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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ
  • उत्तरपर्व *

५३१

इस प्रकार मृत्तिका लगाकर पुनः स्नान करे। फिर विधिवत् आचमन करके उठे और शुद्ध सफेद धोती एवं चहर धारण कर त्रिलोकीको तृप्त करनेके लिये तर्पण करे। सबसे पहले ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और प्रजापतिका तर्पण करे। तत्पश्चात् देवता, यक्ष, नाग, गन्धर्व, श्रेष्ठ अप्सराओं, क्रूर सर्प, गरुड पक्षी, वृक्ष, जम्भक आदि असुर, विद्याधर, मेघ, आकाशचारी जीव, निराधार जीव, पापी जीव तथा धर्मपरायण जीवोंको तृप्त करनेके लिये मैं जल देता हूँ'—यह कहकर उन सबको जलाञ्जलि दे१। देवताओंका तर्पण करते समय यज्ञोपवीतको बायें कंधेपर डाले रहे, तत्पश्चात् उसे गलेमें मालाकी भाँति कर ले और मनुष्यों, ऋषियों तथा ऋषिपुत्रोंका भक्तिपूर्वक तर्पण करे। 'सनक, सनन्दन, सनातन, कपिल, आसुरि, वोढु और पञ्चशिखर२—ये सभी मेरे दिये जलसे सदा तृप्त हों।' ऐसी भावना करके जल दे। इसी प्रकार मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु, नारद तथा सम्पूर्ण देवर्षियों एवं ब्रह्मर्षियोंका अक्षतसहित जलके द्वारा तर्पण करे। इसके बाद यज्ञोपवीतको दायें कंधेपर रखकर बायें घुटनेको पृथ्वीपर टेककर बैठे, फिर अग्निघ्वात, बर्हिषद, हविष्पान्, ऊष्णप, सुकाली, भौम, सोमप तथा आज्यप-संज्ञक पितरोंका तिल और चन्दनयुक्त जलसे भक्तिपूर्वक तर्पण करे। इसी प्रकार हाथोंमें कुश लेकर पवित्र भावसे परलोकवासी पिता, पितामह आदि और मातामह आदिका नाम-गोत्रका उच्चारण करते हुए तर्पण करे। इस क्रमसे विधि और भक्तिके साथ सबका तर्पण करके

निम्राङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे— येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः । ते तृसिमखिला यान्तु यश्चास्मत्तोऽभिवाञ्छति ॥

(उत्तरपर्व १२३।२५)

जो लोग मेरे बान्धव न हों, जो मेरे बान्धव हों तथा जो दूसरे किसी जन्ममें मेरे बान्धव रहे हों, वे सब मेरे दिये हुए जलसे तृप्त हों। उनके सिवा और भी जो कोई प्राणी मुझसे जलकी अभिलाषा रखते हों, वे भी तृप्ति-लाभ करें।' (ऐसा कहकर उनके उद्देश्यसे जल गिराये।)

तत्पश्चात् विधिपूर्वक आचमन कर अपने आगे पुष्प और अक्षतोंसे कमलकी आकृति बनाये। फिर यत्नपूर्वक सूर्यदेवके नामोंका उच्चारण करते हुए अक्षत, पुष्प और रक्त चन्दनमिश्रित जलसे अर्घ्य दे। अर्घ्य-दानका मन्त्र इस प्रकार है—

नमस्ते विश्वरूपाय नमस्ते विष्णुसखाय वै ॥ सहस्त्रशमये नित्यं नमस्ते सर्वतेजसे। नमस्ते सर्ववपुषे नमस्ते सर्वशक्तये ॥ जगत्स्वामिन् नमस्तेऽस्तु दिव्यचन्दनभूषित। पद्मनाभ नमस्तेऽस्तु कुण्डलाङ्कदधारिणे ॥ नमस्ते सर्वलोकेश सर्वासुरनमस्कृत। सुकृतं दुष्कृतं चैव सम्यगजानासि सर्वदा ॥ सत्यदेव नमस्तेऽस्तु सर्वदेव नमोऽस्तु ते। दिवाकर नमस्तेऽस्तु प्रभाकर नमोऽस्तु ते ॥

(उत्तरपर्व १२३।२७—३१)

'हे भगवान् सूर्य! आप विश्वरूप और भगवान् विष्णुके सखा हैं, इन दोनों रूपोंमें आपको नमस्कार हैं। आप सहस्रों किरणोंसे सुशोभित और सबके तेजरूप हैं, आपको सदा नमस्कार हैं। सर्वशक्तिमान्

१-देवा यक्षास्तथा नागा गन्धर्वाप्सरासां गणाः। क्रूराः सर्पाः सुपर्णाश्च तरवो जम्भकादयः ॥

विद्याधरा जलधारास्तथैवाकाशगामिनः। निराधाराश्च ये जीवाः पापकर्मस्ताश्च ये ॥

तेषामाप्यायनार्थतद् दीयते सलिलं मया। (उत्तरपर्व १२३।१५—१७)

२-सनकः सनन्दनश्चैव तृतीयश्च सनातनः। कपिलश्चासुरिश्चैव वोढुः पञ्चशिखस्तथा ॥

सर्वे ते तृसिमायान्तु महतेनाम्बुना सदा। (उत्तरपर्व १२३।१८-१९)

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५३२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भगवन्! सर्वरूपधारी आप परमेश्वरको बार-बार नमस्कार है। दिव्य चन्द्रनसे भूषित और संसारके स्वामी भगवन्! आपको नमस्कार है। कुण्डल और अङ्गद आदि आभूषण धारण करनेवाले पद्मनाभ! आपको नमस्कार है। भगवन्! आप सम्पूर्ण लोकोंके ईश और सभी देवोंके द्वारा वन्दित हैं, आपको मेरा प्रणाम है। आप सदा सब पाप-पुण्यको भलीभाँति

जानते हैं। सत्यदेव! आपको नमस्कार है। सर्वदेव! आपको नमस्कार है। दिवाकर! आपको नमस्कार है। प्रभाकर! आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार सूर्यदेवको नमस्कार कर तीन बार प्रदक्षिणा करे। फिर द्विज, गौ तथा सुवर्णका स्पर्श कर अपने घर जाय और वहाँ भगवान्की प्रतिमाका पूजन करे। (अध्याय १२३)

रुद्र-स्नानकी विधि

महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! अब आप सभी दोषोंको शान्त करनेवाले रुद्र-स्नानके विधानका वर्णन करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! इस सम्बन्धमें महर्षि अगस्त्यके पूछनेपर देवसेनापति भगवान् स्कन्दने जो बताया था, उसे आप सुनें। जो मृतवत्सा (जिसके लड़के अल्प अवस्थामें मर जाते हों), वन्ध्या, दुर्भगा, संतानहीन या केवल कन्या जनती हो, उस स्त्रीको चाहिये कि वह रुद्र-स्नान करे। अष्टमी, चतुर्दशी अथवा रविवारके दिन नदीके तटपर या महानदियोंके संगममें, शिवालयमें, गोष्ठमें अथवा अपने घरमें सुयोग्य ब्राह्मणद्वारा स्नान-विधिका परिज्ञान कर स्नान करे। वह गोबरद्वारा उपलिस स्थानमें एक उत्तम मण्डप बनाकर उसके मध्यमें अष्टदल कमल बनाये। उसके मध्यमें कर्णिकाके ऊपर भगवान् महादेवकी, उनके वाम तथा दक्षिण भागमें क्रमशः पार्वती एवं विनायककी और कमलके अष्टदलोंमें इन्द्रादि दिव्यालोंकी स्थापना करे। तदनन्तर गन्धादि उपचारोंसे उनकी पूजा करे। मण्डपके चारों कोणोंमें कलश स्थापित करे। चारों दिशाओंमें भूत-बलि भी दे। मण्डपके अग्रिकोणमें कुण्ड बनाकर नमक, सर्षप,

घी और मधुसे 'मा नस्तोके तनये०' (यजु० १६।१६) इत्यादि वैदिक मन्त्रसे हवन करे। आचार्य, ब्रह्मा एवं ऋत्विजोंके साथ जापकका भी वर्ण करे। एकादश रुद्रपाठ भी कराये। इस प्रकार दूसरे मण्डपका निर्माण कर उस व्रतकर्त्री स्त्रीको मण्डपमें बैठाकर रुद्रपूजक आचार्य उसे स्नान करायें। अर्क-पत्रके दोनेमें जल लेकर रुद्रैकादशिनीका पाठ कर उस अभिमन्त्रित जलसे स्त्रीका अभिषेक करे। अनन्तर सप्तमृतिकामिश्रित जल, रुद्र-कलशके जल एवं इन्द्रादि दिव्यालोंके पूजित कलशोंके अभिमन्त्रित जलसे उसे स्नान कराये। इस प्रकार रुद्र-स्नान-विधि पूर्ण हो जानेपर स्वर्णमयी धेनु, प्रत्यक्ष धेनु तथा अन्य सामग्री आचार्यको दान करे और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर वस्त्र, दक्षिणा देकर क्षमा-याचना करे। जो स्त्री इस विधिसे स्नान करती है, वह सौभाग्य-सुख प्राप्त करती है और पुत्रवती होती है। उसके शरीरमें रहनेवाले सभी दोष ब्राह्मणोंकी आज्ञासे, रुद्र-स्नान करनेसे दूर हो जाते हैं। पुत्र, लक्ष्मी तथा सुखकी इच्छा करनेवाली नारीको यह व्रत अवश्य करना चाहिये, इससे वह जीवितवत्सा हो जाती है।

(अध्याय १२४)

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  • उत्तरपर्व *

५३३

ग्रहण-स्नानका माहात्म्य और विधान१

युधिष्ठिरने कहा—द्रव्य और मन्त्रोंकी विधियोंके ज्ञाता (पूर्णवेदविद्) भगवन्! सूर्य एवं चन्द्रके ग्रहणके अवसरपर स्नानकी जो विधि है, मैं उसे सुनना चाहता हूँ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! जिस पुरुषकी राशिपर ग्रहणका प्लावन (लगना) होता है, उसके लिये मन्त्र और औषधसहित स्नानका जो विधान है, उसे मैं बतला रहा हूँ। ऐसे मनुष्यको चाहिये कि चन्द्र-ग्रहणके अवसरपर चार ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर गन्ध-माल्य आदिसे उनकी पूजा करे। ग्रहणके पूर्व ही औषध आदिको एकत्र कर ले। फिर छिद्ररहित चार कलशोंकी, उनमें समुद्रकी भावना करके स्थापना करे। फिर उनमें सममृत्तिका—हाथीसार, घुड़साल, वल्मीक (बल्मोट-दियाड़), नदीके संगम, सरोवर, गोशाला और राजद्वारकी मिट्टी लाकर डाल दे। तत्पश्चात् उन कलशोंमें पञ्चगव्य, मोती, गोरोचन, कमल, शङ्ख, पञ्चरत्न, स्फटिक, श्वेत चन्दन, तीर्थ-जल, सरसों, राजदन्त (एक औषधि-विशेष), कुमुद (कुई), खस, गुग्गुल—यह सब डालकर उन कलशोंपर देवताओंका आवाहन इस प्रकार करे—‘सभी समुद्र, नदियाँ, नद और जलप्रद तीर्थ यजमानके पापोंको नष्ट करनेके लिये यहाँ पधारें।’ इसके बाद प्रार्थना करे—‘जो देवताओंके स्वामी माने गये हैं तथा जिनके एक हजार नेत्र हैं, वे वज्रधारी इन्द्रदेव मेरी ग्रहणजन्य पीडाको दूर करें। जो समस्त देवताओंके मुखस्वरूप, सात जिह्वाओंसे युक्त और अतुल कान्तिवाले हैं, वे अग्निदेव चन्द्र-ग्रहणसे

