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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 572, कुल 654 में से

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पृष्ठ 572
  • उत्तरपर्व *

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कलशोंको पञ्चपल्लवों, सर्वौषधि, पञ्चरत्न, रोचना, चन्दन, सप्तमृत्तिका, धान्य तथा पुण्य तीर्थके जल, नारिकेल आदिसे भलीभाँति स्थापित करना चाहिये। ब्रह्मकूर्च-विधानसे पञ्चगव्यका निर्माण करे। इसके अनन्तर वैदिक मन्त्रोंसे कलशोंको अभिमन्त्रित कर उनका पूजन करे। मध्य कुम्भको रुद्रकुम्भ कहा जाता है।

इसके बाद स्वस्तिवाचन करना चाहिये। अनन्तर अग्निकार्य सम्पन्न करे। 'अग्नि दूतं०' (यजु० २२।१७) इस मन्त्रके द्वारा कुण्डमें अग्नि स्थापित करे। 'हिरण्यगर्भः०' (यजु० १३।४) इस मन्त्रसे ब्रह्मासनको स्थापित करे। अग्निपूजनके अनन्तर आज्य (घृत)-का संस्कार करे, अनन्तर विधिपूर्वक यज्ञीय द्रव्योंको यथावत् स्थापित करना चाहिये। इसके बाद पुरुषसूक्त (यजु० ३१।१—१६)-का पाठ करते हुए चरुका निर्माण करे। उसके सिद्ध होनेके बाद पृथ्वीपर स्थापित करे। इसके पश्चात् शमीकी अठारह तथा पलाशकी सात समिधाओंको अग्नि प्रज्वलित करनेके लिये कुण्डमें डाले। आधार और आज्य-भाग-संज्ञक हवन करनेके बाद 'जातवेदसे०' (ऋ० १।१९।१) इस ऋचाके द्वारा घीकी सात आहुतियाँ प्रदान करे। पुनः 'जातवेदसे०' इस मन्त्रसे स्थलीपाकद्रव्यका हवन करे। 'तरत् स मन्दी०' (ऋ० १।५८।१—४) इस सूक्तसे चार बार हवन करे। इसके बाद 'यमाय सोमं' (ऋ० १०।१४।१३) इस मन्त्रसे 'स्वाहा' शब्दका प्रयोगकर सात आहुतियाँ दे। तदनन्तर 'इदं विष्णुर्बि०' (यजु० ५।१५) इस मन्त्रसे सात बार आहुति दे। फिर २७ नक्षत्रोंके

लिये २७ आहुतियाँ दे। अनन्तर 'यत्कर्मणा०' इसके द्वारा हवन करनेके बाद स्विष्टकृत् हवन करे। तदनन्तर घृतसहित तिलसे ग्रहहोम करे। इसके बाद प्रायश्चित्त-निमित्तक हवन करके होम-कर्मको समाप्त करे। तदनन्तर श्रेष्ठ द्विज यजमानके दुर्निमित्तकी शान्तिके लिये पाँच कलशोंके जलसे मन्त्रोंके द्वारा यथाक्रम अभिषेक करे। 'सहस्त्राक्षेण०' (ऋ० १०।१६१।३) इस मन्त्रसे प्रथम कलशके जलसे, 'शतायुषा०' द्वारा द्वितीय कलशके जलसे, 'सजोषा०' (ऋ० ३।४७।२) इस मन्त्रसे तृतीय कलशके जलसे, 'विश्वानि देव०' (ऋ० ५।८२।५) इस मन्त्रसे चतुर्थ कलशके जलसे तथा 'ऋतमस्तु०' इस मन्त्रसे पञ्चम कलशके जलसे अभिषेक करे। इसके बाद 'नमोऽस्तु सर्वभूतेभ्यः०' इस मन्त्रसे दिशाओंको बलि-नैवेद्य प्रदान करे।

यजमानके स्नान करनेके समय ब्राह्मणगण शान्तिका पाठ करें। चारों ओर शान्ति-जलसे जलकी धारा गिराये। अन्तमें पुण्याहवाचनपूर्वक शान्तिकर्मको सम्पन्न करे। ब्राह्मणोंको यथाशक्ति भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, शय्या, आसन एवं दक्षिणा दे। दीन, अनाथ, विशिष्ट श्रोत्रियोंको भी भोजन आदि प्रदान करना चाहिये। ऐसा करनेसे आयुकी वृद्धि और शत्रुपर तत्क्षण विजय प्राप्त होती है तथा पुत्र-लाभ होता है। जैसे शस्त्रोंका प्रहार कवचसे हट जाता है, वैसे ही दैवी विघ्न भी इस शान्तिकर्मसे दूर हो जाते हैं। अहिंसक, इन्द्रियसंयमी, धर्मसे धन अर्जित करनेवाला, दया और दक्षिणासे युक्त व्यक्तिके लिये सभी ग्रह अनुकूल हो जाते हैं*। (अध्याय १४३)

  • अहिंसकस्य दान्तस्य धर्माजितधनस्य च। दयादाक्षिण्ययुक्तस्य सर्वे सानुग्रहा ग्रहाः ॥ (उत्तरपर्व १४३।४५)

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