भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 553, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वसिष्ठजीका यह वचन सुनकर राजा रघुने सम्पूर्ण राज्यमें लोगोंसे इसी प्रकार उत्सव करनेको कहा और स्वयं भी उसमें सहयोग किया, जिससे वह राक्षसी विनष्ट हो गयी। उसी दिनसे इस लोकमें ढोंढाका उत्सव प्रसिद्ध हुआ और अडाडाकी परम्परा चली। ब्राह्मणोंद्वारा सभी दुष्टों और सभी रोगोंको शान्त करनेवाला वसोधर्रा-होम इस दिन किया जाता है, इसलिये इसको होलिका भी कहा जाता है। सब तिथियोंका सार एवं परम आनन्द देनेवाली यह फाल्गुनकी पूर्णिमा तिथि है। इस दिन रात्रिको बालकोंकी विशेषरूपसे रक्षा करनी चाहिये। गोबरसे लिपे-पुते घरके आँगनमें बहुतसे खड्गहस्त बालक बुलाने चाहिये और घरमें रक्षित बालकोंको काष्ठनिर्मित खड्गसे स्पर्श कराना चाहिये। हँसना, गाना, बजाना, नाचना आदि करके उत्सवके बाद गुड़ और बढिया पकवान देकर बालकोंको विसर्जित करना चाहिये। इस विधिसे ढोंढाका दोष अवश्य शान्त हो जाता है।
महाराज युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! दूसरे दिन चैत्र माससे वसन्त-ऋतुका आगमन होता है, उस दिन क्या करना चाहिये?
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— महाराज! होलीके दूसरे दिन प्रतिपदामें प्रातःकाल उठकर आवश्यक
नित्यक्रियासे निवृत्त हो पितरों और देवताओंके लिये तर्पण-पूजन करना चाहिये और सभी दोषोंकी शान्तिके लिये होलिकाकी विभूतिकी वन्दना कर उसे अपने शरीरमें लगाना चाहिये। घरके आँगनको गोबरसे लीपकर उसमें एक चौकोर मण्डल बनाये और उसे रंगीन अक्षताँसे अलंकृत करे। उसपर एक पीठ रखे। पीठपर सुवर्णसहित पल्लवोंसे समन्वित कलश स्थापित करे। उसी पीठपर श्वेत चन्दन भी स्थापित करना चाहिये। सौभाग्यवती स्त्रीको सुन्दर वस्त्र, आभूषण पहनकर दही, दूध, अक्षत, गन्ध, पुष्प, वसोधर्रा आदिसे उस श्रीखण्डकी पूजा करनी चाहिये। फिर आम्रमञ्जरीसहित उस चन्दनका प्राशन करना चाहिये। इससे आयुकी वृद्धि, आरोग्यकी प्राप्ति तथा समस्त कामनाएँ सफल होती हैं। भोजनके समय पहले दिनका पकवान थोड़ा-सा खाकर इच्छानुसार भोजन करना चाहिये। इस विधिसे जो फाल्गुनोत्सव मनाता है, उसके सभी मनोरथ अनायास ही सिद्ध हो जाते हैं। आधि-व्याधि सभीका विनाश हो जाता है और वह पुत्र, पौत्र, धन-धान्यसे पूर्ण हो जाता है। यह परम पवित्र, विजयदायिनी पूर्णिमा सब विघ्नोंको दूर करनेवाली है तथा सब तिथियोंमें उत्तम है।
(अध्याय १३२)
दमनकोत्सव, दोलोत्सव तथा रथयात्रोत्सव आदिका वर्णन
राजा युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! इस संसारमें बहुत-से सुगन्धित पुष्प हैं, परंतु उनको छोड़कर दमनक (दौना) नामक पुष्प देवताओंको क्यों चढ़ाया जाता है तथा दोलोत्सव और रथयात्रोत्सव मनानेकी क्या विधि है, इसका वर्णन करनेकी आप कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— पार्थ! मन्दराचल पर्वतपर दमनक नामका एक श्रेष्ठ तथा अत्यन्त
सुगन्धित वृक्ष उत्पन्न हुआ। उसके दिव्य गन्धके प्रभावसे देवाङ्गनाएँ विमूग्ध हो गयीं और ऋषि-मुनि भी जप, तप वेदाध्ययन आदिसे च्युत हो गये। इस प्रकार उसके गन्धसे सब लोग उन्मत्त हो गये। सभी शुभ कार्यों एवं मङ्गल-कार्योंमें विघ्न उपस्थित हो गया। यह देखकर ब्रह्माजीको बड़ा क्रोध उत्पन्न हुआ और वे दमनकसे बोले— 'दमनक! मैंने तुम्हें संसार (-के दोषों)-के दमन
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