जो पतिके साथ सती हो गयी थीं। तब ये पीपलके द्वारा पालित हुए। सभी कथाएँ बड़ी पुण्यप्रद एवं शनि-पीड़ाको शान्त करनेवाली हैं। अन्तर कल्पभेदका है, अतः संदेह नहीं करना चाहिये।

२-चरन्वृक्षं शनैरेष शुभाशुभफलप्रदः। हतसाध्या ग्रहाश्चैते न भवन्ति कदाचन॥

बलिहोमनमस्कारैः शान्तिं यच्छन्ति पूजिताः। अतोऽर्थमस्य दिवसे ज्ञानमभ्यङ्गपूर्वकम्॥ (उत्तरपर्व ११४।२९-३०)

इसी भावके श्लोक याज्ञवल्क्य आदि स्मृतियोंमें भी आये हैं।

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  • उत्तरपर्व *

५१५

य एभिर्नामभिः स्तौति तस्य तुष्टो भवाम्यहम्। मदीयं तु भयं तस्य स्वप्नेऽपि न भविष्यति ॥

(उत्तरपर्व ११४।३९-४२)

जो भी व्यक्ति प्रत्येक शनिवारको एक वर्षतक इस व्रतको करता है और इस विधिसे उद्यापन करता है, उसे कभी शनिकी पीड़ा नहीं भोगनी पड़ती। यह कहकर ब्रह्माजी सभी देवताओंके साथ अपने परमधामको चले गये और पिप्पलादमुनिने भी ब्रह्माजीके आज्ञानुसार शनैश्चरको उनके स्थानपर प्रतिष्ठित कर दिया। महामुनि पिप्पलादने शनिग्रहकी

इस प्रकार प्रार्थना की— कोणस्थः पिङ्गलो बभ्रुः कृष्णो रौद्रोऽन्तको यमः। सौरिः शनैश्चरो मन्दः प्रीयतां मे ग्रहोत्तमः ॥

(उत्तरपर्व ११४।४७)

जो व्यक्ति शनैश्चरोपाख्यानको भक्तिपूर्वक सुनता है तथा शनिकी लौह-प्रतिमा बनाकर तेलसे भरे हुए लौह-कलशमें रखकर ब्राह्मणको दक्षिणासहित दान देता है, उसको कभी भी शनिकी पीड़ा नहीं होती।

(अध्याय ११४)

आदित्यवार नक्त-व्रत तथा संक्रान्ति-व्रतके उद्यापनकी विधि

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवान् गोविन्द! आप कोई ऐसा व्रत बतलाइये, जो सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला, आरोग्यदायक और अनन्त फलप्रद हो।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! परब्रह्म विश्वात्मा जो परम सनातन धाम है, वह संसारमें सूर्य, अग्नि तथा चन्द्र—इन तीनोंमें विभक्त होकर स्थित है। कुरुनन्दन! उस परमात्माकी आराधना कर मनुष्य क्या नहीं प्राप्त कर सकता? इसलिये रविवारके दिन नक्तव्रत करना चाहिये। भगवान् सूर्यमें अनन्य भक्ति रखकर आदित्यवारको यह व्रत करना चाहिये। ब्राह्मणोंकी विधिवत् पूजा कर सायंकाल रक्त चन्दनसे एक द्वादशदल कमलकी रचना करे और उसके द्वादशदलोंमें सूर्य, दिवाकर, विवस्वान्, भग, वरुण, महेंद्र, आदित्य, शान्त, सूर्यके अश्व, यम, मार्तण्ड तथा रविकी स्थापना करे और उनका पूजन कर तिल, रक्त चन्दन, फल तथा अक्षतसे युक्त अर्घ्य प्रदान करे। अनन्तर विसर्जन कर दे। रात्रिमें भगवान् भास्करका स्मरण करता हुआ तैलरहित भोजन करे। व्रतके पूर्व दिन शनिवारको तैलाभ्यङ्ग न करे। इस प्रकार एक वर्षपर्यन्त व्रत करके उद्यापन करे और यथाशक्ति

गुडसे पूर्ण एक ताम्रपात्रमें स्वर्णकमल स्थापित करे तथा उसके ऊपर स्वर्णमयी भगवान् सूर्यकी द्विभुज प्रतिमा स्थापित करे, साथ ही एक सुवर्णमयी सवत्सा गौ भी स्थापित करे। इनका पूजन कर विद्वान् ब्राह्मणको यह सब सामग्री निवेदित कर दे।

इस प्रकार जो स्त्री-पुरुष इस व्रतको वर्षभर सम्पन्न कर विधिपूर्वक उद्यापन करते हैं, वे नीरोग, धार्मिक, धन-धान्य, पुत्र-पौत्रसे सम्पन्न हो जाते हैं और अन्तमें सूर्यलोकको प्राप्त करते हैं।

भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—राजन्! अब मैं संक्रान्तिके समय किये जानेवाले उद्यापनरूप अन्य व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जो इस लोकमें समस्त कामनाओंके फलका प्रदाता और परलोकमें अक्षय फलदायक है। सूर्यके उत्तरायण या दक्षिणायनके दिन अथवा विषुवयोगमें इस संक्रान्ति-व्रतका आरम्भ करना चाहिये। इस व्रतमें संक्रान्तिके पहले दिन एक बार भोजन करके (रात्रिमें शयन करे।) संक्रान्तिके दिन प्रातःकाल दातून करनेके पश्चात् तिलमिश्रित जलसे स्नान करना चाहिये। सूर्य-संक्रान्तिके दिन भूमिपर चन्दनसे कर्णिकासहित अष्टदल कमलकी रचना करे और उसपर सूर्यका

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

आवाहन करे। कर्णिकामें 'सूर्याय नमः', पूर्वदलपर 'आदित्याय नमः', अग्निकोणस्थित दलपर 'समाधिषे नमः', दक्षिणदलपर 'ऋद्धमण्डलाय नमः', नैऋत्यकोणवाले दलपर 'सवित्रे नमः', पश्चिमदलपर 'वरुणाय नमः', वायव्यकोणस्थित दलपर 'सप्तसप्तये नमः', उत्तरदलपर 'मार्तण्डाय नमः' और ईशानकोणवाले दलपर 'विष्णवे नमः'—इन मन्त्रोंसे सूर्यदेवको स्थापित कर उनकी बार-बार अर्चना करे। तत्पश्चात् वेदीपर भी चन्दन, पुष्पमाला, फल और खाद्य पदार्थोंसे उनकी पूजा करनी चाहिये और अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। पुनः अपनी शक्तिके अनुसार सोनेका कमल बनवाकर उसे घृतपूर्ण पात्र और कलशके साथ ब्राह्मणको दान कर दे। तत्पश्चात् चन्दन और पुष्पयुक्त जलसे भूमिपर सूर्यदेवको अर्घ्य प्रदान करे (अर्घ्यका मन्त्रार्थ इस प्रकार है—) 'अनन्त! आप ही विश्व हैं, विश्व आपका स्वरूप है, आप विश्वमें सर्वाधिक तेजस्वी, स्वयं उत्पन्न होनेवाले, धाता और ऋग्वेद, सामवेद एवं यजुर्वेदके स्वामी हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है।' इस विधिसे मनुष्यको प्रत्येक मासमें सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये अथवा (यदि ऐसा करनेमें असमर्थ हो तो) वर्षकी समाप्तिके दिन यह सारा कार्य बारह बार करे (दोनोंका

फल समान ही है)।

एक वर्ष व्यतीत होनेपर घृतमिश्रित खीरसे अग्नि और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भलीभाँति संतुष्ट करे तथा बारह गौ एवं रत्नसहित स्वर्णमय कमलके साथ कलशोंको दान कर दे। इसी प्रकार सोने, चाँदी अथवा ताँबेकी शेषनागसहित पृथ्वीकी प्रतिमा बनवाकर दान करना चाहिये। जो ऐसा करनेमें असमर्थ हों, वे आटेकी शेषसहित पृथ्वीकी प्रतिमा बनाकर स्वर्णनिर्मित सूर्यके साथ दान कर सकता है। जबतक इस मृत्युलोकमें महेन्द्र आदि देवगणों, हिमालय आदि पर्वतों और सातों समुद्रोंसे युक्त पृथ्वीका अस्तित्व है, तबतक स्वर्गलोकमें अखिल गन्धर्वसमूह उस व्रतीकी भलीभाँति पूजा करते हैं। पुण्य क्षीण होनेपर वह सृष्टिके आदिमें उत्तम कुल और शीलसे सम्पन्न होकर भूतलपर सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है। वह सुन्दर रूप और सुन्दर पत्नीसे युक्त होता है, बहुत-से पुत्र एवं भाई-बन्धु उसके चरणोंकी वन्दना करते हैं। इस प्रकार जो मनुष्य सूर्य-संक्रान्तिकी इस पुण्यमयी अखिल विधिको भक्तिपूर्वक पढ़ता या श्रवण करता है अथवा इसे करनेकी सम्मति देता है, वह ही इन्द्रलोकमें देवताओंद्वारा पूजित होता है। (अध्याय ११५-११६)

