भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वसिष्ठजीका यह वचन सुनकर राजा रघुने सम्पूर्ण राज्यमें लोगोंसे इसी प्रकार उत्सव करनेको कहा और स्वयं भी उसमें सहयोग किया, जिससे वह राक्षसी विनष्ट हो गयी। उसी दिनसे इस लोकमें ढोंढाका उत्सव प्रसिद्ध हुआ और अडाडाकी परम्परा चली। ब्राह्मणोंद्वारा सभी दुष्टों और सभी रोगोंको शान्त करनेवाला वसोधर्रा-होम इस दिन किया जाता है, इसलिये इसको होलिका भी कहा जाता है। सब तिथियोंका सार एवं परम आनन्द देनेवाली यह फाल्गुनकी पूर्णिमा तिथि है। इस दिन रात्रिको बालकोंकी विशेषरूपसे रक्षा करनी चाहिये। गोबरसे लिपे-पुते घरके आँगनमें बहुतसे खड्गहस्त बालक बुलाने चाहिये और घरमें रक्षित बालकोंको काष्ठनिर्मित खड्गसे स्पर्श कराना चाहिये। हँसना, गाना, बजाना, नाचना आदि करके उत्सवके बाद गुड़ और बढिया पकवान देकर बालकोंको विसर्जित करना चाहिये। इस विधिसे ढोंढाका दोष अवश्य शान्त हो जाता है।
महाराज युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! दूसरे दिन चैत्र माससे वसन्त-ऋतुका आगमन होता है, उस दिन क्या करना चाहिये?
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— महाराज! होलीके दूसरे दिन प्रतिपदामें प्रातःकाल उठकर आवश्यक
नित्यक्रियासे निवृत्त हो पितरों और देवताओंके लिये तर्पण-पूजन करना चाहिये और सभी दोषोंकी शान्तिके लिये होलिकाकी विभूतिकी वन्दना कर उसे अपने शरीरमें लगाना चाहिये। घरके आँगनको गोबरसे लीपकर उसमें एक चौकोर मण्डल बनाये और उसे रंगीन अक्षताँसे अलंकृत करे। उसपर एक पीठ रखे। पीठपर सुवर्णसहित पल्लवोंसे समन्वित कलश स्थापित करे। उसी पीठपर श्वेत चन्दन भी स्थापित करना चाहिये। सौभाग्यवती स्त्रीको सुन्दर वस्त्र, आभूषण पहनकर दही, दूध, अक्षत, गन्ध, पुष्प, वसोधर्रा आदिसे उस श्रीखण्डकी पूजा करनी चाहिये। फिर आम्रमञ्जरीसहित उस चन्दनका प्राशन करना चाहिये। इससे आयुकी वृद्धि, आरोग्यकी प्राप्ति तथा समस्त कामनाएँ सफल होती हैं। भोजनके समय पहले दिनका पकवान थोड़ा-सा खाकर इच्छानुसार भोजन करना चाहिये। इस विधिसे जो फाल्गुनोत्सव मनाता है, उसके सभी मनोरथ अनायास ही सिद्ध हो जाते हैं। आधि-व्याधि सभीका विनाश हो जाता है और वह पुत्र, पौत्र, धन-धान्यसे पूर्ण हो जाता है। यह परम पवित्र, विजयदायिनी पूर्णिमा सब विघ्नोंको दूर करनेवाली है तथा सब तिथियोंमें उत्तम है।
(अध्याय १३२)
दमनकोत्सव, दोलोत्सव तथा रथयात्रोत्सव आदिका वर्णन
राजा युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! इस संसारमें बहुत-से सुगन्धित पुष्प हैं, परंतु उनको छोड़कर दमनक (दौना) नामक पुष्प देवताओंको क्यों चढ़ाया जाता है तथा दोलोत्सव और रथयात्रोत्सव मनानेकी क्या विधि है, इसका वर्णन करनेकी आप कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— पार्थ! मन्दराचल पर्वतपर दमनक नामका एक श्रेष्ठ तथा अत्यन्त
सुगन्धित वृक्ष उत्पन्न हुआ। उसके दिव्य गन्धके प्रभावसे देवाङ्गनाएँ विमूग्ध हो गयीं और ऋषि-मुनि भी जप, तप वेदाध्ययन आदिसे च्युत हो गये। इस प्रकार उसके गन्धसे सब लोग उन्मत्त हो गये। सभी शुभ कार्यों एवं मङ्गल-कार्योंमें विघ्न उपस्थित हो गया। यह देखकर ब्रह्माजीको बड़ा क्रोध उत्पन्न हुआ और वे दमनकसे बोले— 'दमनक! मैंने तुम्हें संसार (-के दोषों)-के दमन
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- उत्तरपर्व *
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(शान्त) करनेके लिये उत्पन्न किया है, किंतु तुमने सम्पूर्ण संसारको उद्देहित कर दिया है, तुम्हारा यह काम ठीक नहीं है। सज्जनोंका कहना है कि अतिशय सर्वत्र वर्ज्य है। इसलिये ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे लोगोंमें उद्देग न पैदा हो एकका अपकार करनेवाला व्यक्ति अधम कहा जाता है, परंतु जो अनेकोंका अपकार करनेमें प्रवृत्त हो गया हो, उसके लिये क्या कहा जाय ? तुमने तो बहुतसे लोगोंको दुःख दिया है, इसलिये मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि कोई भी व्यक्ति तुम्हारे पुष्पको देवकार्य तथा पितृकार्यमें आजसे ग्रहण नहीं करेगा।' ब्रह्माजीद्वारा दिये गये शापको सुनकर दमनकने कहा—'महाराज ! मैंने द्वेषवश अथवा क्रोधवश किसीका अपकार नहीं किया है। आपने ही मुझे इतना सुगन्ध दिया है कि उसके प्रभावसे सभी लोग स्वयं उन्मत्त हो जाते हैं। इसमें मेरा क्या दोष है। आपने ही मेरा ऐसा स्वभाव बनाया है। जिसकी जो प्रकृति होती है, उसे वह त्याग नहीं सकता; क्योंकि प्रकृति त्यागनेमें वह असमर्थ होता है१। निरपराध होते हुए भी आपने मुझे शाप दिया है।' दमनककी इस तर्कसंगत बातको सुनकर ब्रह्माजीने कहा—'दमनक ! तुम्हारा कथन ठीक है। मैंने तुम्हें शाप दिया है। उसका मुझे हार्दिक दुःख है। उसकी निवृत्तिके लिये मैं तुझे वरदान देता हूँ कि वसन्त-ऋतुमें तुम सभी देवताओंके मस्तकपर चढ़ोगे। जो व्यक्ति भक्तिभावसे दमनक-पुष्प देवताओंपर चढ़ायेगा, उसे सदा सुख प्राप्त होगा। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी दमनक-चतुर्दशीके नामसे विख्यात होगी और उस दिन व्रत-नियमके पालन करनेसे व्रतीके सभी पाप नष्ट हो जायेंगे। इतना कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान
हो गये और दमनक भी अपने गन्धसे त्रिभुवनको वासित करता हुआ शिवजीके निवास-स्थान मन्दराचलपर रहने लगा। उसी दिनसे लोकमें दमनक-पूजा प्रसिद्ध हुई२।'
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज ! अब मैं दोलोत्सवका वर्णन कर रहा हूँ। किसी समय नन्दनवनमें दोलोत्सव हुआ। वसन्त-ऋतुमें देवाङ्गनाएँ और देवता मिलकर दोला-क्रीड़ा करने लगे। नन्दनवनमें यह मनोहारी उत्सव देखकर भगवती पार्वतीजीने शंकरजीसे कहा—'भगवन् ! इस क्रीड़ाको आप देखें। आप मेरे लिये भी एक दोला बनवाइये, जिसपर मैं आपके साथ बैठकर दोला-क्रीड़ा कर सकूँ।' पार्वतीजीके यह कहनेपर शिवजीने देवताओंको अपने पास बुलाकर दोला बनानेको कहा। देवताओंने शिवजीके कथनानुसार सुन्दर उत्तम इष्टापूर्तमय दोस्तम्भ गाड़कर उसपर सत्यस्वरूप एक लकड़ीका पटरा रखा और वासुकि नागकी रस्सी बनाकर उसके फणोंपर बैठनेके लिये रत्नजटित पीठकी रचना की। उस फणके ऊपर अत्यन्त मृदुल कपास और रेशमी वस्त्र बिछाकर दोलाकी शोभा बढ़ानेके लिये मोतियोंके गुच्छें और फूल-मालाओंसे उसे सजा दिया। इस प्रकार देवताओंने अति उत्तम दोला तैयार कर भगवान् शंकरको आदरपूर्वक प्रदान किया। अनन्तर भगवान् चन्द्रभूषण भगवती पार्वतीके साथ दोलापर बैठ गये। भगवान् शंकरके पार्श्व दोला झूलाने लगे तथा जया और विजया दोनों सखियाँ चँवर डूलाने लगीं। उस समय पार्वतीजीने बहुत ही मधुर स्वरमें गीत गाया, जिससे शिवजी आनन्दमग्न हो गये। गन्धर्व गीत गाने लगे, अप्सराएँ नाचने लगीं और चारण विविध प्रकारके बाजे बजानेमें संलग्न हो गये।
१-या यस्य जन्तोः प्रकृतिः शुभा वा यदि वेतरा। स तस्यामेव रमते दुष्कृते सुकृते तथा ॥ (उत्तरपर्व १३३।१५)
२-अग्नि, मत्स्य और शिवपुराणमें इसका अधिक विस्तारसे वर्णन है।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
परंतु शिवजीके दोला-विहारसे सभी पर्वत काँपने लगे, समुद्रमें हलचल मच गया, प्रचण्ड पवन चलने लगा, सारा लोक त्रस्त हो गया। इस प्रकार त्रैलोक्यको अति व्याकुल देखकर इन्द्रादि सभी देवगणोंने सभीके पापोंका नाश करनेवाले शिवजीके पास आकर प्रणाम किया और प्रार्थना कर कहने लगे—‘नाथ! अब आप दोला-लीलासे निवृत्त हों, क्योंकि त्रैलोक्यको क्षोभ प्राप्त हो रहा है।’ इस प्रकार देवताओंकी प्रार्थना सुनकर प्रसन्न हो शिवजीने दोलासे उतरकर कहा कि ‘आजसे वसन्त-ऋतुमें जो व्यक्ति इस दोलोत्सवको करेगा तथा नैवेद्य अर्पित कर तत्तद् देवताओंके मूल मन्त्रोंसे उन्हें दोलापर आरोहण करायेगा, करेगा, आनन्द मनायेगा और स्तुति-पाठ करेगा, वह सभी अभीष्टोंको प्राप्त करेगा।’
भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—महाराज! अब मैं रथयात्राका वर्णन करता हूँ।
एक बार चैत्र मासमें मलयपर देवताओंसे समावृत्त भगवान् शंकर शान्तभावसे विराजमान थे। इसी समय मृत्युलोकमें इधर-उधर घूमते हुए देवर्षि नारद ब्रह्मलोकसे भगवान् शंकरके पास आये। उन्होंने भगवान्को प्रणाम किया और आसनपर बैठ गये। सर्वज्ञ भगवान् शंकरने देवर्षि नारदसे पूछा—‘मुने! आपका आगमन कहाँसे हो रहा है?’ नारद बोले—‘देवदेव! मैं मृत्युलोकसे आ रहा हूँ। वहाँ कामदेवके मित्र वसन्त-ऋतुने सारा संसार अपने वशमें कर लिया है। वहाँ मन्द-मन्द सुगन्धित मलय पवन बहता है। वसन्त-ऋतुके सहयोगी—कोकिल, आम्रमञ्जरी आदि सभी उसके कार्यमें सहयोग प्रदान कर रहे हैं। नगर-नगर और ग्राम-ग्राममें वसन्त-ऋतु यह घोषणा कर रहा है कि इस संसारका ही नहीं, अपितु तीनों लोकोंका स्वामी एकमात्र कामदेव
