भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- उत्तरपर्व *
५५९
पञ्चपल्लवोंसे सुसज्जित जलपूर्ण चौदह कलशोंको स्थापित करना चाहिये। मण्डपके ऊपर वितान और तोरण लगाने चाहिये। सब सामग्री एकत्रित कर पुण्याहवाचन, स्वस्तिवाचन, जयशब्दपूर्वक शुद्ध दिनसे पुरोहितको हवन प्रारम्भ करना चाहिये। मण्डपके पूर्वमें ब्रह्मा, मध्यमें विष्णु, पश्चिममें रुद्र, उत्तरमें वसु, ईशानमें ग्रह, अग्निकोणमें मरुत् और शेष दिशाओंमें लोकपालोंकी (वेदियोंपर) स्थापना करे। गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे वैदिक और पौराणिक मन्त्रोंद्वारा सबका अलग-अलग पूजन और प्रार्थना करे।
इसके पश्चात् वेदपाठी ब्राह्मणोंसहित विधानपूर्वक कुण्डका संस्कार करे। कुण्डमें अग्नि प्रज्वलितकर उस अग्निका नाम घृतार्चिष रखे। विद्यावृद्ध, वयोवृद्ध, गृहस्थ, जितेन्द्रिय, स्वकर्मनिष्ठ शुद्ध और ज्ञानशक्तिसम्पन्न एक सौ ब्राह्मणोंको हवनके लिये नियुक्त करे अथवा जिस संख्यामें उत्तम ब्राह्मण उपलब्ध हों, उनका ही वरण करना चाहिये। इसके बाद पञ्चमुख अग्निका ध्यान करना चाहिये। नामसहित उनकी सात जिह्वाओंकी पूजा करनी चाहिये। धुआँयुक्त अग्निमें हवन करना व्यर्थ होता है। इसलिये प्रज्वलित अग्निमें ही हवन करना चाहिये।
ऋग्वेदी ब्राह्मणोंको पूर्वभिमुख, यजुर्वेदीको उत्तराभिमुख, सामवेदीको पश्चिमाभिमुख और अथर्वणवेदी ब्राह्मणको दक्षिणाभिमुख बैठकर आधार और आज्यभागकी आहुतियाँ देनी चाहिये। पहले ब्रह्माका स्थापन कर इस कर्मको आरम्भ करना चाहिये। आदिमें 'प्रणव' लगाकर अन्तमें 'स्वाहा' शब्दका उच्चारण कर व्याहतियोंसे हवन करना चाहिये। घी, काला तिल तथा जौ मिलाकर पलाशकी समिधाओंसे कोटिहोम करना चाहिये। एक हजार आहुति पूर्ण होनेपर पूर्णाहुति करनी चाहिये। पुनः उसी प्रकार हवन करना चाहिये। इस विधिसे कोटिहोम
करना चाहिये। इसमें दस हजार बार पूर्णाहुतियाँ दी जाती हैं। इसमें सभी ब्राह्मणों और यजमानको काम, क्रोध आदि दोषोंसे दूर रहना चाहिये।
कोटिहोमकी विधिको सुनकर राजा संवरणने कहा कि महर्षे! इस कोटिहोममें बहुत अधिक समय लगेगा, इतने दिनतक संयमसे रहना बहुत ही कठिन कार्य है। इसलिये कृपाकर आप कोटिहोमकी संक्षिप्त विधि बतानेका कष्ट करें, जिससे कम समयमें यह निर्विघ्न पूर्ण हो जाय।
राजाके इस प्रकारके वचनको सुनकर सनक मुनिने कहा—'राजन्! कोटिहोम चार प्रकारका होता है—शतमुख, दशमुख, द्विमुख और एकमुख। समयानुसार इन चारोंमेंसे जो भी होम हो सके वही करना चाहिये। एक हाथ प्रमाणवाले उत्तम एक सौ कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्डपर एक-एक ब्राह्मणको अथवा समय कम रहनेपर प्रत्येक कुण्डपर दस-दस ब्राह्मणोंको हवनके लिये नियुक्त करे। एक कुण्डमें अग्निका संस्कार कर उसी अग्निको अन्य कुण्डोंमें भी प्रज्वलित करना चाहिये। इस विधिद्वारा जो हवन किया जाता है, उससे एक ही कोटिहोम होता है, जो शतमुख होम कहलाता है। यदि समयका अभाव न हो तो दस कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्डपर बीस-बीस ब्राह्मण हवनके लिये नियुक्त करने चाहिये। यह दशमुख नामक कोटिहोम है। यदि महीने-दो-महीनेका समय हो तो दो कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्डपर पचास-पचास ब्राह्मणोंको हवनके लिये आमन्त्रित करना चाहिये। यह द्विमुख कोटिहोम है। अधिक-से-अधिक समय हो तो एक कुण्डमें अग्नि-स्थापन कर उत्तम कुलोत्पन्न वेदवेत्ता सदाचारी ब्राह्मणोंसे हवन कराना चाहिये। इस हवनमें ब्राह्मणोंकी संख्याका कोई नियम नहीं और समयकी सीमा भी निश्चित नहीं है। यह एकमुख कोटिहोम स्वेच्छायज्ञ कहलाता है। इस
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
५६०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
स्वेच्छायज्ञमें बहुत समय लगता है और बीचमें अनेक प्रकारके विघ्न भी उत्पन्न हो जाते हैं। धन और शरीरकी स्थिरताका कुछ भी भरोसा नहीं है। इसलिये संक्षेपसे ही यज्ञ करना चाहिये।'
यज्ञ सम्पन्न कर अच्छी प्रकारसे महोत्सव मनाना चाहिये। सभी ब्राह्मणोंको कटक, कुण्डल, वस्त्र, दक्षिणा, एक सौ गाय, एक सौ घोड़े और स्वर्ण आदि प्रदान करना चाहिये तथा पुरोहितकी पूजा करनी चाहिये। दीनों, अन्धों तथा कुपणों आदिको भोजन देकर अन्तमें कलशोंके जलसे
अवभूथ स्नान करे और ब्राह्मण यजमानका अभिषेक करे। इस विधिसे जो राजा या व्यक्ति कोटिहोम करता है, वह आरोग्य, पुत्र, राज्यवृद्धि, ऐश्वर्य, धन-धान्य प्राप्तकर सभी प्रकारसे संतुष्ट रहता है तथा उसको ग्रहपीड़ा भी नहीं भोगनी पड़ती। राज्यमें अनावृष्टि, उत्पात, महामारी, दुर्भिक्ष आदि कभी नहीं होते। सभी तरहके पाप और ग्रहोंकी पीड़ाको दूर करनेवाला शान्तिदायक यह कोटिहोम है, इसको करनेवाला व्यक्ति इन्द्रलोकको प्राप्त कर लेता है*। (अध्याय १४२)
महाशान्ति-विधान
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं भगवान् शंकरद्वारा कही गयी महाशान्तिका विधान बतलाता हूँ, यह राजाओंके लिये कल्याणकारी है तथा भयंकर विघ्नोंको दूर करनेवाली है। इस महाशान्तिको राजाके अभिषेक, यात्रा तथा दुःस्वप्नके समय, दुर्निमित्तमें, ग्रहोंकी प्रतिकूलतामें, बिजली और उल्काके गिरनेपर, जन्म-नक्षत्रमें केतुके उदय होनेपर, पृथ्वी-कम्पन और प्रसूतिकालमें, मूलगण्डान्तमें, मिथुन संततिके उत्पत्तिकालमें, राजाके छत्र अथवा ध्वजके अपने स्थानसे पतनके समय, काक, उलूक और कबूतरके घरमें प्रवेश करनेपर, क्रूर ग्रहकी दृष्टि पड़नेपर या जन्मके समय क्रूर ग्रहोंके योग होनेपर, लग्नकुण्डलीमें द्वादश, चतुर्थ और अष्टम स्थानमें बृहस्पति, शनि, सूर्य एवं मंगलके स्थित होनेपर तथा युद्धके समय, वस्त्र, आयुध, मणि, केश, गौ, अश्वके विनाशके समय, रात्रिमें इन्द्रधनुष दिखायी पड़नेपर, घरके तुला-भंगके समय तथा सूर्य और चन्द्र-ग्रहण आदिके
समयमें यह महाशान्ति प्रशस्त मानी गयी है। इसके करनेसे सभी दुर्निमित्त शान्त हो जाते हैं। पाण्डव! उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा शीलसम्पन्न वैदिक ब्राह्मणोंसे इस महाशान्तिको कराना चाहिये। विशेषरूपसे अथर्ववेद, यजुर्वेद तथा ऋग्वेदके ज्ञाता, पवित्र ज्ञानसम्पन्न, जप-होमपरायण और अनेक कुच्छादि व्रतोंके द्वारा शुद्ध व्यक्ति इसमें प्रशस्त माने गये हैं। प्रथम भगवान्की आराधना करके क्रियाका आरम्भ करना चाहिये।
दस या बारह हाथका एक सुन्दर मण्डप बनाकर उसके मध्यमें चार हाथकी वेदी बनाये और आग्नेय दिशामें एक हाथ प्रमाणवाला एक सुन्दर कुण्ड बनवाये एवं वह कुण्ड तीन मेखलाओंसे युक्त तथा योनिसे विभूषित होना चाहिये। मण्डपको चन्दन, माला, तोरण आदिसे अलंकृत कर गोबरसे लीपना चाहिये। मण्डपमें वेदीके ऊपर आग्नेयादि कोणोंमें क्रमशः चार और बीचमें पाँचवाँ कलश स्थापित करना चाहिये।
- वर्तमान समयके लिये यह विषय अत्यन्त उपयोगी है। सम्पन्न, धर्मात्मा तथा राजनीतिज्ञोंको इसका आश्रय लेकर विश्व-कल्याण करना चाहिये। आजकल विश्वमें अनेक दैवी और सामाजिक उपद्रव व्याप्त हैं। कोटिहोमपर कोटिरुद्रहोमात्मक-पद्धति आदि अनेक ग्रन्थ प्रकाशित हैं, किंतु यह प्रकरण भी उपयोगी है।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
५६१
कलशोंको पञ्चपल्लवों, सर्वौषधि, पञ्चरत्न, रोचना, चन्दन, सप्तमृत्तिका, धान्य तथा पुण्य तीर्थके जल, नारिकेल आदिसे भलीभाँति स्थापित करना चाहिये। ब्रह्मकूर्च-विधानसे पञ्चगव्यका निर्माण करे। इसके अनन्तर वैदिक मन्त्रोंसे कलशोंको अभिमन्त्रित कर उनका पूजन करे। मध्य कुम्भको रुद्रकुम्भ कहा जाता है।