भद्राका चरित्र एवं उसके व्रतकी विधि

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! लोकमें भद्रा विधि नामसे प्रसिद्ध है, वह कैसी है, कौन है, वह किसकी पुत्री है, उसका पूजन किस विधिसे किया जाता है? कृपया आप बतानेका कष्ट करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! भद्रा भगवान् सूर्यनारायणकी कन्या है। यह भगवान् सूर्यकी पत्नी छायासे उत्पन्न है और शनैश्चरकी सगी बहिन है। वह काले वर्ण, लम्बे केश, बड़े-बड़े दाँत

और बहुत ही भयंकर रूपवाली है। जन्मते ही वह संसारका ग्रास करनेके लिये दौड़ी, यज्ञोंमें विघ्न-बाधा पहुँचाने लगी और उत्सवों तथा मङ्गल-यात्रा आदिमें उपद्रव करने लगी और पूरे जगत्को पीड़ा पहुँचाने लगी। उसके उच्छृङ्खल स्वभावको देखकर भगवान् सूर्य अत्यन्त चिन्तित हो उठे और उन्होंने शीघ्र ही उसका विवाह करनेका विचार किया। जब जिस-जिस भी देवता, असुर,

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  • उत्तरपर्व *

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किन्नर आदिसे सूर्यनारायणने विवाहका प्रस्ताव रखा, तब उस भयंकर कन्यासे कोई भी विवाह करनेको तैयार न हुआ। दुःखित हो सूर्यनारायणने अपनी कन्याके विवाहके लिये मण्डप बनवाया, पर उसने मण्डप-तोरण आदि सबको उखाड़कर फेंक दिया और सभी लोगोंको कष्ट देने लगी। सूर्यनारायणने सोचा कि इस दुष्टा, कुरूपा, स्वेच्छाचारिणी कन्याका विवाह किसके साथ किया जाय। इसी समय प्रजाके दुःखको देखकर ब्रह्माजीने भी सूर्यके पास आकर उनकी कन्याद्वारा किये गये दुष्कर्मोंको बतलाया। यह सुनकर सूर्यनारायणने कहा—‘ब्रह्मन्! आप ही तो इस संसारके कर्ता तथा भर्ता हैं, फिर आप मुझसे ऐसा क्यों कह रहे हैं। जो भी आप उचित समझे वही करें।’ सूर्यनारायणका ऐसा वचन सुनकर ब्रह्माजीने विष्टिको बुलाकर कहा—‘भद्रे! वव, बालव, कौलव आदि करणोंके अन्तमें तुम निवास करो और जो व्यक्ति यात्रा, प्रवेश, माङ्गल्य कृत्य, खेती, व्यापार, उद्योग आदि कार्य तुम्हारे समयमें करे, उन्हींमें तुम विघ्न करो। तीन दिनतक किसी प्रकारकी बाधा न डालो। चौथे दिनके आधे भागमें देवता और असुर तुम्हारी पूजा करेंगे। जो तुम्हारा आदर न करें उनका कार्य तुम ध्वस्त कर देना।’ इस प्रकार विष्टिको उपदेश देकर ब्रह्माजी अपने धामको चले गये, इधर विष्टि भी देवता, दैत्य, मनुष्य सब प्राणियोंको कष्ट देती हुई घूमने लगी। महाराज! इस तरहसे भद्राकी उत्पत्ति हुई और वह अति दुष्ट

प्रकृतिकी है, इसलिये माङ्गलिक कार्योंमें उसका अवश्य त्याग करना चाहिये।

भद्रा पाँच घड़ी मुखमें, दो घड़ी कण्ठमें, ग्यारह घड़ी हृदयमें, चार घड़ी नाभिमें, पाँच घड़ी कटिमें और तीन घड़ी पुच्छमें स्थित रहती है। जब भद्रा मुखमें रहती है तब कार्यका नाश होता है, कण्ठमें धनका नाश, हृदयमें प्राणका नाश, नाभिमें कलह, कटिमें अर्थभ्रंश होता है, पर पुच्छमें निश्चितरूपसे विजय एवं कार्य-सिद्धि हो जाती है१।

भद्राके बारह नाम हैं—(१) धन्या, (२) दधिमुखी, (३) भद्रा, (४) महामारी, (५) खरानना, (६) कालरात्रि, (७) महारुद्रा, (८) विष्टि, (९) कुलपुत्रिका, (१०) भैरवी, (११) महाकाली तथा (१२) असुरक्षयकरी।

इन बारह नामोंका प्रातःकाल उठकर जो स्मरण करता है, उसे किसी भी व्याधिका भय नहीं होता। रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है और सभी ग्रह अनुकूल हो जाते हैं। उसके कार्योंमें कोई विघ्न नहीं होता। युद्धमें तथा राजकुलमें वह विजय प्राप्त करता है२। जो विधिपूर्वक नित्य विष्टिका पूजन करता है, निःसंदेह उसके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। अब मैं भद्राके व्रतकी विधि बता रहा हूँ—

राजन्! जिस दिन भद्रा हो उस दिन उपवास करना चाहिये। यदि रात्रिके समय भद्रा हो तो दो दिनतक एकभुक्त व्रत करना चाहिये। एक प्रहरके बाद भद्रा हो तो तीन प्रहरतक उपवास करना चाहिये अथवा एकभुक्त रहना चाहिये। स्त्री अथवा

१-मुखे तु घटिकाः पञ्च द्वे कण्ठे तु सदा स्थिते। हृदि चैकादश प्रोक्ताश्चतस्रो नाभिमण्डले ॥

कट्यां पञ्चैव विज्ञेयास्तिस्रः पुच्छे जयावहाः। मुखे कार्यविनाशाय ग्रीवाध्यां धननाशिनी ॥

हृदि प्राणहरा ज्ञेया नाभ्यां तु कलहावहा। कट्यामर्थपरिभ्रंशो विष्टिपुच्छे ध्रुवो जयः ॥

(उत्तरपर्व ११७। २३—२५)

२-धन्या दधिमुखी भद्रा महामारीखरानना। कालरात्रिर्महारुद्रा विष्टिश्च कुलपुत्रिका ॥

भैरवी च महाकाली असुराणां क्षयं करी। द्वादशैव तु नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् ॥

न च व्याधिर्भवेत् तस्य रोगी रोगात्ममुच्यते। ग्रहाः सर्वस्गकुलाः स्मृन् च विघ्नं विघ्नं जायते ॥

रणे राजकुले द्वे सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ (उत्तरपर्व ११७। २७—३०)

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५१८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

पुरुष व्रतके दिन सुगन्ध आमलक लगाकर सर्वौषधि-युक्त जलसे स्नान करे अथवा नदी आदिपर जाकर विधिपूर्वक स्नान करे। देवता एवं पितरोंका तर्पण तथा पूजन कर कुशाकी भद्राकी मूर्ति बनाये और गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उसकी पूजा करे। भद्राके बारह नामोंसे एक सौ आठ बार हवन करनेके बाद तिल और पायस ब्राह्मणको भोजन कराकर स्वयं भी मौन होकर तिलमिश्रित कृशरानका भोजन करना चाहिये। फिर पूजनके अन्तमें इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—

छायासूर्यसुते देवि विष्टिरिष्टार्धदायिनि।

पूजितासि यथाशक्त्या भद्रे भद्रप्रदा भव॥

(उत्तरपर्व ११७। ३९)

इस प्रकार सत्रह भद्राव्रत कर अन्तमें उद्यापन करे। लोहेकी पीठपर भद्राकी मूर्तिको स्थापित कर काला वस्त्र पहनाकर गन्ध, पुष्प आदिसे पूजन कर प्रार्थना करे। लोहा, तैल, तिल, बछड़ासहित काली गाय, काला कम्बल और यथाशक्ति दक्षिणाके साथ वह मूर्ति ब्राह्मणको दान कर देना चाहिये और विसर्जन करना चाहिये। इस विधिसे जो भी व्यक्ति भद्राव्रत और व्रतका उद्यापन करता है, उसके किसी भी कार्यमें विघ्न नहीं पड़ता। भद्राव्रत करनेवाले व्यक्तिको प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी तथा ग्रह आदि कष्ट नहीं देते। उसका इष्टसे वियोग नहीं होता और अन्तमें उसे सूर्यलोककी प्राप्ति होती है*। (अध्याय ११७)