है। भगवन्! उसीके शासनमें सभी लोग उन्मत्त-से हो रहे हैं। चैत्र मासका यह विचित्र प्रभाव देखकर मैं आपसे निवेदन करने आया हूँ।’ नारदजीका वचन सुनकर भगवान् शंकर गम्भर्व, अप्सरा, मुनिगण और सभी देवताओंको साथ लेकर मृत्युलोकमें आये और उन्होंने देखा कि जैसा नारदजीने कहा था, वही स्थिति मृत्युलोकमें व्याप्त है। सब लोग उन्मत्त हो गये हैं। आनन्दमें मग्न हैं। शिवजी वसन्तकी शोभा देख ही रहे थे कि उनके साथ जो देवता आदि आये थे, वे भी आनन्दित हो गाने-बजाने लगे। वसन्तके प्रभावसे देवताओंको भी शुब्ध देखकर शंकरने यह विचार किया कि यह तो बड़ा अनर्थ हो रहा है। इसके प्रतीकारका कोई-न-कोई उपाय करना ही चाहिये। जो अनर्थ होता हुआ देखकर भी उसके निवारणका उपाय नहीं करता, वह अवश्य ही विपत्तिमें पड़कर दुःखको प्राप्त करता है। अब मुझे इन सबकी उन्मादसे रक्षा करनी चाहिये और स्वामिभक्त वसन्त-ऋतुका भी सम्मान रखना चाहिये। यह विचारकर शिवजीने वसन्त-ऋतुको अपने पास बुलाकर कहा कि ‘वसन्त! तुम केवल चैत्र मासमें अपना प्रभाव प्रकट करो, चैत्र मासके शुक्ल पक्षमें सभी जीवोंको और विशेष रूपसे देवताओंको सुख देनेवाले हो जाओ।’ अनन्तर देवताओंको स्वस्थचित्त किया और यह भी कहा कि ‘जो व्यक्ति वसन्त-ऋतुमें रथयात्रोत्सव करेगा, वह इस संसारमें दिव्य भोगोंको भोगनेवाला तथा नीरोग होगा।’ इतना कहकर शिवजी सभी देवताओंके साथ अपने लोकको चले गये। वसन्त-ऋतु भी शिवजीके आज्ञानुसार वनमें विहार करता हुआ अन्तर्धान हो गया। उसी दिनसे लोकमें रथयात्रोत्सवका प्रचार-प्रसार हुआ। जो देवताओंकी रथयात्रा करता है, उसके धन,
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- उत्तरपर्व *
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पशु, पुत्र आदिकी वृद्धि होती है और अन्तमें वह सद्गतिको प्राप्त करता है*।
राजन्! अब आप विशेष तिथियोंका वर्णन सुनें। तृतीयाको गौरी, चतुर्थीको गणपति, पञ्चमीको लक्ष्मी अथवा सरस्वती, षष्ठीको स्कन्द, सप्तमीको सूर्य, अष्टमी और चतुर्दशीको शिव, नवमीको चण्डिका, दशमीको वेदव्यास आदि शान्तचित्त ऋषि-महर्षि, एकादशी तथा द्वादशीको भगवान् विष्णु, त्रयोदशीको कामदेव और पूर्णिमाको सभी देवताओंका अर्चन-पूजन करना चाहिये। इस प्रकार देवताओंकी निर्दिष्ट तिथियोंमें ही दमनकोत्सव, दोलोत्सव और रथयात्रा आदि उत्सव करने चाहिये। इस प्रकार वसन्त-ऋतुमें उत्सव करनेवाला व्यक्ति बहुत कालतक स्वर्गका सुख भोगकर पुनः चक्रवर्ती राजाका पद प्राप्त करता है।
भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—राजन्! जब भगवान् शंकरने अपने नेत्रकी ज्वालासे कामदेवको भस्म कर डाला था, उस समय कामदेवकी पत्नियाँ रति और प्रीति दोनों रो-रोकर विलाप करने लगीं। इसपर पार्वतीजीके हृदयमें दया उत्पन्न हो गयी और वे शिवजीसे प्रार्थना करने लगीं—‘महाराज! आप कृपाकर इस कामदेवको जीवनदान दें और शरीर प्रदान कर दें।’ यह सुनकर प्रसन्न हो शिवजीने कहा—‘पार्वती! यद्यपि अब यह मूर्तिमान् रूपमें जीवित नहीं हो सकता, परंतु चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको प्रतिवर्ष एक बार यह मनसे उत्पन्न होकर जीवित होगा। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको जो भी कामदेवका पूजन करेगा, वह वर्षभर सुखी रहेगा। इतना कहकर शिवजी कैलासपर चले
गये। राजन्! इसकी विधिको सुनें—चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको स्नान कर एक अशोकवृक्ष बनाकर उसके नीचे रति, प्रीति और वसन्तसहित कामदेवकी प्रतिमाको सिंदूर और हल्दीसे बनाना चाहिये अथवा सुवर्णकी मूर्ति स्थापित करनी चाहिये। मूर्ति ऐसी होनी चाहिये, जिसकी सेवामें विद्याधरियाँ हाथ जोड़े हों, अप्सराएँ जिसके चारों तरफ खड़ी हों, गन्धर्व नृत्य कर रहे हों। इस प्रकार मध्याह्नेके समय गन्ध, पुष्प, धूप, अक्षत, ताम्बूल, दीप, अनेक प्रकारके फल, नैवेद्य आदि उपचारोंसे कामदेवकी तथा अपने पतिकी भी पूजा करे। जो इस प्रकार प्रतिवर्ष कामोत्सव करता है, वह सुभिक्ष, क्षेम, आरोग्य, लक्ष्मी आदिको प्राप्त करता है। विष्णु, ब्रह्मा तथा सूर्य, चन्द्र आदि ग्रह, कामदेव, वसन्त और गन्धर्व, असुर, राक्षस, सुपर्ण, नाग, पर्वत आदि उसपर प्रसन्न हो जाते हैं। उसको कभी शोक नहीं होता। जो स्त्री वसन्त-ऋतुमें रति, प्रीति, वसन्त, मलयानिल आदि परिवारसहित कामदेवका भक्तिपूर्वक पूजन करती है, वह सौभाग्य, रूप, पुत्र और सुखको प्राप्त करती है।’
महाराज! इसी प्रकार ज्येष्ठ मासके प्रतिपद तिथिसे लेकर पूर्णिमातक भगवती भूतमाताका पूजोत्सव मनाना चाहिये। अनेक प्रकारके मनोविनोदपूर्ण एवं हास्यपूर्ण गीत, नाटक आदिका आयोजन करना चाहिये। नवमी अथवा एकादशीको दीपक जलाकर अतीव भक्तिपूर्वक भगवतीके समीप ले जाने चाहिये।
इस प्रकार पूर्णिमातक प्रदोषके समय दीपमहोत्सव करना चाहिये और द्वादशीके दिन
- कालक्रमसे इस रथयात्राका प्रचलन कम हो गया, किंतु आषाढ़ शुक्ल द्वितीयाको सर्वत्र जगन्नाथजीकी रथयात्रा निकलती है, विशेषकर पुरीमें।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
भूतमाताका विशेष उत्सव मनाना चाहिये। इस प्रकार अनेक प्रकारके उत्सवोंसे भूतमाताका पूजन करनेवाले व्यक्ति सपरिवार प्रसन्न रहते हैं और
उनके घरमें किसी प्रकारके विघ्न उत्पन्न नहीं होते। ये भूतमाता भगवती पार्वतीके अंशसे समुद्धृत हैं। (अध्याय १३३-१३६)
श्रावणपूर्णिमाको रक्षाबन्धनकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! प्राचीन कालमें देवासुर-संग्राममें देवताओंद्वारा दानव पराजित हो गये। दुःखी होकर वे दैत्यराज बलिके साथ गुरु शुक्राचार्यजीके पास गये और अपनी पराजयका वृत्तान्त बतलाया। इसपर शुक्राचार्य बोले—‘दैत्यराज! आपको विषाद नहीं करना चाहिये। दैववश कालकी गतिसे जय-पराजय तो होती ही रहती है। इस समय वर्षभरके लिये तुम देवराज इन्द्रके साथ संधि कर लो, क्योंकि इन्द्र-पत्नी शचीने इन्द्रको रक्षा-सूत्र बाँधकर अजेय बना दिया है। उसीके प्रभावसे दानवेन्द्र! तुम इन्द्रसे परास्त हुए हो। एक वर्षतक प्रतीक्षा करो, उसके बाद तुम्हारा कल्याण होगा। अपने गुरु शुक्राचार्यके वचनोंको सुनकर सभी दानव निश्चित हो गये और समयकी प्रतीक्षा करने लगे। राजन्! यह रक्षाबन्धनका विलक्षण प्रभाव है, इससे विजय, सुख, पुत्र, आरोग्य और धन प्राप्त होता है।’
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! किस तिथिमें किस विधिसे रक्षाबन्धन करना चाहिये। इसे बतायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! श्रावण मासकी पूर्णिमाके दिन प्रातःकाल उठकर शौच इत्यादि नित्य-क्रियासे निवृत्त होकर श्रुति-स्मृति-विधिसे स्नान कर देवताओं और पितरोंका निर्मल जलसे तर्पण करना चाहिये तथा उपाकर्मविधिसे
वेदोक्त ऋषियोंका तर्पण भी करना चाहिये। ब्राह्मणवर्ग देवताओंके उद्देश्यसे श्राद्ध करें। तदनन्तर अपराह्ण-कालमें रक्षापोटलिका इस प्रकार बनाये—कपास अथवा रेशमके वस्त्रमें अक्षत, गौर सर्पप, सुवर्ण, सरसों, दूर्वा तथा चन्दन आदि पदार्थ रखकर उसे बाँधकर एक पोटलिका बना ले तथा उसे एक ताम्रपात्रमें रख ले और विधिपूर्वक उसको प्रतिष्ठित कर ले। आँगनको गोबरसे लीपकर एक चौकोर मण्डल बनाकर उसके ऊपर पीठ स्थापित करे और उसके ऊपर मन्त्रीसहित राजाको पुरोहितके साथ बैठना चाहिये। उस समय उपस्थित जन प्रसन्न-चित्त रहें। मङ्गल-ध्वनि करें। सर्वप्रथम ब्राह्मण तथा सुवासिनी स्त्रियाँ अध्यादिके द्वारा राजाकी अर्चना करें। अनन्तर पुरोहित उस प्रतिष्ठित रक्षापोटलीको इस मन्त्रका पाठ करते हुए राजाके दाहिने हाथमें बाँधें—
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
(उत्तरपर्व १३७।२०)
तत्पश्चात् राजाको चाहिये कि सुन्दर वस्त्र, भोजन और दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंकी पूजाकर उन्हें संतुष्ट करे। यह रक्षाबन्धन चारों वर्णोंको करना चाहिये। जो व्यक्ति इस विधिसे रक्षाबन्धन करता है, वह वर्षभर सुखी रहकर पुत्र-पौत्र और धनसे परिपूर्ण हो जाता है। (अध्याय १३७)
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- उत्तरपर्व *
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महानवमी ( विजयादशमी )-व्रत
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! महानवमी सब तिथियोंमें श्रेष्ठ है। सभी प्रकारके मङ्गल और भगवतीकी प्रसन्नताके लिये सब लोगोंको और विशेषकर राजाओंको महानवमीका उत्सव अवश्य मनाना चाहिये।
युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! इस महानवमी-व्रतका आरम्भ कबसे हुआ? क्या यशोदाके गर्भसे प्रादुर्भूत होनेके समयसे महानवमी-व्रतका प्रचलन हुआ अथवा इसके पूर्व सत्ययुग आदिमें भी यह महानवमी-व्रत था? इसे आप बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! वह परमशक्ति सर्वव्यापिनी, भावगम्या, अनन्ता और आद्या आदि नामसे विश्वविख्यात है। उनका काली, सर्वमङ्गला, माया, कात्यायिनी, दुर्गा, चामुण्डा तथा शंकरप्रिया आदि अनेक नाम-रूपोंसे ध्यान और पूजन किया जाता है।
देव, दानव, राक्षस, गन्धर्व, नाग, यक्ष, किन्नर, नर आदि सभी अष्टमी तथा नवमीको उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। कन्याके सूर्यमें आश्विन मासके शुक्ल पक्षमें अष्टमीको यदि मूल नक्षत्र हो तो उसका नाम महानवमी है। यह महानवमी तिथि तीनों लोकोंमें अत्यन्त दुर्लभ है। आश्विन मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी और नवमीको जगन्माता भगवती श्रीअम्बिकाका पूजन करनेसे सभी शत्रुओंपर विजय प्राप्त हो जाती है। यह तिथि पुण्य, पवित्रता, धर्म और सुखको देनेवाली है। इस दिन मुण्डमालिनी चामुण्डाका पूजन अवश्य करना चाहिये। सभी कल्पों और मन्वन्तरोंमें देव, दैत्य आदि अनेक प्रकारके उपचारोंसे नवमी तिथिको भगवतीकी पूजा किया करते हैं और तीनों लोकोंमें अवतार लेकर भगवती मर्यादाका पालन करती रहती हैं।
राजन्! यही पराम्बा जगन्माता भगवती यशोदाके गर्भसे उत्पन्न हुई थीं और वे कंसके मस्तकपर पैर रखकर आकाशमें चली गयीं और फिर विन्ध्याचलमें स्थापित हुई, तभीसे यह पूजा प्रवर्तित हुई।
भगवतीका यह उत्सव पहलेसे ही प्रसिद्ध था, परंतु सभी प्राणियोंके उपकारके लिये तथा सभी विघ्न-बाधाओंकी शान्तिके लिये ही मैंने अपनी बहनके रूपमें भगवती विन्ध्यवासिनीदेवीकी महिमाका विशेषरूपसे प्रचार किया। विन्ध्यवासिनी भगवतीके स्थानमें नौ रात्रि, तीन रात्रि, एक रात्रि उपवास या अयाचितव्रत अथवा नक्तव्रत कर अनेक प्रकारके उपचारोंसे भगवतीकी आराधना करनी चाहिये। ग्राम-ग्राम, नगर-नगर और घर-घरमें सभी लोगोंको स्नान कर प्रसन्नचित्त होकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री आदि सभीको भगवतीकी पूजा करनी चाहिये। विशेषकर राजाओंको तो यह पूजन अवश्य करना चाहिये।
विजयकी इच्छा रखनेवाले राजाको प्रतिपदासे अष्टमीपर्यन्त लोहाभिहारिक कर्म (अस्त्र-शस्त्र-पूजन) करना चाहिये। सर्वप्रथम पूर्वोत्तर ढालवाली भूमिमें नौ अथवा सात हाथ लम्बा-चौड़ा, पताकाओंसे सुसज्जित एक मण्डप बनाना चाहिये। उसमें अग्निकोणमें तीन मेखला और पीपलके समान योनिसे युक्त एक अति सुन्दर एक हाथके कुण्डकी रचना करनी चाहिये। राजाके चिह्न—छत्र, चामर, सिंहसन, अश्व, ध्वजा, पताका आदि और सभी प्रकारके अस्त्र-शस्त्र मण्डपमें लाकर रखे। उन सबका अधिवासन करे। इसके अनन्तर ब्राह्मणको चाहिये कि वह स्नानकर श्वेत वस्त्र धारणकर मण्डपादिकी पूजा करे और फिर ओंकारपूर्वक राजचिह्नोंके निर्दिष्ट मन्त्रोंद्वारा घृतसे संयुक्त पायससे हवन-कर्म करे। पूर्वकालमें बहुत
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
ही बलवान्, शक्तिशाली लोह नामका एक दैत्य पैदा हुआ था। उसको देवताओंने मारकर खण्ड-खण्ड कर पृथ्वीपर गिरा दिया। वही दैत्य आज लोहाके रूपमें दिखायी पड़ता है। उसीके अङ्गोंसे ही विभिन्न प्रकारके लोहेकी उत्पत्ति हुई है। इसलिये उसी समयसे लोहाभिहारिक कर्म राजाओंको विजय प्राप्त करनेमें सहायक सिद्ध हुआ, ऐसा ऋषियोंने बतलाया है। हवनका बचा हुआ शेष पायस हाथी और घोड़ोंको खिलाकर उनको अलंकृत कर माङ्गलिक घोष करते हुए रक्षकोंके साथ समारोहपूर्वक नगरमें घुमाना चाहिये। राजाको भी प्रतिदिन स्नानकर पितरों और देवताओंकी पूजा करनेके बाद राजचिह्नोंकी भी भलीभाँति पूजा करनी चाहिये। इससे राजाको विजय, कीर्ति, आयु, यश तथा बलकी प्राप्ति होती है।
इस प्रकार लोहाभिहारिक कर्म करनेके अनन्तर अष्टमीके दिन पूर्वोह्नमें स्नान कर नियमपूर्वक सुवर्ण, चाँदी, पीतल, ताँबा, मृत्तिका, पाषाण, काष्ठ आदिकी दुर्गाकी सुन्दर मूर्ति बनाकर उत्तम सुसज्जित स्थानके बीच सिंहासनके ऊपर स्थापित करे। कुंकुम, चन्दन, सिन्दूर आदिसे उस मूर्तिको चर्चित कर कमल आदि पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य आदिसे अनेक बाजे-गाजेके साथ उनका पूजन करना चाहिये। वन्दीजन स्तुति करें। बहुतसे लोग छत्र-चामर आदि राजचिह्न लेकर चारों ओर खड़े होकर स्थित रहें। दीक्षायुक्त राजा पुरोहितके साथ बिल्वपत्रोंसे भगवतीकी इस मन्त्रसे पूजा करे—
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥
अमृतोद्भवः श्रीवृक्षो महादेवीप्रियः सदा।
बिल्वपत्रं प्रयच्छामि पवित्रं ते सुरेश्वरि ॥
(उत्तरपर्व १३८।८६-८७)
इस प्रकार पूजनकर उसी दिनसे द्रोणपुष्पी (गूमा)-से पूजा करनी चाहिये। असुरोंके साथ युद्ध करनेसे जो क्षति भगवतीके शरीरको हुई उसकी पूर्ति द्रोणपुष्पीसे ही हुई। इसलिये द्रोणपुष्पी भगवतीको अत्यन्त प्रिय है। फिर शत्रुओंके वधके लिये खड्गको प्रणामकर सुभिक्ष, राज्य और अपने विजयकी प्राप्ति-हेतु भगवतीसे प्रार्थना करनी चाहिये और उनका ध्यान तथा इस स्तुतिका पाठ करना चाहिये—
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
कुंकुमेन समालब्धे चन्दनेन विलेपिते।
बिल्वपत्रकृतामाले दुर्गेऽहं शरणं गतः ॥
(उत्तरपर्व १३८।९३-९४)
इस प्रकार अष्टमीको सब प्रकारसे भगवतीका पूजन कर रात्रिको जागरण करना चाहिये और नृत्यादिक उत्सव कराना चाहिये। प्रसन्नतापूर्वक रात्रिके बीत जानेपर नवमीको प्रातःकाल भगवतीकी बड़े समारोहके साथ विशेष पूजा करनी चाहिये। अपराह्न-समयमें रथके बीच भगवती दुर्गाकी प्रतिमाको स्थापित कर पूरे राज्यभरमें भ्रमण कराना चाहिये। अपनी सेनासहित राजाको भी साथ रहना चाहिये।
सभी प्रकारके विघ्नोंकी निवृत्तिके लिये भूतशान्ति करनी चाहिये। जिससे यात्रा निर्विघ्न पूर्ण हो। इस विधिसे जो राजा अथवा सामान्य व्यक्ति भगवतीकी यात्रा करता है, वह सभी प्रकारके पापोंसे छूटकर भगवतीके लोकको प्राप्त कर लेता है और उस व्यक्तिको शत्रु, चोर, ग्रह, विघ्न आदिका भय नहीं होता। भगवतीके भक्त सदा नीरोग, सुखी और निर्भय हो जाते हैं। जो व्यक्ति भगवतीके उत्सव-विधिका श्रवण करता है या पढ़ता है, उसके भी सभी अमङ्गल दूर हो जाते हैं। (अध्याय १३८)
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- उत्तरपर्व *
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इन्द्रध्वजोत्सवके प्रसंगमें उपरिचर वसुका वृत्तान्त
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके समय ब्रह्मा आदि देवताओंने 'इन्द्रको विजय प्राप्त हो', इसलिये ध्वजयष्टिका निर्माण किया। ध्वजयष्टिको देवताओं, सिद्ध-विद्याधर तथा नाग आदिने मेरु पर्वतपर स्थापित कर सभी उपचारों—पुष्प, धूप तथा दीपादिसे उसकी पूजा की और अनेक प्रकारके आभूषण, छत्र, घण्टा, किंकिणी आदिसे उसे अलंकृत किया। उस ध्वजयष्टिको देखकर दैत्य त्रस्त हो गये और युद्धमें देवताओंने उन्हें पराजितकर स्वर्गका राज्य प्राप्त कर लिया। दैत्य पाताललोकको चले गये। उसी दिनसे देवता उस इन्द्रयष्टिका पूजन और उत्सव करने लगे।
एक समय अपने महान् पुण्य-प्रतापके कारण राजा उपरिचर वसु स्वर्गमें आये। उनका देवताओंने बहुत सम्मान किया। उनसे प्रसन्न होकर इन्द्रने वह ध्वज उन्हें दिया और वर देते हुए कहा कि पृथ्वीमें इस ध्वजकी आप पूजा करें, इससे आपके राज्यके सभी दोष दूर हो जायेंगे और जो भी राजा वर्षा-ऋतुमें (भाद्रपद शुक्ल द्वादशी) श्रवण नक्षत्रमें इसका पूजन करेगा, उसके राज्यमें क्षेम और सुभिक्ष बना रहेगा, किसी प्रकारका उपद्रव नहीं होगा, प्रजाएँ प्रसन्न एवं नीरोग होंगी, सर्वत्र धार्मिक यज्ञ होंगे। राज्यमें प्रचुर धन-सम्पत्ति होगी। इन्द्रका यह वचन सुनकर राजा उपरिचर वसु इन्द्रध्वजको लेकर अपने नगरमें चले आये और प्रतिवर्ष इन्द्रध्वजकी पूजा कर उत्सव मनाने लगे। इस ध्वजयष्टिको भी प्रत्यक्ष देवी माना गया है।
अब मैं इन्द्रध्वजके उत्सवकी विधि बता रहा हूँ। बीस हाथ लम्बे, सुपुष्ट, उत्तम काष्ठकी एक यष्टि बनाकर उसे सुन्दर रंग-बिरंगे वस्त्रोंसे सुसज्जित करे। उसमें तेरह आभूषण लगवाये। पहला आभूषण
पिटक चौकोर होता है, इसे 'लोकपाल पिटक' कहते हैं, दूसरा आभूषण लाल रंगका वृत्ताकार होता है, इसी प्रकार अन्य देवसम्बन्धी पिटकोंका निर्माण कर तथा यष्टिमें बाँधकर कुशा, पुष्पमाला, घण्टा, चामर आदिसे समन्वित उस ध्वजको स्थापित करे। अनन्तर हवन कराकर गुड़से युक्त मिष्टान्न और पायस ब्राह्मणोंको भोजन कराये। भोजनोपरान्त उन्हें दक्षिणा दे। उस ध्वजको धीरेसे खड़ाकर स्थापित कर दे। नौ दिन या सात दिनतक उत्सव मनाना चाहिये। अनेक प्रकारके नृत्य, गायन, वादन कराते हुए मल्लयुद्ध आदि उत्सव भी कराने चाहिये। वस्त्राभूषण तथा स्वादिष्ट भोजनादिसे सभी लोगोंको संतुष्टकर सम्मानित करना चाहिये। रात्रिको जागरणकर ध्वजकी भलीभाँति रक्षा करनी चाहिये।