इसके बाद स्वस्तिवाचन करना चाहिये। अनन्तर अग्निकार्य सम्पन्न करे। 'अग्नि दूतं०' (यजु० २२।१७) इस मन्त्रके द्वारा कुण्डमें अग्नि स्थापित करे। 'हिरण्यगर्भः०' (यजु० १३।४) इस मन्त्रसे ब्रह्मासनको स्थापित करे। अग्निपूजनके अनन्तर आज्य (घृत)-का संस्कार करे, अनन्तर विधिपूर्वक यज्ञीय द्रव्योंको यथावत् स्थापित करना चाहिये। इसके बाद पुरुषसूक्त (यजु० ३१।१—१६)-का पाठ करते हुए चरुका निर्माण करे। उसके सिद्ध होनेके बाद पृथ्वीपर स्थापित करे। इसके पश्चात् शमीकी अठारह तथा पलाशकी सात समिधाओंको अग्नि प्रज्वलित करनेके लिये कुण्डमें डाले। आधार और आज्य-भाग-संज्ञक हवन करनेके बाद 'जातवेदसे०' (ऋ० १।१९।१) इस ऋचाके द्वारा घीकी सात आहुतियाँ प्रदान करे। पुनः 'जातवेदसे०' इस मन्त्रसे स्थलीपाकद्रव्यका हवन करे। 'तरत् स मन्दी०' (ऋ० १।५८।१—४) इस सूक्तसे चार बार हवन करे। इसके बाद 'यमाय सोमं' (ऋ० १०।१४।१३) इस मन्त्रसे 'स्वाहा' शब्दका प्रयोगकर सात आहुतियाँ दे। तदनन्तर 'इदं विष्णुर्बि०' (यजु० ५।१५) इस मन्त्रसे सात बार आहुति दे। फिर २७ नक्षत्रोंके
लिये २७ आहुतियाँ दे। अनन्तर 'यत्कर्मणा०' इसके द्वारा हवन करनेके बाद स्विष्टकृत् हवन करे। तदनन्तर घृतसहित तिलसे ग्रहहोम करे। इसके बाद प्रायश्चित्त-निमित्तक हवन करके होम-कर्मको समाप्त करे। तदनन्तर श्रेष्ठ द्विज यजमानके दुर्निमित्तकी शान्तिके लिये पाँच कलशोंके जलसे मन्त्रोंके द्वारा यथाक्रम अभिषेक करे। 'सहस्त्राक्षेण०' (ऋ० १०।१६१।३) इस मन्त्रसे प्रथम कलशके जलसे, 'शतायुषा०' द्वारा द्वितीय कलशके जलसे, 'सजोषा०' (ऋ० ३।४७।२) इस मन्त्रसे तृतीय कलशके जलसे, 'विश्वानि देव०' (ऋ० ५।८२।५) इस मन्त्रसे चतुर्थ कलशके जलसे तथा 'ऋतमस्तु०' इस मन्त्रसे पञ्चम कलशके जलसे अभिषेक करे। इसके बाद 'नमोऽस्तु सर्वभूतेभ्यः०' इस मन्त्रसे दिशाओंको बलि-नैवेद्य प्रदान करे।
यजमानके स्नान करनेके समय ब्राह्मणगण शान्तिका पाठ करें। चारों ओर शान्ति-जलसे जलकी धारा गिराये। अन्तमें पुण्याहवाचनपूर्वक शान्तिकर्मको सम्पन्न करे। ब्राह्मणोंको यथाशक्ति भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, शय्या, आसन एवं दक्षिणा दे। दीन, अनाथ, विशिष्ट श्रोत्रियोंको भी भोजन आदि प्रदान करना चाहिये। ऐसा करनेसे आयुकी वृद्धि और शत्रुपर तत्क्षण विजय प्राप्त होती है तथा पुत्र-लाभ होता है। जैसे शस्त्रोंका प्रहार कवचसे हट जाता है, वैसे ही दैवी विघ्न भी इस शान्तिकर्मसे दूर हो जाते हैं। अहिंसक, इन्द्रियसंयमी, धर्मसे धन अर्जित करनेवाला, दया और दक्षिणासे युक्त व्यक्तिके लिये सभी ग्रह अनुकूल हो जाते हैं*। (अध्याय १४३)
- अहिंसकस्य दान्तस्य धर्माजितधनस्य च। दयादाक्षिण्ययुक्तस्य सर्वे सानुग्रहा ग्रहाः ॥ (उत्तरपर्व १४३।४५)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
५६२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
विनायक-शान्ति१
महाराज युधिष्ठिरने कहा—देवेश! अब आप विनायक-शान्तिकी विधि मुझे बतायें, जिसके करनेसे सभी मानव समस्त आपत्तियोंसे मुक्त हो जाते हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजेन्द्र! विनायकके प्रिय श्रेष्ठ शान्तिका मैं वर्णन करता हूँ, इसके आचरणसे सभी अरिष्ट नष्ट हो जाते हैं। यह विनायक-शान्ति सम्पूर्ण विघ्नोंको दूर करनेके लिये की जाती है। स्वप्रमें जलमें अवगाहन करना, मुण्डित सिरों तथा गेरुआ वस्त्रको देखना, मस्तकरहित शव, बिना किसी कारणके ही दुःखी होना, कार्यमें असफल हो जाना इत्यादि विनायकद्वारा गृहीत होनेपर ही दिखायी देते हैं। विनायकद्वारा गृहीत हो जानेपर राजपुत्र राज्यको प्राप्त नहीं कर सकता, कुमारी पति नहीं प्राप्त कर सकती, गर्भिणी पुत्रको और श्रोत्रिय आचार्यत्वको प्राप्त नहीं कर पाता। विद्यार्थी पढ़ नहीं पाता, व्यापारी व्यापारमें लाभ नहीं पाता और कृषक कृषिकार्यमें सफल नहीं होता।
इसलिये इन विघ्नोंको दूर करनेके लिये पुण्य दिनमें क्षपन-कार्य करना चाहिये। पीले सरसोंकी खली, घृत और सुगन्धित कुंकुमका उबटन लगाकर स्नान कर पवित्र हो जाय। ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराये। विधिपूर्वक कलश-स्थापन करे और ब्राह्मण अभिमन्त्रित जलके द्वारा यजमानका अभिषेक करे और इस प्रकार कहे—
सहस्त्राक्षं शतधारमृषिणा वचनं कृतम्। तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्यः पुनन्तु ते ॥ भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः। भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः ॥
यते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्धनि। ललाटे कर्णयोरक्षगोरापस्तदघ्नन्तु ते सदा ॥
(उत्तरपर्व १४४।१२—१४)
—मैं तुम्हें अभिषिक्त कर रहा हूँ, पावमानी ऋचाओंकी अधिष्ठातृदेवता तुम्हें पवित्र करें। महाराजा वरुण, भगवान् सूर्य, बृहस्पति, इन्द्र, वायु तथा सप्तर्षिगण अपना-अपना तेज तुममें आधान करें। तुम्हारे केशों, सीमन्त, मस्तक, ललाट, कानों एवं आँखोंमें जो भी दौर्भाग्य है, उसको ये अप् देवता नष्ट करें।
अनन्तर कुशाको दक्षिण हाथमें ग्रहण कर सरसोंके तेलसे हवन करे। मित, सम्मित, साल, कालकंटक, कृष्माण्ड तथा राजपुत्रके अन्तमें स्वाहा समन्वित कर हवन करे। चतुष्पथपर कुश बिछाकर सूपमें इनके निमित्त बलि-नैवेद्य अर्पण करे। खिले हुए फूल तथा दूर्वासे अर्घ्य दे। मण्डलमें अर्घ्य प्रदानकर विनायककी माता अम्बिकाकी पूजा करे और यह प्रार्थना करे—मातः! आप मुझे रूप, यश, ऐश्वर्य, पुत्र तथा धन प्रदान करें और मेरी समस्त कामनाओंको पूर्ण करें। अनन्तर सफेद वस्त्र, सफेद माला और श्वेत चन्दन धारणकर ब्राह्मणको भोजन कराये और गुरुको दो वस्त्र प्रदान करे। इस प्रकार ग्रहोंकी और विनायककी विधिपूर्वक पूजा करनेसे सम्पूर्ण कर्मके फलकी प्राप्ति होती है और लक्ष्मीकी भी प्राप्ति हो जाती है। भगवान् सूर्य, कार्तिकेय एवं महागणपतिकी पूजा करके मनुष्य सभी सिद्धियोंको प्राप्त कर लेता है।
(अध्याय १४४)
१—यह प्रकरण याज्ञवल्क्य आदि प्रायः अधिकांश स्मृतियोंमें और पुराणोंमें भी इसी प्रकार प्राप्त होता है।
२—रूपं देहि यशो देहि भगं भगवति देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ (उत्तरपर्व १४४।२१)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
५६३
नक्षत्रार्चन-विधि ( रोगावलचक्र )
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! एक बार कौशिकमुनि अग्निकोत्र करनेके बाद सुखपूर्वक बैठे हुए थे। उसी समय महर्षि गगने उनसे पूछा—‘ब्रह्मन्! बंदीगृहमें निरुद्ध हो अथवा विषम परिस्थितियोंमें अवरुद्ध, दस्यु, शत्रु या हिंस्र पशुओंसे घिरा हो तथा व्याधियोंसे पीड़ित तो ऐसे व्यक्तिकी कैसे मुक्ति हो सकती है। इसे आप मुझे बतलायें।’
कौशिकमुनि बोले—गर्भाधानके समय, जन्म-नक्षत्रमें, मृत्यु-सम्बन्धी ज्ञान होनेपर जिसको रोग-व्याधि उत्पन्न हो जाती है, उसे कष्ट तो होता ही है, उसकी मृत्यु भी सम्भाव्य है। यदि कृतिका नक्षत्रमें कोई व्याधि होती है तो वह पीड़ा नौ राततक बनी रहती है। रोहिणीमें तीन राततक, मृगशिरामें पाँच राततक और यदि आर्द्रामें रोग उत्पन्न हो तो वह व्याधि प्राण-वियोगिनी हो जाती है। पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्रमें सात रात, आश्लेषामें नौ रात, मघामें बीस दिन, पूर्वाफाल्गुनीमें दो मास, उत्तराफाल्गुनीमें तीन पक्ष (पैंतालीस दिन), हस्तमें स्वल्पकालिक पीड़ा, चित्रामें आधे मास, स्वातीमें दो मास, विशाखामें बीस दिन, अनुराधामें दस दिन, ज्येष्ठामें आधे मास और मूलमें मृत्यु हो जाती है। पूर्वाषाढ़ामें पंद्रह दिन, उत्तराषाढ़ामें बीस दिन, श्रवणमें दो मास, धनिष्ठामें आधा मास, शतभिषामें दस दिन, पूर्वाभाद्रपदमें नौ दिन, उत्तराभाद्रपदमें पंद्रह दिन, रेवतीमें दस दिन तथा अश्विनीमें एक दिन-रात कष्ट होता है।
मुने! कुछ विशिष्ट नक्षत्रोंमें व्याधि उत्पन्न
होनेपर मनुष्यके प्राणतक भी चले जाते हैं*, इसमें संदेह नहीं। इसकी विशेष जानकारीके लिये ज्योतिषियोंसे भी परामर्श करना चाहिये।
