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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 570, कुल 654 में से

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पृष्ठ 570
  • उत्तरपर्व *

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पञ्चपल्लवोंसे सुसज्जित जलपूर्ण चौदह कलशोंको स्थापित करना चाहिये। मण्डपके ऊपर वितान और तोरण लगाने चाहिये। सब सामग्री एकत्रित कर पुण्याहवाचन, स्वस्तिवाचन, जयशब्दपूर्वक शुद्ध दिनसे पुरोहितको हवन प्रारम्भ करना चाहिये। मण्डपके पूर्वमें ब्रह्मा, मध्यमें विष्णु, पश्चिममें रुद्र, उत्तरमें वसु, ईशानमें ग्रह, अग्निकोणमें मरुत् और शेष दिशाओंमें लोकपालोंकी (वेदियोंपर) स्थापना करे। गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे वैदिक और पौराणिक मन्त्रोंद्वारा सबका अलग-अलग पूजन और प्रार्थना करे।

इसके पश्चात् वेदपाठी ब्राह्मणोंसहित विधानपूर्वक कुण्डका संस्कार करे। कुण्डमें अग्नि प्रज्वलितकर उस अग्निका नाम घृतार्चिष रखे। विद्यावृद्ध, वयोवृद्ध, गृहस्थ, जितेन्द्रिय, स्वकर्मनिष्ठ शुद्ध और ज्ञानशक्तिसम्पन्न एक सौ ब्राह्मणोंको हवनके लिये नियुक्त करे अथवा जिस संख्यामें उत्तम ब्राह्मण उपलब्ध हों, उनका ही वरण करना चाहिये। इसके बाद पञ्चमुख अग्निका ध्यान करना चाहिये। नामसहित उनकी सात जिह्वाओंकी पूजा करनी चाहिये। धुआँयुक्त अग्निमें हवन करना व्यर्थ होता है। इसलिये प्रज्वलित अग्निमें ही हवन करना चाहिये।

ऋग्वेदी ब्राह्मणोंको पूर्वभिमुख, यजुर्वेदीको उत्तराभिमुख, सामवेदीको पश्चिमाभिमुख और अथर्वणवेदी ब्राह्मणको दक्षिणाभिमुख बैठकर आधार और आज्यभागकी आहुतियाँ देनी चाहिये। पहले ब्रह्माका स्थापन कर इस कर्मको आरम्भ करना चाहिये। आदिमें 'प्रणव' लगाकर अन्तमें 'स्वाहा' शब्दका उच्चारण कर व्याहतियोंसे हवन करना चाहिये। घी, काला तिल तथा जौ मिलाकर पलाशकी समिधाओंसे कोटिहोम करना चाहिये। एक हजार आहुति पूर्ण होनेपर पूर्णाहुति करनी चाहिये। पुनः उसी प्रकार हवन करना चाहिये। इस विधिसे कोटिहोम

करना चाहिये। इसमें दस हजार बार पूर्णाहुतियाँ दी जाती हैं। इसमें सभी ब्राह्मणों और यजमानको काम, क्रोध आदि दोषोंसे दूर रहना चाहिये।

कोटिहोमकी विधिको सुनकर राजा संवरणने कहा कि महर्षे! इस कोटिहोममें बहुत अधिक समय लगेगा, इतने दिनतक संयमसे रहना बहुत ही कठिन कार्य है। इसलिये कृपाकर आप कोटिहोमकी संक्षिप्त विधि बतानेका कष्ट करें, जिससे कम समयमें यह निर्विघ्न पूर्ण हो जाय।

राजाके इस प्रकारके वचनको सुनकर सनक मुनिने कहा—'राजन्! कोटिहोम चार प्रकारका होता है—शतमुख, दशमुख, द्विमुख और एकमुख। समयानुसार इन चारोंमेंसे जो भी होम हो सके वही करना चाहिये। एक हाथ प्रमाणवाले उत्तम एक सौ कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्डपर एक-एक ब्राह्मणको अथवा समय कम रहनेपर प्रत्येक कुण्डपर दस-दस ब्राह्मणोंको हवनके लिये नियुक्त करे। एक कुण्डमें अग्निका संस्कार कर उसी अग्निको अन्य कुण्डोंमें भी प्रज्वलित करना चाहिये। इस विधिद्वारा जो हवन किया जाता है, उससे एक ही कोटिहोम होता है, जो शतमुख होम कहलाता है। यदि समयका अभाव न हो तो दस कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्डपर बीस-बीस ब्राह्मण हवनके लिये नियुक्त करने चाहिये। यह दशमुख नामक कोटिहोम है। यदि महीने-दो-महीनेका समय हो तो दो कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्डपर पचास-पचास ब्राह्मणोंको हवनके लिये आमन्त्रित करना चाहिये। यह द्विमुख कोटिहोम है। अधिक-से-अधिक समय हो तो एक कुण्डमें अग्नि-स्थापन कर उत्तम कुलोत्पन्न वेदवेत्ता सदाचारी ब्राह्मणोंसे हवन कराना चाहिये। इस हवनमें ब्राह्मणोंकी संख्याका कोई नियम नहीं और समयकी सीमा भी निश्चित नहीं है। यह एकमुख कोटिहोम स्वेच्छायज्ञ कहलाता है। इस

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