उत्पन्न हुई मेरी पीडाका विनाश करें। जो समस्त प्राणियोंके कर्मोंके साक्षी हैं तथा महिष जिनका वाहन है, वे धर्मस्वरूप यम चन्द्र-ग्रहणसे उद्भूत हुई मेरी पीडाको मिटायें। जो राक्षसगणोंके अधीश्वर, साक्षात् प्रलयाम्निके सदृश भयानक, खड्गधारी और अत्यन्त भयंकर हैं, वे निर्वृति देव मेरी ग्रहणजन्य पीडाको दूर करें। जो नागपाश धारण करनेवाले हैं तथा मकर जिनका वाहन है, वे जलाधीश्वर साक्षात् वरुणदेव मेरी चन्द्र-ग्रहणजनित पीडाको नष्ट करें। जो प्राणरूपसे समस्त प्राणियोंकी रक्षा करते हैं, (तीव्रगामी) कृष्णमृग जिनका प्रिय वाहन है, वे वायुदेव मेरी चन्द्रग्रहणसे उत्पन्न हुई पीडाका विनाश करें।’

‘जो (नौ) निधियोंके२ स्वामी तथा खड्ग, त्रिशूल और गदा धारण करनेवाले हैं, वे कुबेरदेव चन्द्र-ग्रहणसे उत्पन्न होनेवाले मेरे पापको नष्ट करें। जिनका ललाट चन्द्रमासे सुशोभित है, वृषभ जिनका वाहन है, जो पिनाक नामक धनुष (या त्रिशूलको) धारण करनेवाले हैं, वे देवाधिदेव शंकर मेरी चन्द्र-ग्रहणजन्य पीडाका विनाश करें। ब्रह्मा, विष्णु और सूर्यसहित त्रिलोकियोंमें जितने स्थावर-जङ्गम प्राणी हैं, वे सभी मेरे (चन्द्रजन्य) पापको भस्म कर दें।’ इस प्रकार देवताओंको आमन्त्रित कर व्रती ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंकी ध्वनिके साथ-साथ उन उपकरणयुक्त कलशोंके जलसे स्वयं अभिषेक करे। फिर श्वेत पुष्पोंकी माला, चन्दन, वस्त्र और गोदानद्वारा उन ब्राह्मणोंकी तथा इष्ट देवताओंकी पूजा करे।

१-यह अध्याय मत्स्यपुराणके ६८ वें अध्यायमें इसी प्रकार प्राप्त है, लेकिन भविष्यपुराणका पाठ कुछ वृटिपूर्ण एवं अशुद्ध है, अतः उसे शुद्ध करनेके लिये मत्स्यपुराणकी सहायता ली गयी है।

२-पुराणों तथा महाभारतादिमें निधिपति यक्षराज कुबेरके सदा नौ निधियोंके साथ ही प्रकट होनेको बात मिलती है। पद्म, महापद्म, शङ्ख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और वर्च—ये नौ निधिगण हैं।

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५३४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

तत्पश्चात् वे द्विजवर उन्हीं मन्त्रोंको वस्त्र-पट्ट अथवा कमलदलपर अङ्कित करें, फिर द्रव्ययुक्त उन कलशोंको यजमानके सिरपर रख दें। उस समय यजमान पूर्वाभिमुख हो अपने इष्टदेवकी पूजा कर उन्हें नमस्कार करते हुए ग्रहण-कालकी वेलाको व्यतीत करे। चन्द्र-ग्रहणके निवृत्त हो जानेपर माङ्गलिक कार्य कर गोदान करे और उस (मन्त्रद्वारा अङ्कित) पट्टको स्नानादिसे शुद्ध हुए ब्राह्मणको दान कर दे।

जो मानव इस उपर्युक्त विधिके अनुसार ग्रहणका स्नान करता है, उसे न तो ग्रहणजन्म पीडा

होती है और न उसके बन्धुजनोंका विनाश ही होता है, अपितु उसे पुनरागमनरहित परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है। सूर्य-ग्रहणमें मन्त्रोंमें सदा सूर्यका नाम उच्चारण करना चाहिये। इसके अतिरिक्त चन्द्र-ग्रहण एवं सूर्य-ग्रहण—दोनों अवसरोंपर सूर्यके निमित्त पद्मराग मणि और निशापति चन्द्रमाके निमित्त एक सुन्दर कपिला गौका दान करनेका विधान है। जो मनुष्य इस (ग्रहण-स्नानकी विधि)-को नित्य सुनता अथवा दूसरेको श्रवण कराता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। (अध्याय १२५)

मरणासन्न (मृत्युके पूर्व) प्राणीके कर्तव्य तथा ध्यानके चतुर्विध भेद

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! गृहस्थ व्यक्तिको अपने अन्त समयमें क्या करना चाहिये*। कृपाकर इस विधिको आप बतायें। मुझे यह सुननेकी बहुत ही अभिलाषा है।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! जब मनुष्यको यह ज्ञात हो जाय कि उसका अन्त समीप आ गया है तो उसे गरुडध्वज भगवान् विष्णुका स्मरण करना चाहिये। स्नान करके पवित्र हो शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण कर अनेक प्रकारके पुष्पादि उपचारोंसे नारायणकी पूजा एवं स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करे। अपनी शक्तिके अनुसार गाय, भूमि, सुवर्ण, वस्त्र आदिका दान करे और बन्धु, पुत्र, मित्र, स्त्री, क्षेत्र, धन, धान्य तथा पशु आदिसे चित्तको हटाकर ममत्वका परित्याग कर दे। मित्र, शत्रु, उदासीन अपने और पराये लोगोंके उपकार और अपकारके विषयमें विचार न करे अर्थात् शान्त हो जाय। प्रयत्नपूर्वक

सभी शुभ एवं अशुभ कर्मोंका परित्याग कर इन श्लोकोंका स्मरण करे—‘मैंने समस्त भोगों एवं मित्रोंका परित्याग कर दिया, भोजन भी छोड़ दिया तथा अनुलेपन, माला, आभूषण, गीत, दान, आसन, हवन आदि क्रियाएँ, पदार्थ, नित्य-नैमित्तिक और काम्य सभी क्रियाओंका उत्सर्जन कर दिया है। श्राद्धधर्मोंका भी मैंने परित्याग कर दिया है, आश्रमधर्म और वर्णधर्म भी मैंने छोड़ दिये हैं। जबतक मेरे हाथ-पैर चल रहे हैं, तबतक मैं स्वयं अपना कार्य कर लूँगा, मुझसे सभी निर्भय रहें, कोई भी पाप कर्म न करे। आकाश, जल, पृथ्वी, विवर, बिल, पर्वत, पत्थरोंके मध्य, धान्यादि फसलों, वस्त्र, शयन तथा आसनों आदिमें जो कोई प्राणी अवस्थित हैं, वे मुझसे निर्भय होकर सुखी रहें। जगदुरु भगवान् विष्णुके अतिरिक्त मेरा कोई बन्धु नहीं। मेरे नीचे-ऊपर, दाहिने-बायें, मस्तक, हृदय, बाहुओं,

  • इसी तरहकी बातें गरुडपुराण, भागवत १।१९।३७-३८ आदिमें महाराज परीक्षितद्वारा महर्षि शुक्रदेवजी आदिसे पूछी गयी हैं तथा मनुष्यके जीवनका कब अन्त हो जाय, यह नहीं कहा जा सकता। अतः सदा ही ध्यानपूर्वक भगवान्का स्मरण-भजन करते रहना चाहिये, यही सबका सारंश है।

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  • उत्तरपर्व *

५३५

नेत्रों तथा कानोंमें मित्ररूपमें भगवान् विष्णु ही विराज रहे हैं *।'

इस प्रकार सब कुछ छोड़कर सर्वेश भगवान् अच्युतको हृदयमें धारण कर निरन्तर वासुदेवके नामका कीर्तन करता रहे और जब मृत्यु अति समीप आ जाय, तब दक्षिणाग्र कुशा बिछाकर पूर्व अथवा उत्तरकी ओर सिरकर शयन करे तथा जगत्पति भगवान् विष्णुका इस प्रकार चिन्तन करे— विष्णुं जिष्णुं हृषीकेशं केशवं मधुसूदनम्। नारायणं नरं शौरिं वासुदेवं जनार्दनम्॥ वाराहं यज्ञपुरुषं पुण्डरीकाक्षमच्युतम्। वामनं श्रीधरं कृष्णं नृसिंहमपराजितम्॥ पद्मनाभमजं श्रीशं दामोदरमधोक्षजम्। सर्वेश्वरेश्वरं शुद्धमनन्तं विश्वरूपिणम्॥ चक्रिणं गदिनं शान्तं शङ्खिणं गरुडध्वजम्। किरीटकौस्तुभधरं प्रणामात्म्यहमव्ययम्॥ अहमस्मि जगन्नाथ मयि वासं कुरु द्रुतम्। आवयोरन्तरं मास्तु समीराकाशयोरिव॥ अयं विष्णुरयं शौरिरयं कृष्णः पुरो मम। नीलोत्पलदलश्यामः पद्मपत्रायतेक्षणः॥ एष पश्यतु मामीशः पश्याम्यहमधोक्षजम्। इत्थं जपेदेकमनाः स्मरन् सर्वेश्वरं हरिम्॥

(उत्तरपर्व १२६।१९—२५)

'भगवान् विष्णु, जिष्णु, हृषीकेश, केशव, मधुसूदन, नारायण, नर, शौरि, वासुदेव, जनार्दन, वाराह, यज्ञपुरुष, पुण्डरीकाक्ष, अच्युत, वामन, श्रीधर, कृष्ण, नृसिंह, अपराजित, पद्मनाभ, अज, श्रीश,

दामोदर, अधोक्षज, सर्वेश्वरेश्वर, शुद्ध, अनन्त, विश्वरूपी, चक्री, गदी, शान्त, शङ्खी, गरुडध्वज, किरीटकौस्तुभधर तथा अव्यय परमात्माको मैं प्रणाम करता हूँ। जगन्नाथ! मैं आपका ही हूँ, आप शीघ्र मुझमें निवास करें। वायु एवं आकाशकी तरह मुझमें और आपमें कोई अन्तर न रहे। मैं नीले कमलके समान श्यामवर्ण, कमलनयन भगवान् विष्णु अथवा शौरि या भगवान् श्रीकृष्ण आपको अपने सामने देख रहा हूँ, आप भी मुझे देखें।'

इन मन्त्रोंको पढ़कर भगवान् विष्णुको प्रणाम करे और उनका दर्शन करे तथा 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस मन्त्रका निरन्तर जप करता रहे। जो व्यक्ति प्रसन्नमुख, शङ्ख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण किये हुए, केयूर, कटक, कुण्डल, श्रीवत्स, पीताम्बर आदिसे विभूषित, नवीन मेघके समान श्यामस्वरूप भगवान् विष्णुका ध्यान कर प्राणोंका परित्याग करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो भगवान् अच्युतमें लीन हो जाता है।

राजा युधिष्ठिरने पुनः पूछा—भगवन्! अन्त समयकी जो यह विधि आपने बतायी, वह स्वस्थचित्त रहनेपर ही सम्भव है, परंतु अन्तसमयमें तरुण और नीरोगी पुरुषोंकी भी चित्तवृत्ति मोहग्रस्त हो जाती है, वृद्ध और रोगियोंकी तो बात ही क्या है। अतिवृद्ध और रोगग्रस्त व्यक्तिके लिये कुशाके आसनपर ध्यान करना तो असम्भव ही है। इसलिये प्रभो! दूसरा भी कोई सुगम उपाय बतानेका कष्ट करें, जिससे साधन निष्फल न हो।