रोगके प्रारम्भिक नक्षत्रका ज्ञान हो जानेपर उस नक्षत्रके अधिदेवताके निमित्त निर्दिष्ट द्रव्योद्धार हवन करनेसे रोग-व्याधिकी शान्ति हो जाती है। व्याधि नक्षत्रके किस चरणमें उत्पन्न हुई है, इसका ठीक पता लगाकर आपत्तिजनक स्थितियोंमें व्याधिसे मुक्तिके लिये उस नक्षत्रके स्वामीके मन्त्रोंसे अभीष्ट समिधाद्धार हवन करना चाहिये। अश्विनी नक्षत्रमें क्षीरी (दूधवाले—वट, पीपल, खिरनी आदि) वृक्षोंकी समिधासे अश्विनीकुमारोंके मन्त्रोंसे हवन करना चाहिये। भरणीमें ‘यमदैवत यमाय स्वाहा०’ इस मन्त्रसे घी, मधु और तिलसे हवन करना चाहिये। इसी प्रकार कृतिकामें भी अग्निके मन्त्रोंसे हवन करना चाहिये। रोहिणीमें प्रजापतिके मन्त्रसे, मृगशिरामें घीसे, पुनर्वसुमें दितिदेवीके लिये दूध और घी-मिश्रित आहुति प्रदान करनी चाहिये। पुष्यमें बृहस्पतिके मन्त्रोंसे घी और दूधद्धार, आश्लेषाके देवता सर्प हैं, अतः बड़के दूध और घीसे मिश्रित आहुति देनी चाहिये। इसी प्रकार स्वाती, मूल आदि सभी नक्षत्रोंमें घी-मिश्रित आहुति देनी चाहिये।
मुने! ब्रह्माजीने यह बतलाया है कि विधिपूर्वक गायत्री-मन्त्रद्धार भी प्रायः एक सहस्र (१,०००) घृतकी आहुतियाँ देनेपर सम्पूर्ण ज्वरों एवं व्याधियोंका सद्यः उपशमन हो सकता है। क्योंकि गायत्रीका अर्थ ही है कि गान, हवन, पूजनद्धार त्राण करनेवाली।
(अध्याय १४५)
- ज्योतिर्निबन्ध आदि ज्योतिष-ग्रंथोंके अनुसार आर्द्रा, आश्लेषा, पू०फा०, स्वाती, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ा और पू०भा० में मृत्युका भय होता है या बीमारी स्थिर हो जाती है। अतः इसकी निवृत्तिके लिये तत्त्वं मन्त्र आदिका जप-हवन करना चाहिये।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
५६४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अपराधशतशमन-व्रत
महर्षि वसिष्ठजीने राजा इक्ष्वाकुसे कहा— राजन्! अब आपको एक व्रत बतला रहा हूँ, जिससे महाफलकी प्राप्ति होती है और सैकड़ों दोष—पापोंका शमन हो जाता है।
राजा इक्ष्वाकुने पूछा—ब्रह्मन्! मुख्यरूपसे सौ अपराध या दोष-पाप कौन-कौन हैं और वह व्रत कौन-सा है, जिसके अनुष्ठानमात्रसे उनकी शान्ति हो जाती है। इस व्रतमें किस देवताकी पूजा होती है और किस समय यह व्रत किया जाता है, आप बतलानेकी कृपा करें।
महर्षि वसिष्ठ बोले—महाबाहो! अपराधशतशमन-व्रतको सुनो, जिसका अनुष्ठान करनेमात्रसे मनुष्यको सभी प्रकारकी कामनाएँ और मुक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं। कृत-अकृत सभी गुरुतर पाप रूढ़ीकी राशिके समान जलकर भस्म हो जाते हैं। राजन्! अब आप इन अपराधोंके नाम और लक्षणको सुनें—अनाश्रमित्व—चारों आश्रमोंसे बाहर रहकर स्वच्छन्द नास्तिकवृत्ति अपनाना, अनग्रिता—अग्रिहोत्र, हवन आदि सभी कार्योंका परित्याग, व्रतहीनता—कोई भी सत्य, ब्रह्मचर्य और एकादशी आदि व्रतोंका पालन न करना, अदातुत्व—कभी भी कुछ भी अन्न, धन या आशीर्वाद आदि न देना, अशौच, निर्दयता, लोभ, क्षमाशून्यता, जनपीड़ा, प्रपञ्चमें पड़ना, अमङ्गल, व्रतभङ्ग, नास्तिकता, वेदनिन्दा, कठोरता, असत्यता, हिंसा, चोरी, इन्द्रिय-परायणता, मनको वशमें न रखना, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, दम्भ, शठता, धूर्तता, कटुभाषण, प्रमाद, स्त्री, पुत्र, माता आदिका पालन न करना, अपूज्यकी पूजा करना, श्राद्धका त्याग, जप न करना, बलिवैश्वदेव तथा पञ्चयज्ञका त्याग, संध्या, तर्पण, हवन आदि नित्यकर्मोंका परित्याग, अग्रिका बुझाना, ऋतुकालके बिना ही
स्त्री-सम्पर्क, पर्व आदिमें स्त्री-सहवास, चुगली, दूसरेकी स्त्रीके साथ गमन, वेश्यागामिता, अपात्रको दान देना, अल्पदान, अन्त्यजसङ्ग, माता-पिताकी सेवा न करना, सबसे झगड़ा करना, पुराण और स्मृतियोंका अनादर करना, अभक्ष्य-भक्षण, स्वामि-द्रोह, बिना विचारे कार्य करना, कृषि-कार्य करना, भार्यासंग्रह, मनपर विजय न प्राप्त करना, विद्याकी विस्मृति, शास्त्रका त्याग करना, ऋण लेकर वापस न करना, चित्रकर्म करना, सदा कामनाओंका दास होना, भार्या, पुत्र एवं कन्या आदिका विक्रय करना, पशु-मैथुन, इन्धनार्थ वृक्ष काटना, बिलोंमें पानी आदि डालना, तडागादिके जलको दूषित करना, विद्याका विक्रय, स्ववृत्तिका परित्याग, याचना, कुमित्रता, स्त्री-वध, गो-वध, मित्र-वध, भ्रूण-हत्या, पौरौहित्य, दूसरेका अन्न और शूद्रके अन्नको ग्रहण करना, शूद्रका अग्रिकर्म सम्पन्न करना, विधिविहीन कर्मका निष्पादन, कुपुत्रता, विद्वान् होनेपर याचना करना, वाचालता, प्रतिग्रह लेना, श्रौत-संस्कारहीनता, आर्त व्यक्तिका दुःख दूर न करना, ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्णचोरी, गुरुपत्नीगमन तथा पातकियोंके साथ सम्बन्ध स्थापित करना—ये अपराध हैं। अन्य तत्त्ववेताओंने भी विविध प्रकारके अपराधोंको कहा है।
अनघ! भगवान् सत्येशकी पूजा करनेसे तत्क्षण सभी प्रकारके अपराध नष्ट हो जाते हैं। मनुष्योंद्वारा व्रत और पूजन करनेसे भगवान् स्वयं उसके वशमें हो जाते हैं। ये जगत्पति भगवान् विष्णु लक्ष्मीके साथ सत्यरूपी ध्वजके ऊपर स्थित रहते हैं। इनके पूर्वमें वामदेव, दक्षिणमें नृसिंहभगवान्, पश्चिममें भगवान् कपिल, उत्तरमें वराह तथा ऊर्ध्वमें अच्युत स्थित रहते हैं। इन्हें ही ब्रह्मपञ्चक जानना चाहिये। ये ही सत्येश हैं, इन्हींकी सदैव
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
५६५
पूजा करनी चाहिये। ये सत्येशभगवान् पद्म, कौमोदकी गदा, पाञ्चजन्य शङ्ख तथा सुदर्शन चक्र धारण किये रहते हैं। इनके चरणकमलके अग्रभागसे पवित्र गङ्गाका प्रादुर्भाव हुआ है। इनकी आठ शक्तियाँ हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—जया, विजया, जयन्ती, पापनाशिनी, उन्मीलनी, वंजुली, त्रिस्पृशा और विवर्धना। वे भगवान् हरि शुक्लाम्बरधारी, सौम्य, प्रसन्नमुख, सभी आभरणोंसे युक्त, शोभायमान और भूक्ति-मुक्तिप्रदाता हैं।
राजन्! उनकी जिस विधिसे प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये, उसे आप सुनें। मार्गशीर्ष आदि बारह मासोंमें द्वादशी, अमावास्या अथवा अष्टमीके दिन शुक्ल या कृष्ण पक्षका विचार किये बिना शुद्ध होकर उपवासपूर्वक व्रत करना चाहिये। शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षोंमें जनार्दनकी पूजा करनेका संकल्प लेना चाहिये। इस प्रकार नियम ग्रहण करके दन्तधायनपूर्वक तडाग, पुष्कर अथवा घरपर ही स्नानकर नित्य-नैमित्तिक कर्म करने चाहिये। एक पल सुवर्णके मानसे लक्ष्मीसहित सत्येशकी प्रतिमा बनवाये जो अष्टशक्तियोंसे समन्वित पद्मासनपर स्थित हो। दुग्धसे पूरित कुम्भपर स्थित सुवर्ण-पद्मके ऊपर उस प्रतिमाको स्थापित करे। उस पद्मकी कर्णिकाओंपर देवाधिदेवकी आठ शक्तियोंकी पूजा करे। अनन्तर भगवान् सत्येश (विष्णु) और सत्या (लक्ष्मी)-की विधिवत् विविध पाद्यादि उपचारोंसे पूजा करे। अनन्तर
इस प्रकार प्रार्थना करे—
कृष्ण कृष्ण प्रभो राम राम कृष्ण विभो हरे। ब्राहि मां सर्वदुःखेभ्यो रमया सह माधव॥ पूजा चेयं मया दत्ता पितामह जगद्गुरो। गृहाण जगदीशान नारायण नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व १४६।४८-४९)
अनन्तर अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणको दान देकर व्रतका समापन करना चाहिये। इस व्रतको दोनों पक्षोंमें करे और वर्ष पूरा होनेपर उद्यापन करे। ब्राह्मणसे प्रार्थना करे कि हे ब्राह्मण देवता! मेरे सभी पाप दूर हो जायें। ब्राह्मण कहें—‘आपके सभी पाप एवं दुःख दूर हो जायें।’ तदनन्तर ब्राह्मणको वह मूर्ति समर्पित कर समापन करना चाहिये।
राजन्! ब्रह्मजीने कहा है कि इस व्रतको करनेसे अनन्त फलकी प्राप्ति होती है। जो फल सभी वेदोंके अध्ययनसे और सभी तीर्थोंमें भ्रमण करनेसे प्राप्त होता है, उससे कोटिगुना फल इस व्रतके आचरणसे होता है और व्रतीको इस लोकमें धन, धान्य, पुत्र, पौत्र, मित्र तथा सुखकी प्राप्ति होती है। व्रतको करनेवाले व्यक्तिको विद्या और आरोग्यकी भी प्राप्ति होती है तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्ति होती है। इसमें कोई संदेह नहीं है। जो इसको पढ़ता अथवा सुनता है, उसके भी सभी पाप दूर हो जाते हैं।
(अध्याय १४६)
काञ्चनपुरीव्रत-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! एक बार विश्वके उत्पत्ति, पालन और संहारकारक अक्षर पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु श्वेतद्वीपमें सुखपूर्वक बैठे हुए थे। उसी समय जगन्माता लक्ष्मीने उनके चरणोंमें पञ्चाङ्ग प्रणाम कर उनसे पूछा—‘भगवन्!