इन्द्रध्वजका पूजन, अर्चन तथा उत्सवादि कार्य सम्पन्न करना चाहिये। यदि एक वर्ष करनेके बाद दूसरे वर्ष किसी व्यवधानके कारण पूजनादि कार्य न हो सके तो पुनः बारह वर्ष बाद ही करना चाहिये। ध्वजके अङ्ग-भङ्ग होनेपर अनेक प्रकारके उपद्रव प्रारम्भ हो जाते हैं। यदि ध्वजपर कौआ बैठ जाय तो दुर्भिक्ष पड़ता है, उलूक बैठे तो राजाकी मृत्यु हो जाती है। कपोत बैठे तो प्रजाका विनाश होता है। इसलिये सावधान होकर उसकी रक्षा करनी चाहिये और भक्तिपूर्वक इन्द्रध्वजका उत्थापन कर पूजन करना चाहिये। यदि प्रमादवश ध्वज गिर पड़े या टूट जाय तो सोने अथवा चाँदीका ध्वज बनाकर उसका उत्थापन और अर्चन कर शान्तिक-पौष्टिक आदि कर्म सम्पन्न कराये। ब्राह्मणको भोजन आदिसे संतुष्ट करना चाहिये। इस विधिसे जो राजा इन्द्रध्वजकी यात्रा एवं पूजा करता है, उसके राज्यमें यथेष्ट वृष्टि होती है। मृत्यु और
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अनेक प्रकारके ईति-भीति आदि दुयोंगों, कष्टोंका भय नहीं रहता तथा राजा शत्रुओंको पराजित कर
चिर कालतक राज्यसुख भोगकर अन्त समयमें इन्द्रलोकको प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १३९)
दीपमालिकोत्सव
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने वामनरूप धारणकर दानवराज बलिको छलकर इन्द्रको राज्यका भार सौंप दिया और राजा बलिको पाताललोकमें स्थापित कर दिया। भगवान्ने बलिके यहाँ सदा रहना स्वीकार किया। कार्तिककी अमावास्याको रात्रिमें सारी पृथ्वीपर दैत्योंकी यथेष्ट चेष्टाएँ होती हैं।
युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! कौमुदीतिथिकी विधिको विशेषरूपसे बतानेकी कृपा करें। उस दिन किस वस्तुका दान किया जाता है। किस देवताकी पूजा की जाती है तथा कौन-सी क्रीडा करनी चाहिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! कार्तिक मासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशीको प्रभातके समय नरकके भयको दूर करनेके लिये स्नान अवश्य करना चाहिये। अपामार्ग (चिचड़ा)-के पत्र सिरके ऊपर मन्त्र पढ़ते हुए घुमाये*। इसके बाद धर्मराजके नामों—यम, धर्मराज, मृत्यु, वैवस्वत, अन्तक, काल तथा सर्वभूतक्षयका उच्चारण कर तर्पण करे। देवताओंकी पूजा करनेके बाद नरकसे बचनेके उद्देश्यसे दीप जलाये। प्रदोषके समय शिव, विष्णु, ब्रह्मा आदिके मन्दिरोंमें, कोष्ठगार, चैत्य, सभामण्डप, नदीतट, महल, तडाग, उद्यान, वापी, मार्ग, हस्तिशाला तथा अश्वशाला आदि स्थानोंमें दीप प्रज्वलित करने चाहिये।
अमावास्याके दिन प्रातःकाल स्नानकर देवता
और पितरोंका भक्तिपूर्वक पूजन-तर्पण आदि करे तथा पार्वण-श्राद्ध करे। अनन्तर ब्राह्मणको दूध, दही, घृत और अनेक प्रकारके स्वादिष्ट भोजन करकर दक्षिणा प्रदान करे और उन्हें संतुष्ट करे। अपराह्कालमें राजाद्वारा अपने राज्यमें यह घोषित कराना चाहिये कि 'आज इस लोकमें बलिका शासन है। नगरके सभी लोगोंको अपनी सामर्थ्यके अनुसार अपने घरको स्वच्छ—साफ-सुथरा करके नाना प्रकारके रंग-बिरंगे तोरण-पताकाओं, पुष्पमालाओं तथा बंदनवारोंसे सजाना चाहिये। नगरके सभी लोगों अर्थात् नर-नारी, बाल-वृद्ध आदिको चाहिये कि सुन्दर उत्तम वस्त्र पहनकर कुंकुम, चन्दन आदिका लेप लगाकर ताम्बूलका भक्षण करते हुए आनन्दपूर्वक नृत्य-गीतादिकोंका आयोजन करें।' इस प्रकार अतीव उल्लाससे एवं प्रीतिपूर्वक इस दिन दीपोत्सव मनाना चाहिये। प्रदोषके समय दीपमाला प्रज्वलित कर अनेक प्रकारके दीप-वृक्ष खड़े करने चाहिये। उस समय राक्षस लोकमें विचरण करते हैं। उनके भयको दूर करनेके लिये श्रेष्ठ कन्याओंको दीप-वृक्षोंपर तण्डुल (धानका लावा) फेंकते हुए दीपकोसे नीराजन करना चाहिये। दीपमालाओंके जलानेसे प्रदोष-वेला दोषरहित हो जाती है और राक्षसादिका भय दूर हो जाता है। इस प्रकार अति शोभासम्पन्न नगरकी शोभा देखनेके उद्देश्यसे राजाको अपने मित्र, मन्त्री आदिके साथ अर्धरात्रिके समय धीरे-धीरे पैदल ही चलना
- मन्त्र इस प्रकार हैं—
हर पापमपामार्ग भ्राग्यमाणं पुनः पुनः ।
आपदं किल्विषं चापि ममापहर सर्वशः । अपामार्गं नमस्तेऽस्तु शरीरं मम शोधय ॥ (उत्तरपर्व १४०।९)
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- उत्तरपर्व *
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चाहिये। राजकर्मचारी भी हाथमें प्रज्वलित दीपक लिये रहें। पूरे नगरकी रमणीयता देखकर राजाको यह मानना चाहिये कि राजा बलि मेरे ऊपर आज प्रसन्न हो गये होंगे। फिर राजा अपने महलमें वापस आ जाय।
आधी रात बीत जानेपर जब सब लोग निद्रामें हों, उस समय घरकी स्त्रियोंको चाहिये कि वे सूप बजाते हुए घरभरमें घूमती हुई आँगनतक आयें और इस प्रकार वे दरिद्रा—अलक्ष्मीका अपने घरसे निस्सारण करें। प्रातःकाल होते ही राजाको चाहिये कि वस्त्र, आभूषण आदि देकर ब्राह्मणों, सत्पुरुषोंको संतुष्ट करे और भोजन, ताम्बूल देकर मधुर वचनोंसे पण्डितोंका सत्कार करे तथा सामन्त, सिपाही और सेवक आदिको आभूषण, धन आदि देकर संतुष्ट करे तथा अनेक प्रकारके मल्लक्रीडा आदिका आयोजन करे। राजाको मध्याह्नके अनन्तर नगरके पूर्व दिशामें ऊँचे स्तम्भ अथवा वृक्षोंपर कुश और काशकी बनी मार्गपाली१ बाँधकर उसकी पूजा करे। फिर हवन करे। अपनी प्रजाको भोजन देकर संतुष्ट करे। उस समय राजाको मार्गपालीकी आरती करनी चाहिये, यह आरती विजय प्रदान करती है। उसके बाद गाय, बैल, हाथी, घोड़ा, राजा, राजपुत्र, ब्राह्मण, शूद्र आदि सभी लोगोंको उस मार्गपालीके नीचेसे निकलना चाहिये। मार्गपालीको बाँधनेवाला अपने दोनों कुलोंका उद्धार करता है। इसका लङ्घन करनेवाले वर्षभर सुखी और नीरोग रहते हैं। फिर भूमिपर पाँच रंगोंसे मण्डल लिखकर उसके मध्यमें प्रसन्नमुख, द्विभुज, कुण्डल धारण करनेवाले कृष्णाण्ड, बाण तथा मुर आदि दानवोंके साथ
सर्वाभरणभूषित रानी विन्ध्यावलीसहित राजा बलिकी मूर्तिकी स्थापना करे और कमल, कुमुद, कह्हार, रक्त कमल आदि पुष्पों तथा गन्ध, दीप, नैवेद्य, अक्षत और दीपकों तथा अनेक उपहारोंसे राजा बलिकी पूजा कर इस प्रकार प्रार्थना करे—
बलिराज नमस्तुभ्यं विरोचनसुत प्रभो। भविष्येन्द्रसुरागते पूजेयं प्रतिगृह्यताम्॥
(उत्तरपर्व १४०।५४)
इस प्रकार पूजन कर रात्रिको जागरणपूर्वक महोत्सव करना चाहिये। नगरके लोग अपने-अपने घरमें शय्यामें श्वेत तण्डुल बाँधकर राजा बलिको उसमें स्थापितकर फल-पुष्पादिसे पूजन करें और बलिके उद्देश्यसे दान करें, क्योंकि राजा बलिके लिये जो व्यक्ति दान देता है, उसका दिया हुआ दान अक्षय हो जाता है। भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर बलिले पृथ्वीको प्राप्त किया और यह कार्तिकी अमावास्या तिथि राजा बलिको प्रदान की, उसी दिनसे यह कौमुदीका उत्सव प्रवृत्त हुआ है२। यह तिथि सभी उपद्रव, सभी प्रकारके विघ्न, शोक आदिको दूर करनेवाली है। धन, पुष्टि, सुख आदि प्रदान करती है। 'कु' यह पृथ्वीका वाचक शब्द है और 'मुदी' का अर्थ होता है प्रसन्नता। इसलिये पृथ्वीपर सबको हर्ष देनेके कारण इसका नाम कौमुदी पड़ा। जो राजा वर्षभरमें एक दिन राजा बलिका उत्सव करता है, उसके राज्यमें रोग, शत्रु, महामारी और दुर्भिक्षका भय नहीं होता। सुभिक्ष, आरोग्य और सम्पत्तिकी वृद्धि होती है। इस कौमुदी तिथिको जो व्यक्ति जिस भावमें रहता है, उसे वर्षभर उसी भावकी प्राप्ति होती है। यदि व्यक्ति उस दिन रुदन कर
१-मार्गपाली दरवाजेके पास बना हुआ स्वागतद्वार है, जो कुश, काश, तृण आदि और आम्र तथा अशोकके पत्तेसे अलंकृत कर बनायी जाती है।
२-विष्णुना वसुधा लब्धा प्रीतेन बलये पुनः। उपकारपरो दत्तश्चासुराणां महोत्सवः ॥
ततः प्रभृति राजेन्द्र प्रवृत्ता कौमुदी पुनः। (उत्तरपर्व १४०।५९-६०)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
रहा हो तो रुदन, हर्षित है तो हर्ष, दुःखी है तो दुःख, सुखी है तो सुख, भोगसे भोग, स्वस्थतासे स्वस्थता तथा दीन रहनेसे दीनताकी प्राप्ति होती है१। इसलिये इस तिथिको हष्ट और प्रसन्न रहना चाहिये। यह तिथि वैष्णवी भी है, दानवी भी है
और पैत्रिकी भी है। दीपमालाके दिन जो व्यक्ति भक्तिसे राजा बलिका पूजन-अर्चन करता है, वह वर्षभर आनन्दपूर्वक सुखसे व्यतीत करता है और उसके सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।
(अध्याय १४०)
शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मों तथा नवग्रह-शान्तिकी विधिका वर्णन२
युधिष्ठिरे कहा—भगवन्! आप सर्वज्ञ हैं, इसलिये आप यह बतलानेकी कृपा करें कि सम्पूर्ण कामनाओंकी अविचल सिद्धिके लिये शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मोंका अनुष्ठान किस प्रकार करना चाहिये?