  • परित्यजाम्यहं भोगांस्त्यजामि सुहृदोऽखिलान्। भोजनं हि मयोत्सृष्टमुत्सृष्टमनुलेपनम्॥ स्नान्भूषणादिकं गेयं दानमासनमेव च। होमादयः पदार्था ये ये च नित्यक्रमगताः॥ नैमित्तिकास्तथा काभ्याः श्राद्धधर्मादयोज्झिताः। त्यक्ताश्चाश्रमिका धर्मा वर्णधर्मास्तथोज्झिताः॥ पदभ्यां कराभ्यां विहरन् कुर्वाणः कर्म चोद्दहनं। न पापं कस्यचिन्नाय्याः प्राणिनः सन्तु निर्भयाः॥ नभसि प्राणिनो ये च ये जले ये च भूतले। क्षितैर्विवरगा ये च ये च पापाणसम्पुटे॥ धान्यादिषु च वस्त्रेषु शयनेष्वासनेषु च। ते स्वयं तु विवृध्यन्ते दत्तं तेभ्योऽभयं मया॥ न मेऽस्ति बान्धवः कश्चिद्विष्णुं मुक्त्वा जगदगुरुम्। मित्रपक्षे च मे विष्णुरधश्चोर्ध्वं तथा पुनः॥ पार्श्वतो मूर्ध्नि हृदये बाहुभ्यां चैव चक्षुषोः। श्रोत्रादिषु च सर्वेषु मम विष्णुः प्रतिष्ठितः॥ (उत्तरपर्व १२६।१९—१६)

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५३६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज! यदि और कुछ करना सम्भव न हो तो सबसे सरल उपाय यह है कि चारों तरफसे चितवृत्ति हटाकर गोविन्दका स्मरण करते हुए प्राणका त्याग करना चाहिये, क्योंकि व्यक्ति जिस-जिस भावका स्मरण कर प्राण त्यागता है, उसे वही भाव प्राप्त होता है। अतः सब प्रकारसे निवृत्त होकर निरन्तर वासुदेवका चिन्तन करना चाहिये१।

राजन्! अब आप भगवान् के चिन्तन-ध्यानके स्वरूपोंको सुनें, जिन्हें महर्षि मार्कण्डेयजीने मुझसे कहा था—राज्य, उपभोग, शयन, भोजन, वाहन, मणि, स्त्री, गन्ध, माल्य, वस्त्र, आभूषण आदिमें यदि अत्यन्त मोह रहता है तो यह रागजनित 'आद्य' ध्यान है।

यदि जलाने, मारने, तड़पाने, किसीके ऊपर प्रहार करनेकी द्वेषपूर्ण वृत्ति हो और दया न आये

तो इसे ही क्रोधजनित 'रौद्र' ध्यान कहा गया है। वेदार्थके चिन्तन, इन्द्रियोंके उपशमन, मोक्षकी चिन्ता, प्राणियोंके कल्याणकी भावना आदि ही धर्मपूर्ण सात्त्विक ('धर्म्य') ध्यान है। समस्त इन्द्रियोंका अपने-अपने विषयोंसे निवृत्त हो जाना, हृदयमें इष्ट-अनिष्ट किसीकी भी चिन्ता नहीं करना और आत्मस्थिर होकर एकमात्र परमेश्वरका चिन्तन करना, परमात्मनिष्ठ हो जाना—यह 'शुक्ल'-ध्यानका स्वरूप है। 'आद्य'-ध्यानसे तिर्यक्-योन तथा अधोगतिकी प्राप्ति होती है, 'रौद्र'-ध्यानसे नरक प्राप्त होता है। 'धर्म्य' (सात्त्विक)-ध्यानसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है और 'शुक्ल'-ध्यानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। इसलिये ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे कल्याणकारी 'शुक्ल'-ध्यानमें ही मन-चित्त सदा लगा रहे।

(अध्याय १२६)

इष्टार्पृत् के महिमा

भगवान् श्रीकृष्णने कहा— राजन्! विधिपूर्वक वापी, कूप, तडाग, बावली, वृक्षोद्यान तथा देवमन्दिर आदिका निर्माण करानेवाले तथा इन कार्योंमें सहयोगी—कर्मकार शिल्पी, सूत्रधार आदि सभी पुण्यकर्म पुरुष अपने इष्टार्पृत्थर्मके प्रभावसे सूर्य एवं चन्द्रमाकी प्रभाके समान कान्तिमान् विमानमें बैठकर दिव्यलोकको प्राप्त करते हैं। जलाशय आदिकी खुदाईके समय जो जीव मर जाते हैं, उन्हें भी उत्तम गति प्राप्त होती है। गायके शरीरमें जितने भी रोमकूप हैं, उतने दिव्य वर्षतक

तडाग आदिका निर्माण करनेवाला स्वर्गमें निवास करता है। यदि उसके पितर दुर्गतिको प्राप्त हुए हों तो उनका भी वह उद्धार कर देता है। पितृगण यह गाथा गाते हैं कि देखो! हमारे कुलमें एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसने जलाशयका निर्माणकर प्रतिष्ठा की। जिस तालाबके जलको पीकर गौएँ संतुप्त हो जाती हैं, उस तालाब बनवानेवालेके सात कुलोंका उद्धार हो जाता है। तडाग, वापी, देवालय और सघन छायावाले वृक्ष—ये चारों इस संसारसे उद्धार करते हैं।

१-तिष्ठन् भुञ्जन् स्वप्नं गच्छन्तथा धावन्तितस्ततः । उल्लासिकाले गोविन्दं संस्मरन्तन्मयो भवेत् ॥

यं यं चापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥

(उत्तरपर्व १२६। ३९-४०)

२-भविष्यपुराणमें यह विषय तीन पर्वोंमें तीन बार आया है और वेदोंसे लेकर स्मृतियों तथा अन्य पुराणोंमें भी बार-बार आता है। यह अन्तर्वेदी और बहिर्वेदीके नामसे विख्यात है। इसमें जलाशय, वृक्ष, उद्यान आदि लगानेसे सर्वाधिक पुण्योंका लाभ बताया गया है। यहाँ इसका थोड़ा-सा संक्षेप कर दिया गया है। मात्र सारभूत बातें दी गयी हैं।

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  • उत्तरपर्व *

५३७

जिस प्रकार पुत्रके देखनेसे माता-पिताके स्वरूपका ज्ञान होता है, उसी प्रकार जलाशय देखने और जल पीनेसे उसके कर्ताके शुभाशुभका ज्ञान होता है। इसलिये न्यायसे धनका उपार्जन कर तडाग आदि बनवाना चाहिये। धूप और गर्मीसे व्याकुल पथिक यदि तडागादिके समीप जलका पान करे और वृक्षोंकी घनी छायामें ठंडी हवाका सेवन करता हुआ विश्राम करे तो तडागादिकी प्रतिष्ठा करनेवाला व्यक्ति अपने मातृकुल और पितृकुलका उद्धार कर स्वयं भी सुख प्राप्त करता है। इष्टापूर्तकर्म करनेवाला पुरुष कृतकृत्य हो जाता है। इस लोकमें जो तडागादि बनवाता है, उसीका जन्म सफल है और उसीकी माता पुत्रिणी कहलाती है। वही अजर है, वही अमर है। जबतक तडाग आदि स्थित हैं और उसकी निर्मल कीर्तिका प्रचार-प्रसार होता रहता है, तबतक वह व्यक्ति स्वर्गवासका सुख प्राप्त करता है। जो व्यक्ति हंस आदि पक्षीको कमल और कुवल्य आदि पुष्पोंसे युक्त अपने तडागमें जल पीता हुआ देखता है और जिसके तालाबमें घट, अञ्जलि, मुख तथा चंचु आदिसे अनेक जीव-जन्तु जल पीते हैं, उसी व्यक्तिका जन्म सफल है, उसकी कहँतक प्रशंसा की जाय। जो तडाग आदि बनाकर उसके किनारे देवालय बनवाता है तथा उसमें देवप्रतिष्ठा करता है, उसके पुण्यका कहँतक वर्णन किया जाय? देवालयकी ईंट जबतक खण्ड-खण्ड न हो जाय, तबतक देवालय बनानेवाला व्यक्ति स्वर्गमें निवास करता है। कूप ऐसे स्थानपर बनवाना चाहिये, जहाँ बहुत-से जीव जल पी सकें, कूपका जल स्वादिष्ट हो तो कूप बनवानेवालेके सात कुलोंका उद्धार हो जाता है। जिसके बनाये हुए कूपका जल मनुष्य पीते हैं, वह सभी प्रकारका पुण्य प्राप्त कर लेता है, ऐसा मनुष्य सभी प्राणियोंका उपकार करता

है। तडाग बनवाकर उसके तटपर वृक्षोंके बीच उत्तम देवालय बनवानेसे उस व्यक्तिकी कीर्ति सर्वत्र व्याप्त रहती है और बहुत समयतक दिव्य भोग भोगकर वह चक्रवर्ती राजाका पद प्राप्त करता है। जो व्यक्ति वापी, कूप, तडाग, धर्मशाला आदि बनवाकर अन्नका दान करता है और जिसका वचन अति मधुर है, उसका नाम यमराज भी नहीं लेते।

वे वृक्ष धन्य हैं, जो फल, फूल, पत्र, मूल, वल्कल, छाल, लकड़ी और छायाद्वारा सबका उपकार करते हैं। वस्तुओंके चाहनेवालोंको वे कभी निराश नहीं करते। धर्म-अर्थसे रहित बहुतसे पुत्रोंसे तो मार्गमें लगाया गया एक ही वृक्ष श्रेष्ठ है, जिसकी छायामें पथिक विश्राम करते हैं। सघन छायावाले श्रेष्ठ वृक्ष अपनी छाया, पल्लव और छालके द्वारा प्राणियोंको, पुष्पोंके द्वारा देवताओंको और फलोंके द्वारा पितरोंको प्रसन्न करते हैं। पुत्र तो निश्चित नहीं है कि एक वर्षपर भी श्राद्ध करेगा या नहीं, परंतु वृक्ष तो प्रतिदिन अपने फल-मूल, पत्र आदिका दानकर वृक्ष लगानेवालेका श्राद्ध करते हैं। वह फल न तो अग्निहोत्रादि कर्म करनेसे और न ही पुत्र उत्पन्न करनेसे प्राप्त होता है, जो फल मार्गमें छायादार वृक्षके लगानेसे प्राप्त होता है।

छायादार वृक्ष, पुष्प देनेवाले वृक्ष, फल देनेवाले वृक्ष तथा वृक्षवाटिका कुलीन स्त्रीकी भाँति अपने पितृकुल तथा पतिकुल दोनों कुलोंको उसी प्रकार सुख देनेवाले होते हैं, जैसे लगाये गये वृक्ष आदि अपने लगानेवाले तथा रक्षा आदि करनेवाले दोनोंके कुलोंका उद्धार कर देते हैं। जो भी बगीचा आदि लगाता है, उसे अवश्य ही उत्तम लोककी प्राप्ति होती है और वह व्यक्ति नित्य गायत्रीजपका, नित्य दानका और नित्य यज्ञ करनेका फल पाता है। जो पुरुष एक पीपल, एक नीम, एक बरगद, दस इमली तथा एक-एक कैथ, बिल्व और

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५३८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

आमलक तथा पाँच आमके वृक्ष लगाता है, वह कभी नरकका मुँह नहीं देखता*। जिसने जलाशय न बनवाया हो और एक भी वृक्ष न लगाया हो, उसने संसारमें जन्म लेकर कौन-सा कार्य किया। वृक्षोंके समान कोई भी परोपकारी नहीं है। वृक्ष धूपमें खड़े रहकर दूसरोंको छाया प्रदान करते हैं तथा फल, पुष्प आदिसे सबका सत्कार करते हैं। मानवोंकी शुभ गति पुत्रोंके बिना नहीं होती—यह कथन तो उचित ही है, किंतु यदि पुत्र कुपुत्र हो गया तो वह अपने पिताके लिये कलंकस्वरूप तथा नरकका हेतु भी बन जाता है। इसलिये विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि विधिपूर्वक वृक्षारोपण

करके उसका पालन-पोषण करे। इससे संसारमें न तो कलंक होता है और न निन्द्य गति ही प्राप्त होती है, बल्कि कीर्ति, यश एवं अन्तमें शुभ गति प्राप्त होती है।