आप भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले हैं। महाभाग! मुझपर भी दया करके आप कोई ऐसा रूप-सौभाग्यदायक सर्वोत्तम व्रत बतलायें, जिसके आचरणसे समस्त तीर्थ आदि पुण्य कर्मोंका फल प्राप्त हो जाय।’
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
५६६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
भगवान् विष्णु बोले—देवि! जिस प्रकार आश्रमोंमें गृहस्थाश्रम, वर्णोंमें ब्राह्मण, नदियोंमें गङ्गा, जलाशयोंमें समुद्र, देवताओंमें विष्णु (मैं) तथा स्त्रियोंमें तुम (लक्ष्मी) श्रेष्ठ हो, उसी प्रकार व्रतोंमें काञ्चनपुरीव्रत उत्तम है। इस व्रतका पहले भगवती पार्वतीने भगवान् शंकरके साथ अनुष्ठान किया था। सीताजीने भी भगवान् श्रीरामके साथ इसी व्रतका पालन कर अखण्ड साम्राज्य प्राप्त किया था। दमयन्तीके वियोगमें राजा नलने भी इस व्रतको किया था। वनवासी पाण्डवोंने भी द्रौपदीके साथ इस व्रतका आचरण किया और सभी कष्टोंसे मुक्त होकर साम्राज्य-लाभ किया। भद्रे! यह व्रत स्वर्ग और मोक्षको प्रदान करनेवाला है। रम्भा, मेनका, इन्द्राणी (शची) सत्यभामा, शाण्डिली, अरुन्धती, उर्वशी तथा देवदत्ता आदि श्रेष्ठ स्त्रियोंने इस व्रतका आचरण करके सौभाग्य, सुख और अपने मनोरथ प्राप्त किये थे। पातालमें नागकन्याओंने और गायत्री, सरस्वती एवं सावित्री आदि उत्तम देवियों तथा अन्य नारियोंने सभी कामनाओंकी पूर्तिकी अभिलाषासे इस व्रतका अनुष्ठान किया था। यह व्रत सभी प्रकारके दुःखोंका नाशक, प्रीतिवर्धक तथा व्रतोंमें उत्तम है, इसलिये इस व्रतका मैं वर्णन कर रहा हूँ। इसके अनुष्ठानसे ब्रह्महत्या आदि महापातकोंके करनेवाले, तौल मापमें कमी करनेवाले, कन्या बेचनेवाले, गौ बेचनेवाले, अगम्यागमनमें लिप्त, मांसभक्षी, जारजपुत्रके यहाँ भोजन करनेवाले, भूमिका हरण करनेवाले आदि पापकर्मी भी पापोंसे निःसंदेह मुक्त हो जाते हैं। इसकी विधि इस प्रकार है—
देवि! यह काञ्चनपुरी-व्रत किसी महीनेमें शुक्ल या कृष्ण पक्षकी तृतीया, एकादशी, पूर्णिमा, संक्रान्ति, अमावास्या तथा अष्टमीको उपवासपूर्वक किया जा सकता है। व्रती इस दिन काञ्चनपुरी
बनवाकर दान करे। वह पूर्वाह्नमें नदी आदिके शुद्ध निर्मल जलमें स्नान करे। पहले मन्त्रपूर्वक पवित्र मृत्तिका ग्रहणकर उसे शरीरमें लगाये फिर जलमें गोते लगाये। इस विधिसे स्नान कर शुद्धात्मा व्रती अपने घर आये और उस दिन किसी पाखण्डी, विधर्मी, धूर्त, शठ आदिसे वार्तालाप न करे। अपना हाथ-पैर धोकर पवित्र हो आचमन करे। एक उत्तम जलसे भरा स्वर्णयुक्त शङ्ख लेकर उस जलको द्वादशाक्षरमन्त्रसे अभिमन्त्रितकर 'हरि' इस मन्त्रका जप कर जल पी ले। शमीवृक्षसे चार स्तम्भोंसे युक्त एक वेदी बनाये जो चार हाथ प्रमाणकी हो। वेदीको पुष्पमाला, वितान, दिव्य धूप आदिसे अधिवासित और अलंकृत कर ले। वेदीके मध्यमें एक पद्मकी रचना करे। मण्डलके बीचमें सुन्दर एक भद्रपीठका निर्माण कराये। भद्रपीठके ऊपर सुन्दर आसनपर लक्ष्मीके साथ भगवान् जनार्दनकी स्थापना करे। मण्डलके अग्र भागमें जलपूर्ण कलशकी स्थापना कर उसमें क्षीरसागरकी कल्पना करे। कलशपर चार पल, दो पल अथवा एक पलकी काञ्चनपुरीकी स्वर्णमयी प्रतिमा बनाकर स्थापित करे। उसके आगे कदली-स्तम्भ और तोरण लगाये। फिर ब्राह्मणोंद्वारा उसकी प्रतिष्ठा कराये।
उस पुरीके मध्यमें विष्णुसहित लक्ष्मीकी सुवर्णमय प्रतिमाकी स्थापना करनी चाहिये। पञ्चामृतसे देवेश नारायण तथा लक्ष्मीको स्नान कराकर मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए चन्दन, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा उनका पूजन करना चाहिये। इन्द्रादि लोकपालोंकी पूजा भी यथाक्रमसे करनी चाहिये। विघ्ननिवारणके लिये गणपति तथा नवग्रहोंका पूजन कर हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् पायस, सोहाल, फेनी, मोदक आदिका नैवेद्य अर्पित कर देश-कालके अनुसार फल भी अर्पण करना चाहिये। दस
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
५६७
दिशाओंमें दस घृतपूरित दीपक प्रज्वलित करे। पुष्पमाला, चन्दन आदि भी चढ़ाये, साथ ही विष्णुस्तवराज, पुरुषसूक्त आदिका पाठ करे। सोलह सप्लीक ब्राह्मणोंमें लक्ष्मी-विष्णुकी भावना कर पूजा करे। अन्तमें पूजित सभी पदार्थ उन्हें निवेदित कर प्रार्थना करे कि 'ब्राह्मण देवता! भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हो जायँ।' शय्या-दान तथा गो-दान भी करे। जो काञ्चनपुरी आदिकी प्रतिमा पूजित की गयी है, उसे व्रती देख न सके, इसलिये वस्त्रसे आच्छादितकर अपने नेत्रोंको वस्त्रसे ढककर दीपके साथ मण्डपमें ले आये और आचार्य कहे—'आप सभी कामनाओंको देनेवाली एवं दुःख-दौर्भाग्यको दूर करनेवाली इस रमणीय काञ्चनपुरीका दर्शन करें।'
अनन्तर व्रती नेत्रके वस्त्रको खोलकर गुरुके सम्मुख पुष्पाञ्जलि देकर उस शुभ पुरीका दर्शन करे। तदनन्तर चाँदी, ताँबे अथवा किसी शङ्खमें पञ्चरत्न, गङ्गाजल, फल, सरसों, अक्षत, रोचना तथा दहीमिश्रित अर्घ्य बनाकर भगवान् विष्णुको प्रदान करे और प्रार्थना करे—'सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले भगवान् लक्ष्मीनारायण! आप इस सुवर्णपुरीके प्रदान करनेसे मनोवाञ्छित फल पूर्ण करें। नारायण! लक्ष्मीकान्त! जगन्नाथ! आप इस अर्घ्यको ग्रहण करें, आपको नमस्कार है।'
इस प्रकार महातेजस्वी भगवान् विष्णुको अर्घ्य देकर भक्तिपूर्वक देवी लक्ष्मीको भी अर्घ्य प्रदान करना चाहिये और कहना चाहिये कि 'देवि! आप ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, पार्वती एवं भगवान् कार्तिकेयसे पूजित हैं। धर्मकी कामनासे मेरे द्वारा भी आप पूजित हैं, आप मुझे सौभाग्य, पुत्र, धन, पौत्र प्रदान करें। देवि! आप मेरे द्वारा प्रदत्त इस अर्घ्यको ग्रहण कर मुझे सुख प्रदान करें।' इस प्रकार व्रतको पूर्णकर महोत्सव मनाये एवं रात्रिमें जागरण करे। निद्रारहित होकर जागरण करनेसे सौ यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। प्रातःकाल निर्मल जलसे स्नानकर पितर और देवताओंकी पूजा कर सप्लीक ब्राह्मणोंको वस्त्र देकर भोजन कराये और यथाशक्ति दक्षिणा प्रदानकर क्षमा-याचना करे। दीन, अन्ध, बधिर, पंगु आदि सबको संतुष्ट करे। अनन्तर पारणा करे। तदनन्तर मधुर पायसयुक्त व्यञ्जनोसे मित्र और बान्धवोंके साथ भोजन करे। ऐसा करनेसे व्रती ब्रह्मलोकको प्राप्त कर ब्रह्माके साथ आनन्दमय जीवन व्यतीत करता है। अनन्तर रुद्रलोक, उसके बाद विष्णुलोकको प्राप्त करता है। देवि! काञ्चनपुरी नामक यह व्रत पूर्वसमयमें तुमने भी किया था, उसी पुण्यके प्रभावसे त्रैलोक्यपूजित मुझे स्वामीके रूपमें तुमने प्राप्त किया है।
(अध्याय १४७)
कन्या-दान एवं ब्राह्मणोंकी परिचर्याका माहात्म्य
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—'राजन्! जो विवाह करने योग्य कन्याको अलंकृतकर ब्राह्मविधिसे सुयोग्य वरको प्रदान करता है, वह सात पूर्व और सात आगे आनेवाली पीढ़ियोंको तथा अपने कुलके सभी मनुष्योंको भी इस कन्या-दानके पुण्यसे तार देता है, इसमें संदेह नहीं। जो प्राजापत्य-विधिके द्वारा
कन्या-दान करता है, वह दक्षप्रजापतिके लोकको प्राप्त करता है। वह अपना उद्धार कर अपार पुण्य प्राप्त करता है तथा अन्तमें स्वर्गलोक प्राप्त करता है। जो पृथ्वी, गौ, अश्व, गजका दान हीन वर्णको करता है, वह घोर नरकमें पड़ता है। शुल्क लेकर कन्याका दान करनेवाला घोर नरक प्राप्त करता
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
५६८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
है और हजारों वर्षों तक अपवित्र लाला-भक्षण करता हुआ नरकमें जीवन-यापन करता है। इसलिये सवर्णा कन्या सवर्णको ही प्रदान करनी चाहिये। ब्राह्मणके बालक अथवा किसी अनाथको जो चूड़ाकरण, उपनयन आदि संस्कारोंसे संस्कृत करता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है। अनाथ कन्याका विवाह करानेवाला स्वर्गमें पूजित होता है। पूर्वजोंने कहा है कि जो कन्या-दानके साथ प्रदीप्त शुद्ध स्वर्णका दान करता है, वह द्विगुणित कन्या-दानका फल प्राप्त करता है। कन्याकी पूजासे विष्णुकी पूजाके समान पुण्य होता है।
महाराज! पृथ्वीपर ब्राह्मण ही देवता हैं, स्वर्गमें ब्राह्मण ही देवता हैं। इतना ही नहीं, तीनों लोकोंमें ब्राह्मणसे श्रेष्ठ कोई नहीं है। ब्राह्मणोंमें यह शक्ति
है कि वे मन्त्र-बलके प्रभावसे देवताको अदेवता और अदेवताको देवता बना देते हैं। इसलिये महाभाग! ब्राह्मणकी सदा पूजा करनी चाहिये। देवगण ब्राह्मणसे ही पूर्वमें उत्पन्न हुए ऐसा स्मृतियोंका कथन है। सम्पूर्ण जगत् ब्राह्मणसे ही उत्पन्न है। इसलिये ब्राह्मण पूज्यतम हैं। देवगण, पितृगण, ऋषिगण जिसके मुखसे भोजन करते हैं, उस ब्राह्मणसे श्रेष्ठ और कौन हो सकता है? धर्मज्ञ! ब्राह्मणोंका कल्याण करनेवाला व्यक्ति स्वर्गलोकमें पूजित होता है। जब प्रत्यक्ष देवता ब्राह्मण संतुष्ट होकर बोलते हैं तो यह समझना चाहिये कि परोक्षमें देवताओंकी ही यह वाणी है। उसीसे मनुष्यका कल्याण हो जाता है, अतः सदा ब्राह्मणकी सेवा करनी चाहिये। (अध्याय १४८-१५०)
