भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 569, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें५५८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
इस प्रकार मनुष्य जिस वस्तुकी अभिलाषा करता है, उसे वह प्रचुर मात्रामें प्राप्त हो जाती है। जो निष्कामभावसे इसका अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। (अध्याय १४१)
कोटिहोमका विधान
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! प्राचीन कालमें प्रतिष्ठान (पैठण) नामक नगरमें संवरण नामके एक महान् भाग्यशाली राजा थे। वे सभी शास्त्रोंमें निपुण, ब्रह्मतत्त्वके ज्ञाता, पितृभक्त तथा देव-ब्राह्मणके उपासक थे।
एक समयकी बात है, ब्रह्माजीके पुत्र महायोगी सनक राजा संवरणके पास आये। उन्हें देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने मुनिको आसन देकर प्रणाम किया तथा अर्घ्य, पाद्य आदिसे उनका सत्कार कर अपना राज्य और स्वयंको भी उनके लिये समर्पित किया। मुनिने भी राजाद्वारा किये गये अभिवादन और सत्कारको स्वीकार किया। उसके बाद ब्रह्मर्षि सनकने अनेक राजाओं, महाराजाओंके चरित और इतिहास-पुराण आदिकी कथाएँ उन्हें सुनायीं। राजा कथा सुनकर आत्मविभोर हो उठे। इसी अवसरपर राजा संवरणने जगत्के प्राणियोंके हितकी दृष्टिसे सनकजीसे प्रार्थना करते हुए कहा—‘देवर्षि! भूकम्प, उपलवृष्टि, ग्रहयुद्ध, अनावृष्टि, राज्योपद्रव आदि उत्पातोंकी शान्तिके लिये कोई उपाय बतानेकी कृपा करें, जिससे कि धन-धान्यकी वृद्धि, आरोग्य, सुख और स्वर्गकी प्राप्ति हो।’ राजा संवरणकी प्रार्थनाको सुनकर सनकजीने कहा—‘राजन्! सभी कार्यकी सिद्धि करनेवाले शान्तिप्रद कोटिहोमकी विधि बता रहा हूँ, जिसके करनेसे ब्रह्महत्यादि पातक छूट जाते हैं। सभी उत्पात शान्त हो जाते हैं। साथ ही आरोग्य एवं सुखकी भी प्राप्ति होती है।’ इसका विधान इस प्रकार है—
सबसे पहले शुद्ध मुहूर्त देखकर देवालय, नदीके
तटपर, वनमें अथवा घरमें कोटिहोम करना चाहिये। सर्वप्रथम वेदवेत्ता ब्राह्मणका वरण कर गन्ध, अक्षत, पुष्प, माला, वस्त्र, आभूषण आदिसे उनका पूजन कर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—
त्वं नो गतिः पिता माता त्वं गतिस्त्वं परायणः। त्वत्प्रसादेन विप्रर्षिं सर्व मे स्यान्मनोगतम्॥ आपद्भिर्मोक्षाय च मे कुरु यज्ञमनुत्तमम्। कोटिहोमाख्यमतुलं शान्त्यर्थं सार्वकामिकम्॥
(उत्तरपर्व १४२। १७-१८)
‘विप्रश्रेष्ठ! आप ही हमलोगोंके माता-पिता हैं, आप ही हमारे आश्रय हैं और आप ही गति हैं। आपके अनुग्रहसे हमारे सभी मनोरथ परिपूर्ण हो जायें। आपत्तिसे छुटकारा प्राप्त करनेके लिये तथा सार्वकामिक शान्ति प्राप्त करनेके लिये आप कोटिहोम नामक उत्तम यज्ञ करा दें।’
आचार्यको भी श्वेत वस्त्र आदिसे अलंकृत होकर विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ पुण्याहवाचन करना चाहिये। पूर्व और उत्तरकी ओर ढालयुक्त समतल भूमिपर बने हुए मण्डपको ब्राह्मण सूत्रद्वारा घेर दे। मण्डपका प्रमाण इस प्रकार है—एक सौ हाथ विस्तारका मण्डप उत्तम, पचास हाथका मध्यम तथा पच्चीस हाथका मण्डप निकृष्ट है, किंतु शक्ति और सामर्थ्यके अनुसार ही मण्डप बनाकर उसके बीचमें आठ हाथ लम्बा-चौड़ा, तीन मेखलासे युक्त, बारह अंगुलके विस्तारयुक्त योनिसहित एक चौरस कुण्ड बनाना चाहिये। कुण्डके पूर्व दिशामें चार हाथ लम्बी-चौड़ी वेदी बनाये, जो एक हाथ ऊँची हो। उसमें सभी देवताओंको स्थापित करे। मण्डपकी भूमिको गोबर-मिट्टीसे अच्छी तरह लीपकर
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth