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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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पृष्ठ 554
  • उत्तरपर्व *

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(शान्त) करनेके लिये उत्पन्न किया है, किंतु तुमने सम्पूर्ण संसारको उद्देहित कर दिया है, तुम्हारा यह काम ठीक नहीं है। सज्जनोंका कहना है कि अतिशय सर्वत्र वर्ज्य है। इसलिये ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे लोगोंमें उद्देग न पैदा हो एकका अपकार करनेवाला व्यक्ति अधम कहा जाता है, परंतु जो अनेकोंका अपकार करनेमें प्रवृत्त हो गया हो, उसके लिये क्या कहा जाय ? तुमने तो बहुतसे लोगोंको दुःख दिया है, इसलिये मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि कोई भी व्यक्ति तुम्हारे पुष्पको देवकार्य तथा पितृकार्यमें आजसे ग्रहण नहीं करेगा।' ब्रह्माजीद्वारा दिये गये शापको सुनकर दमनकने कहा—'महाराज ! मैंने द्वेषवश अथवा क्रोधवश किसीका अपकार नहीं किया है। आपने ही मुझे इतना सुगन्ध दिया है कि उसके प्रभावसे सभी लोग स्वयं उन्मत्त हो जाते हैं। इसमें मेरा क्या दोष है। आपने ही मेरा ऐसा स्वभाव बनाया है। जिसकी जो प्रकृति होती है, उसे वह त्याग नहीं सकता; क्योंकि प्रकृति त्यागनेमें वह असमर्थ होता है१। निरपराध होते हुए भी आपने मुझे शाप दिया है।' दमनककी इस तर्कसंगत बातको सुनकर ब्रह्माजीने कहा—'दमनक ! तुम्हारा कथन ठीक है। मैंने तुम्हें शाप दिया है। उसका मुझे हार्दिक दुःख है। उसकी निवृत्तिके लिये मैं तुझे वरदान देता हूँ कि वसन्त-ऋतुमें तुम सभी देवताओंके मस्तकपर चढ़ोगे। जो व्यक्ति भक्तिभावसे दमनक-पुष्प देवताओंपर चढ़ायेगा, उसे सदा सुख प्राप्त होगा। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी दमनक-चतुर्दशीके नामसे विख्यात होगी और उस दिन व्रत-नियमके पालन करनेसे व्रतीके सभी पाप नष्ट हो जायेंगे। इतना कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान

हो गये और दमनक भी अपने गन्धसे त्रिभुवनको वासित करता हुआ शिवजीके निवास-स्थान मन्दराचलपर रहने लगा। उसी दिनसे लोकमें दमनक-पूजा प्रसिद्ध हुई२।'

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज ! अब मैं दोलोत्सवका वर्णन कर रहा हूँ। किसी समय नन्दनवनमें दोलोत्सव हुआ। वसन्त-ऋतुमें देवाङ्गनाएँ और देवता मिलकर दोला-क्रीड़ा करने लगे। नन्दनवनमें यह मनोहारी उत्सव देखकर भगवती पार्वतीजीने शंकरजीसे कहा—'भगवन् ! इस क्रीड़ाको आप देखें। आप मेरे लिये भी एक दोला बनवाइये, जिसपर मैं आपके साथ बैठकर दोला-क्रीड़ा कर सकूँ।' पार्वतीजीके यह कहनेपर शिवजीने देवताओंको अपने पास बुलाकर दोला बनानेको कहा। देवताओंने शिवजीके कथनानुसार सुन्दर उत्तम इष्टापूर्तमय दोस्तम्भ गाड़कर उसपर सत्यस्वरूप एक लकड़ीका पटरा रखा और वासुकि नागकी रस्सी बनाकर उसके फणोंपर बैठनेके लिये रत्नजटित पीठकी रचना की। उस फणके ऊपर अत्यन्त मृदुल कपास और रेशमी वस्त्र बिछाकर दोलाकी शोभा बढ़ानेके लिये मोतियोंके गुच्छें और फूल-मालाओंसे उसे सजा दिया। इस प्रकार देवताओंने अति उत्तम दोला तैयार कर भगवान् शंकरको आदरपूर्वक प्रदान किया। अनन्तर भगवान् चन्द्रभूषण भगवती पार्वतीके साथ दोलापर बैठ गये। भगवान् शंकरके पार्श्व दोला झूलाने लगे तथा जया और विजया दोनों सखियाँ चँवर डूलाने लगीं। उस समय पार्वतीजीने बहुत ही मधुर स्वरमें गीत गाया, जिससे शिवजी आनन्दमग्न हो गये। गन्धर्व गीत गाने लगे, अप्सराएँ नाचने लगीं और चारण विविध प्रकारके बाजे बजानेमें संलग्न हो गये।

१-या यस्य जन्तोः प्रकृतिः शुभा वा यदि वेतरा। स तस्यामेव रमते दुष्कृते सुकृते तथा ॥ (उत्तरपर्व १३३।१५)

२-अग्नि, मत्स्य और शिवपुराणमें इसका अधिक विस्तारसे वर्णन है।

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