दानकी महिमा और प्रत्यक्ष धेनु-दानकी विधि
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आपके श्रीमुखसे मैंने पुराणोंके विषयोंको सुना। व्रतोंको भी मैंने विस्तारपूर्वक सुना, संसारकी असारताको भी मैंने समझा, अब मैं दानके माहात्म्यको सुनना चाहता हूँ। दान किस समय, किसको, किस विधिसे देना चाहिये, यह सब बतानेकी कृपा करें। मेरी समझसे दानसे बढ़कर अन्य कोई पुण्य कार्य नहीं है; क्योंकि धनिकोंका धन चोरोंद्वारा चुराया जा सकता है अथवा राजाद्वारा छिन्वाया जा सकता है, अतः धन रहनेपर दान अवश्य करना चाहिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! मृत्युके उपरान्त धन आदि वैभव व्यक्तिके साथ नहीं जाते, परंतु ब्राह्मणको दिया गया दान परलोकमें
पाथेय बनकर उसके साथ जाता है। हृष्ट, पुष्ट, बलवान् शरीर पानेसे भी कोई लाभ नहीं है, जबतक कि किसीका उपकार न करे। उपकारहीन जीवन व्यर्थ है। इसलिये एक ग्राससे आधा अथवा उससे भी कम मात्रामें किसी चाहनेवाले व्यक्तिको दान क्यों नहीं दिया जाता? इच्छानुसार धन कब और किसको प्राप्त हुआ या होगा? धर्म, अर्थ तथा कामके विषयमें सचेष्ट होकर जिसने प्रयत्न नहीं किया, उसका जीवन लोहारकी धौकनीकी भाँति व्यर्थ ही चलता है। जिस व्यक्तिने न दान दिया, न हवन किया, तीर्थस्थानोंमें प्राण नहीं त्यागा, सुवर्ण, अन्न-वस्त्र तथा जल आदिसे ब्राह्मणोंका सत्कार नहीं किया, वही व्यक्ति जन्म-जन्ममें अन्न, वस्त्ररहित, रोगसे ग्रसित, हाथमें कपाल
१- द्विजपुत्रमनाथं वा संस्कार्यक्षं कर्मभिः।
चूडोपनयनाद्यैश्च सोऽश्वमेधफलं लभेत्। अनाथां कन्यांकां दत्त्वा नाकलोकं महीयते ॥ (उत्तरपर्व १४८। ७-८) २- ग्रासादर्धमपि ग्रासमर्थिभ्यः किं न दीयते। इच्छानुरूपो विभवः कदा कस्य भविष्यति ॥ (उत्तरपर्व १५१। ६)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
५६९
लेकर दर-दर भटकता हुआ याचना करता रहता है। अनेक प्रकारके कष्टोंको सहकर प्राणोंसे भी अधिक प्रिय जो धन एकत्र किया गया है, उसकी एक ही सुगति है दान। शेष भोग और नाश तो प्रत्यक्ष विपत्तियाँ ही हैं१। उपभोगसे और दानसे धनका नाश नहीं होता, केवल पूर्व-पुण्यके क्षीण होनेसे ही धनका नाश होता है। मरणोपरान्त धनपर अपना स्वामित्व नहीं रह जाता, इसलिये अपने हाथसे ही सुपात्रको धनका दान कर लेना चाहिये। राजन्! दान देनेके अनेक रूप हैं, इस विषयमें व्यास, वाल्मीकि, मनु आदि महापुरुषोंने पहले ही बतलाया है कि पूर्वजन्ममें किये गये व्रत, दान एवं देवपूजन आदि पुण्यकर्म ही दूसरे जन्ममें फलीभूत होते हैं।
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! भगवान् विष्णु, शिव एवं ब्राह्मणोंकी प्रसन्नताके लिये जो दान जिस विधिसे देना चाहिये आप उस विधिका वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! गौ, भूमि और सरस्वती—ये तीन दान सभी दानोंमें श्रेष्ठ और मुख्य हैं। ये अतिदान कहे गये हैं२। गायोंके दुहने, पृथ्वीको जोतकर अन्न उपजाने तथा विद्याके पढ़ने-पढ़ानेसे सात कुलोंका उद्धार होता है। अब मैं दान देने योग्य गौके लक्षणों और गोदानकी विधि बता रहा हूँ—महाराज! सुपुष्ट, सुन्दर, सवत्सा, पयस्विनी और न्यायपूर्वक अर्जित धनसे प्राप्त गौ श्रेष्ठ ब्राह्मणको देना चाहिये। वृद्धा, रोगिणी, वन्ध्या, अङ्गहीन, मृतवत्सा, दुःशीला और दुःधरहित तथा अन्यायपूर्वक प्राप्त गौका कभी दान नहीं करना
चाहिये। राजन्! किसी पुण्य दिनमें स्नानकर पितरोंका तर्पणकर भगवान् शिव और विष्णुका घी और दुग्धसे अभिषेक करनेके बाद सोनेके सींगयुक्त, रौप्य खुरवाली, कांस्यके दोहन-पात्रसहित सवत्सा गौका पुष्प आदिसे भलीभाँति पूजन करना चाहिये, उसे वस्त्र तथा माला आदिसे अलंकृत कर ले। गौको पूर्व या उत्तराभिमुख खड़ा करना चाहिये। अनन्तर दक्षिणाके साथ ब्राह्मणको गौका दान करना चाहिये और प्रार्थनापूर्वक इस प्रकार प्रदक्षिणा करनी चाहिये—
गावो ममाग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पृच्छतः ॥
गावो मे हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम्।
(उत्तरपर्व १५१।२९-३०)
गायकी पूँछ पकड़कर, हाथीका सँड़, घोड़ेका कान तथा दासीके सिरका स्पर्श कर और मृगचर्मकी पूँछ पकड़कर दान करना चाहिये। जब ब्राह्मण गाय लेकर जाने लगे तो उसके पीछे-पीछे आठ-दस कदमतक जाना चाहिये। इस विधिसे जो व्यक्ति गोदान करता है, उसे सभी प्रकारके अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं और स्वर्गकी प्राप्ति होती है। सात जन्मोंमें किये गये पापका उसी क्षण नाश हो जाता है। राजन्! यह विधि दक्षप्रजापतिके लिये भगवान् विष्णुने कही है। गोदान करनेवाला चतुर्दश इन्द्रोंके समयतक स्वर्गमें निवास करता है। यह गोदान सभी पापोंको दूर करनेवाला है। इससे बढ़कर और कोई प्रायश्चित्त नहीं है। गोदान ही एक ऐसा दान है, जो जन्म-जन्मान्तरतक फल देता रहता है।'
(अध्याय १५१)
१-आयासशतलब्धस्य प्राणेभ्योऽपि गरीयसः। गतिरेकेव वित्तस्य दानमन्या विपत्तयः ॥ (उत्तरपर्व १५१।११)
दानं भोगो नाशस्तिक्षो गतथो भवन्ति धनस्य। यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ॥ (सुभाषितरत्नावली)
सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोऽ पाकी ॥ (रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड)
२-त्रौण्याहुरतिदानानि गावः पृथ्वी सरस्वती। (उत्तरपर्व १५१।१८)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
५७०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
तिलधेनु-दानकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज ! अब मैं भगवान् वाराहके द्वारा कहे गये तिलधेनु-दानकी विधि बता रहा हूँ। जिससे दाता ब्रह्महत्यादि महापातकों तथा सभी उपपातकोंसे मुक्त हो जाता है और स्वर्गमें निवास करता है।
पहले पृथ्वीको गोबरसे लीपकर उसपर काला मृगचर्म तथा उसके चारों ओर कुश बिछा ले। तदनन्तर उसपर गायकी आकृतिके रूपमें तिलकी राशि फैला ले अर्थात् तिलमयी धेनु बना ले। सफेद, कृष्ण, भूरे तथा गोमूत्रवर्णके तिलोंसे धेनुकी रचना करनी चाहिये। चार आढकके मानकी गाय और एक द्रोण तिलसे बछड़ेका निर्माण करे। गायके खुरके पास चाँदी, सींगके पास स्वर्ण, जिह्वाके पास शक्कर, मुखके पास गुड़, गलकम्बलके पास कम्बल, पैरके स्थानमें ईख, पीठके स्थानपर ताँबा और नेत्रोंके लिये मुक्ता रखनी चाहिये। इसी प्रकार कानके स्थानपर पीपलके पत्ते, दाँतोंके स्थानपर फल, पूँछके स्थानपर माला और स्तनोंके स्थानपर मक्खन रखे। सिरके स्थानपर सफेद वस्त्र, रोमोंके स्थानपर सफेद सरसों रख दे। सुन्दर फलों तथा मणि-मुक्ताओंसे उस तिलमयी कल्पित धेनुको सुसज्जित करे। कांस्यकी दोहनी भी समीपमें रख दे। किसी पुण्य पर्वके दिन उस धेनुका पूजन इत्यादि कर ब्राह्मणको दान कर दे और इस मन्त्रको पढ़ते हुए प्रार्थनापूर्वक प्रदक्षिणा करे—
या लक्ष्मीः सर्वभूतानां या वै देवेष्बवस्थिता।
धेनुरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु॥
(उत्तरपर्व १५२।१५)
दक्षिणासहित गाय ब्राह्मणको दे दे। इस विधिसे जो तिलधेनुका दान करता है, वह व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त होकर परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है।
जो व्यक्ति इस दानका अनुमोदन कर प्रसन्नचित्त होकर प्रशंसा करते हैं तथा विधिपूर्वक जो ब्राह्मण दान ग्रहण करते हैं, वे भी ब्रह्मलोकको प्राप्त करते हैं। प्रशान्त, सुशील, वेदव्रतपरायण ब्राह्मणके लिये तिलधेनुका दान करनेवाले व्यक्तिको अपने कृत-अकृतका शोक नहीं करना पड़ता। तिलधेनु-दान करनेवाले व्यक्तिको तीन दिन अथवा एक दिन तिलका ही भोजन करना चाहिये। दान करनेसे मनुष्यके पाप नष्ट हो जाते हैं और उसके अंदर पवित्रता आ जाती है। तिलका भक्षण करना चान्द्रायणव्रतसे अधिक श्रेष्ठ माना गया है। बाल्य, युवा अथवा वृद्धावस्थामें मन, वचन तथा कर्मसे जो पाप हुआ हो अथवा अभक्ष्य-भक्षण, अगम्यागमन, अपेयपान इत्यादि जो पातक, महापातक और उपपातक किये गये हों, वे सब तिलधेनुके दानसे दूर हो जाते हैं। पवित्र गङ्गा आदि नदियोंमें थूकने तथा नग्न स्नान करनेसे जो पाप होता है, वह भी नष्ट हो जाता है। तिलधेनुका दान करनेवाला व्यक्ति यमलोकके मार्गकी भयंकर यातनाओंका अतिक्रमण कर सुवर्णके विमानमें बैठकर उत्तम लोकमें चला जाता है। राजन् ! नैमिषारण्यमें कथा-प्रसंगके समय मुनियोंने यह विधि सुनायी और नारदजीने मुझे इस विधिकी उपदेश किया, वही तिलधेनु-दानकी विधि मैंने आपसे कही है। तिलधेनुका दान करना पवित्र, पुण्य और माङ्गल्यप्रद तथा कीर्तिवर्धक है। श्राद्धके समय ब्राह्मणोंको इस माहात्म्यका श्रवण करानेसे अनन्त पुण्य प्राप्त होता है। गौ, घर, शय्या और कन्या एक व्यक्तिको ही देनी चाहिये, क्योंकि विभाजनसे दोनोंको अधोगतिकी प्राप्ति होती है और विक्रय करनेसे सात कुल दुर्गतिको प्राप्त करते हैं। इस दानके प्रभावसे दान करनेवाला