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! लक्ष्मीकी कामनावाले अथवा शान्तिके अभिलाषी तथा वृष्टि, दीर्घायु और पुष्टिकी इच्छासे युक्त मनुष्यको ग्रहयज्ञका समारम्भ करना चाहिये। मैं सम्पूर्ण शास्त्रोंका अवलोकन करनेके पश्चात् पुराणों एवं श्रुतियोंद्वारा आदिष्ट इस ग्रहशान्तिका संक्षिप्त वर्णन कर रहा हूँ। इसके लिये ज्योतिषीद्वारा बतलाये गये शुभ मुहूर्तमें ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर ग्रहों एवं ग्रहाधिदेवोंकी स्थापना करके हवन प्रारम्भ करना चाहिये। पुराणों एवं श्रुतियोंके ज्ञाता विद्वानोंने तीन प्रकारके ग्रहयज्ञ बतलाये हैं। पहला दस हजार आहुतियोंका अयुतहोम, उससे बढ़कर दूसरा एक लाख आहुतियोंका लक्षहोम तथा सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला तीसरा एक करोड़ आहुतियोंका कोटिहोम होता है। दस हजार आहुतियोंवाला ग्रहयज्ञ नवग्रहयज्ञ कहलाता है। इसकी विधि जो पुराणों एवं श्रुतियोंमें बतलायी गयी है, प्रथम मैं उसका वर्णन कर रहा हूँ। (यजमान मण्डपनिर्माणके बाद)
हवनकुण्डकी पूर्वोत्तर-दिशामें स्थापनाके लिये एक वेदीका निर्माण कराये, जो दो बीता लम्बी-चौड़ी, एक बीता ऊँची, दो परिधियोंसे सुशोभित और चौकोर हो। उसका मुख उत्तरकी ओर हो। पुनः कुण्डमें अग्निकी स्थापना करके उस वेदीपर देवताओंका आवाहन करे। इस प्रकार उसपर बत्तीस देवताओंकी स्थापना करनी चाहिये।
सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु—ये लोगोंके हितकारी ग्रह कहे गये हैं। इन ग्रहोंकी प्रतिमा क्रमशः ताँबा, स्फटिक, रक्त चन्दन, स्वर्ण, चाँदी तथा लोहेसे बनानी चाहिये। श्वेत चावलोंद्वारा वेदीके मध्यमें सूर्यकी, दक्षिणमें मंगलकी, उत्तरमें बृहस्पतिकी, पूर्वोत्तरकोणपर बुधकी, पूर्वमें शुक्रकी, दक्षिण-पूर्वकोणपर चन्द्रमाकी, पश्चिममें शनिकी, पश्चिम-दक्षिणकोणपर राहुकी और पश्चिमोत्तरकोणपर केतुकी स्थापना करनी चाहिये। इन सभी ग्रहोंमें सूर्यके शिव, चन्द्रमाके पार्वती, मंगलके स्कन्द, बुधके भगवान् विष्णु, बृहस्पतिके ब्रह्मा, शुक्रके इन्द्र, शनैश्चरके यम, राहुके काल और केतुके चित्रगुप्त अधिदेवता माने गये हैं। अग्नि, जल, पृथ्वी, विष्णु, इन्द्र, सौवर्ण देवता, प्रजापति, सर्प और ब्रह्मा—ये सभी क्रमशः
१-यो यादृशेन भावेन तिष्ठत्यस्यांयुधिष्ठिर। हर्षदेन्यादिरूपेण तस्य वर्षं प्रयाति हि॥
रुदिते रोदिति वर्षं दृष्टो वर्षप्रह्व्यति। भुक्ता भोक्ता भवेद्वर्षस्वस्थः स्वस्थो भवेदिति॥ (उत्तरपर्व १४०। ६८-६९)
२-यह पाँच आथर्वण कल्पों—नक्षत्र, वैतान, संहिताविधि, अङ्गिरस एवं शान्तिकल्पमेंसे प्रथम एवं पाँचवें शान्तिकल्पका समन्वित रूप है और अथर्वपरिशिष्ट, याज्ञवल्क्यस्मृति १। २९५—३०८, वृद्धपाशर ११, पद्मपुराण, सुष्टिखण्ड ८२—८६, नारदपुराण १। ५१, मत्स्यपुराण, अग्निपुराण २६४—२७४ आदिमें भी प्राप्त है।
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- उत्तरपर्व *
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प्रत्यधिदेवता हैं। इनके अतिरिक्त विनायक, दुर्गा, वायु, आकाश, सावित्री, लक्ष्मी तथा उमाको उनके पतिदेवताओंके साथ और अश्विनीकुमारोंका भी व्याहितियोंके उच्चारणपूर्वक आवाहन करना चाहिये। उस समय मंगलसहित सूर्यको लाल वर्णका, चन्द्रमा और शुक्रको श्वेत वर्णका, बुध और बृहस्पतिको पीत वर्णका, शनि और राहुको कृष्ण वर्णका तथा केतुको धूम्र वर्णका जानना और ध्यान करना चाहिये। बुद्धिमान् यज्ञकर्ता जो ग्रह जिस रंगका हो, उसे उसी रंगका वस्त्र और फूल समर्पित करे, सुगन्धित धूप दे। पुनः फल, पुष्प आदिके साथ सूर्यको गुड़ और चावलसे बने हुए अन्न (खीर)-का, चन्द्रमाको घी और दूधसे बने हुए पदार्थका, मंगलको गोड़ियाका, बुधको क्षीरषष्ठिक (दूधमें पके हुए साठीके चावल)-का, बृहस्पतिको दही-भातका, शुक्रको घी-भातका, शनैश्चरको खिचड़ीका, राहुको अजशृंगी नामक लताके फलके गूदाका और केतुको विचित्र रंगवाले भातका नैवेद्य अर्पण करके सभी प्रकारके भक्ष्य पदार्थोंद्वारा पूजन करे।
वेदीके पूर्वोत्तरकोणपर एक छिद्ररहित कलशकी स्थापना करे, उसे दही और अक्षतसे सुशोभित, आप्रके पल्लवसे आच्छादित और दो वस्त्रोंसे परिवेष्टित करके उसके निकट फल रख दे। उसमें पञ्चरत्न डाल दे और उसे पञ्चभङ्ग (पीपल, बरगद, पाकड़, गूलर और आमके पल्लव)-से युक्त कर दे। उसपर वरुण, गङ्गा आदि नदियों, सभी समुद्रों और सरोवरोंका आवाहन तथा स्थापन करे। राजेन्द्र! धर्मज्ञ पुरोहितको चाहिये कि वह हाथीसार, घुड़शाल, चौराहे, बिमवट, नदीके संगम, कुण्ड और गोशालाकी मिट्टी लाकर उसे सर्वौषधमिश्रित जलसे अभिषिक्त कर यजमानके स्नानके लिये वहाँ प्रस्तुत कर दे तथा 'यजमानके पापको नष्ट करनेवाले सभी समुद्र, नदी, नद, बादल और सरोवर यहाँ पथारें' ऐसा
कहकर इन देवताओंका आवाहन करे। तत्पश्चात् घी, जौ, चावल, तिल आदिसे हवन प्रारम्भ करे। मदार, पलाश, खैर, चिचड़ा, पीपल, गूलर, शमी, दूब और कुश—ये क्रमशः नवों ग्रहोंकी समिधाएँ हैं। इनमें प्रत्येक ग्रहके लिये मधु, घी और दही अथवा पायससे युक्त एक सौ आठ या अट्ठाईस आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको सदा सभी कर्मोंमें अँगूठेके सिरसे तर्जनीके सिरेतककी मापवाली तथा बरौह, शाखा और पतोंसे रहित समिधाओंकी कल्पना करनी चाहिये। परमार्थवेत्ता यजमान सभी देवताओंके लिये उन-उनके पृथक्-पृथक् मन्त्रोंका मन्द स्वरसे उच्चारण करते हुए समिधाओंका हवन करे। अनन्तर प्रत्येक देवताके लिये उसके मन्त्रद्वारा हवन करना चाहिये। ब्राह्मणको 'आ कृष्णेन रजसा०' (यजु० ३३।४३) इस मन्त्रका उच्चारण कर सूर्यको आहुति देनी चाहिये। पुनः 'इमं देवा०' (यजु० ९।४०) इस मन्त्रसे चन्द्रमाको आहुति दे। मंगलके लिये 'अग्निर्मूर्धा०' (यजु० १३।१४) इस मन्त्रसे आहुति दे। बुधके लिये 'उदबुध्यस्व०' (यजु० १५।५४) और देवगुरु बृहस्पतिके लिये 'बृहस्पते अति०' (यजु० २६।३) ये मन्त्र माने गये हैं। शुक्रके लिये 'अन्नात्यरि०' (यजु० १९।७५) और शनैश्चरके लिये 'शं नो देवीरभिष्ट्य०' (यजु० ३६।१२) इस मन्त्रसे आहुति दे। राहुके लिये 'कथा नश्चित्र०' (यजु० २७।३९) यह मन्त्र कहा गया है तथा केतुकी शान्तिके लिये 'केतुं कृण्वन्०' (यजु० २९।३७) इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। चरु आदि हवनीय पदार्थोंमें घी मिलाकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक हवन करना चाहिये, तत्पश्चात् व्याहितियोंका उच्चारण करके घीकी दस आहुतियाँ अग्निमें डाले। पुनः श्रेष्ठ ब्राह्मण उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख बैठकर प्रत्येक देवताके मन्त्रोच्चारणपूर्वक चरु आदि पदार्थोंका हवन करे।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
फिर 'आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं०' (ऋ० ४।३।१, कृष्णयजु० तै० सं० १।३।१४।१) इस मन्त्रका उच्चारण कर रुद्रके लिये हवन और बलि देनी चाहिये। तत्पश्चात् उमाके लिये 'आपो हि घ्ना०' (वाजस० सं० ११।५०) इस मन्त्रसे, स्वामिकार्तिकेयके लिये 'स्यो ना०' इस मन्त्रसे, विष्णुके लिये 'इदं विष्णुर्वि०' (यजु० ५।१५) इस मन्त्रसे, ब्रह्माके लिये 'तमीशानम्०' (वाजस० २५।१८) इस मन्त्रसे और इन्द्रके लिये 'इन्द्रभिहेवताय०' इस मन्त्रसे आहुति डाले। इसी प्रकार यमके लिये 'आयं गौः०' (यजु० ३।६) इस मन्त्रसे हवन बतलाया गया है। कालके लिये 'ब्रह्मजज्ञानम्०' (यजु० १३।३) यह मन्त्र प्रशस्त माना गया है। अग्निके लिये 'अग्निं दूतं वृणीमहे०' (ऋक्स० १।१२।१) यह मन्त्र बतलाया गया है। वरुणके लिये 'उदुत्तमं वरुणपाशम्०' (ऋक्स० १।२४।१५) यह मन्त्र कहा गया है। वेदोंमें पृथ्वीके लिये 'पृथिव्यन्तरिक्षम्०' इस मन्त्रका पाठ है। विष्णुके लिये 'सहस्रशीर्षा पुरुषः०' (वाजस० सं० ३१।१) यह मन्त्र कहा गया है।
हवन समाप्त हो जानेपर चार ब्राह्मण अभिषेक-मन्त्रोंद्वारा उसी जलपूर्ण कलशसे पूर्व अथवा उत्तर मुख करके बैठे हुए यजमानका अभिषेक करें और ऐसा कहें—'ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर—ये देवता आपका अभिषेक करें। जगदीश्वर वसुदेव-नन्दन श्रीकृष्ण, सामर्थ्यशाली संकर्षण (बलराम), प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये सभी आपको विजय प्रदान करें। इन्द्र, अग्नि, ऐश्वर्यशाली यम, निर्ऋति, वरुण, पवन, कुबेर, ब्रह्मासहित शिव, शेषनाग और दिव्यालगण—ये सभी आपकी रक्षा करें। कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, मेधा, पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, मति, बुद्धि, लज्जा, शान्ति, पुष्टि, कान्ति तथा तुष्टि—ये सभी माताएँ जो धर्मकी पत्नियाँ हैं,