इसी प्रकार जो व्यक्ति भव्य देव-मन्दिर बनवाकर उसमें देवमूर्तियोंकी प्रतिमाओंको स्थापित करता है, मन्दिरमें अनुलेपन, देवताओंका अभिषेक, दीपदान तथा विविध उपचारोंद्वारा उनकी अर्चा करता अथवा करवाता है, वह इस संसारमें राज्यश्री प्राप्त कर अन्तमें परमधामको प्राप्त करता है तथा इस लोकमें कीर्ति एवं यशरूपी शरीरसे प्रतिष्ठित रहता है। (अध्याय १२७—१२९)

दीपदानकी महिमाके प्रसंगमें जातिस्मरा रानी ललिताका आख्यान

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! वह कौन-सा व्रत, तप, नियम अथवा दान है, जिसके करनेसे इस लोकमें अत्यन्त तेजोमय शरीरकी प्राप्ति होती है। इसे आप बतायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! किसी समय पिंगल नामके एक तपस्वी मथुरामें आकर प्रवास कर रहे थे। उन तपस्वीसे देवी जाम्बवतीने भी यही प्रश्न किया था, उस विषयको आप सुनें—पिंगलमुनिने कहा था—‘देवि! संक्रान्ति, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, वैधृति, व्यतिपातयोग, उत्तरायण, दक्षिणायन, विषुव, एकादशी, शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी, तिथिक्षय, सप्तमी तथा अष्टमी—इन पुण्य दिनोंमें स्नान कर, व्रतपरायण स्त्री अथवा पुरुषको अपने आँगनके मध्य घृत-कुम्भ और जलता हुआ दीपक भूमिदेवको दान देना चाहिये। इससे प्रदीप्त एवं ओजस्वी शरीर प्राप्त होती है।’

राजा युधिष्ठिरने पूछा—मधुसूदन! भूमिके देवता कौन हैं? मेरे इस संशयको दूर करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! पूर्वकालमें सत्ययुगके आदिमें त्रिशंकु नामका एक (सूर्यवंशी) राजा था, जो सशरीर स्वर्गको जाना चाहता था। पर महर्षि वसिष्ठने उसे चाण्डाल बना दिया, इससे त्रिशंकु बहुत दुःखी हुआ और उसने विश्वामित्रजीसे समस्त वृत्तान्त कहा। इससे क्रुद्ध होकर विश्वामित्रने दूसरी सृष्टिकी रचना प्रारम्भ कर दी। उस सृष्टिमें सभी देवताओंके साथ-साथ त्रिशंकुके लिये दूसरा स्वर्ग बनाना प्रारम्भ कर दिया और शुद्धाटक (सिंघाड़ा), नारियल, कोद्वर, कृष्णाण्ड, ऊंट, भेड़ आदिका निर्माण किया एवं नये सप्तर्षि तथा देवताओंकी प्रतिमाका भी निर्माण कर दिया। उस समय इन्द्रने आकर इनकी प्रार्थना की और विश्वामित्रजीसे सृष्टि रोकनेका अनुरोध किया तथा

  • अक्षतथमेकं पिचुमन्दमेकं न्यग्रोधमेकं दश तिन्तिडीकान्। कपित्थबिल्वामलकीत्रयं च पञ्चाप्ररोपी नरकं न पश्येत्॥

(उत्तरपर्व १२८।११)

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  • उत्तरपर्व *

५३९

दीपदान करनेकी सम्मति दी। जो प्रतिमाएँ इन्होंने बनायी थीं, उनमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि सभी देवताओंका वास हुआ और वे ही इस संसारके प्राणियोंका कल्याण करनेके लिये मर्त्यलोकमें प्रतिमाओंमें मूर्तिमान् रूपमें स्थित हुए एवं नैवेद्यादिको ग्रहण करते हैं तथा अपने भक्तोंपर प्रसन्न होकर वरदान देते हैं, वे ही भूमिदेव कहलाते हैं। राजन्! इसीलिये उनके सम्मुख दीपदान करना चाहिये। भगवान् सूर्यके लिये प्रदत्त दीपकी रक्त वस्त्रसे निर्मित वर्तिका 'पूर्णवर्ति' कहलाती है। इसी प्रकार शिवके लिये निर्मित श्वेत वस्त्रकी वर्तिका 'ईश्वरवर्ति', विष्णुके लिये निर्मित पीत वस्त्रकी वर्तिका 'भोगवर्ति', गौरीके लिये निर्मित कुसुम रंगके वस्त्रकी वर्तिका 'सौभाग्यवर्ति', दुर्गाके लिये लाखके रंगके समान रंगवाले वस्त्रकी वर्तिका 'पूर्णवर्तिका' कहलाती है। ऐसे ही ब्रह्माके लिये प्रदत्त वर्तिका 'पद्मवर्ति', नागोंके लिये प्रदत्त वर्तिका 'नागवर्ति' तथा ग्रहोंके लिये प्रदत्त वर्तिका 'ग्रहवर्ति' कहलाती है। इन देवताओंके लिये ऐसे ही वर्तिकायुक्त दीपकका दान करना चाहिये। पहले देवताका पूजन करनेके बाद बड़े पात्रमें घी भरकर दीपदान करना चाहिये। इस विधिसे जो दीपदान करता है, वह सुन्दर तेजस्वी विमानमें बैठकर स्वर्गमें जाता है और वहाँ प्रलयपर्यन्त निवास करता है। जिस प्रकार दीप प्रकाशित होता है, उसी प्रकार दीपदान करनेवाला व्यक्ति भी प्रकाशित होता है। दीपके शिखाकी भाँति उसकी भी ऊर्ध्वगति होती है। दीपक घृत या तेलके जलाने चाहिये, वसा, मज्जा आदि तरलद्रव्ययुक्तके नहीं। जलते हुए दीपको बुझाना नहीं चाहिये, न ही उस स्थानसे हटाना चाहिये। दीप बुझा देनेवाला काना होता है और दीपको चुरानेवाला अंधा होता है। दीपका बुझाना निन्दनीय कर्म है।

राजन्! आप दीपदानके माहात्म्यमें एक आख्यान सुनें—विदर्भ देशमें चित्ररथ नामका एक राजा रहता था। उस राजाके अनेक पुत्र थे और एक कन्या थी, जिसका नाम था ललिता। वह सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न अत्यन्त सुन्दर थी। राजा चित्ररथने धर्मका अनुसरण करनेवाले महाराज काशिराज चारुधर्माके साथ ललिताका विवाह किया। चारुधर्माकी यह प्रधान रानी हुई। वह विष्णु-मन्दिरमें सहस्रों प्रज्वलित दीपक प्रतिदिन जलाया करती थी। विशेषरूपसे आश्विन-कार्तिकमें बड़े समारोहपूर्वक दीपदान करती थी। वह चौराहों, गलियों, मन्दिरों, पीपलके वृक्षके पास, गोशाला, पर्वतशिखर, नदीतटों तथा कुओंपर प्रतिदिन दीपदान करती थी। एक बार उसकी सपत्नियोंने उससे पूछा—'ललिता! तुम दीपदानका फल हमें भी बतलाओ। तुम्हारी भक्ति देवताओंके पूजन आदिमें न होकर दीपदानमें इतनी अधिक क्यों है?' यह सुनकर ललिताने कहा—'सखियो! तुमलोगोंसे मुझे कोई शिकायत नहीं है, न ही ईर्ष्या, इसलिये मैं तुमलोगोंसे दीपदानका फल कह रही हूँ। ब्रह्माजीने मनुष्योंके उद्धारके लिये साक्षात् पार्वतीजीको मद्रदेशमें श्रेष्ठ देविका नदीके रूपमें पृथ्वीपर अवतरित किया, वह पापोंका नाश करनेवाली है, उसमें एक बार भी स्नान करनेसे मनुष्य शिवजीका गण हो जाता है। उस नदीमें जहाँ भगवान् विष्णुने नृसिंहरूपसे स्वयं स्नान किया था, उस स्थानको नृसिंहतीर्थ कहते हैं। नृसिंहतीर्थमें स्नान करनेमात्रसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।'

सौवीर नामके एक राजा थे, जिसके पुरोहित थे मैत्रेय। राजाने देविकाके तटपर एक विष्णुमन्दिर बनवाया। उस मन्दिरमें मैत्रेयजी प्रतिदिन पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे पूजन और दीपदान किया

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५४०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

करते थे। वे एक दिन कार्तिककी पूर्णिमाको वहाँ दीपदानका बहुत बड़ा उत्सव मना रहे थे। रात्रिके समय सभी लोगोंको नींद आ गयी। उस मन्दिरमें अपने पूर्वजन्ममें मूषिकारूपमें रहनेवाली मुझे दीपककी घृतवर्तिको खानेकी इच्छा हुई। उसी क्षण मुझे बिल्लीकी आवाज सुनायी दी। मैंने भयभीत होकर दीपककी बत्ती छोड़ दी और छिप गयी, वह दीपक बुझने नहीं पाया। मन्दिरमें पूर्ववत् प्रकाश हो गया। कुछ काल बाद मेरी मृत्यु हो गयी, पुनः मैं विदभदेशमें चित्रथ राजाकी राजकन्या हुई और काशिराज चारुधर्माकी मैं पटरानी हुई। सखियो! कार्तिक मासमें विष्णुमन्दिरमें दीपदानका ऐसा सुन्दर फल होता है। चूँकि मैं मूषिका थी, मेरा दीपदानका कोई संकल्प नहीं था, फिर भी

मुझसे अनायास जो मन्दिरमें भयवश दीप प्रज्वलित हुआ अथवा मैं दीपको नष्ट न कर सकी, उस समय बिना परिज्ञानके मुझसे जो दीपदानका पुण्यकर्म हुआ था, उसी पुण्य-कर्मके फलस्वरूप आज मैं श्रेष्ठ महारानीके पदपर स्थित हूँ और मुझे अपने पूर्वजन्मका ज्ञान है। इसी कारण मैं आज भी निरन्तर दीपदान करती रहती हूँ। मैं दीपदानके फलको भलीभाँति जानती हूँ, इसलिये नित्य देवालयमें दीप जलाती हूँ।' ललिताका यह कथन सुनकर सभी सहेलियाँ भी दीपदान करने लगीं और बहुत समयतक राज्य-सुख भोगकर सभी अपने पतिके साथ विष्णुलोकको चली गयीं। इस प्रकार जो भी पुरुष अथवा स्त्री दीपदान करते हैं, वे उत्तम तेज प्राप्तकर विष्णुलोकको प्राप्त करते हैं। (अध्याय १३०)

वृषोत्सर्गकी महिमा

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! कार्तिक और माघकी पूर्णिमा, चैत्रकी पूर्णिमा तथा तृतीया और वैशाखकी पूर्णिमा एवं द्वादशीमें शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न वृषभको चार गौओंके साथ छोड़नेसे अनन्त पुण्य प्राप्त होता है। इस वृषोत्सर्गकी विधिको गर्गाचार्यने मुझसे इस प्रकार बतलाया है—सबसे पहले षोडशमातृकाका पूजन कर मातृश्राद्ध तथा फिर आभ्युदयिक श्राद्ध करना चाहिये। फिर एक कलश स्थापित कर उसपर रुद्रका पूजन करके घृतसे हवन करना चाहिये। उस सर्वाङ्गसुन्दर तरुण बछड़ेके वाम भागमें त्रिशूल और दक्षिण भागमें चक्रयुक्त चिह्न अङ्कितकर कुंकुम आदिसे अनुलिप्त करे, गलेमें पुष्पकी माला पहना दे। अनन्तर चार तरुण बछियाओंको भी भूषित कर उनके कानमें कहे कि 'आपके पतिस्वरूप इस पुष्ट एवं सुन्दर वृषको मैं विसर्जित कर रहा हूँ, आप इसके साथ स्वच्छन्दतापूर्वक प्रसन्न होकर विहार करें।' पुनः