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
५७१
उत्तम विमानमें बैठकर साक्षात् विष्णुभगवान् के समीप पहुँच जाता है। माघ अथवा कार्तिककी पूर्णिमा, चन्द्र-सूर्य-ग्रहण, अयन-संक्रान्ति, विषुव-
योग, व्यतीपात-योग, वैशाख अथवा मार्गशीर्षकी पूर्णिमा और गजच्छाया-योगमें तिलधेनुका दान प्रशस्त माना गया है। (अध्याय १५२)
जलधेनु-दानके प्रसंगमें महर्षि मुद्गलका आख्यान
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं जलधेनु-दानकी विधि बता रहा हूँ, जिससे देवाधिदेव भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। उत्तम जलसे पूर्ण एक कलश स्थापित करे, उसमें पञ्चरत्न, धान्य, दूर्वा, पञ्चपल्लव, कुष्ठसंज्ञक ओषधि, खश, जटामांसी, मुरा, प्रियंगु और आँवला छोड़े। फिर उसे दो श्वेत वस्त्रों, यज्ञोपवीत और पुष्पमालाओंसे अलंकृत करे। कुशके आसनपर कलशको रखकर उसके आस-पास जूता, छाता आदि तथा चारों दिशाओंमें चाँदीके चार पात्रोंमें तिल, दही, घृत और मधु भरकर रखे। कलशमें सवत्सा धेनुकी कल्पना कर उसे गोमयसे उपलिस कर दे। पूँछके स्थानपर माला लटका दे। समीपमें दोहनपात्र भी रख ले। इसके बाद सब उपचारोंसे भगवान् विष्णुकी यथाशक्ति पूजा कर उस कलशमें जलधेनुकी अभिमन्त्रणा करे और इस प्रकार कहे— विष्णोर्वक्षसि या लक्ष्मीः स्वाहा या च विभावसोः। सोमशक्रार्कशक्तिर्था धेनुरूपेण साऽस्तु मे॥
(उत्तरपर्व १५३।८)
‘जो गौमाता भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें लक्ष्मीके रूपमें निवास करती हैं और अग्निदेवकी पत्नी स्वाहा तथा चन्द्रमा, सूर्य एवं इन्द्रकी शक्ति-रूपमें प्रतिष्ठित हैं वे मेरे लिये इस जलरूपी कलशमें अधिष्ठित हों।’
इस मन्त्रसे कलशमें धेनुको प्रतिष्ठितकर वत्स-समन्वित उस जलधेनुका तथा जलशायी भगवान् अच्युत गोविन्दका भलीभाँति पूजन करे। तदनन्तर वीतराग और शान्तचित्त होकर भगवान् विष्णुकी
प्रसन्नताके लिये उस कलशस्थित जलधेनुका ब्राह्मणको दान कर दे और इस प्रकार कहे—
शेषपर्यङ्कशयनः श्रीमाञ्छाङ्गविभूषितः।
जलशायी जगद्योनिः प्रीयतां मम केशवः॥
(उत्तरपर्व १५३।११)
‘शेषनागरूपी शय्यापर शयन करनेवाले, शार्ङ्धनुषसे विभूषित, जलशायी, जगद्योनि, श्रीसम्पन्न भगवान् केशव! आप (इस दानरूपी कर्मसे) मुझपर प्रसन्न हों।’
दान करनेके बाद उस दिन गोव्रत करना चाहिये। इस विधिसे जलधेनुका दान करनेवाला व्यक्ति सभी प्रकारके आनन्दको प्राप्त करता है तथा उसे सार्वकालिक अतुल शान्ति प्राप्त होती है एवं सभी मनोरथोंकी सिद्धि हो जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं।
राजन्! इस विषयमें एक आख्यान सुना जाता है जो इस प्रकार है—किसी समय जातिस्मर महात्मा मुद्गल-ऋषि भ्रमण करते हुए यमलोकमें गये। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि पापी जीव अनेक प्रकारके कुम्भीपाक आदि दारुण नरकमें कष्ट भोग रहे हैं और यमराजके अति भयंकर दूत उन्हें अनेक प्रकारके दुःख दे रहे हैं। मुद्गलमुनिको देखकर नरकके जीवोंकी पीड़ा शान्त हो गयी और उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई तथा वे सुखका अनुभव करने लगे। जीवोंको सुखी देखकर मुनिको बहुत आश्चर्य हुआ, उसपर उन्होंने यमराजसे इसका कारण पूछा। यमराजने कहा—‘मुने! आपको देखकर नरकके जीवोंको जो प्रसन्नता हुई है, उसका
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
५७२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
कारण यह है कि आपने तीन जन्मोंमें विधिवत् जलधेनुका दान किया है, उसीके प्रभावसे आपका दर्शन सबको आह्लादित कर रहा है। जो आपका दर्शन करेंगे, आपका ध्यान करेंगे, आपकी चर्चा सुनेंगे अथवा आप जिन्हें देखेंगे, स्मरण करेंगे उनको भी सुख-शान्ति और आनन्द होगा। जलधेनुका दान करनेवालेको हजारों जन्मोंतक कोई क्लेश नहीं होता। इससे अधिक प्रसन्नतादायक अन्य कोई कर्म नहीं है। मुने! अब आप मेरे द्वारा अर्घ्य, पाद्य आदि स्वीकार कर अपने धामको जाड़ये। जिन्होंने भगवान् श्रीकृष्णका आश्रय ग्रहण किया है, वे मेरे द्वारा नियमन करने योग्य नहीं हैं। जो भगवान् श्रीकृष्णका पूजन-व्रत करता है, नित्य उनका ध्यान करता है, उनके कृष्ण, अच्युत, अनन्त, वासुदेव आदि नामोंका निरन्तर उच्चारण करता है, वह इस लोकमें नहीं आता। जो 'अच्युतः प्रीयताम्' ऐसा कहकर दान देता है, वह मेरे लोकमें नहीं आता। वे भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं और हम सभी उनके आज्ञाकारी हैं। मैं लोकोंका संयमन करता हूँ और मेरा संयमन भगवान् श्रीकृष्ण करते हैं*। यमराजका यह वचन सुनकर अग्नि, शस्त्र आदिसे पीड़ित सब नरकके जीव भगवान्की स्तुति करते हुए उनके पवित्र नामोंका स्मरण करने लगे। भगवान् विष्णुका स्मरण करते ही उस पुण्यकर्मके प्रभावसे नरककी अग्नि शीतल हो गयी। यमराजके सभी अस्त्र-शस्त्र प्रभावशून्य हो गये, अन्धकार दूर हो
गया। सर्वत्र प्रकाश छा गया। यमदूत मूर्च्छित हो गये। शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु बहने लगी। मधुर ध्वनियाँ होने लगीं। पूय और रुधिरकी नदियोंमें उत्तम गङ्गाजल प्रवाहित होने लगा। सभी जीव दुःखसे छूटकर उत्तम वस्त्र, आभूषण, माला आदिसे विभूषित हो गये तथा तीनों पापोंसे मुक्त हो गये। यह अद्भुत दृश्य देखकर धर्मराज उन निष्पाप नारकीय जीवोंका पाद्यादिसे अर्चन करने लगे और इसे भगवान् विष्णुकी महिमा समझकर उनको बार-बार प्रणाम करने लगे।
यमराज इस प्रकार स्तुति कर ही रहे थे कि उनके देखते-ही-देखते नरकके सभी जीव दिव्य विमानोंमें बैठकर स्वर्गमें चले गये। मुद्गल-ऋषि भी यह सब चरित्र देखकर अपने धाममें चले आये और भगवान् विष्णुका प्रभाव तथा जलधेनु-दानके माहात्म्यका बार-बार स्मरण करते हुए कहने लगे—
अहो! भगवान् विष्णुकी माया बड़ी विचित्र और कठिन है, जिससे मोहित होकर प्राणी परमेश्वरको नहीं पहचान पाता। इसी कारण जीव कीट, जूँ, पतङ्ग, वृक्ष, लता, पशु, पक्षी आदि योनियोंमें भ्रमण करते हैं और अपनी मुक्तिके लिये प्रयत्न नहीं करते। यह आश्चर्य है कि मायासे मोहित व्यक्ति अपना हित नहीं पहचान पाता। विष्णुभगवान्की माया यद्यपि बड़ी ही विचित्र है, परंतु भगवान्का आश्रय ग्रहण करनेपर व्यक्ति उस मायाको दूर कर लेता है। जो व्यक्ति मानव-
- कृष्णस्तु पूजितो यैस्तु ये कृष्णार्थमुपोषिताः । यैश्च नित्यं स्मृतः कृष्णो न ते महिषयोपगाः ॥ नमः कृष्णाच्युतानन्त वासुदेवेत्युदीरितम् । यैर्भावभावितैर्विप्र न ते महिषयोपगाः ॥ दानं ददद्भिर्यैरुक्तमच्युतः प्रीयतामिति । श्रद्धापुरःसैर्विप्र न ते महिषयोपगाः ॥ स एव नाथः सर्वस्य तत्रियोगकरा वयम् । जनसंयमनश्चाहमस्मत्संयमनो हरिः ॥
(उत्तरपर्व १५३।३०—३३)
ऐसे ही 'हरिगुरुवशगोऽस्मि न स्वतन्त्रः, प्रभवति संयमने ममापि विष्णुः' आदि प्रायः पंद्रह श्लोक विष्णुपुराणके यमगीतामें हैं, जो प्रायः प्रतिदिन पठनीय हैं।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
५७३
जन्म पाकर भी भगवान्की आराधना नहीं करता, उसका मनुष्यके रूपमें जन्म लेना ही व्यर्थ है। ऐसा कौन अभागा व्यक्ति होगा, जो भगवान्की आराधना नहीं करेगा, जबकि भक्तिपूर्वक थोड़ी-सी भी आराधना की जाय तो भगवान् विष्णु इस लोक तथा परलोकमें उसका कल्याण कर देते हैं। भगवान्को धन, वस्त्र, आभूषण आदि कुछ भी नहीं चाहिये। उन्हें तो मात्र हृदयकी भक्ति एवं शुद्ध प्रेम चाहिये१। इसलिये जीव! तुम भगवान्से दूर क्यों रहते हो! हजारों जन्मोंके बाद इस कर्मभूमिमें दुर्लभ मानव-रूपमें जन्म लेकर जो व्यक्ति श्रीविष्णुकी आराधना और जलधेनुका दान
नहीं करता, उस व्यक्ति का यह जन्म ही व्यर्थ है। वह व्यक्ति मायाके जालमें पड़ा रहता है। मुद्गल-ऋषिने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर कहा कि 'मनुष्यो! मैं पुकार-पुकारकर कहता हूँ कि आपलोगोंको दोनों लोकोंमें कल्याण प्राप्त करनेके लिये श्रीविष्णुभगवान्की आराधना और जलधेनुका दान करना चाहिये। नरककी यातना अति दुःखदायिनी है, इसे मैंने स्वयं अपनी आँखोंसे देखा है। विचार करनेपर यह सत्य ही मालूम पड़ता है कि उस दुःखसे बचनेके लिये भगवान् विष्णुमें अपने मनको लगाना चाहिये, यही श्रेयस्कर उपाय है२।' (अध्याय १५३)
घृतधेनुदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं घृतधेनुदान और घृतधेनु-निर्माणकी विधि बता रहा हूँ, इसे आप प्रेमपूर्वक सुनें। गायके घीसे भरे हुए कलशोंको गायकी आकृतिमें बनाकर उन्हें गन्ध, पुष्प आदिसे अलंकृत कर श्वेत वस्त्रसे भलीभाँति ढँक दे और दोहन-स्थानपर कांस्यकी दोहनी रख दे। पैरोंकी जगहपर ईखके डंडे, खुरकी जगहपर चाँदी, आँखके स्थानपर सोना, सींगोंके स्थानपर अगरकाष्ठ, दोनों बगलमें सप्तधान्य, गलकम्बलके स्थानपर ऊनी वस्त्र, नासिकाके स्थानपर तुरस्कदेशीय कपूर, स्तनोंके स्थानपर फल, जिह्वाके स्थानपर शर्करा, मुखके स्थानपर दूधमिश्रित गुड़, पूँछकी जगहपर रेशमी वस्त्र तथा रोओंकी जगहपर सफेद (गौर) सरसों और पीठकी जगहपर ताम्रपात्र स्थापित करे। इस प्रकारसे घृतधेनुकी रचना करे। इसी प्रकार
