भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 542, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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इस प्रकार मृत्तिका लगाकर पुनः स्नान करे। फिर विधिवत् आचमन करके उठे और शुद्ध सफेद धोती एवं चहर धारण कर त्रिलोकीको तृप्त करनेके लिये तर्पण करे। सबसे पहले ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और प्रजापतिका तर्पण करे। तत्पश्चात् देवता, यक्ष, नाग, गन्धर्व, श्रेष्ठ अप्सराओं, क्रूर सर्प, गरुड पक्षी, वृक्ष, जम्भक आदि असुर, विद्याधर, मेघ, आकाशचारी जीव, निराधार जीव, पापी जीव तथा धर्मपरायण जीवोंको तृप्त करनेके लिये मैं जल देता हूँ'—यह कहकर उन सबको जलाञ्जलि दे१। देवताओंका तर्पण करते समय यज्ञोपवीतको बायें कंधेपर डाले रहे, तत्पश्चात् उसे गलेमें मालाकी भाँति कर ले और मनुष्यों, ऋषियों तथा ऋषिपुत्रोंका भक्तिपूर्वक तर्पण करे। 'सनक, सनन्दन, सनातन, कपिल, आसुरि, वोढु और पञ्चशिखर२—ये सभी मेरे दिये जलसे सदा तृप्त हों।' ऐसी भावना करके जल दे। इसी प्रकार मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु, नारद तथा सम्पूर्ण देवर्षियों एवं ब्रह्मर्षियोंका अक्षतसहित जलके द्वारा तर्पण करे। इसके बाद यज्ञोपवीतको दायें कंधेपर रखकर बायें घुटनेको पृथ्वीपर टेककर बैठे, फिर अग्निघ्वात, बर्हिषद, हविष्पान्, ऊष्णप, सुकाली, भौम, सोमप तथा आज्यप-संज्ञक पितरोंका तिल और चन्दनयुक्त जलसे भक्तिपूर्वक तर्पण करे। इसी प्रकार हाथोंमें कुश लेकर पवित्र भावसे परलोकवासी पिता, पितामह आदि और मातामह आदिका नाम-गोत्रका उच्चारण करते हुए तर्पण करे। इस क्रमसे विधि और भक्तिके साथ सबका तर्पण करके
निम्राङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे— येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः । ते तृसिमखिला यान्तु यश्चास्मत्तोऽभिवाञ्छति ॥
(उत्तरपर्व १२३।२५)
जो लोग मेरे बान्धव न हों, जो मेरे बान्धव हों तथा जो दूसरे किसी जन्ममें मेरे बान्धव रहे हों, वे सब मेरे दिये हुए जलसे तृप्त हों। उनके सिवा और भी जो कोई प्राणी मुझसे जलकी अभिलाषा रखते हों, वे भी तृप्ति-लाभ करें।' (ऐसा कहकर उनके उद्देश्यसे जल गिराये।)
तत्पश्चात् विधिपूर्वक आचमन कर अपने आगे पुष्प और अक्षतोंसे कमलकी आकृति बनाये। फिर यत्नपूर्वक सूर्यदेवके नामोंका उच्चारण करते हुए अक्षत, पुष्प और रक्त चन्दनमिश्रित जलसे अर्घ्य दे। अर्घ्य-दानका मन्त्र इस प्रकार है—
नमस्ते विश्वरूपाय नमस्ते विष्णुसखाय वै ॥ सहस्त्रशमये नित्यं नमस्ते सर्वतेजसे। नमस्ते सर्ववपुषे नमस्ते सर्वशक्तये ॥ जगत्स्वामिन् नमस्तेऽस्तु दिव्यचन्दनभूषित। पद्मनाभ नमस्तेऽस्तु कुण्डलाङ्कदधारिणे ॥ नमस्ते सर्वलोकेश सर्वासुरनमस्कृत। सुकृतं दुष्कृतं चैव सम्यगजानासि सर्वदा ॥ सत्यदेव नमस्तेऽस्तु सर्वदेव नमोऽस्तु ते। दिवाकर नमस्तेऽस्तु प्रभाकर नमोऽस्तु ते ॥
(उत्तरपर्व १२३।२७—३१)
'हे भगवान् सूर्य! आप विश्वरूप और भगवान् विष्णुके सखा हैं, इन दोनों रूपोंमें आपको नमस्कार हैं। आप सहस्रों किरणोंसे सुशोभित और सबके तेजरूप हैं, आपको सदा नमस्कार हैं। सर्वशक्तिमान्
१-देवा यक्षास्तथा नागा गन्धर्वाप्सरासां गणाः। क्रूराः सर्पाः सुपर्णाश्च तरवो जम्भकादयः ॥
विद्याधरा जलधारास्तथैवाकाशगामिनः। निराधाराश्च ये जीवाः पापकर्मस्ताश्च ये ॥
तेषामाप्यायनार्थतद् दीयते सलिलं मया। (उत्तरपर्व १२३।१५—१७)
२-सनकः सनन्दनश्चैव तृतीयश्च सनातनः। कपिलश्चासुरिश्चैव वोढुः पञ्चशिखस्तथा ॥
सर्वे ते तृसिमायान्तु महतेनाम्बुना सदा। (उत्तरपर्व १२३।१८-१९)
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