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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 543, कुल 654 में से

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पृष्ठ 543

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भगवन्! सर्वरूपधारी आप परमेश्वरको बार-बार नमस्कार है। दिव्य चन्द्रनसे भूषित और संसारके स्वामी भगवन्! आपको नमस्कार है। कुण्डल और अङ्गद आदि आभूषण धारण करनेवाले पद्मनाभ! आपको नमस्कार है। भगवन्! आप सम्पूर्ण लोकोंके ईश और सभी देवोंके द्वारा वन्दित हैं, आपको मेरा प्रणाम है। आप सदा सब पाप-पुण्यको भलीभाँति

जानते हैं। सत्यदेव! आपको नमस्कार है। सर्वदेव! आपको नमस्कार है। दिवाकर! आपको नमस्कार है। प्रभाकर! आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार सूर्यदेवको नमस्कार कर तीन बार प्रदक्षिणा करे। फिर द्विज, गौ तथा सुवर्णका स्पर्श कर अपने घर जाय और वहाँ भगवान्की प्रतिमाका पूजन करे। (अध्याय १२३)

रुद्र-स्नानकी विधि

महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! अब आप सभी दोषोंको शान्त करनेवाले रुद्र-स्नानके विधानका वर्णन करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! इस सम्बन्धमें महर्षि अगस्त्यके पूछनेपर देवसेनापति भगवान् स्कन्दने जो बताया था, उसे आप सुनें। जो मृतवत्सा (जिसके लड़के अल्प अवस्थामें मर जाते हों), वन्ध्या, दुर्भगा, संतानहीन या केवल कन्या जनती हो, उस स्त्रीको चाहिये कि वह रुद्र-स्नान करे। अष्टमी, चतुर्दशी अथवा रविवारके दिन नदीके तटपर या महानदियोंके संगममें, शिवालयमें, गोष्ठमें अथवा अपने घरमें सुयोग्य ब्राह्मणद्वारा स्नान-विधिका परिज्ञान कर स्नान करे। वह गोबरद्वारा उपलिस स्थानमें एक उत्तम मण्डप बनाकर उसके मध्यमें अष्टदल कमल बनाये। उसके मध्यमें कर्णिकाके ऊपर भगवान् महादेवकी, उनके वाम तथा दक्षिण भागमें क्रमशः पार्वती एवं विनायककी और कमलके अष्टदलोंमें इन्द्रादि दिव्यालोंकी स्थापना करे। तदनन्तर गन्धादि उपचारोंसे उनकी पूजा करे। मण्डपके चारों कोणोंमें कलश स्थापित करे। चारों दिशाओंमें भूत-बलि भी दे। मण्डपके अग्रिकोणमें कुण्ड बनाकर नमक, सर्षप,

घी और मधुसे 'मा नस्तोके तनये०' (यजु० १६।१६) इत्यादि वैदिक मन्त्रसे हवन करे। आचार्य, ब्रह्मा एवं ऋत्विजोंके साथ जापकका भी वर्ण करे। एकादश रुद्रपाठ भी कराये। इस प्रकार दूसरे मण्डपका निर्माण कर उस व्रतकर्त्री स्त्रीको मण्डपमें बैठाकर रुद्रपूजक आचार्य उसे स्नान करायें। अर्क-पत्रके दोनेमें जल लेकर रुद्रैकादशिनीका पाठ कर उस अभिमन्त्रित जलसे स्त्रीका अभिषेक करे। अनन्तर सप्तमृतिकामिश्रित जल, रुद्र-कलशके जल एवं इन्द्रादि दिव्यालोंके पूजित कलशोंके अभिमन्त्रित जलसे उसे स्नान कराये। इस प्रकार रुद्र-स्नान-विधि पूर्ण हो जानेपर स्वर्णमयी धेनु, प्रत्यक्ष धेनु तथा अन्य सामग्री आचार्यको दान करे और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर वस्त्र, दक्षिणा देकर क्षमा-याचना करे। जो स्त्री इस विधिसे स्नान करती है, वह सौभाग्य-सुख प्राप्त करती है और पुत्रवती होती है। उसके शरीरमें रहनेवाले सभी दोष ब्राह्मणोंकी आज्ञासे, रुद्र-स्नान करनेसे दूर हो जाते हैं। पुत्र, लक्ष्मी तथा सुखकी इच्छा करनेवाली नारीको यह व्रत अवश्य करना चाहिये, इससे वह जीवितवत्सा हो जाती है।

(अध्याय १२४)

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