उनको वस्त्रसे आच्छादितकर एवं स्वादिष्ट भोजनसे संतुष्टकर देवालय, गोष्ठ अथवा नदी-संगम आदि स्थानोंमें छोड़ना चाहिये। वे पुरुष धन्य हैं, जो स्वेच्छाचारी, गरजते हुए, ककुद्धान् तथा अहंकारसे पूर्ण वृष छोड़ते हैं। इस विधिसे जो वृषोत्सर्ग करता है, उसके दस पुस्त पहलेके और दस पुस्त आगेके भी पुरुष सद्भक्तिको प्राप्त करते हैं। यदि वृष नदीके जलमें प्रवेश करता है और उसके सींगसे या पूँछसे जो जल उछलता है, उस तर्पणरूप जलसे वृषोत्सर्ग करनेवाले व्यक्तिके पितरोंको अक्षयतृप्ति प्राप्त होती है। अपने सींगसे या खुरोंसे यदि वह मिट्टी खोदता है तो वृषोत्सर्ग करनेवालेके पितरोंके लिये वह खोदी भूमि जल भर जानेपर मधुकुल्या बन जाती है। चार हजार हाथ लम्बे-चौड़े तडाग बनानेसे पितरोंको उतनी तृप्ति नहीं होती, जितनी तृप्ति एक वृष छोड़नेसे होती है। मधु और तिलको एक साथ मिलाकर पिण्डदान करनेसे पितरोंको जो

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  • उत्तरपर्व *

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तृप्ति नहीं होती, वह तृप्ति एक वृषोत्सर्ग करनेसे प्राप्त होती है। जो व्यक्ति अपने पितरोंके उद्धारके लिये वृष छोड़ता है, वह स्वयं भी स्वर्गलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १३१)

फाल्गुन-पूर्णिमोत्सव

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! फाल्गुनकी पूर्णिमाको ग्राम-ग्राम तथा नगर-नगरमें उत्सव क्यों मनाया जाता है और गाँवों एवं नगरोंमें होली क्यों जलायी जाती है? क्या कारण है कि बालक उस दिन घर-घर अनाप-शनाप शोर मचाते हैं? अडाडा किसे कहते हैं, उसे शीतोष्ण क्यों कहा जाता है तथा किस देवताका पूजन किया जाता है। आप कृपाकर यह बतानेका कष्ट करें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—पार्थ! सत्ययुगमें रघु नामके एक शूरवीर प्रियवादी सर्वगुणसम्पन्न दानी राजा थे। उन्होंने समस्त पृथ्वीको जीतकर सभी राजाओंको अपने वशमें करके पुत्रकी भाँति प्रजाका लालन-पालन किया। उनके राज्यमें कभी दुर्भिक्ष नहीं हुआ और न किसीकी अकाल मृत्यु हुई। अधर्ममें किसीकी रुचि नहीं थी। पर एक दिन नगरके लोग राजद्वारपर सहसा एकत्र होकर 'त्राहि', 'त्राहि' पुकारने लगे। राजाने इस तरह भयभीत लोगोंसे कारण पूछा। उन लोगोंने कहा कि महाराज! ढोंढा नामकी एक राक्षसी प्रतिदिन हमारे बालकोंको कष्ट देती है और उसपर किसी मन्त्र-तन्त्र, औषधि आदिका प्रभाव भी नहीं पड़ता, उसका किसी भी प्रकार निवारण नहीं हो पा रहा है। नगरवासियोंका यह वचन सुनकर विस्मित राजाने राज्यपुरोहित महर्षि वसिष्ठमुनिसे उस राक्षसीके विषयमें पूछा। तब उन्होंने राजासे कहा—'राजन्! माली नामका एक दैत्य है, उसीकी एक पुत्री है, जिसका नाम है ढोंढा। उसने बहुत समयतक उग्र तपस्या करके शिवजीको प्रसन्न किया। उन्होंने उससे वरदान माँगनेको कहा।' इसपर ढोंढाने यह

वरदान माँगा कि 'प्रभो! देवता, दैत्य, मनुष्य आदि मुझे न मार सकें तथा अस्त्र-शस्त्र आदिसे भी मेरा वध न हो, साथ ही दिनमें, रात्रिमें, शीतकाल, उष्णकाल तथा वर्षाकालमें, भीतर अथवा बाहर कहीं भी मुझे किसीसे भय न हो।' इसपर भगवान् शंकरने 'तथास्तु' कहकर यह भी कहा कि 'तुम्हें उन्मत्त बालकोंसे भय होगा।' इस प्रकार वर देकर भगवान् शिव अपने धामको चले गये। वही ढोंढा नामकी कामरूपिणी राक्षसी नित्य बालकोंको और प्रजाको पीड़ा देती है। 'अडाडा' मन्त्रका उच्चारण करनेपर वह ढोंढा शान्त हो जाती है। इसलिये उसको अडाडा भी कहते हैं। यही उस राक्षसी ढोंढाका चरित्र है। अब मैं उससे पीछा छुड़ानेका उपाय बता रहा हूँ।

राजन्! आज फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी पूर्णिमा तिथिको सभी लोगोंको निडर होकर क्रीडा करनी चाहिये और नाचना, गाना तथा हँसना चाहिये। बालक लकड़ियोंके बने हुए तलवार लेकर वीर सैनिकोंकी भाँति हर्षसे युद्धके लिये उत्सुक हो दौड़ते हुए निकल पड़ें और आनन्द मनायें। सूखी लकड़ी, उपले, सूखी पत्तियाँ आदि अधिक-से-अधिक एक स्थानपर इकट्ठाकर उस ढेरमें रक्षोघ्न मन्त्रोंसे अग्नि लगाकर उसमें हवनकर हँसकर ताली बजाना चाहिये। उस जलते हुए ढेरकी तीन बार परिक्रमा कर बच्चे, बूढ़े सभी आनन्ददायक विनोदपूर्ण वार्तालाप करें और प्रसन्न रहें। इस प्रकार रक्षामन्त्रोंसे, हवन करनेसे, कोलाहल करनेसे तथा बालकोंद्वारा तलवारके प्रहारके भयसे उस दुष्ट राक्षसीका निवारण हो जाता है।

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५४२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

वसिष्ठजीका यह वचन सुनकर राजा रघुने सम्पूर्ण राज्यमें लोगोंसे इसी प्रकार उत्सव करनेको कहा और स्वयं भी उसमें सहयोग किया, जिससे वह राक्षसी विनष्ट हो गयी। उसी दिनसे इस लोकमें ढोंढाका उत्सव प्रसिद्ध हुआ और अडाडाकी परम्परा चली। ब्राह्मणोंद्वारा सभी दुष्टों और सभी रोगोंको शान्त करनेवाला वसोधर्रा-होम इस दिन किया जाता है, इसलिये इसको होलिका भी कहा जाता है। सब तिथियोंका सार एवं परम आनन्द देनेवाली यह फाल्गुनकी पूर्णिमा तिथि है। इस दिन रात्रिको बालकोंकी विशेषरूपसे रक्षा करनी चाहिये। गोबरसे लिपे-पुते घरके आँगनमें बहुतसे खड्गहस्त बालक बुलाने चाहिये और घरमें रक्षित बालकोंको काष्ठनिर्मित खड्गसे स्पर्श कराना चाहिये। हँसना, गाना, बजाना, नाचना आदि करके उत्सवके बाद गुड़ और बढिया पकवान देकर बालकोंको विसर्जित करना चाहिये। इस विधिसे ढोंढाका दोष अवश्य शान्त हो जाता है।

महाराज युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! दूसरे दिन चैत्र माससे वसन्त-ऋतुका आगमन होता है, उस दिन क्या करना चाहिये?

भगवान् श्रीकृष्णने कहा— महाराज! होलीके दूसरे दिन प्रतिपदामें प्रातःकाल उठकर आवश्यक

नित्यक्रियासे निवृत्त हो पितरों और देवताओंके लिये तर्पण-पूजन करना चाहिये और सभी दोषोंकी शान्तिके लिये होलिकाकी विभूतिकी वन्दना कर उसे अपने शरीरमें लगाना चाहिये। घरके आँगनको गोबरसे लीपकर उसमें एक चौकोर मण्डल बनाये और उसे रंगीन अक्षताँसे अलंकृत करे। उसपर एक पीठ रखे। पीठपर सुवर्णसहित पल्लवोंसे समन्वित कलश स्थापित करे। उसी पीठपर श्वेत चन्दन भी स्थापित करना चाहिये। सौभाग्यवती स्त्रीको सुन्दर वस्त्र, आभूषण पहनकर दही, दूध, अक्षत, गन्ध, पुष्प, वसोधर्रा आदिसे उस श्रीखण्डकी पूजा करनी चाहिये। फिर आम्रमञ्जरीसहित उस चन्दनका प्राशन करना चाहिये। इससे आयुकी वृद्धि, आरोग्यकी प्राप्ति तथा समस्त कामनाएँ सफल होती हैं। भोजनके समय पहले दिनका पकवान थोड़ा-सा खाकर इच्छानुसार भोजन करना चाहिये। इस विधिसे जो फाल्गुनोत्सव मनाता है, उसके सभी मनोरथ अनायास ही सिद्ध हो जाते हैं। आधि-व्याधि सभीका विनाश हो जाता है और वह पुत्र, पौत्र, धन-धान्यसे पूर्ण हो जाता है। यह परम पवित्र, विजयदायिनी पूर्णिमा सब विघ्नोंको दूर करनेवाली है तथा सब तिथियोंमें उत्तम है।

(अध्याय १३२)

दमनकोत्सव, दोलोत्सव तथा रथयात्रोत्सव आदिका वर्णन

राजा युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! इस संसारमें बहुत-से सुगन्धित पुष्प हैं, परंतु उनको छोड़कर दमनक (दौना) नामक पुष्प देवताओंको क्यों चढ़ाया जाता है तथा दोलोत्सव और रथयात्रोत्सव मनानेकी क्या विधि है, इसका वर्णन करनेकी आप कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा— पार्थ! मन्दराचल पर्वतपर दमनक नामका एक श्रेष्ठ तथा अत्यन्त

सुगन्धित वृक्ष उत्पन्न हुआ। उसके दिव्य गन्धके प्रभावसे देवाङ्गनाएँ विमूग्ध हो गयीं और ऋषि-मुनि भी जप, तप वेदाध्ययन आदिसे च्युत हो गये। इस प्रकार उसके गन्धसे सब लोग उन्मत्त हो गये। सभी शुभ कार्यों एवं मङ्गल-कार्योंमें विघ्न उपस्थित हो गया। यह देखकर ब्रह्माजीको बड़ा क्रोध उत्पन्न हुआ और वे दमनकसे बोले— 'दमनक! मैंने तुम्हें संसार (-के दोषों)-के दमन

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  • उत्तरपर्व *

५४३

(शान्त) करनेके लिये उत्पन्न किया है, किंतु तुमने सम्पूर्ण संसारको उद्देहित कर दिया है, तुम्हारा यह काम ठीक नहीं है। सज्जनोंका कहना है कि अतिशय सर्वत्र वर्ज्य है। इसलिये ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे लोगोंमें उद्देग न पैदा हो एकका अपकार करनेवाला व्यक्ति अधम कहा जाता है, परंतु जो अनेकोंका अपकार करनेमें प्रवृत्त हो गया हो, उसके लिये क्या कहा जाय ? तुमने तो बहुतसे लोगोंको दुःख दिया है, इसलिये मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि कोई भी व्यक्ति तुम्हारे पुष्पको देवकार्य तथा पितृकार्यमें आजसे ग्रहण नहीं करेगा।' ब्रह्माजीद्वारा दिये गये शापको सुनकर दमनकने कहा—'महाराज ! मैंने द्वेषवश अथवा क्रोधवश किसीका अपकार नहीं किया है। आपने ही मुझे इतना सुगन्ध दिया है कि उसके प्रभावसे सभी लोग स्वयं उन्मत्त हो जाते हैं। इसमें मेरा क्या दोष है। आपने ही मेरा ऐसा स्वभाव बनाया है। जिसकी जो प्रकृति होती है, उसे वह त्याग नहीं सकता; क्योंकि प्रकृति त्यागनेमें वह असमर्थ होता है१। निरपराध होते हुए भी आपने मुझे शाप दिया है।' दमनककी इस तर्कसंगत बातको सुनकर ब्रह्माजीने कहा—'दमनक ! तुम्हारा कथन ठीक है। मैंने तुम्हें शाप दिया है। उसका मुझे हार्दिक दुःख है। उसकी निवृत्तिके लिये मैं तुझे वरदान देता हूँ कि वसन्त-ऋतुमें तुम सभी देवताओंके मस्तकपर चढ़ोगे। जो व्यक्ति भक्तिभावसे दमनक-पुष्प देवताओंपर चढ़ायेगा, उसे सदा सुख प्राप्त होगा। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी दमनक-चतुर्दशीके नामसे विख्यात होगी और उस दिन व्रत-नियमके पालन करनेसे व्रतीके सभी पाप नष्ट हो जायेंगे। इतना कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान

