भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
स्वेच्छायज्ञमें बहुत समय लगता है और बीचमें अनेक प्रकारके विघ्न भी उत्पन्न हो जाते हैं। धन और शरीरकी स्थिरताका कुछ भी भरोसा नहीं है। इसलिये संक्षेपसे ही यज्ञ करना चाहिये।'
यज्ञ सम्पन्न कर अच्छी प्रकारसे महोत्सव मनाना चाहिये। सभी ब्राह्मणोंको कटक, कुण्डल, वस्त्र, दक्षिणा, एक सौ गाय, एक सौ घोड़े और स्वर्ण आदि प्रदान करना चाहिये तथा पुरोहितकी पूजा करनी चाहिये। दीनों, अन्धों तथा कुपणों आदिको भोजन देकर अन्तमें कलशोंके जलसे
अवभूथ स्नान करे और ब्राह्मण यजमानका अभिषेक करे। इस विधिसे जो राजा या व्यक्ति कोटिहोम करता है, वह आरोग्य, पुत्र, राज्यवृद्धि, ऐश्वर्य, धन-धान्य प्राप्तकर सभी प्रकारसे संतुष्ट रहता है तथा उसको ग्रहपीड़ा भी नहीं भोगनी पड़ती। राज्यमें अनावृष्टि, उत्पात, महामारी, दुर्भिक्ष आदि कभी नहीं होते। सभी तरहके पाप और ग्रहोंकी पीड़ाको दूर करनेवाला शान्तिदायक यह कोटिहोम है, इसको करनेवाला व्यक्ति इन्द्रलोकको प्राप्त कर लेता है*। (अध्याय १४२)
महाशान्ति-विधान
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं भगवान् शंकरद्वारा कही गयी महाशान्तिका विधान बतलाता हूँ, यह राजाओंके लिये कल्याणकारी है तथा भयंकर विघ्नोंको दूर करनेवाली है। इस महाशान्तिको राजाके अभिषेक, यात्रा तथा दुःस्वप्नके समय, दुर्निमित्तमें, ग्रहोंकी प्रतिकूलतामें, बिजली और उल्काके गिरनेपर, जन्म-नक्षत्रमें केतुके उदय होनेपर, पृथ्वी-कम्पन और प्रसूतिकालमें, मूलगण्डान्तमें, मिथुन संततिके उत्पत्तिकालमें, राजाके छत्र अथवा ध्वजके अपने स्थानसे पतनके समय, काक, उलूक और कबूतरके घरमें प्रवेश करनेपर, क्रूर ग्रहकी दृष्टि पड़नेपर या जन्मके समय क्रूर ग्रहोंके योग होनेपर, लग्नकुण्डलीमें द्वादश, चतुर्थ और अष्टम स्थानमें बृहस्पति, शनि, सूर्य एवं मंगलके स्थित होनेपर तथा युद्धके समय, वस्त्र, आयुध, मणि, केश, गौ, अश्वके विनाशके समय, रात्रिमें इन्द्रधनुष दिखायी पड़नेपर, घरके तुला-भंगके समय तथा सूर्य और चन्द्र-ग्रहण आदिके
समयमें यह महाशान्ति प्रशस्त मानी गयी है। इसके करनेसे सभी दुर्निमित्त शान्त हो जाते हैं। पाण्डव! उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा शीलसम्पन्न वैदिक ब्राह्मणोंसे इस महाशान्तिको कराना चाहिये। विशेषरूपसे अथर्ववेद, यजुर्वेद तथा ऋग्वेदके ज्ञाता, पवित्र ज्ञानसम्पन्न, जप-होमपरायण और अनेक कुच्छादि व्रतोंके द्वारा शुद्ध व्यक्ति इसमें प्रशस्त माने गये हैं। प्रथम भगवान्की आराधना करके क्रियाका आरम्भ करना चाहिये।
दस या बारह हाथका एक सुन्दर मण्डप बनाकर उसके मध्यमें चार हाथकी वेदी बनाये और आग्नेय दिशामें एक हाथ प्रमाणवाला एक सुन्दर कुण्ड बनवाये एवं वह कुण्ड तीन मेखलाओंसे युक्त तथा योनिसे विभूषित होना चाहिये। मण्डपको चन्दन, माला, तोरण आदिसे अलंकृत कर गोबरसे लीपना चाहिये। मण्डपमें वेदीके ऊपर आग्नेयादि कोणोंमें क्रमशः चार और बीचमें पाँचवाँ कलश स्थापित करना चाहिये।
- वर्तमान समयके लिये यह विषय अत्यन्त उपयोगी है। सम्पन्न, धर्मात्मा तथा राजनीतिज्ञोंको इसका आश्रय लेकर विश्व-कल्याण करना चाहिये। आजकल विश्वमें अनेक दैवी और सामाजिक उपद्रव व्याप्त हैं। कोटिहोमपर कोटिरुद्रहोमात्मक-पद्धति आदि अनेक ग्रन्थ प्रकाशित हैं, किंतु यह प्रकरण भी उपयोगी है।
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