महर्षि अगस्त्यकी कथा और उनके अर्घ्य-दानकी विधि

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! अब आप सभी पापोंको दूर करनेवाले अगस्त्यमुनिके चरित्र, अर्घ्य-दानकी विधि और अगस्त्योदय-कालका वर्णन कीजिये।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! एक बार देवश्रेष्ठ मित्र और वरुण दोनों मन्दराचलपर कठिन तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्यामें बाधा डालनेके लिये इन्द्रने उर्वशी अप्सराको भेजा। उसे देखकर दोनों क्षुब्ध हो उठे। अपने मनके विकारको जानकर उन्होंने अपना तेज एक कुम्भमें स्थापित कर दिया। राजा निमिके शापसे उसी कुम्भसे प्रथम महर्षि वसिष्ठका अनन्तर दिव्य तपोधन महात्मा अगस्त्यका प्रादुर्भाव हुआ।

अगस्त्यमुनिका विवाह लोपामुद्रासे हुआ। अनन्तर विप्रोंसे घिरे हुए अगस्त्यमुनि अपनी

पत्नीके साथ रहकर मलयपर्वतके एक प्रदेशमें वैखानस-विधिके अनुसार अत्यन्त कठोर तप करने लगे। वे बहुत कालतक तपस्या करते रहे, उसी समय बड़े ही दुराचारी और ब्राह्मणोंद्वारा किये जा रहे यज्ञोंका विध्वंस करनेवाले दो दैत्य जिनका नाम इल्वल और वातापि था, वहाँ उपस्थित हुए। ये दोनों बड़े ही मायावी थे। इन दोनोंका प्रतिदिनका कार्य यह था कि एक भाई मेघ बनकर विविध प्रकारके भोजनोंका रूप धारण कर लेता और दूसरा भाई श्राद्धमें भोजन करने-हेतु ब्राह्मणोंको निमन्त्रण देकर बुलाता और भोजन कराता। भोजन कर लेनेके तुरंत बाद ही इल्वल अपने भाईका नाम लेकर पुकारता। दैत्यकी पुकार सुनते ही उसका दूसरा भाई ब्राह्मणोंके पेटको चौरता हुआ बाहर निकल

  • भद्राके विषयमें ज्योतिष-ग्रन्थोंमें विस्तारसे वर्णन मिलता है, विशेषकर मुहूर्त-चिन्तामणिकी पीयूषधारा व्याख्यामें। पञ्चाङ्गोंकी यह व्यापक वस्तु है। यह प्रायः प्रत्येक द्वितीया, तृतीया, सप्तमी, अष्टमी, द्वादशी और त्रयोदशीको लागि रहती है। इसका पूरा समय प्रायः २४ घण्टेका होता है। इस अध्यायमें उसके रहस्यको ठीकसे समझानेका प्रयत्न किया गया है और उसकी शान्तिका भी उपाय बतलाया है।

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  • उत्तरपर्व *

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जाता था। इस प्रकार उन दोनों दैत्योंने अनेक ब्राह्मणों तथा मुनियोंको मार डाला।

एक दिनकी बात है, इल्वलने भुगुवंशमें उत्पन्न ब्राह्मणोंके साथ अगस्त्यमुनिको भोजनके लिये आमन्त्रित किया। भोजनके समय अगस्त्यमुनिने इल्वलके द्वारा बनाया गया भोजन सारा-का-सारा खा डाला, पर मुनि निर्विकार होकर शुद्ध हो गये थे। इल्वलने पूर्वरीतिसे अपने भाई वातापिको पुकारकर कहा—‘भाई! अब क्यों विलम्ब कर रहे हो, मुनिके शरीरको चीरकर बाहर आ जाओ।’ इसपर अगस्त्यमुनिने कहा—‘अरे दुष्ट दैत्य! तुम्हारा भाई वातापि तो उदरमें ही भस्म होकर समाप्त हो गया, अब वह बाहर कहाँसे आयेगा। यह सुनकर इल्वल बहुत ही क्रुद्ध हो उठा, परंतु अगस्त्यमुनिने उसको भी अपनी क्रुद्ध दृष्टिसे जलाकर भस्म कर डाला। उन दोनों दैत्योंके मारे जानेपर शेष दैत्य भी मुनिके वैरको स्मरण करते हुए भयभीत होकर समुद्रमें जाकर छिप गये। वे रात्रिके समय समुद्रसे बाहर निकलकर मुनियोंका भक्षण करते, यज्ञपात्र फोड़ डालते और पुनः समुद्रमें जाकर छिप जाते। दैत्योंके इस प्रकारके उत्पातको देखकर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र आदि सभी देवता आपसमें विचारकर महर्षि अगस्त्यजीके पास आकर बोले—‘ब्रह्मर्षि! आप समुद्रके जलको सोख लीजिये।’ यह सुनकर अगस्त्यजीने अपनेमें आग्रेयी धारणाका अवधान कर समुद्रके जलका पान कर लिया। समुद्रके सूख जानेपर देवताओंने उन सभी दैत्योंका संहार कर डाला।

इस प्रकार महर्षि अगस्त्यने इस संसारको निष्कण्टक कर दिया। उसके बाद गङ्गाजीके जलसे समुद्र पुनः भर गया। तब देवता और दैत्योंने मिलकर मन्दराचल पर्वतको मथानी तथा नागराज वासुकिको रस्सी बनाकर समुद्रका मन्थन

किया। उस समय समुद्रसे चन्द्रमा, लक्ष्मी, अमृत, कौस्तुभमणि, ऐरावत हाथी आदि उत्तम-उत्तम रत्न निकले। समुद्रसे ही अति भयंकर कालकूट विष भी निकला, जिसके गन्धमात्रसे ही देवता और दैत्य सभी मूर्च्छित होने लगे। इस कालकूट विषका कुछ भाग भगवान् शंकरने पान कर लिया। जिससे वे नीलकण्ठ कहलाये, तब ब्रह्माजीने कहा कि ‘भगवान् शंकरके अतिरिक्त संसारमें ऐसा किसीमें सामर्थ्य नहीं है, जो इस शेष विषका पान करे, अतः देवगणो! आप सब दक्षिण दिशामें लङ्काके समीप निवास करनेवाले अगस्त्यमुनिके पास जायँ, वे हमलोगोंके शरणदाता हैं। ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर सभी देवता अगस्त्यमुनिके पास गये। मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यने सबको भयभीत पाकर उन्हें यह आश्वासन दिया कि मैं उस विषको अपने तपोबलके प्रभावसे हिमालय पर्वतमें प्रविष्ट कर दूँगा। तब महर्षि अगस्त्यजीके तपोबलके प्रभावसे वही विष हिमालयके शिखरों, निकुञ्जों तथा वृक्षोंमें बिखर गया और शेष बचे हुए विषको धतूर, अर्क आदि वृक्षोंमें उन्होंने बाँट दिया। उसी हिमालय पर्वतके विषसे युक्त वायुके प्रभावसे प्राणियोंमें अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न होते हैं, जिससे प्राणियोंको कष्ट सहन करना पड़ता है। उस विषयुक्त वायुका प्रभाव वृषकी संक्रान्तिसे लेकर सिंह-संक्रान्तिक बना रहता है। बादमें उसका वेग शान्त हो जाता है। इस प्रकार कालकूट विषके विनाशकारी प्रभावसे अगस्त्यमुनिने समस्त प्राणियोंकी रक्षा की।’

पूर्वकालमें प्रजाकी बहुत वृद्धि हुई। उस समय ब्रह्माजीने अपने शरीरसे मृत्युको उत्पन्न किया और मृत्युने प्रजाका भयंकर विनाश किया। एक दिन वह मृत्यु अगस्त्यमुनिके समीप भी आयी। अगस्त्यजीने क्रोधभरी दृष्टिसे मृत्युको तत्काल

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भस्म कर दिया। पुनः ब्रह्माजीको दूसरी व्याधिरूप मृत्युकी उत्पत्ति करनी पड़ी।

दण्डकारण्यमें श्वेत नामक एक राजा रहता था, स्वर्ग जानेपर भी वह प्रतिदिन क्षुधाके कारण अपने मांसको ही खाकर कष्ट भोग रहा था। एक दिन दुःखी हो राजाने अगस्त्यमुनिसे कहा—‘महाराज! सभी वस्तुओंका दान तो मैंने किया है, परंतु अन्न और जलका दान मैं नहीं कर सका और न मैंने श्राद्ध ही किया। इसलिये मुझे इस रूपमें प्रतिदिन अपना ही मांस खाना पड़ रहा है। प्रभो! आप दया करके कोई उपाय कीजिये, जिससे कि मुझे इस विपत्तिसे छुटकारा प्राप्त हो।’ राजाद्वारा इस प्रकार दीन वचन सुनकर अगस्त्यमुनि दयार्द्र हो उठे और उन्होंने रत्नोद्वारा श्राद्ध कराया। श्राद्धके फलस्वरूप सहसा वह दिव्य देह धारणकर स्वर्गलोकमें दिव्य भोग भोगने लगा।