आकर आपको अभिषिक्त करें। सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, राहु और केतु—ये सभी ग्रह प्रसन्नतापूर्वक आपको अभिषिक्त करें। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, ऋषि, गौ, देवमाताएँ, देवपत्नियाँ, वृक्ष, नाग, दैत्य, अप्सराओंके समूह, अस्त्र, सभी शस्त्र, नृपगण, वाहन, औषध, रत्न, (कला, काष्ठ आदि) कालके अवयव, नदियाँ, सागर, पर्वत, तीर्थस्थान, बादल तथा नद—ये सभी सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये आपको अभिषिक्त करें।'
इस प्रकार श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा सर्वौषधि एवं सम्पूर्ण सुगन्धित पदार्थोंसे युक्त जलसे स्नान करा दिये जानेके पश्चात् सपत्नीक यजमान श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत चन्दनका अनुलेप करे और विस्मयरहित होकर शान्त चित्तवाले ऋत्विजोंका प्रयत्नपूर्वक दक्षिणा आदि देकर पूजन करे तथा सूर्यके लिये कपिला गौका, चन्द्रमाके लिये शङ्खुका, मंगलके लिये भार वहन करनेमें समर्थ एवं ऊँचे डीलवाले लाल रंगके बैलका, बुधके लिये सुवर्णका, बृहस्पतिके लिये एक जोड़ा पीले वस्त्रका, शुक्रके लिये श्वेत रंगके घोड़ेका, शनैश्चरके लिये काली गौका, राहुके लिये लोहेकी बनी हुई वस्तुका और केतुके लिये उत्तम बकरेके दानका विधान है। यजमानको ये सारी दक्षिणाएँ सुवर्णके साथ अथवा स्वर्णनिर्मित मूर्तिके रूपमें देनी चाहिये या जिस प्रकार गुरु (पुरोहित) प्रसन्न हों, उनके आज्ञानुसार सभी ब्राह्मणोंको सुवर्णसे अलंकृत गौएँ अथवा केवल सुवर्ण दान करना चाहिये। पर सर्वत्र मन्त्रोच्चारणपूर्वक ही इन सभी दक्षिणाओंके देनेका विधान है।
दान देते समय सभी देय वस्तुओंसे पृथक्-पृथक् इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—'कपिले! तुम रोहिणीरूप हो, तीर्थ एवं देवता तुम्हारे स्वरूप
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- उत्तरपर्व *
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हैं तथा तुम सम्पूर्ण देवोंकी पूजनीया हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। शङ्खु! तुम पुण्योके भी पुण्य और मङ्गलोंके भी मङ्गल हो। भगवान् विष्णुने तुम्हें अपने हाथमें धारण किया है, इसलिये तुम मुझे शान्ति प्रदान करो। जगत्को आनन्दित करनेवाले वृषभ! तुम वृषरूपसे धर्म और अष्टमूर्ति शिवजीके वाहन हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। सुवर्ण! तुम ब्रह्माके आत्मस्वरूप, अग्निके स्वर्णमय बीज और अनन्त पुण्यके प्रदाता हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। दो पीले वस्त्र अर्थात् पीताम्बर भगवान् श्रीकृष्णको परम प्रिय हैं, इसलिये विष्णो! उसको दान करनेसे आप मुझे शान्ति प्रदान करें। अश्व! तुम अश्वरूपसे विष्णु हो, अमृतसे उत्पन्न हुए हो तथा सूर्य एवं चन्द्रमाके नित्य वाहन हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। पृथ्वी! तुम समस्त धेनुस्वरूपा, कृष्ण (गोविन्द) नामवाली और सदा सम्पूर्ण पापोंको हरण करनेवाली हो, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करो। लौह! चूँकि विश्वके सभी सम्पादित होनेवाले लौह-कर्म हल एवं अस्त्र आदि सारे कार्य सदा तुम्हारे ही अधीन हैं, इसलिये तुम मुझे शान्ति प्रदान करो। छग! चूँकि तुम सम्पूर्ण यज्ञोंके मुख्य अङ्गरूपसे निर्धारित हो और अग्निदेवके नित्य वाहन हो, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करो। गौ! चूँकि गौओंके अङ्गोंमें चौदहों भुवन निवास करते हैं, इसलिये तुम मेरे लिये इहलोक एवं परलोकमें भी कल्याण प्रदान करो। जिस प्रकार भगवान् केशव तथा शिवकी शय्या कभी शून्य नहीं रहती, बल्कि लक्ष्मी तथा पार्वतीसे सदा सुशोभित रहती है, वैसे ही मेरे द्वारा भी दान की गयी शय्या जन्म-जन्ममें सुखसे सम्पन्न रहे। जैसे सभी रत्नोंमें समस्त देवता निवास करते हैं, वैसे ही रत्नदान करनेसे वे देवता मुझे शान्ति प्रदान करें। सभी दान भूमिदानकी सोलहवीं
कलाकी भी समता नहीं कर सकते, अतः भूमि-दान करनेसे मुझे इस लोकमें शान्ति प्राप्त हो।' इस प्रकार कृपणता छोड़कर भक्तिपूर्वक रत्न, सुवर्ण, वस्त्रसमूह, धूप, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे ग्रहोंकी पूजा करनी चाहिये।
राजन्! अब आप भक्तिपूर्वक ग्रहोंके स्वरूपोंको सुनें—(चित्र-प्रतिमादि विधानोंमें) सूर्यदेवकी दो भुजाएँ निर्दिष्ट हैं, वे कमलके आसनपर विराजमान रहते हैं, उनके दोनों हाथोंमें कमल सुशोभित रहते हैं। उनकी कान्ति कमलके भीतरी भागकी-सी है और वे सात घोड़ों तथा सात रस्सियोंसे जुते रथपर आरूढ़ रहते हैं। चन्द्रमा गौर वर्ण, श्वेत वस्त्र और श्वेत अश्वयुक्त हैं तथा उनके आभूषण भी श्वेत वर्णके हैं। धरणीनन्दन मंगलकी चार भुजाएँ हैं। वे अपने चारों हाथोंमें खड्ग, ढाल, गदा तथा वरदमुद्रा धारण किये हैं, उनके शरीरकी कान्ति कनेरके पुष्प-सरीखी है। वे लाल रंगकी पुष्पमाला और वस्त्र धारण करते हैं। बुध पीले रंगकी पुष्पमाला और वस्त्र धारण करते हैं। पीत चन्दनसे अनुलिप्त हैं। वे दिव्य सोनेके रथपर विराजमान हैं। देवताओं और दैत्योंके गुरु बृहस्पति और शुक्रकी प्रतिमाएँ क्रमशः पीत और श्वेत वर्णकी होनी चाहिये। उनके चार भुजाएँ हैं, जिनमें वे दण्ड, रुद्राक्षकी माला, कमण्डलु और वरमुद्रा धारण किये रहते हैं। शनैश्चरकी शरीर-कान्ति इन्द्रनीलमणिकी-सी है। वे गीधपर सवार होते हैं और हाथमें धनुष-बाण, त्रिशूल और वरमुद्रा धारण किये रहते हैं। राहुका मुख सिंहके समान भयंकर है। उनके हाथोंमें तलवार, कवच, त्रिशूल और वरमुद्रा शोभा पाती है तथा वे नीले रंगके सिंहआसनपर आसीन होते हैं। ध्यान (प्रतिमा)-में ऐसे ही राहु प्रशस्त माने गये हैं। केतु बहुतेरे हैं। उन सबकी दो भुजाएँ हैं। उनके शरीर आदि धूम्र वर्णके हैं।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
उनके मुख विकृत हैं। वे दोनों हाथोंमें गदा एवं वरमुद्रा धारण किये हैं और नित्य गीथपर समासीन रहते हैं। इन सभी लोक-हितकारी ग्रहोंको किरीटसे सुशोभित कर देना चाहिये तथा इन सबकी ऊँचाई अपने हाथके प्रमाणसे एक सौ आठ अङ्गुल (साढ़े चार हाथ)-की होनी चाहिये।
हे पाण्डुनन्दन! यह मैंने आपको नवग्रहोंका स्वरूप बतलाया है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि ऐसी प्रतिमा बनाकर इनकी पूजा करे। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे ग्रहोंकी पूजा करता है, वह इस लोकमें सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है तथा अन्तमें स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यदि किसी निर्धन मनुष्यको कोई ग्रह नित्य पीडा पहुँचा रहा हो तो उस बुद्धिमान्को चाहिये कि उस ग्रहकी यलपूर्वक भलीभाँति पूजा करके तत्पश्चात् शेष ग्रहोंकी भी अर्चना करे, क्योंकि ग्रह, गौ, राजा और ब्राह्मण—ये विशेषरूपसे पूजित होनेपर रक्षा करते हैं, अन्यथा अवहेलना किये जानेपर जलाकर भस्म कर देते हैं। इसलिये वैभवकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्यको दक्षिणासे रहित यज्ञ नहीं करना चाहिये, क्योंकि भरपूर दक्षिणा देनेसे (यज्ञका प्रधान) देवता भी संतुष्ट हो जाता है। नवग्रहोंके यज्ञमें यह दस हजार आहुतियोंवाला हवन ही होता है। इसी प्रकार विवाह, उत्सव, यज्ञ, देवप्रतिष्ठा आदि कर्मोंमें तथा चित्तकी उद्विग्नता एवं आकस्मिक विपत्तियोंमें भी यह दस हजार आहुतियोंवाला हवन ही बतलाया गया है। इसके बाद अब मैं एक लाख आहुतियोंवाले यज्ञकी विधि बतला रहा हूँ, सुनिये।
विद्वानोंने सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये लक्षहोमका विधान किया है, क्योंकि यह पितरोंको परम प्रिय और साक्षात् भोग एवं मोक्षरूपी फलका
प्रदाता है। बुद्धिमान् यजमानको चाहिये कि ग्रहबल और ताराबलको अपने अनुकूल पाकर ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराये और अपने गृहके पूर्वोत्तर दिशामें अथवा शिवमन्दिरकी समीपवर्ती भूमिपर विधानपूर्वक एक मण्डपका निर्माण कराये, जो दस हाथ अथवा आठ हाथ लम्बा-चौड़ा चौकोर हो तथा उसका मुख (प्रवेशद्वार) उत्तर दिशाकी ओर हो। उसकी भूमिको यलपूर्वक पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू बना देना चाहिये।
तदनन्तर मण्डपके पूर्वोत्तर भागमें यथार्थ लक्षणोंसे युक्त एक सुन्दर कुण्ड* तैयार कराये। परिमाणसे कम अथवा अधिक परिमाणमें बना हुआ कुण्ड अनेकों प्रकारका भय देनेवाला हो जाता है, इसलिये शान्तिकुण्डको परिमाणके अनुकूल ही बनाना चाहिये। ब्रह्माने लक्षहोमको अयुतहोमसे दसगुना अधिक फलदायक बतलाया है, इसलिये इसे प्रयलपूर्वक आहुतियों और दक्षिणाओंद्वारा सम्पादित करना चाहिये। लक्षहोममें कुण्ड चार हाथ लम्बा और दो हाथ चौड़ा होता है, उसके भी मुखस्थानपर योनि बनी होती है और वह तीन मेखलाओंसे युक्त होता है। देवताओंकी स्थापनाके लिये एक वेदीका भी विधान बतलाया है, जो तीन परिधियोंसे युक्त हो। इनमें पहली परिधि दो अङ्गुल ऊँची शेष दो एक-एक अङ्गुल ऊँची होनी चाहिये। विद्वानोंने इन सबकी चौड़ाई दो अङ्गुलकी बतलायी है। वेदीके ऊपर दस अङ्गुल ऊँची एक दीवाल बनायी जाय, उसीपर पहलेकी ही भाँति फूल और अक्षतोंसे देवताओंका आवाहन किया जाय। राजेन्द्र! अधिदेवताओं एवं प्रत्यधिदेवताओंसहित सभी ग्रहोंको सूर्यके सम्मुख ही स्थापित करना चाहिये, उत्तराभिमुख अथवा पराङ्मुख नहीं। लक्ष्मीकामी मनुष्यको इस यज्ञमें
