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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 528, कुल 654 में से

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पृष्ठ 528
  • उत्तरपर्व *

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किन्नर आदिसे सूर्यनारायणने विवाहका प्रस्ताव रखा, तब उस भयंकर कन्यासे कोई भी विवाह करनेको तैयार न हुआ। दुःखित हो सूर्यनारायणने अपनी कन्याके विवाहके लिये मण्डप बनवाया, पर उसने मण्डप-तोरण आदि सबको उखाड़कर फेंक दिया और सभी लोगोंको कष्ट देने लगी। सूर्यनारायणने सोचा कि इस दुष्टा, कुरूपा, स्वेच्छाचारिणी कन्याका विवाह किसके साथ किया जाय। इसी समय प्रजाके दुःखको देखकर ब्रह्माजीने भी सूर्यके पास आकर उनकी कन्याद्वारा किये गये दुष्कर्मोंको बतलाया। यह सुनकर सूर्यनारायणने कहा—‘ब्रह्मन्! आप ही तो इस संसारके कर्ता तथा भर्ता हैं, फिर आप मुझसे ऐसा क्यों कह रहे हैं। जो भी आप उचित समझे वही करें।’ सूर्यनारायणका ऐसा वचन सुनकर ब्रह्माजीने विष्टिको बुलाकर कहा—‘भद्रे! वव, बालव, कौलव आदि करणोंके अन्तमें तुम निवास करो और जो व्यक्ति यात्रा, प्रवेश, माङ्गल्य कृत्य, खेती, व्यापार, उद्योग आदि कार्य तुम्हारे समयमें करे, उन्हींमें तुम विघ्न करो। तीन दिनतक किसी प्रकारकी बाधा न डालो। चौथे दिनके आधे भागमें देवता और असुर तुम्हारी पूजा करेंगे। जो तुम्हारा आदर न करें उनका कार्य तुम ध्वस्त कर देना।’ इस प्रकार विष्टिको उपदेश देकर ब्रह्माजी अपने धामको चले गये, इधर विष्टि भी देवता, दैत्य, मनुष्य सब प्राणियोंको कष्ट देती हुई घूमने लगी। महाराज! इस तरहसे भद्राकी उत्पत्ति हुई और वह अति दुष्ट

प्रकृतिकी है, इसलिये माङ्गलिक कार्योंमें उसका अवश्य त्याग करना चाहिये।

भद्रा पाँच घड़ी मुखमें, दो घड़ी कण्ठमें, ग्यारह घड़ी हृदयमें, चार घड़ी नाभिमें, पाँच घड़ी कटिमें और तीन घड़ी पुच्छमें स्थित रहती है। जब भद्रा मुखमें रहती है तब कार्यका नाश होता है, कण्ठमें धनका नाश, हृदयमें प्राणका नाश, नाभिमें कलह, कटिमें अर्थभ्रंश होता है, पर पुच्छमें निश्चितरूपसे विजय एवं कार्य-सिद्धि हो जाती है१।

भद्राके बारह नाम हैं—(१) धन्या, (२) दधिमुखी, (३) भद्रा, (४) महामारी, (५) खरानना, (६) कालरात्रि, (७) महारुद्रा, (८) विष्टि, (९) कुलपुत्रिका, (१०) भैरवी, (११) महाकाली तथा (१२) असुरक्षयकरी।

इन बारह नामोंका प्रातःकाल उठकर जो स्मरण करता है, उसे किसी भी व्याधिका भय नहीं होता। रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है और सभी ग्रह अनुकूल हो जाते हैं। उसके कार्योंमें कोई विघ्न नहीं होता। युद्धमें तथा राजकुलमें वह विजय प्राप्त करता है२। जो विधिपूर्वक नित्य विष्टिका पूजन करता है, निःसंदेह उसके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। अब मैं भद्राके व्रतकी विधि बता रहा हूँ—

राजन्! जिस दिन भद्रा हो उस दिन उपवास करना चाहिये। यदि रात्रिके समय भद्रा हो तो दो दिनतक एकभुक्त व्रत करना चाहिये। एक प्रहरके बाद भद्रा हो तो तीन प्रहरतक उपवास करना चाहिये अथवा एकभुक्त रहना चाहिये। स्त्री अथवा

१-मुखे तु घटिकाः पञ्च द्वे कण्ठे तु सदा स्थिते। हृदि चैकादश प्रोक्ताश्चतस्रो नाभिमण्डले ॥

कट्यां पञ्चैव विज्ञेयास्तिस्रः पुच्छे जयावहाः। मुखे कार्यविनाशाय ग्रीवाध्यां धननाशिनी ॥

हृदि प्राणहरा ज्ञेया नाभ्यां तु कलहावहा। कट्यामर्थपरिभ्रंशो विष्टिपुच्छे ध्रुवो जयः ॥

(उत्तरपर्व ११७। २३—२५)

२-धन्या दधिमुखी भद्रा महामारीखरानना। कालरात्रिर्महारुद्रा विष्टिश्च कुलपुत्रिका ॥

भैरवी च महाकाली असुराणां क्षयं करी। द्वादशैव तु नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् ॥

न च व्याधिर्भवेत् तस्य रोगी रोगात्ममुच्यते। ग्रहाः सर्वस्गकुलाः स्मृन् च विघ्नं विघ्नं जायते ॥

रणे राजकुले द्वे सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ (उत्तरपर्व ११७। २७—३०)

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