एक बार विन्ध्याचल पर्वतके हृदयमें यह प्रश्न उठा कि सूर्यनारायण मेरुपर्वतकी परिक्रमा तो करते हैं, पर मेरी नहीं करते। क्यों न मैं उनका मार्ग रोक दूँ। मनमें यह निश्चय कर विन्ध्यगिरि प्रतिदिन बढ़ने लगा। विन्ध्याचलको बढ़ते हुए देखकर सभी देवता व्याकुल हो उठे और उन्होंने अगस्त्यमुनिके पास जाकर निवेदन किया—‘प्रभो! आप कृपाकर सूर्यके मार्गको अवरुद्ध करनेवाले उस विन्ध्यगिरिको रोकें और उसे स्थिर कर दें।’ देवताओंका विनययुक्त वचन सुनकर अगस्त्यजीने विन्ध्याचल पर्वतके पास पहुँचकर कहा—‘पर्वतोत्तम! मैं तीर्थयात्रा करने जा रहा हूँ, तुम थोड़ा नीचे हो जाओ तो उस पार चला जाऊँ।’ मुनिकी आज्ञासे विन्ध्याचल नीचा हो गया। अगस्त्यमुनिने पर्वतको लाँघकर कहा—‘जबतक मैं तीर्थयात्रासे वापस नहीं आ जाता, तबतक तुम इसी स्थितिमें रहना।’ इतना कहकर

अगस्त्यमुनि दक्षिण दिशाको चले गये और फिर वापस नहीं लौटे। आज भी आकाशमें दक्षिण दिशामें देदीप्यमान हो रहे हैं और लोपामुद्राके साथ महर्षि अगस्त्यकी यह त्रिलोकी वन्दना करता है।

एक समयकी बात है, अपनी पत्नी लोपामुद्राकी इच्छापर अगस्त्यजीने कुबेरको बुलाकर आनन्दके सभी ऐश्वर्य महल, शय्या, वस्त्राभूषण आदि उन्हें उपलब्ध करा दिये और लोपामुद्राके साथ अगस्त्यजी बहुत समयतक आनन्दित होते रहे।

राजन्! इस प्रकार अगस्त्यमुनिके अनेक अद्भुत दिव्य चरित्र हैं। आप भी भगवान् अगस्त्यके लिये अर्घ्य प्रदान करें, इससे आपको महान् पुण्य प्राप्त होगा। उनके अर्घ्य-दानकी विधि इस प्रकार है—

जब कन्या राशिमें सूर्यके सात अंश (५।२२) शेष रहते हैं, उसी दिन महर्षि अगस्त्यका पूर्वमें उदय होता है, उसी समय उनके निमित्त अर्घ्य देना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि प्रातः श्वेत तिलोंसे स्नानकर श्वेत वस्त्र, श्वेत पुष्पोंकी माला आदिसे विभूषित होकर पञ्चरत्नसहित एक सुवर्ण कलश स्थापित करे। उसके ऊपर अनेक प्रकारके भोज्य पदार्थ और सप्तधान्यसहित घीका पात्र रखे। उसके ऊपर जटाधारी, हाथमें कमण्डलु धारण किये हुए, शिष्योंके साथ अगस्त्यमुनिकी स्वर्ण-प्रतिमा बनाकर स्थापित करना चाहिये। तत्पश्चात् श्वेत चन्दन, चमेलीके पुष्प, उत्तम धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उनकी पूजा करनेके बाद अर्घ्य देना चाहिये। खजूर, नारियल, कूम्भाण्ड, खीरा, ककड़ी, कर्कोटक, आरवेल्ल, बीजपूर (बिजौरा), बैंगन, अनार, नारंगी, केला, कुशा, काश, दूर्वाके अंकुर, नीलकमल तथा अंकुरित अन्न—यह सभी सामग्री एक बाँसके पात्रमें रखकर सुवर्ण, चाँदी अथवा ताँबेका अर्घ्यपात्र नम्र हो सिरसे लगाकर प्रसन्न-चित्तसे जानुओंको पृथ्वीपर

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  • उत्तरपर्व *

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टेककर दक्षिणाभिमुख हो इन मन्त्रोंसे भक्तिपूर्वक भगवान् अगस्त्यको अर्घ्य प्रदान करना चाहिये— काशपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसम्भव । मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोनो नमोऽस्तु ते ॥ विन्ध्यवृद्धिक्षयकर मेघतोयविषापह । रत्नवल्लभ देवर्षे लङ्कावास नमोऽस्तु ते ॥ वातापिर्भक्षितो येन समुद्राः शोषिताः पुरा । लोपामुद्रापतिः श्रीमान् योऽसौ तस्मै नमो नमः ॥ येनोदितेन पापानि प्रलयं यान्ति व्याधयः । तस्मै नमोऽस्त्वगस्त्याय सशिष्याय सुपुत्रिणे ॥

(उत्तरपर्व ११८।६१—७२)

‘देवर्षे ! आपका वर्ण काश-पुष्पके समान है, आप अग्नि और मरुत्से उद्भूत हैं। मित्रावरुणके पुत्र कुम्भयोनो ! आपको नमस्कार है। आप वृष्टिमें अमृतका संचार करनेवाले हैं, आपने बढ़ते हुए विन्ध्यगिरिको निवृत्त किया था और आप दक्षिण दिशामें निवास करते हैं, आपको नमस्कार है। आपने वातापि राक्षसको भस्म कर दिया तथा समुद्रको सोख लिया, लोपामुद्राके पति भगवान् अगस्त्य ! आपको बार-बार नमस्कार है। आपके

उदय होनेपर सारी व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं, शिष्यों और पुत्रोंके साथ भगवान् ! आपको नमस्कार है।’

इस प्रकार अर्घ्य प्रदान कर वह प्रतिमा विद्वान् श्रेष्ठ ब्राह्मणको दानमें दे दे।

किसी एक फल अथवा धान्य आदिका एक वर्षतक त्याग करे। इस विधिसे यदि ब्राह्मण सात वर्षतक अर्घ्य दे तो चारों वेदोंका ज्ञाता और सभी शास्त्रोंका मर्मज्ञ हो जाता है। क्षत्रिय समस्त पृथ्वीको जीतकर राजा बनता है। वैश्य धन-धान्य तथा पशुओं एवं समृद्धिको प्राप्त करता है तथा शुद्ध धन, सम्मान, आरोग्य प्राप्त करता है और स्त्रियोंको सौभाग्य, ऋद्धि-वृद्धि तथा पुत्रकी प्राप्ति होती है। विधवाको अनन्त पुण्यकी प्राप्ति होती है, कन्याको श्रेष्ठ पति प्राप्त होता है तथा रोगी अगस्त्यमुनिको अर्घ्य देकर रोगसे छुटकारा पा जाता है। जिस देशमें भगवान् अगस्त्यका इस विधिसे पूजन होता है और अर्घ्य दिया जाता है, वहाँ कभी दुर्भिक्ष, अकाल आदिका भय नहीं होता। अगस्त्य-ऋषिके आख्यानको सुननेवाले सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो स्वर्गलोकको प्राप्त करते हैं*। (अध्याय ११८)

नवोदित चन्द्र, गुरु एवं शुक्रको अर्घ्य देनेकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज ! अब मैं नवोदित चन्द्रमाको अर्घ्य देनेकी विधि बता रहा हूँ। प्रतिमास शुक्ल पक्षकी द्वितीयाको प्रदोषकालके समय भूमिपर गोबरका एक मण्डल बनाकर उसमें रोहिणीसहित चन्द्रमाकी प्रतिमाको स्थापित करके श्वेत चन्दन, श्वेत पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, अनेक प्रकारके फल, नैवेद्य, दही, श्वेत वस्त्र तथा दूर्वाङ्गुर

आदिसे उनका पूजन करे और इस मन्त्रसे चन्द्रमाको अर्घ्य प्रदान करे—

नवो नवोऽसि मासान्ते जायमानः पुनः पुनः ।

आप्यायस्व स मे त्वेवं सोमराज नमो नमः ॥

(उत्तरपर्व ११९।६)

जो व्यक्ति इस विधिसे चन्द्रमाको प्रतिमास अर्घ्य देता है, उसे पुत्र, पौत्र, धन, पशु, आरोग्य