- 'कल्याण' अग्निपुराणाङ्क ३० २४ की टिप्पणीमें कुण्ड-मण्डप-निर्माणकी पूरी विधि द्रष्टव्य है।
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- उत्तरपर्व *
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(सभी देवताओंके अतिरिक्त) गरुडकी भी पूजा करनी चाहिये। (उस समय ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये—) 'गरुड! तुम्हारे शरीरसे सामवेदकी ध्वनि निकलती रहती है, तुम भगवान् विष्णुके वाहन और नित्य विवरूप पापको हरनेवाले हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो।'
तत्पश्चात् पहलेकी तरह कलशकी स्थापना करके हवन आरम्भ करे। एक लाख आहुतियोंसे हवन करनेके पश्चात् पुनः समिधाओंकी संख्याके बराबर और अधिक आहुतियाँ डाले। फिर अग्निके ऊपर घृतकुम्भसे वसोर्धारा गिराये। (वसोर्धाराकी विधि यह है—) भुजा-बराबर लम्बी गूलरकी लकड़ीसे, जो खोखली न हो तथा सीधी एवं गीली हो, सुवा बनवाकर उसे दो खम्भोंपर रखकर उसके द्वारा अग्निके ऊपर सम्यक् प्रकारसे घीकी धारा गिराये। उस समय अग्निसूक्त (ऋ० सं० १।१), विष्णुसूक्त (वाजसं० ५।१—२२), रुद्रसूक्त (वही १६) और इन्दु (सोम)-सूक्त (ऋक्० १।९१) पाठ करना चाहिये तथा महावैश्वानर साम और ज्येष्ठसामका गान करना चाहिये। तदुपरान्त पूर्ववत् यजमान स्नान कर स्वस्तिवाचन कराये तथा काम-क्रोधरहित होकर शान्तिचित्तसे पूर्ववत् ऋत्विजोंको पृथक्-पृथक् दक्षिणा प्रदान करे। नवग्रहयज्ञके अयुतहोममें चार वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको अथवा श्रुतिके जानकार एवं शान्त स्वभाववाले दो ही ऋत्विजोंको नियुक्त करना चाहिये। विस्तारमें नहीं फँसना चाहिये।
इसी प्रकार लक्षहोममें अपनी सामर्थ्यके अनुकूल मत्सररहित होकर दस, आठ अथवा चार ऋत्विजोंको नियुक्त करना चाहिये। पाण्डवश्रेष्ठ! सम्पत्तिशाली यजमानको यथाशक्ति भक्ष्य पदार्थ, आभूषण, वस्त्रोंसहित शय्या, स्वर्णनिर्मित कड़े, कुण्डल और अँगूठी आदि सभी वस्तुएँ लक्षहोममें
नवग्रह-यज्ञसे दसगुनी अधिक देनी चाहिये। मनुष्यको कृपणतावश दक्षिणारहित यज्ञ नहीं करना चाहिये। जो लोभ अथवा अज्ञानसे भरपूर दक्षिणा नहीं देता, उसका कुल नष्ट हो जाता है। समृद्धिकामी मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार अन्नका दान करना चाहिये, क्योंकि अन्न-दानरहित किया हुआ यज्ञ दुर्भिक्षरूप फलका दाता हो जाता है। अन्नहीन यज्ञ राष्ट्रको, मन्त्रहीन यज्ञ ऋत्विजको और दक्षिणारहित यज्ञ यज्ञकर्ताको जलाकर नष्ट कर देता है। इस प्रकार (विधिहीन) यज्ञके समान अन्य कोई शत्रु नहीं है। अल्प धनवाले मनुष्यको कभी लक्षहोम नहीं करना चाहिये, क्योंकि यज्ञमें (दक्षिणा आदिके लिये) प्रकट हुआ विग्रह सदाके लिये कष्टकारक हो जाता है। स्वल्प सम्पत्तिवाला मनुष्य केवल पुरोहितकी अथवा दो या तीन ब्राह्मणोंकी भक्तिके साथ विधिपूर्वक पूजा करे अथवा एक ही वेदज्ञ ब्राह्मणकी भक्तिके साथ दक्षिणा आदिसे प्रयत्नपूर्वक अर्चना करे, बहुतोंके चक्करमें न पड़े। अधिक सम्पत्ति होनेपर लक्षहोम करना चाहिये, क्योंकि यह अधिक लाभदायक है। इसका विधिपूर्वक अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। वह आठ सौ कल्पोंतक शिवलोकमें वसुगण, आदित्यगण और मरुदग्गणोंद्वारा पूजित होता है तथा अन्तमें मोक्षको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य किसी विशेष कामनासे इस लक्षहोमको विधिपूर्वक सम्पन्न करता है, उसे उस कामनाकी प्राप्ति तो हो ही जाती है, साथ ही वह अविनाशी पदको भी प्राप्त कर लेता है। इसका अनुष्ठान करनेसे पुत्रार्थीको पुत्रकी प्राप्ति होती है, धनार्थी धन लाभ करता है, भार्यार्थी सुन्दर पत्नी, कुमारी कन्या सुन्दर पति, राज्यसे भ्रष्ट हुआ राजा राज्य और लक्ष्मीका अभिलाषी लक्ष्मी प्राप्त करता है।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
इस प्रकार मनुष्य जिस वस्तुकी अभिलाषा करता है, उसे वह प्रचुर मात्रामें प्राप्त हो जाती है। जो निष्कामभावसे इसका अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। (अध्याय १४१)
कोटिहोमका विधान
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! प्राचीन कालमें प्रतिष्ठान (पैठण) नामक नगरमें संवरण नामके एक महान् भाग्यशाली राजा थे। वे सभी शास्त्रोंमें निपुण, ब्रह्मतत्त्वके ज्ञाता, पितृभक्त तथा देव-ब्राह्मणके उपासक थे।
एक समयकी बात है, ब्रह्माजीके पुत्र महायोगी सनक राजा संवरणके पास आये। उन्हें देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने मुनिको आसन देकर प्रणाम किया तथा अर्घ्य, पाद्य आदिसे उनका सत्कार कर अपना राज्य और स्वयंको भी उनके लिये समर्पित किया। मुनिने भी राजाद्वारा किये गये अभिवादन और सत्कारको स्वीकार किया। उसके बाद ब्रह्मर्षि सनकने अनेक राजाओं, महाराजाओंके चरित और इतिहास-पुराण आदिकी कथाएँ उन्हें सुनायीं। राजा कथा सुनकर आत्मविभोर हो उठे। इसी अवसरपर राजा संवरणने जगत्के प्राणियोंके हितकी दृष्टिसे सनकजीसे प्रार्थना करते हुए कहा—‘देवर्षि! भूकम्प, उपलवृष्टि, ग्रहयुद्ध, अनावृष्टि, राज्योपद्रव आदि उत्पातोंकी शान्तिके लिये कोई उपाय बतानेकी कृपा करें, जिससे कि धन-धान्यकी वृद्धि, आरोग्य, सुख और स्वर्गकी प्राप्ति हो।’ राजा संवरणकी प्रार्थनाको सुनकर सनकजीने कहा—‘राजन्! सभी कार्यकी सिद्धि करनेवाले शान्तिप्रद कोटिहोमकी विधि बता रहा हूँ, जिसके करनेसे ब्रह्महत्यादि पातक छूट जाते हैं। सभी उत्पात शान्त हो जाते हैं। साथ ही आरोग्य एवं सुखकी भी प्राप्ति होती है।’ इसका विधान इस प्रकार है—
सबसे पहले शुद्ध मुहूर्त देखकर देवालय, नदीके
तटपर, वनमें अथवा घरमें कोटिहोम करना चाहिये। सर्वप्रथम वेदवेत्ता ब्राह्मणका वरण कर गन्ध, अक्षत, पुष्प, माला, वस्त्र, आभूषण आदिसे उनका पूजन कर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—
त्वं नो गतिः पिता माता त्वं गतिस्त्वं परायणः। त्वत्प्रसादेन विप्रर्षिं सर्व मे स्यान्मनोगतम्॥ आपद्भिर्मोक्षाय च मे कुरु यज्ञमनुत्तमम्। कोटिहोमाख्यमतुलं शान्त्यर्थं सार्वकामिकम्॥
(उत्तरपर्व १४२। १७-१८)
‘विप्रश्रेष्ठ! आप ही हमलोगोंके माता-पिता हैं, आप ही हमारे आश्रय हैं और आप ही गति हैं। आपके अनुग्रहसे हमारे सभी मनोरथ परिपूर्ण हो जायें। आपत्तिसे छुटकारा प्राप्त करनेके लिये तथा सार्वकामिक शान्ति प्राप्त करनेके लिये आप कोटिहोम नामक उत्तम यज्ञ करा दें।’
आचार्यको भी श्वेत वस्त्र आदिसे अलंकृत होकर विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ पुण्याहवाचन करना चाहिये। पूर्व और उत्तरकी ओर ढालयुक्त समतल भूमिपर बने हुए मण्डपको ब्राह्मण सूत्रद्वारा घेर दे। मण्डपका प्रमाण इस प्रकार है—एक सौ हाथ विस्तारका मण्डप उत्तम, पचास हाथका मध्यम तथा पच्चीस हाथका मण्डप निकृष्ट है, किंतु शक्ति और सामर्थ्यके अनुसार ही मण्डप बनाकर उसके बीचमें आठ हाथ लम्बा-चौड़ा, तीन मेखलासे युक्त, बारह अंगुलके विस्तारयुक्त योनिसहित एक चौरस कुण्ड बनाना चाहिये। कुण्डके पूर्व दिशामें चार हाथ लम्बी-चौड़ी वेदी बनाये, जो एक हाथ ऊँची हो। उसमें सभी देवताओंको स्थापित करे। मण्डपकी भूमिको गोबर-मिट्टीसे अच्छी तरह लीपकर
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- उत्तरपर्व *
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पञ्चपल्लवोंसे सुसज्जित जलपूर्ण चौदह कलशोंको स्थापित करना चाहिये। मण्डपके ऊपर वितान और तोरण लगाने चाहिये। सब सामग्री एकत्रित कर पुण्याहवाचन, स्वस्तिवाचन, जयशब्दपूर्वक शुद्ध दिनसे पुरोहितको हवन प्रारम्भ करना चाहिये। मण्डपके पूर्वमें ब्रह्मा, मध्यमें विष्णु, पश्चिममें रुद्र, उत्तरमें वसु, ईशानमें ग्रह, अग्निकोणमें मरुत् और शेष दिशाओंमें लोकपालोंकी (वेदियोंपर) स्थापना करे। गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे वैदिक और पौराणिक मन्त्रोंद्वारा सबका अलग-अलग पूजन और प्रार्थना करे।
इसके पश्चात् वेदपाठी ब्राह्मणोंसहित विधानपूर्वक कुण्डका संस्कार करे। कुण्डमें अग्नि प्रज्वलितकर उस अग्निका नाम घृतार्चिष रखे। विद्यावृद्ध, वयोवृद्ध, गृहस्थ, जितेन्द्रिय, स्वकर्मनिष्ठ शुद्ध और ज्ञानशक्तिसम्पन्न एक सौ ब्राह्मणोंको हवनके लिये नियुक्त करे अथवा जिस संख्यामें उत्तम ब्राह्मण उपलब्ध हों, उनका ही वरण करना चाहिये। इसके बाद पञ्चमुख अग्निका ध्यान करना चाहिये। नामसहित उनकी सात जिह्वाओंकी पूजा करनी चाहिये। धुआँयुक्त अग्निमें हवन करना व्यर्थ होता है। इसलिये प्रज्वलित अग्निमें ही हवन करना चाहिये।