हो गये और दमनक भी अपने गन्धसे त्रिभुवनको वासित करता हुआ शिवजीके निवास-स्थान मन्दराचलपर रहने लगा। उसी दिनसे लोकमें दमनक-पूजा प्रसिद्ध हुई२।'

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज ! अब मैं दोलोत्सवका वर्णन कर रहा हूँ। किसी समय नन्दनवनमें दोलोत्सव हुआ। वसन्त-ऋतुमें देवाङ्गनाएँ और देवता मिलकर दोला-क्रीड़ा करने लगे। नन्दनवनमें यह मनोहारी उत्सव देखकर भगवती पार्वतीजीने शंकरजीसे कहा—'भगवन् ! इस क्रीड़ाको आप देखें। आप मेरे लिये भी एक दोला बनवाइये, जिसपर मैं आपके साथ बैठकर दोला-क्रीड़ा कर सकूँ।' पार्वतीजीके यह कहनेपर शिवजीने देवताओंको अपने पास बुलाकर दोला बनानेको कहा। देवताओंने शिवजीके कथनानुसार सुन्दर उत्तम इष्टापूर्तमय दोस्तम्भ गाड़कर उसपर सत्यस्वरूप एक लकड़ीका पटरा रखा और वासुकि नागकी रस्सी बनाकर उसके फणोंपर बैठनेके लिये रत्नजटित पीठकी रचना की। उस फणके ऊपर अत्यन्त मृदुल कपास और रेशमी वस्त्र बिछाकर दोलाकी शोभा बढ़ानेके लिये मोतियोंके गुच्छें और फूल-मालाओंसे उसे सजा दिया। इस प्रकार देवताओंने अति उत्तम दोला तैयार कर भगवान् शंकरको आदरपूर्वक प्रदान किया। अनन्तर भगवान् चन्द्रभूषण भगवती पार्वतीके साथ दोलापर बैठ गये। भगवान् शंकरके पार्श्व दोला झूलाने लगे तथा जया और विजया दोनों सखियाँ चँवर डूलाने लगीं। उस समय पार्वतीजीने बहुत ही मधुर स्वरमें गीत गाया, जिससे शिवजी आनन्दमग्न हो गये। गन्धर्व गीत गाने लगे, अप्सराएँ नाचने लगीं और चारण विविध प्रकारके बाजे बजानेमें संलग्न हो गये।

१-या यस्य जन्तोः प्रकृतिः शुभा वा यदि वेतरा। स तस्यामेव रमते दुष्कृते सुकृते तथा ॥ (उत्तरपर्व १३३।१५)

२-अग्नि, मत्स्य और शिवपुराणमें इसका अधिक विस्तारसे वर्णन है।

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५४४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

परंतु शिवजीके दोला-विहारसे सभी पर्वत काँपने लगे, समुद्रमें हलचल मच गया, प्रचण्ड पवन चलने लगा, सारा लोक त्रस्त हो गया। इस प्रकार त्रैलोक्यको अति व्याकुल देखकर इन्द्रादि सभी देवगणोंने सभीके पापोंका नाश करनेवाले शिवजीके पास आकर प्रणाम किया और प्रार्थना कर कहने लगे—‘नाथ! अब आप दोला-लीलासे निवृत्त हों, क्योंकि त्रैलोक्यको क्षोभ प्राप्त हो रहा है।’ इस प्रकार देवताओंकी प्रार्थना सुनकर प्रसन्न हो शिवजीने दोलासे उतरकर कहा कि ‘आजसे वसन्त-ऋतुमें जो व्यक्ति इस दोलोत्सवको करेगा तथा नैवेद्य अर्पित कर तत्तद् देवताओंके मूल मन्त्रोंसे उन्हें दोलापर आरोहण करायेगा, करेगा, आनन्द मनायेगा और स्तुति-पाठ करेगा, वह सभी अभीष्टोंको प्राप्त करेगा।’

भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—महाराज! अब मैं रथयात्राका वर्णन करता हूँ।

एक बार चैत्र मासमें मलयपर देवताओंसे समावृत्त भगवान् शंकर शान्तभावसे विराजमान थे। इसी समय मृत्युलोकमें इधर-उधर घूमते हुए देवर्षि नारद ब्रह्मलोकसे भगवान् शंकरके पास आये। उन्होंने भगवान्को प्रणाम किया और आसनपर बैठ गये। सर्वज्ञ भगवान् शंकरने देवर्षि नारदसे पूछा—‘मुने! आपका आगमन कहाँसे हो रहा है?’ नारद बोले—‘देवदेव! मैं मृत्युलोकसे आ रहा हूँ। वहाँ कामदेवके मित्र वसन्त-ऋतुने सारा संसार अपने वशमें कर लिया है। वहाँ मन्द-मन्द सुगन्धित मलय पवन बहता है। वसन्त-ऋतुके सहयोगी—कोकिल, आम्रमञ्जरी आदि सभी उसके कार्यमें सहयोग प्रदान कर रहे हैं। नगर-नगर और ग्राम-ग्राममें वसन्त-ऋतु यह घोषणा कर रहा है कि इस संसारका ही नहीं, अपितु तीनों लोकोंका स्वामी एकमात्र कामदेव

है। भगवन्! उसीके शासनमें सभी लोग उन्मत्त-से हो रहे हैं। चैत्र मासका यह विचित्र प्रभाव देखकर मैं आपसे निवेदन करने आया हूँ।’ नारदजीका वचन सुनकर भगवान् शंकर गम्भर्व, अप्सरा, मुनिगण और सभी देवताओंको साथ लेकर मृत्युलोकमें आये और उन्होंने देखा कि जैसा नारदजीने कहा था, वही स्थिति मृत्युलोकमें व्याप्त है। सब लोग उन्मत्त हो गये हैं। आनन्दमें मग्न हैं। शिवजी वसन्तकी शोभा देख ही रहे थे कि उनके साथ जो देवता आदि आये थे, वे भी आनन्दित हो गाने-बजाने लगे। वसन्तके प्रभावसे देवताओंको भी शुब्ध देखकर शंकरने यह विचार किया कि यह तो बड़ा अनर्थ हो रहा है। इसके प्रतीकारका कोई-न-कोई उपाय करना ही चाहिये। जो अनर्थ होता हुआ देखकर भी उसके निवारणका उपाय नहीं करता, वह अवश्य ही विपत्तिमें पड़कर दुःखको प्राप्त करता है। अब मुझे इन सबकी उन्मादसे रक्षा करनी चाहिये और स्वामिभक्त वसन्त-ऋतुका भी सम्मान रखना चाहिये। यह विचारकर शिवजीने वसन्त-ऋतुको अपने पास बुलाकर कहा कि ‘वसन्त! तुम केवल चैत्र मासमें अपना प्रभाव प्रकट करो, चैत्र मासके शुक्ल पक्षमें सभी जीवोंको और विशेष रूपसे देवताओंको सुख देनेवाले हो जाओ।’ अनन्तर देवताओंको स्वस्थचित्त किया और यह भी कहा कि ‘जो व्यक्ति वसन्त-ऋतुमें रथयात्रोत्सव करेगा, वह इस संसारमें दिव्य भोगोंको भोगनेवाला तथा नीरोग होगा।’ इतना कहकर शिवजी सभी देवताओंके साथ अपने लोकको चले गये। वसन्त-ऋतु भी शिवजीके आज्ञानुसार वनमें विहार करता हुआ अन्तर्धान हो गया। उसी दिनसे लोकमें रथयात्रोत्सवका प्रचार-प्रसार हुआ। जो देवताओंकी रथयात्रा करता है, उसके धन,

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  • उत्तरपर्व *

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पशु, पुत्र आदिकी वृद्धि होती है और अन्तमें वह सद्गतिको प्राप्त करता है*।

राजन्! अब आप विशेष तिथियोंका वर्णन सुनें। तृतीयाको गौरी, चतुर्थीको गणपति, पञ्चमीको लक्ष्मी अथवा सरस्वती, षष्ठीको स्कन्द, सप्तमीको सूर्य, अष्टमी और चतुर्दशीको शिव, नवमीको चण्डिका, दशमीको वेदव्यास आदि शान्तचित्त ऋषि-महर्षि, एकादशी तथा द्वादशीको भगवान् विष्णु, त्रयोदशीको कामदेव और पूर्णिमाको सभी देवताओंका अर्चन-पूजन करना चाहिये। इस प्रकार देवताओंकी निर्दिष्ट तिथियोंमें ही दमनकोत्सव, दोलोत्सव और रथयात्रा आदि उत्सव करने चाहिये। इस प्रकार वसन्त-ऋतुमें उत्सव करनेवाला व्यक्ति बहुत कालतक स्वर्गका सुख भोगकर पुनः चक्रवर्ती राजाका पद प्राप्त करता है।

भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—राजन्! जब भगवान् शंकरने अपने नेत्रकी ज्वालासे कामदेवको भस्म कर डाला था, उस समय कामदेवकी पत्नियाँ रति और प्रीति दोनों रो-रोकर विलाप करने लगीं। इसपर पार्वतीजीके हृदयमें दया उत्पन्न हो गयी और वे शिवजीसे प्रार्थना करने लगीं—‘महाराज! आप कृपाकर इस कामदेवको जीवनदान दें और शरीर प्रदान कर दें।’ यह सुनकर प्रसन्न हो शिवजीने कहा—‘पार्वती! यद्यपि अब यह मूर्तिमान् रूपमें जीवित नहीं हो सकता, परंतु चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको प्रतिवर्ष एक बार यह मनसे उत्पन्न होकर जीवित होगा। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको जो भी कामदेवका पूजन करेगा, वह वर्षभर सुखी रहेगा। इतना कहकर शिवजी कैलासपर चले

गये। राजन्! इसकी विधिको सुनें—चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको स्नान कर एक अशोकवृक्ष बनाकर उसके नीचे रति, प्रीति और वसन्तसहित कामदेवकी प्रतिमाको सिंदूर और हल्दीसे बनाना चाहिये अथवा सुवर्णकी मूर्ति स्थापित करनी चाहिये। मूर्ति ऐसी होनी चाहिये, जिसकी सेवामें विद्याधरियाँ हाथ जोड़े हों, अप्सराएँ जिसके चारों तरफ खड़ी हों, गन्धर्व नृत्य कर रहे हों। इस प्रकार मध्याह्नेके समय गन्ध, पुष्प, धूप, अक्षत, ताम्बूल, दीप, अनेक प्रकारके फल, नैवेद्य आदि उपचारोंसे कामदेवकी तथा अपने पतिकी भी पूजा करे। जो इस प्रकार प्रतिवर्ष कामोत्सव करता है, वह सुभिक्ष, क्षेम, आरोग्य, लक्ष्मी आदिको प्राप्त करता है। विष्णु, ब्रह्मा तथा सूर्य, चन्द्र आदि ग्रह, कामदेव, वसन्त और गन्धर्व, असुर, राक्षस, सुपर्ण, नाग, पर्वत आदि उसपर प्रसन्न हो जाते हैं। उसको कभी शोक नहीं होता। जो स्त्री वसन्त-ऋतुमें रति, प्रीति, वसन्त, मलयानिल आदि परिवारसहित कामदेवका भक्तिपूर्वक पूजन करती है, वह सौभाग्य, रूप, पुत्र और सुखको प्राप्त करती है।’