घृतधेनुके पास ही घृतधेनु-वत्सकी भी कल्पना करे। तदनन्तर विधिपूर्वक घृतधेनुकी प्रतिष्ठा कर भलीभाँति पूजन करे और इस प्रकार कहे— आज्यं तेजः समुद्दिष्टमाज्यं पापहरं परम्। आज्यं सुराणामाहारः सर्वमाज्ये प्रतिष्ठितम्॥ त्वं चैवाज्यमयी देवि कल्पितासि मया किल। सर्वपापापनोदाय सुखाय भव भामिनि॥
(उत्तरपर्व १५४।८-९)
'घृतको तेजोवर्धक तथा पापापहारी बतलाया गया है। देवताओंका आहार घृत ही है, सभी कुछ घृतमें ही प्रतिष्ठित है, इसलिये घृतमयी देवि! तुम मेरे द्वारा घृतकुण्डोंमें कल्पित की गयी हो, मेरे पापोंको नष्टकर मुझे आनन्द प्रदान करो।'
ऐसा कहकर दक्षिणासहित घृतधेनुका दान ब्राह्मणको दे दे और कहे कि ब्राह्मणदेवता! मेरा उपकार करनेके लिये आप इस आज्यमयी धेनुको
१-यो न वितर्द्धिविभवेन वासोभिर्न भूषणैः। तुष्यते हृदयेनैव कस्तमीशं न पूजयेत्॥ (उत्तरपर्व १५३।६५)
२-महर्षि मुद्गलप्रोक्त मुद्गलपुराण सभी उपपुराणोंमें बड़ा है और इनकी धर्मनिष्ठा एवं भक्तिकी विशिष्ट कथा महाभारतके सङ्कप्रस्थीय मुद्गलोपाख्यानमें भी अतीव आकर्षक है। धर्मकी उपेक्षाके कारण मुद्गलपुराण अब प्रायः लुप्त-सा हो रहा है। ऐसे ही गणेशपुराण भी लुप्त-सा हो रहा है। समर्थ व्यक्तियोंको इन दोनोंको प्रकाशित करनेका प्रयत्न अवश्य करना चाहिये।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
५७४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
ग्रहण करें। उस दिन घृतका ही आहार करना चाहिये। इसी विधिसे नवनीत (मक्खन)-धेनुका भी दान करना चाहिये। घृतधेनुका दान करनेवाला व्यक्ति उस लोकमें निवास करता है, जहाँ घी और दूधकी नदियाँ बहती हैं। वह व्यक्ति अपने सात पीढ़ीके लोगोंका भी उद्धार कर देता है। ये
फल तो सकाम दान देनेवाले व्यक्तियोंके हैं, किंतु जो व्यक्ति निष्कामभावसे घृतधेनुका दान करता है, वह निष्कलमष होकर परम पदको प्राप्त करता है। घृत सर्वदेवमय है, इसलिये घृतके दानसे सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं।
(अध्याय १५४)
लवणधेनुदान-विधि
राजा युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! आप इस प्रकारके दानकी विधिका वर्णन करें, जिसे करनेसे सभी दानोंका फल प्राप्त हो जाय एवं सभी पापोंका नाश हो जाय और सभी मनोरथ सिद्ध हो जायँ तथा व्यक्ति शुद्ध हो जाय।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! सभी दानोंमें लवणधेनुका दान उत्तम है। इससे ब्रह्महत्या, गोहत्या, पितृहत्या, गुरुपत्नीगमन, विश्वासघात, क्रूरता आदि अनेक प्रकारके पापोंका आचरण करनेवाला व्यक्ति मुक्त हो जाता है। वह धन, धान्य, पुत्र, पौत्र एवं सुख प्राप्त कर दीर्घायु होकर इस संसारके सुखको भोगकर अन्तमें शिवलोकको प्राप्त कर लेता है। अब मैं इस लवणधेनुदानकी विधिको बता रहा हूँ—
भूमिको गोबरसे लीपकर उसके ऊपर कुश बिछा दे तथा उसके ऊपर मेषका चर्म बिछा दे। उसपर पूर्व दिशाकी ओर मुँह करके बैठे। चाहे कोई मनुष्य धनी हो या गरीब प्रायः एक आदक अर्थात् चार सेर लवण रखकर उसमें धेनुकी कल्पना करनी चाहिये। सुवर्णमण्डित चन्दनकाष्ठके सींग, चाँदीके खुर, ईखके पैर, फलोंके स्तन, शर्कराकी जिह्वा, चन्दनकी नासिका, सीपके कान, मोतियोंकी आँखोंकी कल्पना कर उसके कपोलमें सत्कुपिण्ड, मुखमें जौ, दोनों पार्श्वोंमें तिल और गेहूँ—इस प्रकार
सप्तधान्य उस लवणधेनुके अङ्गोंमें स्थापित करे। इसी प्रकार ताप्रसे पीठ, गुडपिण्डसे अपान-देश, कम्बलसे पूँछका, अंगूरसे चार स्तनोंका, मधुर फलों एवं मधुसे योनिदेशकी रचना करनी चाहिये। इस प्रकार उपर्युक्त सामग्रियोंसे लवणधेनुकी रचनाकर सेरभर नमकके मानसे उसके वत्सकी कल्पना करे। धेनु तथा बछड़ेको वस्त्र-आभूषण आदिसे अलंकृत करे। तदनन्तर स्वयं स्नान कर देवताओं और ब्राह्मणकी पूजा करे। स्त्री-पुत्रके साथ गायकी पूजा एवं प्रदक्षिणा करे और इस मन्त्रको पढ़कर नमस्कार करे—
लवणे वै रसाः सर्वे लवणे सर्वदेवताः।
सर्वदेवमये देवि लवणाख्ये नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व १५५।१८)
‘लवणमें सभी रस निहित हैं। सभी देवताओंका निवास लवणमें रहता है, इसलिये सर्वदेवमयी लवणधेनु! आपको मेरा नमस्कार है।’
अनन्तर दक्षिणाके साथ वह धेनु ब्राह्मणको समर्पित कर दे। राजन्! लवणधेनुका दान करनेसे सम्पूर्ण पृथ्वीकी परिक्रमा और सभी यज्ञों तथा दानोंका भी फल प्राप्त हो जाता है। इस विधिसे जो व्यक्ति रसमयी लवणधेनुका दान करता है, उसे सौभाग्य, सुख, आरोग्य, सम्पत्ति, धन-धान्यकी प्राप्ति होती है तथा वह प्रलयपर्यन्त स्वर्गमें निवास करता है। (अध्याय १५५)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
५७५
सुवर्णधेनुदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं सुवर्णधेनुदानकी विधि बता रहा हूँ, जिससे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। पचास पल (प्रायः तीन किलो), पचीस पल अथवा जितनी भी सामर्थ्य हो उस मानमें शुद्ध सुवर्णसे रत्नजटित सुन्दर कपिला सुवर्णधेनुकी रचना करनी चाहिये। उसके चतुर्थशसे उसका वत्स बनाये। गलेमें चाँदीकी घंटी लगाये, रेशमी वस्त्र ओढ़ाये, इसी प्रकार हीरेके दाँत, वैदूर्यका गलकम्बल, ताँबेके सींग, मोतीकी आँखें और मूँगेकी जीभ बनाये। कृष्णमृगचर्मके ऊपर एक प्रस्थ गुड रखकर उसके ऊपर सुवर्णधेनुको स्थापित करे। अनेक प्रकारके फलयुक्त आठ कलश, अठारह प्रकारके धान्य, छाता, जूता, आसन, भोजन-सामग्री, ताँबेका दोहनपात्र, दीपक, लवण, शर्करा आदि स्थापित करे। तदनन्तर स्नान कर सुवर्णधेनुकी प्रदक्षिणा कर उसकी भलीभाँति पूजा करे। पूजनके अनन्तर प्रार्थनापूर्वक उस सुवर्णधेनुको दक्षिणा तथा सभी उपस्करणोंके साथ ब्राह्मणको दान करे।
राजन्! गौके जिस अङ्गमें जो देवता, मनु एवं तीर्थ निवास करते हैं वे इस प्रकार हैं*—नेत्रोंमें सूर्य और चन्द्रमा, जिह्वामें सरस्वती, दाँतोंमें मरुद्रण, कानोंमें अश्विनीकुमार, सींगके अग्रभागमें रुद्र और ब्रह्मा, ककुदमें गन्धर्व और अप्सराएँ, कुक्षिमें चारों समुद्र, योनिमें गङ्गा, रोमकूपोंमें ऋषिगण, अपानदेशमें पृथ्वी, आँतोंमें नाग, अस्थियोंमें पर्वत, पैरोंमें चतुर्विध पुरुषार्थ, हुंकारमें चारों वेद, कण्ठमें रुद्र, पृष्ठभागमें मेरु और समस्त शरीरमें भगवान् विष्णु निवास करते हैं। इस प्रकार यह सुवर्णधेनु सर्वदेवमयी और परम पवित्र है।
जो व्यक्ति सुवर्णधेनुका दान करता है, वह मानो सभी प्रकारके दान कर लेता है। इस कर्मभूमिमें यह दान बहुत दुर्लभ है। इसलिये प्रयत्नपूर्वक काञ्चनधेनुका दान करना चाहिये। इससे संसारसे उद्धार हो जाता है और कीर्ति तथा शान्तिकी प्राप्ति होती है एवं उसके सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं और अन्तमें उसे शिवलोककी प्राप्ति होती है।
(अध्याय १५६)
रत्नधेनुदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं गोलोक प्राप्त करानेवाले अत्युत्तम रत्नधेनुदानकी विधि बता रहा हूँ। किसी पुण्य दिनमें भूमिको पवित्र गोबरसे लीपकर उसमें धेनुकी कल्पना करे। पृथ्वीपर कृष्णमृगचर्म बिछाकर उसपर एक द्रोण लवण रखकर उसके ऊपर विधिपूर्वक
संकल्पसहित रत्नमयी धेनु स्थापित करे। बुद्धिमान् पुरुष उसके मुखमें इक्यासी पद्मरागमणि तथा चरणोंमें पुष्पराग स्थापित करे। उस गौके ललाटपर सोनेका तिलक, उसकी दोनों आँखोंमें सौ मोती, दोनों भौंहोंपर सौ मूँगा और दोनों कानोंकी जगह दो सीपें लगाये। उसके सींग सोनेके होने चाहिये।
- नेत्रयोः सूर्यशशिनी जिह्वायां तु सरस्वती। दन्तेषु मरुतो देवाः कर्णयोश्च तथाश्चिनी ॥
शुङ्गाग्रयो सदा चास्या देवी रुद्रपितामही। गन्धर्वाप्सरसश्चैव ककुर्देशं प्रतिष्ठिताः ॥
कुक्षौ समुद्राश्चत्वारो योनी त्रिपथगामिनी ॥
ऋषयो रोमकूपेषु अपाने वसुधा स्थिता। अन्नेषु नागा विज्ञेयाः पर्वताश्चास्थिषु स्थिताः ॥
धर्मकामार्थमोक्षास्तु पादेषु परिसंस्थिताः। हुंकारे च चतुर्वेदाः कण्ठे रुद्राः प्रतिष्ठिताः ॥
पृष्ठभागे स्थितो मेरुर्विष्णुः सर्वशरीरगः। एवं सर्वमयी देवी पावनी विश्वरूपिणी ॥ (उत्तरपर्व १५६। १६-२०)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
५७६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
सिरकी जगह सौ हीरोंको स्थापित करना चाहिये। कण्ठ और नेत्र-पलकोंमें सौ गोमेदक, पृष्ठभागमें सौ इन्द्रनील (नीलम), दोनों पार्श्वस्थानोंमें सौ वैदूर्य (बिल्लौर), उदरपर स्फटिक तथा कटिदेशपर सौ सौगन्धिक (माणिक-लाल) मणि रखना चाहिये। खुरोंको स्वर्णमय, पूँछको मुक्ता (मोतियों)-की लड़ियोंसे युक्तकर तथा दोनों नाकोंकी सूर्यकान्त एवं चन्द्रकान्त मणियोंसे रचनाकर कर्पूर और चन्दनसे चर्चित करे। रोमोंको केसर और नाभिको चाँदीसे बनवाये। गुदामें सौ लाल मणियोंको लगाना चाहिये। अन्य रत्नोंको संधिभागोंपर लगाना चाहिये। जीभको शक्करसे, गोबरको गुड़से और गोमूत्रको घीसे बनाना चाहिये। दही-दूध प्रत्यक्ष ही रखे। पूँछके अग्रभागपर चमर तथा स्तनोंके पास ताँबेकी दोहनी रखनी चाहिये।
