भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 552, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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तृप्ति नहीं होती, वह तृप्ति एक वृषोत्सर्ग करनेसे प्राप्त होती है। जो व्यक्ति अपने पितरोंके उद्धारके लिये वृष छोड़ता है, वह स्वयं भी स्वर्गलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १३१)
फाल्गुन-पूर्णिमोत्सव
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! फाल्गुनकी पूर्णिमाको ग्राम-ग्राम तथा नगर-नगरमें उत्सव क्यों मनाया जाता है और गाँवों एवं नगरोंमें होली क्यों जलायी जाती है? क्या कारण है कि बालक उस दिन घर-घर अनाप-शनाप शोर मचाते हैं? अडाडा किसे कहते हैं, उसे शीतोष्ण क्यों कहा जाता है तथा किस देवताका पूजन किया जाता है। आप कृपाकर यह बतानेका कष्ट करें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—पार्थ! सत्ययुगमें रघु नामके एक शूरवीर प्रियवादी सर्वगुणसम्पन्न दानी राजा थे। उन्होंने समस्त पृथ्वीको जीतकर सभी राजाओंको अपने वशमें करके पुत्रकी भाँति प्रजाका लालन-पालन किया। उनके राज्यमें कभी दुर्भिक्ष नहीं हुआ और न किसीकी अकाल मृत्यु हुई। अधर्ममें किसीकी रुचि नहीं थी। पर एक दिन नगरके लोग राजद्वारपर सहसा एकत्र होकर 'त्राहि', 'त्राहि' पुकारने लगे। राजाने इस तरह भयभीत लोगोंसे कारण पूछा। उन लोगोंने कहा कि महाराज! ढोंढा नामकी एक राक्षसी प्रतिदिन हमारे बालकोंको कष्ट देती है और उसपर किसी मन्त्र-तन्त्र, औषधि आदिका प्रभाव भी नहीं पड़ता, उसका किसी भी प्रकार निवारण नहीं हो पा रहा है। नगरवासियोंका यह वचन सुनकर विस्मित राजाने राज्यपुरोहित महर्षि वसिष्ठमुनिसे उस राक्षसीके विषयमें पूछा। तब उन्होंने राजासे कहा—'राजन्! माली नामका एक दैत्य है, उसीकी एक पुत्री है, जिसका नाम है ढोंढा। उसने बहुत समयतक उग्र तपस्या करके शिवजीको प्रसन्न किया। उन्होंने उससे वरदान माँगनेको कहा।' इसपर ढोंढाने यह
वरदान माँगा कि 'प्रभो! देवता, दैत्य, मनुष्य आदि मुझे न मार सकें तथा अस्त्र-शस्त्र आदिसे भी मेरा वध न हो, साथ ही दिनमें, रात्रिमें, शीतकाल, उष्णकाल तथा वर्षाकालमें, भीतर अथवा बाहर कहीं भी मुझे किसीसे भय न हो।' इसपर भगवान् शंकरने 'तथास्तु' कहकर यह भी कहा कि 'तुम्हें उन्मत्त बालकोंसे भय होगा।' इस प्रकार वर देकर भगवान् शिव अपने धामको चले गये। वही ढोंढा नामकी कामरूपिणी राक्षसी नित्य बालकोंको और प्रजाको पीड़ा देती है। 'अडाडा' मन्त्रका उच्चारण करनेपर वह ढोंढा शान्त हो जाती है। इसलिये उसको अडाडा भी कहते हैं। यही उस राक्षसी ढोंढाका चरित्र है। अब मैं उससे पीछा छुड़ानेका उपाय बता रहा हूँ।
राजन्! आज फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी पूर्णिमा तिथिको सभी लोगोंको निडर होकर क्रीडा करनी चाहिये और नाचना, गाना तथा हँसना चाहिये। बालक लकड़ियोंके बने हुए तलवार लेकर वीर सैनिकोंकी भाँति हर्षसे युद्धके लिये उत्सुक हो दौड़ते हुए निकल पड़ें और आनन्द मनायें। सूखी लकड़ी, उपले, सूखी पत्तियाँ आदि अधिक-से-अधिक एक स्थानपर इकट्ठाकर उस ढेरमें रक्षोघ्न मन्त्रोंसे अग्नि लगाकर उसमें हवनकर हँसकर ताली बजाना चाहिये। उस जलते हुए ढेरकी तीन बार परिक्रमा कर बच्चे, बूढ़े सभी आनन्ददायक विनोदपूर्ण वार्तालाप करें और प्रसन्न रहें। इस प्रकार रक्षामन्त्रोंसे, हवन करनेसे, कोलाहल करनेसे तथा बालकोंद्वारा तलवारके प्रहारके भयसे उस दुष्ट राक्षसीका निवारण हो जाता है।
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