भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 526, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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य एभिर्नामभिः स्तौति तस्य तुष्टो भवाम्यहम्। मदीयं तु भयं तस्य स्वप्नेऽपि न भविष्यति ॥
(उत्तरपर्व ११४।३९-४२)
जो भी व्यक्ति प्रत्येक शनिवारको एक वर्षतक इस व्रतको करता है और इस विधिसे उद्यापन करता है, उसे कभी शनिकी पीड़ा नहीं भोगनी पड़ती। यह कहकर ब्रह्माजी सभी देवताओंके साथ अपने परमधामको चले गये और पिप्पलादमुनिने भी ब्रह्माजीके आज्ञानुसार शनैश्चरको उनके स्थानपर प्रतिष्ठित कर दिया। महामुनि पिप्पलादने शनिग्रहकी
इस प्रकार प्रार्थना की— कोणस्थः पिङ्गलो बभ्रुः कृष्णो रौद्रोऽन्तको यमः। सौरिः शनैश्चरो मन्दः प्रीयतां मे ग्रहोत्तमः ॥
(उत्तरपर्व ११४।४७)
जो व्यक्ति शनैश्चरोपाख्यानको भक्तिपूर्वक सुनता है तथा शनिकी लौह-प्रतिमा बनाकर तेलसे भरे हुए लौह-कलशमें रखकर ब्राह्मणको दक्षिणासहित दान देता है, उसको कभी भी शनिकी पीड़ा नहीं होती।
(अध्याय ११४)
आदित्यवार नक्त-व्रत तथा संक्रान्ति-व्रतके उद्यापनकी विधि
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवान् गोविन्द! आप कोई ऐसा व्रत बतलाइये, जो सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला, आरोग्यदायक और अनन्त फलप्रद हो।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! परब्रह्म विश्वात्मा जो परम सनातन धाम है, वह संसारमें सूर्य, अग्नि तथा चन्द्र—इन तीनोंमें विभक्त होकर स्थित है। कुरुनन्दन! उस परमात्माकी आराधना कर मनुष्य क्या नहीं प्राप्त कर सकता? इसलिये रविवारके दिन नक्तव्रत करना चाहिये। भगवान् सूर्यमें अनन्य भक्ति रखकर आदित्यवारको यह व्रत करना चाहिये। ब्राह्मणोंकी विधिवत् पूजा कर सायंकाल रक्त चन्दनसे एक द्वादशदल कमलकी रचना करे और उसके द्वादशदलोंमें सूर्य, दिवाकर, विवस्वान्, भग, वरुण, महेंद्र, आदित्य, शान्त, सूर्यके अश्व, यम, मार्तण्ड तथा रविकी स्थापना करे और उनका पूजन कर तिल, रक्त चन्दन, फल तथा अक्षतसे युक्त अर्घ्य प्रदान करे। अनन्तर विसर्जन कर दे। रात्रिमें भगवान् भास्करका स्मरण करता हुआ तैलरहित भोजन करे। व्रतके पूर्व दिन शनिवारको तैलाभ्यङ्ग न करे। इस प्रकार एक वर्षपर्यन्त व्रत करके उद्यापन करे और यथाशक्ति
गुडसे पूर्ण एक ताम्रपात्रमें स्वर्णकमल स्थापित करे तथा उसके ऊपर स्वर्णमयी भगवान् सूर्यकी द्विभुज प्रतिमा स्थापित करे, साथ ही एक सुवर्णमयी सवत्सा गौ भी स्थापित करे। इनका पूजन कर विद्वान् ब्राह्मणको यह सब सामग्री निवेदित कर दे।
इस प्रकार जो स्त्री-पुरुष इस व्रतको वर्षभर सम्पन्न कर विधिपूर्वक उद्यापन करते हैं, वे नीरोग, धार्मिक, धन-धान्य, पुत्र-पौत्रसे सम्पन्न हो जाते हैं और अन्तमें सूर्यलोकको प्राप्त करते हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—राजन्! अब मैं संक्रान्तिके समय किये जानेवाले उद्यापनरूप अन्य व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जो इस लोकमें समस्त कामनाओंके फलका प्रदाता और परलोकमें अक्षय फलदायक है। सूर्यके उत्तरायण या दक्षिणायनके दिन अथवा विषुवयोगमें इस संक्रान्ति-व्रतका आरम्भ करना चाहिये। इस व्रतमें संक्रान्तिके पहले दिन एक बार भोजन करके (रात्रिमें शयन करे।) संक्रान्तिके दिन प्रातःकाल दातून करनेके पश्चात् तिलमिश्रित जलसे स्नान करना चाहिये। सूर्य-संक्रान्तिके दिन भूमिपर चन्दनसे कर्णिकासहित अष्टदल कमलकी रचना करे और उसपर सूर्यका
584 Sankshipta Bhavishya Puran, Section 18 and 20, Digitized by Sarvagya Sharda Peeth