  • इस व्रतका उल्लेख मत्स्यपुराण अध्याय ६१ आदिमें तथा इनकी कथा, इनका अनेक आश्रमोंमें निवास और अगस्त्यार्घ्यपर ऋग्वेद १।१७९।६ से लेकर अग्नि, गरुड, बृहद्भर्म आदि पुराणोंतकमें अपार सामग्री भरी पड़ी है। हेमाद्रि, गोपाल तथा रत्नाकर आदिने भी इन्हें अपने व्रत-निबन्धोंमें कई पृष्ठोंमें संगृहीत किया है।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

आदिकी प्राप्ति होती है तथा सौ वर्षतक सुख भोगकर अन्तमें वह चन्द्रलोकको और फिर मोक्षको प्राप्त करता है।

राजन्! शुक्रके दोषकी निवृत्तिके लिये यात्राके आरम्भमें, गमनकालमें और शुक्रोदयके समय शुक्रदेवकी पूजा अवश्य करनी चाहिये। शुक्रकी पूजन-विधिको मैं बता रहा हूँ, उसे आप ध्यानपूर्वक सुनें—

सुवर्ण, चाँदी अथवा कांस्यके पात्रमें मोतीयुक्त चाँदीकी शुक्रकी मूर्तिको पुष्प तथा श्वेत वस्त्रसे अलंकृतकर श्वेत चावलोंपर स्थापित करे। षोडशोपचार अथवा पञ्चोपचारसे शुक्रदेवकी पूजा करके इस मन्त्रसे उन्हें अर्घ्य प्रदान करे—

नमस्ते सर्वदेवेश नमस्ते भृगुनन्दन।

कवे सर्वार्थसिद्धार्थ गृहाणार्घ्य नमोऽस्तु ते ॥

(उत्तरपर्व १२०।४)

तदनन्तर प्रणामपूर्वक मूर्तिको विसर्जित कर

सवत्सा गौके साथ वह प्रतिमा तथा अन्य सभी सामग्री ब्राह्मणको दे दे। इस विधिसे शुक्रदेवकी पूजा करनेसे सभी मनःकामनाओंकी पूर्ति हो जाती है और फसल अच्छी होती है।

इसी प्रकार सुवर्ण आदिके पात्रमें सुवर्णकी बृहस्पतिकी मूर्ति स्थापित करे। प्रतिमाको सर्पयुक्त जल तथा पञ्चगव्यसे स्नान कराकर पीत पुष्प और पीत वस्त्रोंसे अलंकृत करे। अनन्तर विविध उपचारोंसे उनका पूजन कर अर्घ्य प्रदान कर घीसे हवन करे। सवत्सा गौके साथ वह बृहस्पतिकी मूर्ति दक्षिणासहित ब्राह्मणको दान कर दे। यात्राकाल, बृहस्पतिकी संक्रान्ति और उनके उदयके समय जो इनका पूजन करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। शुक्र तथा बृहस्पतिका इस विधिसे पूजन करनेसे पूजकके घरमें उनका दोष नहीं होता।

(अध्याय ११९-१२०)

प्रकीर्ण-व्रत *

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज! अब मैं अत्यन्त गुप्त विविध प्रकीर्ण व्रतोंका वर्णन कर रहा हूँ। जो प्रातः स्नानकर अश्वत्थ-वृक्षका पूजन कर ब्राह्मणोंको तिलसे भरे हुए पात्रका दान करता है, उसे कृत-अकृत किसी कार्यके लिये शोक नहीं करना पड़ता। यह पात्रव्रत सभी पापोंको दूर करनेवाला है। सुवर्णकी बृहस्पतिकी प्रतिमा बनाकर उसे पीत वस्त्रादिसे अलंकृतकर पुण्य दिनमें ब्राह्मणको दान करना चाहिये। यह वाचस्पतिव्रत बल और बुद्धिप्रदायक है। एकभुक्त रहकर लवण, कटु, तिक्त, जीरक, मरिच, हींग और सौंठसे युक्त पदार्थ तथा शिलाजीत—ये सात पदार्थ सात कुटुम्बी ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये, इस शिलाव्रतको

करनेसे लक्ष्मीलोककी तथा वाक्यटुता प्राप्त होती है। नक्तव्रतकर गाय, वस्त्र और सुवर्णका सुदर्शनचक्र तथा त्रिशूल गृहस्थ ब्राह्मणको दानमें दे और उन्हें प्रणाम कर 'शिवकेशवौ प्रीयेताम्' यह वाक्य कहे। यह शिवकेशवव्रत महापातकोंको भी नष्ट कर देता है। एक वर्षतक एकभुक्त रहकर सुवर्णका बना हुआ बैल और उपस्करणसहित तिलधेनु ब्राह्मणको दान करे। इस व्रतको रुद्रव्रत कहते हैं। यह व्रत सभी प्रकारके पाप एवं शोकको दूर करता है और व्रतीको शिवलोककी प्राप्ति कराता है।

पञ्चमी तिथिके दिन सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नानकर गृहस्थाश्रमके सात उपस्करणों—घर, ऊखल, सूप, सिल, थाली, घड़ा तथा चूल्हाका दान गृहस्थ

  • मत्स्यपुराणके १०१ वें अध्याय तथा पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड, अध्याय २० में भी स्वल्प भेदके साथ इन व्रतोंका वर्णन है।

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  • उत्तरपर्व *

५२३

ब्राह्मणको देना चाहिये। इसे गृहव्रत कहते हैं। इस व्रतको करनेसे सभी सुख प्राप्त होते हैं। इस व्रतका उपदेश अत्रिमुनिने अनसूयाको किया था।

सुवर्णका कमल तथा नील कमल शर्करापात्रसहित श्रद्धासे गृहस्थ ब्राह्मणको दान देना चाहिये। यह नीलव्रत है। इस व्रतको जो कोई भी व्यक्ति करता है, उसे विष्णुलोककी प्राप्ति होती है। आषाढ़ आदि चार महीनोंमें तैलाभ्यङ्ग नहीं करना चाहिये। अन्तमें पारणामें तिलके तेलसे भरा हुआ नया घड़ा ब्राह्मणको दे और घी तथा पायसयुक्त भोजन कराये, इस व्रतको प्रीतिव्रत कहते हैं। इसे भक्तिपूर्वक करनेसे विष्णुलोककी प्राप्ति होती है।

चैत्र मासमें दही, दूध, घी और गुड़, खाँड़, ईखके द्वारा बने पदार्थोंका त्याग करना चाहिये और बादमें दो ब्राह्मणोंकी पूजा कर दही, दूध तथा दो वस्त्र, रससे भरे पात्र आदि पदार्थ 'गौरी मे प्रीयताम्' कहकर ब्राह्मणको देना चाहिये। यह गौरीव्रत है। इस व्रतको जो करता है, उसे गौरीलोककी प्राप्ति होती है।

त्रयोदशीसे एक वर्षतक नक्तव्रत करनेके बाद पारणामें दो वस्त्रोंसहित सुवर्णका अशोक-वृक्ष तथा ब्राह्मणको दक्षिणा देकर 'प्रद्युम्नः प्रीयताम्' यह वाक्य कहना चाहिये। यह कामव्रत है। इस व्रतको करनेसे सभी प्रकारके शोक दूर हो जाते हैं तथा विष्णुलोककी प्राप्ति होती है। आषाढ़ आदि चार मासोंमें अपने नख नहीं काटने चाहिये और बैगनका भोजन भी नहीं करना चाहिये। अन्तमें कार्तिक पूर्णिमाके दिन घी और शहदसे भरे हुए घटके साथ सुवर्णका बैगन ब्राह्मणको दान दे। इसे शिवव्रत कहते हैं। शिवव्रत करनेवाला व्यक्ति रुद्रलोकको प्राप्त करता है। इसी प्रकार पूर्णिमाको एकभुक्तव्रत करनेके बाद चन्दनसे पूर्णिमाकी मूर्ति बनाकर उसका पूजन करे। अनन्तर

दूध, दही, घी, शहद और श्वेत शर्करा—इन पाँच सामग्रियोंसे भरे हुए पाँच घड़े पाँच ब्राह्मणोंको दानमें दे। इस व्रतको पञ्चव्रत कहते हैं। इस व्रतको करनेसे समस्त मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। हेमन्त और शिशिर-ऋतुमें उद्भूत पुष्पोंका त्याग कर फाल्गुनकी पूर्णिमाको यथाशक्ति सुवर्णके बने हुए तीन पुष्प ब्राह्मणको दान देकर 'शिवकेशवौ प्रीयेताम्' इस वाक्यका उच्चारण करना चाहिये। इसे सौगन्ध्यव्रत कहते हैं। इस व्रतके करनेसे शिरःप्रदेशसे सुगन्धि उत्पन्न होती रहती है और व्रतीको उत्तम लोककी प्राप्ति होती है।

फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको नमक नहीं खाना चाहिये। जो व्यक्ति एक वर्षतक नियमपूर्वक इस सौभाग्यव्रतको करके अन्तमें सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा कर गृहके साथ गृहस्थके उपयोगी सामग्रियों तथा उत्तम शय्याका दान देकर 'भवानी प्रीयताम्' इस वाक्यको कहता है, उसे गौरीलोककी प्राप्ति होती है। यह उत्तम सौभाग्यको प्रदान करनेवाला है।

संध्या-समय एक वर्षतक मौनव्रत रखकर पारणाकर तथा घृतकुम्भ, दो वस्त्र और घण्टा ब्राह्मणको दान करना चाहिये। इसे सारस्वतव्रत कहते हैं। यह व्रत विद्या और रूपको देनेवाला है। इस व्रतको करनेसे सरस्वतीलोककी प्राप्ति होती है।

एक वर्षतक पञ्चमी तिथिको उपवास करनेके बाद सुवर्णकमल और श्रेष्ठ गौ ब्राह्मणको दान देना चाहिये। इसे लक्ष्मीव्रत कहते हैं। यह व्रत कान्ति एवं सौभाग्यको प्रदान करता है। व्रतीको जन्म-जन्ममें लक्ष्मीकी प्राप्ति और अन्तमें विष्णुलोककी प्राप्ति होती है।

जो स्त्री चैत्र माससे आरम्भ कर नियमसे (प्रातःकाल) एक वर्षतक जलका पान करे और (भगवान् सूर्यके निमित्त) जलधारा प्रदान करे

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५२४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

और वर्षके अन्तमें घृतपूर्ण नवीन कलशका दान करे तो उसे सौभाग्य प्राप्त होता है। इसे धाराव्रत कहा गया है। यह सभी रोगोंका नाशक, कान्ति एवं सौभाग्य-प्रदायक तथा सपत्नीके दर्पको नाश करनेवाला है।

गौरीसहित रुद्र, लक्ष्मीसहित विष्णु और राज्ञीसहित भगवान् सूर्यकी मूर्तियों विधिपूर्वक स्थापित कर उनका पूजन करे, घण्टायुक्त गौ, दोहनी और दक्षिणाके साथ उस मूर्तिको ब्राह्मणको दान दे। इस व्रतको देवव्रत कहते हैं। इस व्रतको करनेसे शरीर दिव्य हो जाता है।

श्वेत चन्दन, श्वेत पुष्प आदिसे शिवलिङ्ग और विष्णुकी मूर्तिका प्रतिदिन एक वर्षतक उपलेपन करनेके बाद जलसे भरे हुए घटके साथ सुन्दर गाय ब्राह्मणको दान दे। यह शुक्लव्रत है। यह व्रत बहुत कल्याणकारी है। इस व्रतको करनेवाला शिवलोकको प्राप्त करता है।

अश्वत्थ, सूर्यनारायण और गङ्गाजीका नित्य प्रणामपूर्वक पूजनकर नौ वर्षतक एकभुक्तव्रत करे, अन्तमें सपत्नीके ब्राह्मणकी पूजा कर तीन गाय और सुवर्णका वृक्ष ब्राह्मणको दान दे। इस व्रतको कीर्तिव्रत कहते हैं। यह व्रत ऐश्वर्य और कीर्तिको देनेवाला है। प्रतिदिन गोबरका मण्डल बनाकर उसमें अक्षतोंद्वारा कमल बनाये, उसके ऊपर शिव, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य, गौरी तथा गणपतिको घीसे स्नान कराकर एक वर्षतक प्रतिदिन पूजन करनेके बाद सामवेदका गान करके अन्तमें आठ अंगुलके सुवर्ण-कमलसहित उत्तम गाय ब्राह्मणको दान दे। इस व्रतको सामव्रत कहते हैं। इस व्रतको करनेवाला व्यक्ति शिवलोकको प्राप्त करता है।

नवमीको एकभुक्तव्रत कर अन्तमें कन्याओंको भोजन कराये तथा उन्हें कंचुकी, दो वस्त्र प्रदान करे एवं सुवर्णका सिंहासन भी ब्राह्मणको दे। इस

व्रतको वीरव्रत कहते हैं। जो स्त्री इस व्रतको करती है, उसे अनेक जन्मोंतक सुन्दर रूप, अखण्ड सौभाग्य और सुखकी प्राप्ति होती रहती है। व्रतीको शिवलोककी प्राप्ति होती है। अमावास्यासे जो एक वर्षपर्यन्त श्राद्ध करता है और श्रद्धापूर्वक पाँच पयस्विनी सवत्सा गौ, पीले वस्त्र तथा जलपूर्ण कलश दान करता है, वह व्यक्ति अपने पूर्वजोंका उद्धारकर विष्णुलोकको प्राप्त करता है। यह पितृव्रत कहलाता है।

जो स्त्री एक वर्षतक ताम्बूलका त्यागकर अन्तमें सुवर्णके तीन ताम्बूल बनाकर उसमें चूनेकी जगह मोती रखकर तथा सुपारीके चूर्णके साथ गणेशको निवेदित कर ब्राह्मणको दान करती है, उसे कभी भी दुर्भाग्यकी प्राप्ति नहीं होती, साथ ही मुखमें उत्तम सुगन्ध और सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। यह पत्रव्रत है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ तथा आषाढ़—इन चार मासोंमें अथवा एक मास या एक पक्षपर्यन्त जलका अयाचितव्रत करना चाहिये। अन्तमें जलपूर्ण कलश, अन्न, वस्त्र, घी, ससधान्य, तिलपात्र और सुवर्ण ब्राह्मणको दे। इस व्रतको वारिव्रत कहते हैं। वारिव्रतको करनेवाला व्यक्ति एक कल्पपर्यन्त ब्रह्मलोकमें निवास करनेके बाद पृथ्वीपर चक्रवर्ती राजा होता है।

जो एक वर्षतक पञ्चामृतसे भगवान् शिव और भगवान् विष्णुको स्नान कराकर अन्तमें गाय, शङ्ख और सुवर्ण ब्राह्मणको दान करता है, वह बहुत कालतक शिवलोकमें निवास करता है और राजाका पद प्राप्त करता है। यह वृत्तिव्रत कहलाता है। जो व्यक्ति सर्वथा मांसाहारका परित्याग कर अन्तमें सुवर्णका हरिण और सवत्सा गौ ब्राह्मणको दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। इसे अहिंसाव्रत कहते हैं, यह सम्पूर्ण शान्तियोंको देनेवाला है। जो माघ मासमें प्रातःकाल

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  • उत्तरपर्व *

५२५

स्नानकर अन्तमें ब्राह्मण-दम्पतिकी वस्त्र, आभूषण, पुष्पमाला आदिसे पूजा कर उनको स्वादिष्ट भोजन कराता है, वह आरोग्य और सौभाग्यको प्राप्त करता है और कल्पपर्यन्त सूर्यलोकमें निवास करता है। इस व्रतको सूर्यव्रत कहते हैं।

जो आषाढ़ आदि चार मासोंमें प्रातःकाल स्नानकर कार्तिक पूर्णिमाके दिन घृतकुम्भ और गौ गृहस्थ ब्राह्मणको दान देकर अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मण-भोजन कराता है, उसकी सभी मनःकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और उसे अन्तमें विष्णुलोककी प्राप्ति होती है। यह वैष्णवव्रत कहलाता है। जो एक अयनसे दूसरे अयनतक मधु और घीका त्याग करके अन्तमें घी तथा गौ ब्राह्मणको दानकर घी और पायस ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, उसे शील और आरोग्यकी प्राप्ति होती है। इस व्रतको शीलव्रत कहते हैं। जो (नियतकालतक) प्रतिदिन संध्याके समय दीपदान करता है तथा अभक्ष्य पदार्थ एवं तेलका सेवन नहीं करता, फिर व्रत समाप्त होनेपर ब्राह्मणको दीपक, सुवर्णके बने चक्र, त्रिशूल और दो वस्त्र दान करता है, वह महान् तेजस्वी होता है। यह कान्ति प्रदान करनेवाला व्रत दीपव्रत कहलाता है।

जो स्त्री एकभुक्त रहकर एक सप्ताहतक गन्ध, पुष्प, रक्त चन्दन आदिसे भगवती गौरीकी पूजा करती है, साथ ही प्रत्येक दिन क्रम-क्रमसे कुमुदा, माधवी, गौरी, भवानी, पार्वती, उमा तथा काली— इन सात नामोंसे एक-एक सुवासिनी स्त्रीका पुष्प, चन्दन, कुंकुम, ताम्बूल तथा नारिकेल एवं अलंकारोंसे पूजनकर 'कुमुदा प्रीयताम्' इस प्रकारसे कहकर विसर्जन करती है तथा आठवें दिन उन्हीं पूजित सुवासिनी स्त्रियोंको निमन्त्रित कर उन्हें षड्दस भोजन आदिसे तृप्तकर वस्त्र, माला तथा आभूषण एवं दर्पण आदि प्रदान करती है, साथ ही एक

