भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 527, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
आवाहन करे। कर्णिकामें 'सूर्याय नमः', पूर्वदलपर 'आदित्याय नमः', अग्निकोणस्थित दलपर 'समाधिषे नमः', दक्षिणदलपर 'ऋद्धमण्डलाय नमः', नैऋत्यकोणवाले दलपर 'सवित्रे नमः', पश्चिमदलपर 'वरुणाय नमः', वायव्यकोणस्थित दलपर 'सप्तसप्तये नमः', उत्तरदलपर 'मार्तण्डाय नमः' और ईशानकोणवाले दलपर 'विष्णवे नमः'—इन मन्त्रोंसे सूर्यदेवको स्थापित कर उनकी बार-बार अर्चना करे। तत्पश्चात् वेदीपर भी चन्दन, पुष्पमाला, फल और खाद्य पदार्थोंसे उनकी पूजा करनी चाहिये और अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। पुनः अपनी शक्तिके अनुसार सोनेका कमल बनवाकर उसे घृतपूर्ण पात्र और कलशके साथ ब्राह्मणको दान कर दे। तत्पश्चात् चन्दन और पुष्पयुक्त जलसे भूमिपर सूर्यदेवको अर्घ्य प्रदान करे (अर्घ्यका मन्त्रार्थ इस प्रकार है—) 'अनन्त! आप ही विश्व हैं, विश्व आपका स्वरूप है, आप विश्वमें सर्वाधिक तेजस्वी, स्वयं उत्पन्न होनेवाले, धाता और ऋग्वेद, सामवेद एवं यजुर्वेदके स्वामी हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है।' इस विधिसे मनुष्यको प्रत्येक मासमें सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये अथवा (यदि ऐसा करनेमें असमर्थ हो तो) वर्षकी समाप्तिके दिन यह सारा कार्य बारह बार करे (दोनोंका
फल समान ही है)।
एक वर्ष व्यतीत होनेपर घृतमिश्रित खीरसे अग्नि और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भलीभाँति संतुष्ट करे तथा बारह गौ एवं रत्नसहित स्वर्णमय कमलके साथ कलशोंको दान कर दे। इसी प्रकार सोने, चाँदी अथवा ताँबेकी शेषनागसहित पृथ्वीकी प्रतिमा बनवाकर दान करना चाहिये। जो ऐसा करनेमें असमर्थ हों, वे आटेकी शेषसहित पृथ्वीकी प्रतिमा बनाकर स्वर्णनिर्मित सूर्यके साथ दान कर सकता है। जबतक इस मृत्युलोकमें महेन्द्र आदि देवगणों, हिमालय आदि पर्वतों और सातों समुद्रोंसे युक्त पृथ्वीका अस्तित्व है, तबतक स्वर्गलोकमें अखिल गन्धर्वसमूह उस व्रतीकी भलीभाँति पूजा करते हैं। पुण्य क्षीण होनेपर वह सृष्टिके आदिमें उत्तम कुल और शीलसे सम्पन्न होकर भूतलपर सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है। वह सुन्दर रूप और सुन्दर पत्नीसे युक्त होता है, बहुत-से पुत्र एवं भाई-बन्धु उसके चरणोंकी वन्दना करते हैं। इस प्रकार जो मनुष्य सूर्य-संक्रान्तिकी इस पुण्यमयी अखिल विधिको भक्तिपूर्वक पढ़ता या श्रवण करता है अथवा इसे करनेकी सम्मति देता है, वह ही इन्द्रलोकमें देवताओंद्वारा पूजित होता है। (अध्याय ११५-११६)
भद्राका चरित्र एवं उसके व्रतकी विधि
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! लोकमें भद्रा विधि नामसे प्रसिद्ध है, वह कैसी है, कौन है, वह किसकी पुत्री है, उसका पूजन किस विधिसे किया जाता है? कृपया आप बतानेका कष्ट करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! भद्रा भगवान् सूर्यनारायणकी कन्या है। यह भगवान् सूर्यकी पत्नी छायासे उत्पन्न है और शनैश्चरकी सगी बहिन है। वह काले वर्ण, लम्बे केश, बड़े-बड़े दाँत
और बहुत ही भयंकर रूपवाली है। जन्मते ही वह संसारका ग्रास करनेके लिये दौड़ी, यज्ञोंमें विघ्न-बाधा पहुँचाने लगी और उत्सवों तथा मङ्गल-यात्रा आदिमें उपद्रव करने लगी और पूरे जगत्को पीड़ा पहुँचाने लगी। उसके उच्छृङ्खल स्वभावको देखकर भगवान् सूर्य अत्यन्त चिन्तित हो उठे और उन्होंने शीघ्र ही उसका विवाह करनेका विचार किया। जब जिस-जिस भी देवता, असुर,
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