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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 555, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

परंतु शिवजीके दोला-विहारसे सभी पर्वत काँपने लगे, समुद्रमें हलचल मच गया, प्रचण्ड पवन चलने लगा, सारा लोक त्रस्त हो गया। इस प्रकार त्रैलोक्यको अति व्याकुल देखकर इन्द्रादि सभी देवगणोंने सभीके पापोंका नाश करनेवाले शिवजीके पास आकर प्रणाम किया और प्रार्थना कर कहने लगे—‘नाथ! अब आप दोला-लीलासे निवृत्त हों, क्योंकि त्रैलोक्यको क्षोभ प्राप्त हो रहा है।’ इस प्रकार देवताओंकी प्रार्थना सुनकर प्रसन्न हो शिवजीने दोलासे उतरकर कहा कि ‘आजसे वसन्त-ऋतुमें जो व्यक्ति इस दोलोत्सवको करेगा तथा नैवेद्य अर्पित कर तत्तद् देवताओंके मूल मन्त्रोंसे उन्हें दोलापर आरोहण करायेगा, करेगा, आनन्द मनायेगा और स्तुति-पाठ करेगा, वह सभी अभीष्टोंको प्राप्त करेगा।’

भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—महाराज! अब मैं रथयात्राका वर्णन करता हूँ।

एक बार चैत्र मासमें मलयपर देवताओंसे समावृत्त भगवान् शंकर शान्तभावसे विराजमान थे। इसी समय मृत्युलोकमें इधर-उधर घूमते हुए देवर्षि नारद ब्रह्मलोकसे भगवान् शंकरके पास आये। उन्होंने भगवान्को प्रणाम किया और आसनपर बैठ गये। सर्वज्ञ भगवान् शंकरने देवर्षि नारदसे पूछा—‘मुने! आपका आगमन कहाँसे हो रहा है?’ नारद बोले—‘देवदेव! मैं मृत्युलोकसे आ रहा हूँ। वहाँ कामदेवके मित्र वसन्त-ऋतुने सारा संसार अपने वशमें कर लिया है। वहाँ मन्द-मन्द सुगन्धित मलय पवन बहता है। वसन्त-ऋतुके सहयोगी—कोकिल, आम्रमञ्जरी आदि सभी उसके कार्यमें सहयोग प्रदान कर रहे हैं। नगर-नगर और ग्राम-ग्राममें वसन्त-ऋतु यह घोषणा कर रहा है कि इस संसारका ही नहीं, अपितु तीनों लोकोंका स्वामी एकमात्र कामदेव

है। भगवन्! उसीके शासनमें सभी लोग उन्मत्त-से हो रहे हैं। चैत्र मासका यह विचित्र प्रभाव देखकर मैं आपसे निवेदन करने आया हूँ।’ नारदजीका वचन सुनकर भगवान् शंकर गम्भर्व, अप्सरा, मुनिगण और सभी देवताओंको साथ लेकर मृत्युलोकमें आये और उन्होंने देखा कि जैसा नारदजीने कहा था, वही स्थिति मृत्युलोकमें व्याप्त है। सब लोग उन्मत्त हो गये हैं। आनन्दमें मग्न हैं। शिवजी वसन्तकी शोभा देख ही रहे थे कि उनके साथ जो देवता आदि आये थे, वे भी आनन्दित हो गाने-बजाने लगे। वसन्तके प्रभावसे देवताओंको भी शुब्ध देखकर शंकरने यह विचार किया कि यह तो बड़ा अनर्थ हो रहा है। इसके प्रतीकारका कोई-न-कोई उपाय करना ही चाहिये। जो अनर्थ होता हुआ देखकर भी उसके निवारणका उपाय नहीं करता, वह अवश्य ही विपत्तिमें पड़कर दुःखको प्राप्त करता है। अब मुझे इन सबकी उन्मादसे रक्षा करनी चाहिये और स्वामिभक्त वसन्त-ऋतुका भी सम्मान रखना चाहिये। यह विचारकर शिवजीने वसन्त-ऋतुको अपने पास बुलाकर कहा कि ‘वसन्त! तुम केवल चैत्र मासमें अपना प्रभाव प्रकट करो, चैत्र मासके शुक्ल पक्षमें सभी जीवोंको और विशेष रूपसे देवताओंको सुख देनेवाले हो जाओ।’ अनन्तर देवताओंको स्वस्थचित्त किया और यह भी कहा कि ‘जो व्यक्ति वसन्त-ऋतुमें रथयात्रोत्सव करेगा, वह इस संसारमें दिव्य भोगोंको भोगनेवाला तथा नीरोग होगा।’ इतना कहकर शिवजी सभी देवताओंके साथ अपने लोकको चले गये। वसन्त-ऋतु भी शिवजीके आज्ञानुसार वनमें विहार करता हुआ अन्तर्धान हो गया। उसी दिनसे लोकमें रथयात्रोत्सवका प्रचार-प्रसार हुआ। जो देवताओंकी रथयात्रा करता है, उसके धन,

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