ब्राह्मणकी भी पूजा करती है, उसे सुन्दर देह और सौभाग्य प्राप्त होता है, इसे समसुन्दरकव्रत कहा जाता है। चैत्र मासमें सभी प्रकारके सुगन्धित पदार्थोंका त्याग करना चाहिये और अन्तमें सुगन्धद्रव्यसे पूर्ण एक सीपी, दो सफेद वस्त्र अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणाके साथ ब्राह्मणको दान देना चाहिये। इस व्रतको वरुणव्रत कहते हैं। इसको करनेसे सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं और वरुणलोककी प्राप्ति होती है।

वैशाख मासमें नमकका त्यागकर अन्तमें सवत्सा गौ ब्राह्मणको दे। यह कान्तिव्रत है। इस व्रतको करनेसे कीर्ति और कान्तिकी वृद्धि होती है तथा अन्तमें विष्णुलोककी प्राप्ति होती है। जो तीन पलसे अधिक परिमाणका सोनेका ब्रह्माण्ड बनाकर उसे तिलकी ढेरीमें रखे तथा 'मैं अहंकाररूपी तिलका दान करनेवाला हूँ', ऐसी भावना करके घीसे अग्निको तथा दक्षिणासे ब्राह्मणको तृप्त करे एवं तीन दिनतक तिलव्रती रहे। फिर माला, वस्त्र तथा आभूषणोंद्वारा ब्राह्मण-दम्पतिकी पूजन करके विश्वाम्नाकी तृप्तिके उद्देश्यसे किसी शुभ दिनमें तिलसहित ब्रह्माण्ड ब्राह्मणको दान करे तो ऐसा करनेवाला पुरुष पुनर्जन्मसे रहित ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। इसका नाम ब्रह्मव्रत है। यह मनुष्योंको मोक्ष देनेवाला है।

जो तीन दिनतक दुग्धका आहार कर सुवर्णसहित सवत्सा गौ तथा एक पलसे अधिक सुवर्णसे कल्पवृक्ष बनाकर चावलोंके ढेरपर स्थापित कर उत्तम वस्त्र और पुष्पमालाओंसे ढककर ब्राह्मणको दान करता है, उसे कल्पभर स्वर्गमें निवास-स्थान मिलता है, इसे कल्पव्रत कहते हैं। जो अयाचितव्रतकर सभी अलंकारोंसे अलंकृत एक श्रेष्ठ बछियाका व्यतीपात तथा ग्रहण, अयन-संक्रान्तिमें ब्राह्मणको दान करता है, उसे परलोकगमनमें

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५२६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कोई कष्ट नहीं होता तथा उसका मार्ग सुखदायी होता है, इसे द्वारव्रत कहते हैं।

जो एक वर्षतक अष्टमीको रात्रिमें एक बार भोजन करता है तथा अन्तमें ब्राह्मणको पयस्विनी गौका दान करता है, वह इन्द्रलोकमें जाता है। इसे सुगतिव्रत कहते हैं। जो हेमन्त और शिशिर-ऋतुमें ईधनका दान करता है और अन्तमें घी तथा गाय ब्राह्मणको दान करता है, वह आरोग्य, द्युति, कान्ति तथा ब्रह्मपदको प्राप्त करता है। यह वैश्वानरव्रत सभी पापोंका नाशक है। जो एकादशीको नक्तव्रतकर चैत्र मासके चित्रा नक्षत्रमें सुवर्णका शङ्कु और चक्र ब्राह्मणको दान करता है, वह कल्पपर्यन्त विष्णुलोकमें निवास कर पृथ्वीपर राजाका पद प्राप्त करता है। यह विष्णुव्रत कहलाता है। जो एक वर्षतक पञ्चमीको दुग्धाहार कर अन्तमें दो गाय ब्राह्मणको दान करता है, वह एक कल्पतक लक्ष्मीलोकमें निवास करता है। यह देवीव्रत कहलाता है। जो एक वर्षतक सप्तमीके दिन नक्तव्रत कर अन्तमें पयस्विनी गाय ब्राह्मणको दान करता है, उसे सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। इसे भानुव्रत कहते हैं। जो चतुर्थीको एक वर्षतक रात्रिमें भोजन करता है और अन्तमें आठ गौएँ अग्निहोत्री ब्राह्मणको दान करता है, उसके सभी तरहके विघ्न दूर हो जाते हैं। इसे विनायकव्रत कहते हैं। जो चातुर्मास्यमें फलोंका त्याग कर कार्तिकमें सुवर्णका फल, दो गौ, दो श्वेत वस्त्र और घीसे पूर्ण घट दक्षिणासहित ब्राह्मणको दान करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। इसे फलव्रत कहते हैं।

एक वर्षतक सप्तमीको उपवास कर अन्तमें सुवर्णका कमल बनाकर और कांस्यकी दोहनीसहित सवत्सा गौ पौराणिक ब्राह्मणको दान करनेसे सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। यह सौरव्रत है। जो बारह द्वादशियोंको उपवास करके अन्तमें यथाशक्ति

वस्त्रसहित जलपूर्ण बारह घट ब्राह्मणोंको दान करता है, उसके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। यह गोविन्दव्रत भगवान् गोविन्दके पदको प्राप्त करानेवाला है।

कार्तिक पूर्णिमाको वृषोत्सर्गकर रात्रिमें भोजन करना चाहिये। इस व्रतको वृषव्रत कहते हैं। इस व्रतको करनेसे गोलोककी प्राप्ति होती है। कुच्छ-प्रायश्चित्तेके अन्तमें गोदान कर यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। यह प्राजापत्यव्रत है। इससे पापशुद्धि होती है। जो एक वर्षतक चतुर्दशीको नक्तव्रत करके अन्तमें दो गायोंका दान करता है, वह शैवपदको प्राप्त करता है। यह त्र्यम्बकव्रत है। सात रात्रि उपवास कर ब्राह्मणको घृतपूर्ण घटका दान करे। इसे ब्रह्मव्रत कहते हैं, इससे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है।

कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीको उपवास कर रात्रिके समय पञ्चगव्य-पान करे अर्थात् कपिला गौका मूत्र, कृष्णा गौका गोबर, श्वेत गौका दूध, लाल गौका दही तथा कबरी गौका घी लेकर मन्त्रोंसे कुशोदक मिलाकर प्राशन करे। दूसरे दिन प्रातः स्नानकर देवता और पितरोंका तर्पण आदि करनेके बाद ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। इसे ब्रह्मकूर्चव्रत कहते हैं। इस व्रतको करनेसे बाल्य, यौवन और बुढ़ापेमें किये गये सभी प्रकारके पापोंका नाश हो जाता है। जो एक वर्षतक तृतीयाको बिना पकाये अन्न, फल इत्यादिका भोजन करता है और अन्तमें सुन्दर गौ ब्राह्मणको दानमें देता है, वह शिवलोकमें निवास करता है। इसे ऋषिव्रत कहते हैं।

एक वर्षतक ताम्बूल आदि मुखवासके पदार्थोंका त्यागकर अन्तमें ब्राह्मणको गायका दान करे। यह सुमुखव्रत है। इससे कुबेरलोककी प्राप्ति होती है। रात्रिभर जलमें निवास कर प्रातःकाल जो गोदान करता है, उसे वरुणलोककी प्राप्ति होती है। यह

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  • उत्तरपर्व *

५२७

वरुणव्रत कहलाता है। जो चान्द्रायणव्रत करनेके बाद सुवर्णका चन्द्रमा बनाकर ब्राह्मणको दान करता है, उसे चन्द्रलोककी प्राप्ति होती है। यह चन्द्रव्रत है।

ज्येष्ठ मासकी अष्टमी और चतुर्दशीको पञ्चाग्रि-सेवन करके सुवर्णसहित गौका ब्राह्मणको दान करे, यह रुद्रव्रत है। इससे रुद्रलोककी प्राप्ति होती है। जो एक वर्षतक तृतीयाको शिवालयमें उपलेपन करनेके बाद गोदान करता है वह स्वर्गलोक प्राप्त करता है। यह भवानीव्रत है।