महाराज! इसी प्रकार ज्येष्ठ मासके प्रतिपद तिथिसे लेकर पूर्णिमातक भगवती भूतमाताका पूजोत्सव मनाना चाहिये। अनेक प्रकारके मनोविनोदपूर्ण एवं हास्यपूर्ण गीत, नाटक आदिका आयोजन करना चाहिये। नवमी अथवा एकादशीको दीपक जलाकर अतीव भक्तिपूर्वक भगवतीके समीप ले जाने चाहिये।

इस प्रकार पूर्णिमातक प्रदोषके समय दीपमहोत्सव करना चाहिये और द्वादशीके दिन

  • कालक्रमसे इस रथयात्राका प्रचलन कम हो गया, किंतु आषाढ़ शुक्ल द्वितीयाको सर्वत्र जगन्नाथजीकी रथयात्रा निकलती है, विशेषकर पुरीमें।

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५४६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भूतमाताका विशेष उत्सव मनाना चाहिये। इस प्रकार अनेक प्रकारके उत्सवोंसे भूतमाताका पूजन करनेवाले व्यक्ति सपरिवार प्रसन्न रहते हैं और

उनके घरमें किसी प्रकारके विघ्न उत्पन्न नहीं होते। ये भूतमाता भगवती पार्वतीके अंशसे समुद्धृत हैं। (अध्याय १३३-१३६)

श्रावणपूर्णिमाको रक्षाबन्धनकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! प्राचीन कालमें देवासुर-संग्राममें देवताओंद्वारा दानव पराजित हो गये। दुःखी होकर वे दैत्यराज बलिके साथ गुरु शुक्राचार्यजीके पास गये और अपनी पराजयका वृत्तान्त बतलाया। इसपर शुक्राचार्य बोले—‘दैत्यराज! आपको विषाद नहीं करना चाहिये। दैववश कालकी गतिसे जय-पराजय तो होती ही रहती है। इस समय वर्षभरके लिये तुम देवराज इन्द्रके साथ संधि कर लो, क्योंकि इन्द्र-पत्नी शचीने इन्द्रको रक्षा-सूत्र बाँधकर अजेय बना दिया है। उसीके प्रभावसे दानवेन्द्र! तुम इन्द्रसे परास्त हुए हो। एक वर्षतक प्रतीक्षा करो, उसके बाद तुम्हारा कल्याण होगा। अपने गुरु शुक्राचार्यके वचनोंको सुनकर सभी दानव निश्चित हो गये और समयकी प्रतीक्षा करने लगे। राजन्! यह रक्षाबन्धनका विलक्षण प्रभाव है, इससे विजय, सुख, पुत्र, आरोग्य और धन प्राप्त होता है।’

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! किस तिथिमें किस विधिसे रक्षाबन्धन करना चाहिये। इसे बतायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! श्रावण मासकी पूर्णिमाके दिन प्रातःकाल उठकर शौच इत्यादि नित्य-क्रियासे निवृत्त होकर श्रुति-स्मृति-विधिसे स्नान कर देवताओं और पितरोंका निर्मल जलसे तर्पण करना चाहिये तथा उपाकर्मविधिसे

वेदोक्त ऋषियोंका तर्पण भी करना चाहिये। ब्राह्मणवर्ग देवताओंके उद्देश्यसे श्राद्ध करें। तदनन्तर अपराह्ण-कालमें रक्षापोटलिका इस प्रकार बनाये—कपास अथवा रेशमके वस्त्रमें अक्षत, गौर सर्पप, सुवर्ण, सरसों, दूर्वा तथा चन्दन आदि पदार्थ रखकर उसे बाँधकर एक पोटलिका बना ले तथा उसे एक ताम्रपात्रमें रख ले और विधिपूर्वक उसको प्रतिष्ठित कर ले। आँगनको गोबरसे लीपकर एक चौकोर मण्डल बनाकर उसके ऊपर पीठ स्थापित करे और उसके ऊपर मन्त्रीसहित राजाको पुरोहितके साथ बैठना चाहिये। उस समय उपस्थित जन प्रसन्न-चित्त रहें। मङ्गल-ध्वनि करें। सर्वप्रथम ब्राह्मण तथा सुवासिनी स्त्रियाँ अध्यादिके द्वारा राजाकी अर्चना करें। अनन्तर पुरोहित उस प्रतिष्ठित रक्षापोटलीको इस मन्त्रका पाठ करते हुए राजाके दाहिने हाथमें बाँधें—

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

(उत्तरपर्व १३७।२०)

तत्पश्चात् राजाको चाहिये कि सुन्दर वस्त्र, भोजन और दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंकी पूजाकर उन्हें संतुष्ट करे। यह रक्षाबन्धन चारों वर्णोंको करना चाहिये। जो व्यक्ति इस विधिसे रक्षाबन्धन करता है, वह वर्षभर सुखी रहकर पुत्र-पौत्र और धनसे परिपूर्ण हो जाता है। (अध्याय १३७)

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  • उत्तरपर्व *

५४७

महानवमी ( विजयादशमी )-व्रत

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! महानवमी सब तिथियोंमें श्रेष्ठ है। सभी प्रकारके मङ्गल और भगवतीकी प्रसन्नताके लिये सब लोगोंको और विशेषकर राजाओंको महानवमीका उत्सव अवश्य मनाना चाहिये।

युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! इस महानवमी-व्रतका आरम्भ कबसे हुआ? क्या यशोदाके गर्भसे प्रादुर्भूत होनेके समयसे महानवमी-व्रतका प्रचलन हुआ अथवा इसके पूर्व सत्ययुग आदिमें भी यह महानवमी-व्रत था? इसे आप बतलानेकी कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! वह परमशक्ति सर्वव्यापिनी, भावगम्या, अनन्ता और आद्या आदि नामसे विश्वविख्यात है। उनका काली, सर्वमङ्गला, माया, कात्यायिनी, दुर्गा, चामुण्डा तथा शंकरप्रिया आदि अनेक नाम-रूपोंसे ध्यान और पूजन किया जाता है।

देव, दानव, राक्षस, गन्धर्व, नाग, यक्ष, किन्नर, नर आदि सभी अष्टमी तथा नवमीको उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। कन्याके सूर्यमें आश्विन मासके शुक्ल पक्षमें अष्टमीको यदि मूल नक्षत्र हो तो उसका नाम महानवमी है। यह महानवमी तिथि तीनों लोकोंमें अत्यन्त दुर्लभ है। आश्विन मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी और नवमीको जगन्माता भगवती श्रीअम्बिकाका पूजन करनेसे सभी शत्रुओंपर विजय प्राप्त हो जाती है। यह तिथि पुण्य, पवित्रता, धर्म और सुखको देनेवाली है। इस दिन मुण्डमालिनी चामुण्डाका पूजन अवश्य करना चाहिये। सभी कल्पों और मन्वन्तरोंमें देव, दैत्य आदि अनेक प्रकारके उपचारोंसे नवमी तिथिको भगवतीकी पूजा किया करते हैं और तीनों लोकोंमें अवतार लेकर भगवती मर्यादाका पालन करती रहती हैं।

राजन्! यही पराम्बा जगन्माता भगवती यशोदाके गर्भसे उत्पन्न हुई थीं और वे कंसके मस्तकपर पैर रखकर आकाशमें चली गयीं और फिर विन्ध्याचलमें स्थापित हुई, तभीसे यह पूजा प्रवर्तित हुई।

भगवतीका यह उत्सव पहलेसे ही प्रसिद्ध था, परंतु सभी प्राणियोंके उपकारके लिये तथा सभी विघ्न-बाधाओंकी शान्तिके लिये ही मैंने अपनी बहनके रूपमें भगवती विन्ध्यवासिनीदेवीकी महिमाका विशेषरूपसे प्रचार किया। विन्ध्यवासिनी भगवतीके स्थानमें नौ रात्रि, तीन रात्रि, एक रात्रि उपवास या अयाचितव्रत अथवा नक्तव्रत कर अनेक प्रकारके उपचारोंसे भगवतीकी आराधना करनी चाहिये। ग्राम-ग्राम, नगर-नगर और घर-घरमें सभी लोगोंको स्नान कर प्रसन्नचित्त होकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री आदि सभीको भगवतीकी पूजा करनी चाहिये। विशेषकर राजाओंको तो यह पूजन अवश्य करना चाहिये।

विजयकी इच्छा रखनेवाले राजाको प्रतिपदासे अष्टमीपर्यन्त लोहाभिहारिक कर्म (अस्त्र-शस्त्र-पूजन) करना चाहिये। सर्वप्रथम पूर्वोत्तर ढालवाली भूमिमें नौ अथवा सात हाथ लम्बा-चौड़ा, पताकाओंसे सुसज्जित एक मण्डप बनाना चाहिये। उसमें अग्निकोणमें तीन मेखला और पीपलके समान योनिसे युक्त एक अति सुन्दर एक हाथके कुण्डकी रचना करनी चाहिये। राजाके चिह्न—छत्र, चामर, सिंहसन, अश्व, ध्वजा, पताका आदि और सभी प्रकारके अस्त्र-शस्त्र मण्डपमें लाकर रखे। उन सबका अधिवासन करे। इसके अनन्तर ब्राह्मणको चाहिये कि वह स्नानकर श्वेत वस्त्र धारणकर मण्डपादिकी पूजा करे और फिर ओंकारपूर्वक राजचिह्नोंके निर्दिष्ट मन्त्रोंद्वारा घृतसे संयुक्त पायससे हवन-कर्म करे। पूर्वकालमें बहुत

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५४८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

ही बलवान्, शक्तिशाली लोह नामका एक दैत्य पैदा हुआ था। उसको देवताओंने मारकर खण्ड-खण्ड कर पृथ्वीपर गिरा दिया। वही दैत्य आज लोहाके रूपमें दिखायी पड़ता है। उसीके अङ्गोंसे ही विभिन्न प्रकारके लोहेकी उत्पत्ति हुई है। इसलिये उसी समयसे लोहाभिहारिक कर्म राजाओंको विजय प्राप्त करनेमें सहायक सिद्ध हुआ, ऐसा ऋषियोंने बतलाया है। हवनका बचा हुआ शेष पायस हाथी और घोड़ोंको खिलाकर उनको अलंकृत कर माङ्गलिक घोष करते हुए रक्षकोंके साथ समारोहपूर्वक नगरमें घुमाना चाहिये। राजाको भी प्रतिदिन स्नानकर पितरों और देवताओंकी पूजा करनेके बाद राजचिह्नोंकी भी भलीभाँति पूजा करनी चाहिये। इससे राजाको विजय, कीर्ति, आयु, यश तथा बलकी प्राप्ति होती है।

इस प्रकार लोहाभिहारिक कर्म करनेके अनन्तर अष्टमीके दिन पूर्वोह्नमें स्नान कर नियमपूर्वक सुवर्ण, चाँदी, पीतल, ताँबा, मृत्तिका, पाषाण, काष्ठ आदिकी दुर्गाकी सुन्दर मूर्ति बनाकर उत्तम सुसज्जित स्थानके बीच सिंहासनके ऊपर स्थापित करे। कुंकुम, चन्दन, सिन्दूर आदिसे उस मूर्तिको चर्चित कर कमल आदि पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य आदिसे अनेक बाजे-गाजेके साथ उनका पूजन करना चाहिये। वन्दीजन स्तुति करें। बहुतसे लोग छत्र-चामर आदि राजचिह्न लेकर चारों ओर खड़े होकर स्थित रहें। दीक्षायुक्त राजा पुरोहितके साथ बिल्वपत्रोंसे भगवतीकी इस मन्त्रसे पूजा करे—

जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।

दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥

अमृतोद्भवः श्रीवृक्षो महादेवीप्रियः सदा।

बिल्वपत्रं प्रयच्छामि पवित्रं ते सुरेश्वरि ॥

(उत्तरपर्व १३८।८६-८७)

इस प्रकार पूजनकर उसी दिनसे द्रोणपुष्पी (गूमा)-से पूजा करनी चाहिये। असुरोंके साथ युद्ध करनेसे जो क्षति भगवतीके शरीरको हुई उसकी पूर्ति द्रोणपुष्पीसे ही हुई। इसलिये द्रोणपुष्पी भगवतीको अत्यन्त प्रिय है। फिर शत्रुओंके वधके लिये खड्गको प्रणामकर सुभिक्ष, राज्य और अपने विजयकी प्राप्ति-हेतु भगवतीसे प्रार्थना करनी चाहिये और उनका ध्यान तथा इस स्तुतिका पाठ करना चाहिये—

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

कुंकुमेन समालब्धे चन्दनेन विलेपिते।

बिल्वपत्रकृतामाले दुर्गेऽहं शरणं गतः ॥

(उत्तरपर्व १३८।९३-९४)

इस प्रकार अष्टमीको सब प्रकारसे भगवतीका पूजन कर रात्रिको जागरण करना चाहिये और नृत्यादिक उत्सव कराना चाहिये। प्रसन्नतापूर्वक रात्रिके बीत जानेपर नवमीको प्रातःकाल भगवतीकी बड़े समारोहके साथ विशेष पूजा करनी चाहिये। अपराह्न-समयमें रथके बीच भगवती दुर्गाकी प्रतिमाको स्थापित कर पूरे राज्यभरमें भ्रमण कराना चाहिये। अपनी सेनासहित राजाको भी साथ रहना चाहिये।

सभी प्रकारके विघ्नोंकी निवृत्तिके लिये भूतशान्ति करनी चाहिये। जिससे यात्रा निर्विघ्न पूर्ण हो। इस विधिसे जो राजा अथवा सामान्य व्यक्ति भगवतीकी यात्रा करता है, वह सभी प्रकारके पापोंसे छूटकर भगवतीके लोकको प्राप्त कर लेता है और उस व्यक्तिको शत्रु, चोर, ग्रह, विघ्न आदिका भय नहीं होता। भगवतीके भक्त सदा नीरोग, सुखी और निर्भय हो जाते हैं। जो व्यक्ति भगवतीके उत्सव-विधिका श्रवण करता है या पढ़ता है, उसके भी सभी अमङ्गल दूर हो जाते हैं। (अध्याय १३८)

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  • उत्तरपर्व *

५४९

इन्द्रध्वजोत्सवके प्रसंगमें उपरिचर वसुका वृत्तान्त

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके समय ब्रह्मा आदि देवताओंने 'इन्द्रको विजय प्राप्त हो', इसलिये ध्वजयष्टिका निर्माण किया। ध्वजयष्टिको देवताओं, सिद्ध-विद्याधर तथा नाग आदिने मेरु पर्वतपर स्थापित कर सभी उपचारों—पुष्प, धूप तथा दीपादिसे उसकी पूजा की और अनेक प्रकारके आभूषण, छत्र, घण्टा, किंकिणी आदिसे उसे अलंकृत किया। उस ध्वजयष्टिको देखकर दैत्य त्रस्त हो गये और युद्धमें देवताओंने उन्हें पराजितकर स्वर्गका राज्य प्राप्त कर लिया। दैत्य पाताललोकको चले गये। उसी दिनसे देवता उस इन्द्रयष्टिका पूजन और उत्सव करने लगे।

एक समय अपने महान् पुण्य-प्रतापके कारण राजा उपरिचर वसु स्वर्गमें आये। उनका देवताओंने बहुत सम्मान किया। उनसे प्रसन्न होकर इन्द्रने वह ध्वज उन्हें दिया और वर देते हुए कहा कि पृथ्वीमें इस ध्वजकी आप पूजा करें, इससे आपके राज्यके सभी दोष दूर हो जायेंगे और जो भी राजा वर्षा-ऋतुमें (भाद्रपद शुक्ल द्वादशी) श्रवण नक्षत्रमें इसका पूजन करेगा, उसके राज्यमें क्षेम और सुभिक्ष बना रहेगा, किसी प्रकारका उपद्रव नहीं होगा, प्रजाएँ प्रसन्न एवं नीरोग होंगी, सर्वत्र धार्मिक यज्ञ होंगे। राज्यमें प्रचुर धन-सम्पत्ति होगी। इन्द्रका यह वचन सुनकर राजा उपरिचर वसु इन्द्रध्वजको लेकर अपने नगरमें चले आये और प्रतिवर्ष इन्द्रध्वजकी पूजा कर उत्सव मनाने लगे। इस ध्वजयष्टिको भी प्रत्यक्ष देवी माना गया है।

अब मैं इन्द्रध्वजके उत्सवकी विधि बता रहा हूँ। बीस हाथ लम्बे, सुपुष्ट, उत्तम काष्ठकी एक यष्टि बनाकर उसे सुन्दर रंग-बिरंगे वस्त्रोंसे सुसज्जित करे। उसमें तेरह आभूषण लगवाये। पहला आभूषण

पिटक चौकोर होता है, इसे 'लोकपाल पिटक' कहते हैं, दूसरा आभूषण लाल रंगका वृत्ताकार होता है, इसी प्रकार अन्य देवसम्बन्धी पिटकोंका निर्माण कर तथा यष्टिमें बाँधकर कुशा, पुष्पमाला, घण्टा, चामर आदिसे समन्वित उस ध्वजको स्थापित करे। अनन्तर हवन कराकर गुड़से युक्त मिष्टान्न और पायस ब्राह्मणोंको भोजन कराये। भोजनोपरान्त उन्हें दक्षिणा दे। उस ध्वजको धीरेसे खड़ाकर स्थापित कर दे। नौ दिन या सात दिनतक उत्सव मनाना चाहिये। अनेक प्रकारके नृत्य, गायन, वादन कराते हुए मल्लयुद्ध आदि उत्सव भी कराने चाहिये। वस्त्राभूषण तथा स्वादिष्ट भोजनादिसे सभी लोगोंको संतुष्टकर सम्मानित करना चाहिये। रात्रिको जागरणकर ध्वजकी भलीभाँति रक्षा करनी चाहिये।

इन्द्रध्वजका पूजन, अर्चन तथा उत्सवादि कार्य सम्पन्न करना चाहिये। यदि एक वर्ष करनेके बाद दूसरे वर्ष किसी व्यवधानके कारण पूजनादि कार्य न हो सके तो पुनः बारह वर्ष बाद ही करना चाहिये। ध्वजके अङ्ग-भङ्ग होनेपर अनेक प्रकारके उपद्रव प्रारम्भ हो जाते हैं। यदि ध्वजपर कौआ बैठ जाय तो दुर्भिक्ष पड़ता है, उलूक बैठे तो राजाकी मृत्यु हो जाती है। कपोत बैठे तो प्रजाका विनाश होता है। इसलिये सावधान होकर उसकी रक्षा करनी चाहिये और भक्तिपूर्वक इन्द्रध्वजका उत्थापन कर पूजन करना चाहिये। यदि प्रमादवश ध्वज गिर पड़े या टूट जाय तो सोने अथवा चाँदीका ध्वज बनाकर उसका उत्थापन और अर्चन कर शान्तिक-पौष्टिक आदि कर्म सम्पन्न कराये। ब्राह्मणको भोजन आदिसे संतुष्ट करना चाहिये। इस विधिसे जो राजा इन्द्रध्वजकी यात्रा एवं पूजा करता है, उसके राज्यमें यथेष्ट वृष्टि होती है। मृत्यु और

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५५०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अनेक प्रकारके ईति-भीति आदि दुयोंगों, कष्टोंका भय नहीं रहता तथा राजा शत्रुओंको पराजित कर

चिर कालतक राज्यसुख भोगकर अन्त समयमें इन्द्रलोकको प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १३९)

दीपमालिकोत्सव

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने वामनरूप धारणकर दानवराज बलिको छलकर इन्द्रको राज्यका भार सौंप दिया और राजा बलिको पाताललोकमें स्थापित कर दिया। भगवान्ने बलिके यहाँ सदा रहना स्वीकार किया। कार्तिककी अमावास्याको रात्रिमें सारी पृथ्वीपर दैत्योंकी यथेष्ट चेष्टाएँ होती हैं।

युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! कौमुदीतिथिकी विधिको विशेषरूपसे बतानेकी कृपा करें। उस दिन किस वस्तुका दान किया जाता है। किस देवताकी पूजा की जाती है तथा कौन-सी क्रीडा करनी चाहिये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! कार्तिक मासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशीको प्रभातके समय नरकके भयको दूर करनेके लिये स्नान अवश्य करना चाहिये। अपामार्ग (चिचड़ा)-के पत्र सिरके ऊपर मन्त्र पढ़ते हुए घुमाये*। इसके बाद धर्मराजके नामों—यम, धर्मराज, मृत्यु, वैवस्वत, अन्तक, काल तथा सर्वभूतक्षयका उच्चारण कर तर्पण करे। देवताओंकी पूजा करनेके बाद नरकसे बचनेके उद्देश्यसे दीप जलाये। प्रदोषके समय शिव, विष्णु, ब्रह्मा आदिके मन्दिरोंमें, कोष्ठगार, चैत्य, सभामण्डप, नदीतट, महल, तडाग, उद्यान, वापी, मार्ग, हस्तिशाला तथा अश्वशाला आदि स्थानोंमें दीप प्रज्वलित करने चाहिये।

अमावास्याके दिन प्रातःकाल स्नानकर देवता

और पितरोंका भक्तिपूर्वक पूजन-तर्पण आदि करे तथा पार्वण-श्राद्ध करे। अनन्तर ब्राह्मणको दूध, दही, घृत और अनेक प्रकारके स्वादिष्ट भोजन करकर दक्षिणा प्रदान करे और उन्हें संतुष्ट करे। अपराह्कालमें राजाद्वारा अपने राज्यमें यह घोषित कराना चाहिये कि 'आज इस लोकमें बलिका शासन है। नगरके सभी लोगोंको अपनी सामर्थ्यके अनुसार अपने घरको स्वच्छ—साफ-सुथरा करके नाना प्रकारके रंग-बिरंगे तोरण-पताकाओं, पुष्पमालाओं तथा बंदनवारोंसे सजाना चाहिये। नगरके सभी लोगों अर्थात् नर-नारी, बाल-वृद्ध आदिको चाहिये कि सुन्दर उत्तम वस्त्र पहनकर कुंकुम, चन्दन आदिका लेप लगाकर ताम्बूलका भक्षण करते हुए आनन्दपूर्वक नृत्य-गीतादिकोंका आयोजन करें।' इस प्रकार अतीव उल्लाससे एवं प्रीतिपूर्वक इस दिन दीपोत्सव मनाना चाहिये। प्रदोषके समय दीपमाला प्रज्वलित कर अनेक प्रकारके दीप-वृक्ष खड़े करने चाहिये। उस समय राक्षस लोकमें विचरण करते हैं। उनके भयको दूर करनेके लिये श्रेष्ठ कन्याओंको दीप-वृक्षोंपर तण्डुल (धानका लावा) फेंकते हुए दीपकोसे नीराजन करना चाहिये। दीपमालाओंके जलानेसे प्रदोष-वेला दोषरहित हो जाती है और राक्षसादिका भय दूर हो जाता है। इस प्रकार अति शोभासम्पन्न नगरकी शोभा देखनेके उद्देश्यसे राजाको अपने मित्र, मन्त्री आदिके साथ अर्धरात्रिके समय धीरे-धीरे पैदल ही चलना

  • मन्त्र इस प्रकार हैं—

हर पापमपामार्ग भ्राग्यमाणं पुनः पुनः ।

आपदं किल्विषं चापि ममापहर सर्वशः । अपामार्गं नमस्तेऽस्तु शरीरं मम शोधय ॥ (उत्तरपर्व १४०।९)

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