ऋग्वेदी ब्राह्मणोंको पूर्वभिमुख, यजुर्वेदीको उत्तराभिमुख, सामवेदीको पश्चिमाभिमुख और अथर्वणवेदी ब्राह्मणको दक्षिणाभिमुख बैठकर आधार और आज्यभागकी आहुतियाँ देनी चाहिये। पहले ब्रह्माका स्थापन कर इस कर्मको आरम्भ करना चाहिये। आदिमें 'प्रणव' लगाकर अन्तमें 'स्वाहा' शब्दका उच्चारण कर व्याहतियोंसे हवन करना चाहिये। घी, काला तिल तथा जौ मिलाकर पलाशकी समिधाओंसे कोटिहोम करना चाहिये। एक हजार आहुति पूर्ण होनेपर पूर्णाहुति करनी चाहिये। पुनः उसी प्रकार हवन करना चाहिये। इस विधिसे कोटिहोम
करना चाहिये। इसमें दस हजार बार पूर्णाहुतियाँ दी जाती हैं। इसमें सभी ब्राह्मणों और यजमानको काम, क्रोध आदि दोषोंसे दूर रहना चाहिये।
कोटिहोमकी विधिको सुनकर राजा संवरणने कहा कि महर्षे! इस कोटिहोममें बहुत अधिक समय लगेगा, इतने दिनतक संयमसे रहना बहुत ही कठिन कार्य है। इसलिये कृपाकर आप कोटिहोमकी संक्षिप्त विधि बतानेका कष्ट करें, जिससे कम समयमें यह निर्विघ्न पूर्ण हो जाय।
राजाके इस प्रकारके वचनको सुनकर सनक मुनिने कहा—'राजन्! कोटिहोम चार प्रकारका होता है—शतमुख, दशमुख, द्विमुख और एकमुख। समयानुसार इन चारोंमेंसे जो भी होम हो सके वही करना चाहिये। एक हाथ प्रमाणवाले उत्तम एक सौ कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्डपर एक-एक ब्राह्मणको अथवा समय कम रहनेपर प्रत्येक कुण्डपर दस-दस ब्राह्मणोंको हवनके लिये नियुक्त करे। एक कुण्डमें अग्निका संस्कार कर उसी अग्निको अन्य कुण्डोंमें भी प्रज्वलित करना चाहिये। इस विधिद्वारा जो हवन किया जाता है, उससे एक ही कोटिहोम होता है, जो शतमुख होम कहलाता है। यदि समयका अभाव न हो तो दस कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्डपर बीस-बीस ब्राह्मण हवनके लिये नियुक्त करने चाहिये। यह दशमुख नामक कोटिहोम है। यदि महीने-दो-महीनेका समय हो तो दो कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्डपर पचास-पचास ब्राह्मणोंको हवनके लिये आमन्त्रित करना चाहिये। यह द्विमुख कोटिहोम है। अधिक-से-अधिक समय हो तो एक कुण्डमें अग्नि-स्थापन कर उत्तम कुलोत्पन्न वेदवेत्ता सदाचारी ब्राह्मणोंसे हवन कराना चाहिये। इस हवनमें ब्राह्मणोंकी संख्याका कोई नियम नहीं और समयकी सीमा भी निश्चित नहीं है। यह एकमुख कोटिहोम स्वेच्छायज्ञ कहलाता है। इस
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
स्वेच्छायज्ञमें बहुत समय लगता है और बीचमें अनेक प्रकारके विघ्न भी उत्पन्न हो जाते हैं। धन और शरीरकी स्थिरताका कुछ भी भरोसा नहीं है। इसलिये संक्षेपसे ही यज्ञ करना चाहिये।'
यज्ञ सम्पन्न कर अच्छी प्रकारसे महोत्सव मनाना चाहिये। सभी ब्राह्मणोंको कटक, कुण्डल, वस्त्र, दक्षिणा, एक सौ गाय, एक सौ घोड़े और स्वर्ण आदि प्रदान करना चाहिये तथा पुरोहितकी पूजा करनी चाहिये। दीनों, अन्धों तथा कुपणों आदिको भोजन देकर अन्तमें कलशोंके जलसे
अवभूथ स्नान करे और ब्राह्मण यजमानका अभिषेक करे। इस विधिसे जो राजा या व्यक्ति कोटिहोम करता है, वह आरोग्य, पुत्र, राज्यवृद्धि, ऐश्वर्य, धन-धान्य प्राप्तकर सभी प्रकारसे संतुष्ट रहता है तथा उसको ग्रहपीड़ा भी नहीं भोगनी पड़ती। राज्यमें अनावृष्टि, उत्पात, महामारी, दुर्भिक्ष आदि कभी नहीं होते। सभी तरहके पाप और ग्रहोंकी पीड़ाको दूर करनेवाला शान्तिदायक यह कोटिहोम है, इसको करनेवाला व्यक्ति इन्द्रलोकको प्राप्त कर लेता है*। (अध्याय १४२)
महाशान्ति-विधान
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं भगवान् शंकरद्वारा कही गयी महाशान्तिका विधान बतलाता हूँ, यह राजाओंके लिये कल्याणकारी है तथा भयंकर विघ्नोंको दूर करनेवाली है। इस महाशान्तिको राजाके अभिषेक, यात्रा तथा दुःस्वप्नके समय, दुर्निमित्तमें, ग्रहोंकी प्रतिकूलतामें, बिजली और उल्काके गिरनेपर, जन्म-नक्षत्रमें केतुके उदय होनेपर, पृथ्वी-कम्पन और प्रसूतिकालमें, मूलगण्डान्तमें, मिथुन संततिके उत्पत्तिकालमें, राजाके छत्र अथवा ध्वजके अपने स्थानसे पतनके समय, काक, उलूक और कबूतरके घरमें प्रवेश करनेपर, क्रूर ग्रहकी दृष्टि पड़नेपर या जन्मके समय क्रूर ग्रहोंके योग होनेपर, लग्नकुण्डलीमें द्वादश, चतुर्थ और अष्टम स्थानमें बृहस्पति, शनि, सूर्य एवं मंगलके स्थित होनेपर तथा युद्धके समय, वस्त्र, आयुध, मणि, केश, गौ, अश्वके विनाशके समय, रात्रिमें इन्द्रधनुष दिखायी पड़नेपर, घरके तुला-भंगके समय तथा सूर्य और चन्द्र-ग्रहण आदिके
समयमें यह महाशान्ति प्रशस्त मानी गयी है। इसके करनेसे सभी दुर्निमित्त शान्त हो जाते हैं। पाण्डव! उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा शीलसम्पन्न वैदिक ब्राह्मणोंसे इस महाशान्तिको कराना चाहिये। विशेषरूपसे अथर्ववेद, यजुर्वेद तथा ऋग्वेदके ज्ञाता, पवित्र ज्ञानसम्पन्न, जप-होमपरायण और अनेक कुच्छादि व्रतोंके द्वारा शुद्ध व्यक्ति इसमें प्रशस्त माने गये हैं। प्रथम भगवान्की आराधना करके क्रियाका आरम्भ करना चाहिये।
दस या बारह हाथका एक सुन्दर मण्डप बनाकर उसके मध्यमें चार हाथकी वेदी बनाये और आग्नेय दिशामें एक हाथ प्रमाणवाला एक सुन्दर कुण्ड बनवाये एवं वह कुण्ड तीन मेखलाओंसे युक्त तथा योनिसे विभूषित होना चाहिये। मण्डपको चन्दन, माला, तोरण आदिसे अलंकृत कर गोबरसे लीपना चाहिये। मण्डपमें वेदीके ऊपर आग्नेयादि कोणोंमें क्रमशः चार और बीचमें पाँचवाँ कलश स्थापित करना चाहिये।
- वर्तमान समयके लिये यह विषय अत्यन्त उपयोगी है। सम्पन्न, धर्मात्मा तथा राजनीतिज्ञोंको इसका आश्रय लेकर विश्व-कल्याण करना चाहिये। आजकल विश्वमें अनेक दैवी और सामाजिक उपद्रव व्याप्त हैं। कोटिहोमपर कोटिरुद्रहोमात्मक-पद्धति आदि अनेक ग्रन्थ प्रकाशित हैं, किंतु यह प्रकरण भी उपयोगी है।
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- उत्तरपर्व *
५६१
कलशोंको पञ्चपल्लवों, सर्वौषधि, पञ्चरत्न, रोचना, चन्दन, सप्तमृत्तिका, धान्य तथा पुण्य तीर्थके जल, नारिकेल आदिसे भलीभाँति स्थापित करना चाहिये। ब्रह्मकूर्च-विधानसे पञ्चगव्यका निर्माण करे। इसके अनन्तर वैदिक मन्त्रोंसे कलशोंको अभिमन्त्रित कर उनका पूजन करे। मध्य कुम्भको रुद्रकुम्भ कहा जाता है।
इसके बाद स्वस्तिवाचन करना चाहिये। अनन्तर अग्निकार्य सम्पन्न करे। 'अग्नि दूतं०' (यजु० २२।१७) इस मन्त्रके द्वारा कुण्डमें अग्नि स्थापित करे। 'हिरण्यगर्भः०' (यजु० १३।४) इस मन्त्रसे ब्रह्मासनको स्थापित करे। अग्निपूजनके अनन्तर आज्य (घृत)-का संस्कार करे, अनन्तर विधिपूर्वक यज्ञीय द्रव्योंको यथावत् स्थापित करना चाहिये। इसके बाद पुरुषसूक्त (यजु० ३१।१—१६)-का पाठ करते हुए चरुका निर्माण करे। उसके सिद्ध होनेके बाद पृथ्वीपर स्थापित करे। इसके पश्चात् शमीकी अठारह तथा पलाशकी सात समिधाओंको अग्नि प्रज्वलित करनेके लिये कुण्डमें डाले। आधार और आज्य-भाग-संज्ञक हवन करनेके बाद 'जातवेदसे०' (ऋ० १।१९।१) इस ऋचाके द्वारा घीकी सात आहुतियाँ प्रदान करे। पुनः 'जातवेदसे०' इस मन्त्रसे स्थलीपाकद्रव्यका हवन करे। 'तरत् स मन्दी०' (ऋ० १।५८।१—४) इस सूक्तसे चार बार हवन करे। इसके बाद 'यमाय सोमं' (ऋ० १०।१४।१३) इस मन्त्रसे 'स्वाहा' शब्दका प्रयोगकर सात आहुतियाँ दे। तदनन्तर 'इदं विष्णुर्बि०' (यजु० ५।१५) इस मन्त्रसे सात बार आहुति दे। फिर २७ नक्षत्रोंके
लिये २७ आहुतियाँ दे। अनन्तर 'यत्कर्मणा०' इसके द्वारा हवन करनेके बाद स्विष्टकृत् हवन करे। तदनन्तर घृतसहित तिलसे ग्रहहोम करे। इसके बाद प्रायश्चित्त-निमित्तक हवन करके होम-कर्मको समाप्त करे। तदनन्तर श्रेष्ठ द्विज यजमानके दुर्निमित्तकी शान्तिके लिये पाँच कलशोंके जलसे मन्त्रोंके द्वारा यथाक्रम अभिषेक करे। 'सहस्त्राक्षेण०' (ऋ० १०।१६१।३) इस मन्त्रसे प्रथम कलशके जलसे, 'शतायुषा०' द्वारा द्वितीय कलशके जलसे, 'सजोषा०' (ऋ० ३।४७।२) इस मन्त्रसे तृतीय कलशके जलसे, 'विश्वानि देव०' (ऋ० ५।८२।५) इस मन्त्रसे चतुर्थ कलशके जलसे तथा 'ऋतमस्तु०' इस मन्त्रसे पञ्चम कलशके जलसे अभिषेक करे। इसके बाद 'नमोऽस्तु सर्वभूतेभ्यः०' इस मन्त्रसे दिशाओंको बलि-नैवेद्य प्रदान करे।
यजमानके स्नान करनेके समय ब्राह्मणगण शान्तिका पाठ करें। चारों ओर शान्ति-जलसे जलकी धारा गिराये। अन्तमें पुण्याहवाचनपूर्वक शान्तिकर्मको सम्पन्न करे। ब्राह्मणोंको यथाशक्ति भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, शय्या, आसन एवं दक्षिणा दे। दीन, अनाथ, विशिष्ट श्रोत्रियोंको भी भोजन आदि प्रदान करना चाहिये। ऐसा करनेसे आयुकी वृद्धि और शत्रुपर तत्क्षण विजय प्राप्त होती है तथा पुत्र-लाभ होता है। जैसे शस्त्रोंका प्रहार कवचसे हट जाता है, वैसे ही दैवी विघ्न भी इस शान्तिकर्मसे दूर हो जाते हैं। अहिंसक, इन्द्रियसंयमी, धर्मसे धन अर्जित करनेवाला, दया और दक्षिणासे युक्त व्यक्तिके लिये सभी ग्रह अनुकूल हो जाते हैं*। (अध्याय १४३)
- अहिंसकस्य दान्तस्य धर्माजितधनस्य च। दयादाक्षिण्ययुक्तस्य सर्वे सानुग्रहा ग्रहाः ॥ (उत्तरपर्व १४३।४५)
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