जो माघ मासकी सप्तमी तिथिको रात्रिमें आर्द्र वस्त्रोंको धारण किये रहता है और उपवास कर ब्राह्मणको गौका दान करता है, वह कल्पभरतक स्वर्गमें निवास करता है। यह तापनव्रत कहलाता है। जो तीन रात्रि उपवास कर फाल्गुनकी पूर्णिमाको गृहदान करता है, उसे सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। यह धामव्रत है। पूर्णमासीको उपवासकर तीनों संध्याओंमें वस्त्र, आभूषण, भोजन आदि देकर सप्लीक ब्राह्मणकी पूजा करनी चाहिये। इस व्रतको इन्दुव्रत कहते हैं। इस व्रतके प्रभावसे उसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। जो शुक्ल पक्षकी द्वितीयाको नमकसे भरे हुए काँसेके पात्रके साथ वस्त्र और दक्षिणा एक वर्षतक ब्राह्मणको देता है और अन्तमें शिवमन्दिरमें गोदान करता है, वह कल्पभरतक शिवलोकमें निवास करनेके बाद राजाओंका राजा होता है। इसे सोमव्रत कहते हैं। एक वर्षतक प्रत्येक प्रतिपदाको एक समय भोजन करनेके बाद कपिला गौ ब्राह्मणको दान करे। यह आग्रेयव्रत है। इसके करनेसे अग्निलोककी प्राप्ति होती है।

जो माघ मासकी एकादशी, चतुर्दशी और अष्टमीको एकभुक्त रहता है तथा वस्त्र, जूता, कम्बल, चर्म आदि शीत निवारण करनेवाली वस्तुओंका दान करता है तथा चैत्रमें इन्हीं तिथियोंमें

छाता, पंखा आदि उष्णनिवारक पदार्थोंका दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञ करनेका फल प्राप्त होता है। यह सौख्यव्रत है। एक वर्षतक दशमी तिथिको एकभुक्तव्रत करके अन्तमें सुवर्णकी स्त्री-रूप दस दिशाओंकी मूर्ति तिलोंकी राशिपर स्थापितकर गायसहित ब्राह्मणको दान करनेसे महापातक दूर हो जाते हैं। यह विश्वव्रत है। इसे करनेसे ब्रह्माण्डका आधिपत्य मिलता है। जो शुक्ल पक्षकी सप्तमी तिथिको नक्तव्रत करके सूर्यनारायणका पूजन कर सप्तधान्य और लवण ब्राह्मणको दान देता है, वह अपने सात कुलोंका उद्धार करता है। यह धान्यव्रत है। एक मास उपवासकर जो ब्राह्मणको गाय प्रदान करता है, उसे विष्णुलोककी प्राप्ति होती है। इसे भीमव्रत कहते हैं।

जो तीस पलसे अधिक पर्वत और समुद्रोंसहित स्वर्णकी पृथ्वी बनाकर तिलोंकी राशिपर रखकर कुटुम्बी ब्राह्मणको दान करता है तथा दूध पीकर रहता है, वह सात कल्पतक रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यह महीव्रत कहलाता है।

माघ अथवा चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको गुड़का भक्षण करे तथा सभी उपस्करोंसहित गुडधेनु ब्राह्मणको दान दे, उसे उमाव्रत कहते हैं। इस व्रतको करनेवाला गौरीलोकमें निवास करता है। जो एक वर्षतक केवल एक ही अन्नका भोजन करता है और भक्ष्य पदार्थोंके साथ जलका घड़ा दान करता है, वह कल्पपर्यन्त शिवलोकमें निवास करता है। इसे प्राप्तिव्रत कहते हैं। जो कार्तिकसे आरम्भ कर प्रत्येक मासकी तृतीयाको रात्रिमें गोमूत्रमें पकायी गयी लपसीका प्राशन करता है, वह गौरीलोकमें एक कल्पतक निवास करता है, अनन्तर पृथ्वीपर राजा होता है। यह महान् कल्याणकारी रुद्रव्रत है। जो पुरुष कन्यादान करता है अथवा कराता है, वह अपने इक्कीस कुलोंसहित ब्रह्मलोकको

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५२८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

प्राप्त करता है। कन्यादानसे बढ़कर कोई भी दान उत्तम नहीं है। इस दानको करनेसे अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति होती है। यह कन्यादानव्रत है। तिलपिष्टका हाथी बनाकर दो लाल वस्त्र, अड्डुश, चामर, माला आदिसे उसको सजाकर तथा ताम्रपात्रमें स्थापित करनेके बाद वस्त्राभूषण आदिसे पलीसहित ब्राह्मणका पूजन करके गलेतक जलमें स्थित होकर वह हाथी उनको दान कर दे। यह कान्तरव्रत है। इस व्रतको करनेसे जंगल आदिसे सम्बन्धित समस्त संकट और पापोंसे छुटकारा मिल जाता है।

जो ज्येष्ठा नक्षत्र आनेपर 'त्रातारमिन्द्र-मवितारमिन्द्रम्' आदि मन्त्रोंसे इन्द्रदेवताका व्रत-पूजन तथा हवन करते हैं, वे प्रलयपर्यन्त इन्द्रलोकमें निवास करते हैं। इसे पुरन्दरव्रत या इन्द्रव्रत कहते हैं। जो पञ्चमीको दूधका आहार करके सुवर्णकी नाग-प्रतिमा ब्राह्मणको देता है, उसे कभी सर्पका भय नहीं रहता। शुक्ल पक्षकी अष्टमीको उपवास कर दो श्वेत वस्त्र और घण्टासे भूषित बैल ब्राह्मणको दान दे। इसे वृषव्रत कहते हैं। इस व्रतको करनेवाला एक कल्पतक शिवलोकमें निवास करता है तथा पुनः राजाका पद प्राप्त करता है। उत्तरायणके दिन एक सेर घीसे सूर्यनारायणको स्नान कराकर उत्तम घोड़ी ब्राह्मणको दे। इस व्रतको राजीवव्रत कहते हैं। इस व्रतको करनेवाले व्यक्तिको अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है तथा अन्तमें वह पुत्र, भाई, स्त्री आदिसहित सूर्यलोकमें निवास करता है। जो नवमीको नक्तव्रतकर भगवती विन्ध्यवासिनीकी पूजा कर

पिङ्गलके साथ सुवर्णका शुक्ल ब्राह्मणको प्रदान करता है, उसे उत्तम वाणी और अन्तमें अग्निलोककी प्राप्ति होती है। इसे आग्रेयव्रत कहते हैं।

विष्कुम्भ आदि सत्ताईस योगोंमें नक्तव्रत करके क्रमसे घी, तेल, फल, ईख, जौ, गेहूँ, चना, सेम, शालि-चावल, नमक, दही, दूध, वस्त्र, सुवर्ण, कम्बल, गाय, बैल, छतरी, जूता, कपूर, कुंकुम, चन्दन, पुष्प, लोहा, ताम्र, कांस्य और चाँदी ब्राह्मणको देना चाहिये। यह योगव्रत है। इस व्रतको करनेवाला व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और उसको कभी अपने इष्टसे वियोग नहीं होता। जो कार्तिकी पूर्णिमासे आरम्भ कर आश्विनकी पूर्णिमातक बारह पूर्णिमाओंमें क्रमसे मेघ, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ तथा मीन—इन बारह राशियोंकी स्वर्णप्रतिमाओंको वस्त्र, माल्य आदिसे अलंकृत एवं पूजितकर दक्षिणाके साथ ब्राह्मणको दान करता है, उसके सम्पूर्ण उपद्रवोंका शमन हो जाता है एवं सारी आशाएँ पूर्ण हो जाती हैं और उसे सोमलोककी प्राप्ति होती है। यह राशिव्रत कहलाता है।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! मैंने इन विविध व्रतोंको बतलाया है, इन व्रतोंकी विधि श्रवण करने या पढ़नेमात्रसे ही पातक, महापातक और उपपातक नष्ट हो जाते हैं। जो कोई भी व्यक्ति इन व्रतोंको भक्तिपूर्वक करेगा, उसे धन, सौख्य, संतान, स्वर्ग आदि कोई भी पदार्थ दुर्लभ नहीं होगा। (अध्याय १२१)

माघ-स्नान-विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! कलियुगमें मनुष्योंको स्नान-कर्ममें शिथिलता रहती है, फिर भी माघ-स्नानका विशेष फल होनेसे इसकी विधिका वर्णन कर रहा हूँ। जिसके हाथ, पाँव, वाणी, मन

अच्छी तरह संयत हैं और जो विद्या, तप तथा कीर्तिसे समन्वित हैं, उन्हें ही तीर्थ, स्नान-दान आदि पुण्य कर्मोंका शास्त्रोंमें निर्दिष्ट फल प्राप्त होता है। परंतु श्रद्धाहीन, पापी, नास्तिक, संशयात्मा

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