इसी प्रकार गौके चतुर्थांशसे बछड़ा बनाना
चाहिये। इसके बाद धेनुको आमन्त्रित करे। उस समय गुड़धेनुकी तरह आवाहन कर यह कहना चाहिये—‘देवि! चूँकि रुद्र, इन्द्र, चन्द्रमा, ब्रह्मा, तथा विष्णु—ये सभी तुम्हें देवताओंका निवासस्थान मानते हैं तथा समस्त त्रिभुवन तुम्हारे ही शरीरमें व्याप्त है, अतः तुम भवसागरसे पीड़ित मेरा शीघ्र ही उद्धार करो।’ इस प्रकार आमन्त्रित करनेके बाद गौकी पूजा तथा परिक्रमा कर भक्तिपूर्वक साष्टाङ्ग प्रणाम करके उस रत्नधेनुका दान ब्राह्मणको दक्षिणाके साथ करे, अन्तमें क्षमा-प्रार्थना करे। इस प्रकार सम्पूर्ण विधियोंको जाननेवाला जो पुरुष इस रत्नधेनुका दान करता है, वह शिवलोक (कैलास या सुमेरुस्थित दिव्य शिवधाम)-को प्राप्त करता है तथा पुनः बहुत समयके बाद इस पृथ्वीपर चक्रवर्ती राजा होता है और उसकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। (अध्याय १५७)
उभयमुखी धेनु-दानका माहात्म्य
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—प्रभो! उभयमुखी अर्थात् प्रसवके समयमें गौका दान किस प्रकार करना चाहिये और उसके दानका क्या फल है। इसे आप बतायें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! उभयमुखी गौ-दानका संयोग बड़े भाग्यसे प्राप्त होता है। जबतक बछड़ेके पैर प्रसवके समय भीतर हों और केवल सिर बाहर दिखलायी दे, उस समय वह गौ मानो साक्षात् सप्तद्वीपवती पृथ्वी है। ऐसी उभयमुखी गौके दानके फलका वर्णन शक्य नहीं। यज्ञ और दान करनेसे जो फल प्राप्त नहीं होता, वह फल
केवल उभयमुखी धेनुके दानसे ही प्राप्त हो जाता है और दाताका उद्धार हो जाता है। सींगोंको स्वर्णसे, खुरोंको चाँदीसे तथा पूँछको मोतीकी मालाओंसे अलंकृतकर जो उभयमुखी धेनुका दान करता है, वह गौ और बछड़ेके शरीरमें जितने रोम हैं, उतने ही हजार वर्षतक स्वर्गमें पूजित होता है तथा अपने पितरोंका उद्धार कर देता है। जो व्यक्ति सुवर्णसहित उभयमुखी धेनुका दान करता है, उसके लिये गोलोक और ब्रह्मलोक सुलभ हो जाता है। दुर्बल, अङ्गहीन गौ और दक्षिणासे रहित दान नहीं करना चाहिये।
(अध्याय १५८)
१-इतने बहुमूल्य रत्नोंका दान करनेके उल्लेखसे लोभ, धूर्तता या असम्भावनाकी कल्पनाकर चकित नहीं होना चाहिये, क्योंकि पूर्ण धर्माचरण, देवाराधन और ईमानदारी तथा परस्पर उपकारकी भावनासे भारत ऐसा ही समृद्ध था कि कोई वस्तु दाम लेकर नहीं बेची जाती थी। इस बातको ‘कल्याण’ के ‘हिन्दू संस्कृति-अङ्क’ से लेकर १९६८ के कई साधारण अङ्कोंमें बार-बार प्रमाणोंद्वारा सिद्ध किया गया है।
२-अन्य पुराणोंमें भी इसका महत्त्व आया है और इसकी परिक्रमासे सप्तद्वीपवती पृथ्वीकी परिक्रमाका पुण्य बतलाया गया है।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
५७७
गोसहस्रदान-विधि
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—जनार्दन! आप गोसहस्रदानका विधान बतायें। यह किस समय किस विधिसे किया जाता है।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्रजेश्वर! गौएँ सम्पूर्ण संसारमें पवित्र हैं और गौएँ ही उत्तम आश्रयस्थान हैं। संसारकी आजीविकाके लिये ब्रह्माजीने इनकी सृष्टि की है। तीनों लोकोंके हितकी कामनासे गौकी सृष्टि प्रथम की गयी है। इनके मूत्र और पुरीषसे देवमन्दिर भी पवित्र हो जाते हैं औरोंके लिये तो कहना ही क्या! गौएँ काम्य यज्ञोंकी मूलाधार हैं, इनमें सभी देवताओंका निवास है। गोमयमें साक्षात् लक्ष्मीका निवास है। ब्राह्मण और गौ—दोनों एक ही कुलके दो रूप हैं। एकमें मन्त्र अधिष्ठित हैं और एकमें हविष्य-पदार्थ। इन्हीं गौओंके पुत्रोंके द्वारा सारे संसार और देवताओंका भरण-पोषण होता है। राजन्! आप ऐसी विशिष्ट गुणमयी गौके दानका विधान सुनें। एकमात्र सर्वगुण तथा सर्वलक्षणसम्पन्न गौका दान करनेपर समस्त कुटुम्ब तर जाता है, फिर यदि अधिक गौएँ दानमें दी जायें तो उनके माहात्म्यके विषयमें क्या कहा जाय?
प्राचीन कालमें महाराज नहुष और महामति ययातिने भी सहस्रों गौओंका दान किया था, जिसके प्रभावसे वे ब्रह्म-स्थानको प्राप्त हो गये। पुत्रकी कामनासे देवी अदितिने भी गङ्गाजीके तटपर अपार गोदान किया था, जिसके फलस्वरूप उन्होंने तीनों लोकोंके स्वामी नारायण (भगवान् वामन—उपेन्द्र)—को पुत्ररूपमें प्राप्त किया।
राजन्! ऐसा सुना जाता है कि पितृगण इस प्रकारकी गाथा गाते हैं—क्या मेरे कुलमें ऐसा
कोई पुण्यात्मा पुत्र होगा, जो सहस्रों गौओंका दान करेगा, जिसके पुण्यकर्मसे हम सब परमसिद्धिको प्राप्त कर सकेंगे अथवा हमारे कुलमें सहस्रों गोदान करनेवाली कोई दुहिता (कन्या) होगी, जो अपने पुण्य-कर्मके आधारपर मेरे लिये मोक्षकी सीढ़ी तैयार कर देगी?
राजन्! अब मैं शास्त्रोक्त सार्वकामिक गोसहस्रदानरूप यज्ञकी विधि बता रहा हूँ। दाता किसी तीर्थस्थान अथवा गोष्ठ या अपने घरपर ही दस अथवा बारह हाथका लम्बा-चौड़ा एक सुन्दर मण्डप बनवाये। उसमें तोरण लगाये जायें। उसके चारों दिशाओंमें चार दरवाजे लगाये जायें। मण्डपके मध्यमें चार हाथकी एक सुन्दर बेदी बनाये। इस बेदीके पूर्वोत्तर-दिशा (ईशानकोण)—में एक हाथके प्रमाणकी ग्रहवेदीका निर्माण करे। ग्रहयज्ञके विधानसे उसपर क्रमसे ग्रहोंकी स्थापना करे। सर्वप्रथम ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रकी अर्चना करनी चाहिये। यज्ञके लिये ऋत्विजोंका वरण, पुनः वेदीके पूर्वोत्तर-भागमें एक शिव-कुण्डका निर्माण कर द्वार-प्रदेशमें पल्लवोंसे सुशोभित दो-दो कलशोंकी स्थापना करनी चाहिये और उनमें पञ्चरत्न डाल देना चाहिये। तदनन्तर हवन करना चाहिये। तुलापुरुषदानके समान इसमें भी लोकपालोंके निमित्त बलि-नैवेद्य प्रदान करना चाहिये। सहस्रों गौओंमेंसे सवत्सा दस गौओंको अलग कर उन्हें वस्त्र और माला आदिसे खूब अलंकृत कर ले। इन दसों गौओंके मध्य जाकर विधिपूर्वक सबकी पूजा करे। इनके गलेमें सोनेकी घंटी, ताँबेके दोहनपात्र, खुरोंमें चाँदी और मस्तकको सुवर्ण-तिलकसे अलंकृतकर सींगोंमें भी सोना लगा दे।
१-यासां मूत्रपुरीषेण देवतायतनायपि । शुचीनि समजयन्त किं भूतमधिकं ततः ॥ (उत्तरपर्व १५९।३)
२-दुहिता वा कुले काचिद् गोसहस्रप्रदायिनी । सोपानः सुगतिर्दत्तो भविष्यति न संशयः ॥ (उत्तरपर्व १५९।१४)
584 Sankshipta Bhavishya Puran, Section 20.1, Front Page Content. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
५७८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
गोमाताके चतुर्दिक् चमर डुलाना चाहिये। इसी प्रसंगमें मुनियोंने सुवर्णमय नन्दिकेश्वर (वृषभ)-को लवणके ऊपर रखकर अथवा प्रत्यक्ष वृषभके भी दानका विधान बतलाया है। इस प्रकार दस-दस गौके क्रमसे गौसहस्र या गौशत दान करना चाहिये। यदि संख्यामें सम्पूर्ण गौएँ उपलब्ध न हो सकें तो दस गौओंकी पूजा कर शेष गौओंकी परिकल्पना कर उनका दान करना चाहिये१।
तदनन्तर पुण्यकाल आनेपर गीत एवं माङ्गलिक शब्दोंके साथ वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान कराया हुआ यजमान अञ्जलिमें पुष्प लेकर इस प्रकार उच्चारण करे—‘विश्वमूर्तिस्वरूप विश्वमाताओंको नमस्कार है। लोकोंको धारण करनेवाली रोहिणीरूप गौओंको बारम्बार प्रणाम है। गौओंके अङ्गोंमें इक्कीसों भुवन तथा ब्रह्मादि देवताओंका निवास है, वे रोहिणीस्वरूपा२ माताएँ मेरी रक्षा करें। गौएँ मेरे अग्रभागमें रहें, गौएँ मेरे पृष्ठभागमें रहें, गौएँ नित्य मेरे चारों ओर वर्तमान रहें और मैं गौओंके मध्यमें निवास करूँ३। चूँकि तुम्हीं वृषरूपसे सनातन धर्म और भगवान् शिवके वाहन हो, अतः मेरी रक्षा करो!’ इस प्रकार आमन्त्रित कर बुद्धिमान् यजमान सभी सामग्रियोंके साथ एक गौ और नन्दिकेश्वरको गुरुको दान कर
दे तथा उन दसों गौओंमेंसे एक-एक तथा हजार गौओंमेंसे एक-एक सौ, पचास-पचास अथवा बीस-बीस गौ प्रत्येक ऋत्विजको समर्पित कर दे। तत्पश्चात् उनकी आज्ञासे अन्य ब्राह्मणोंको दस-दस या पाँच-पाँच गौएँ देनी चाहिये। एक ही गाय बहुतोंको नहीं देनी चाहिये, क्योंकि वह दोषप्रदायिनी हो जाती है। बुद्धिमान् यजमानको आरोग्यवृद्धिके लिये एक-एकको अनेक गौएँ देनी चाहिये। इस प्रकार एक हजार गोदान करनेवाला यजमान एक दिनके लिये पुनः पयोन्नत करे और इस महादानका अनुकीर्तन स्वयं सुनाये अथवा सुने।
यदि उसे विपुल समृद्धिकी इच्छा हो तो उस दिन ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करना चाहिये। इस विधिसे जो मनुष्य एक हजार गौओंका दान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर सिद्धों एवं चारणोंद्वारा सेवित होता है। वह क्षुद्र घंटियोंसे सुशोभित सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर आरूढ़ होकर सभी लोकपालोंके लोकोंमें देवताओंद्वारा पूजित होता है। इस गौसहस्रदानसे पुरुष अपने इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। गोदानमें गौ, पात्र, काल एवं विधिका विशेषरूपसे विचार करना चाहिये। (अध्याय १५९)
वृषभदानकी महिमा
महाराज युधिष्ठिरने कहा—जनार्दन! आपकी हृदयमें एक कौतूहल है। तीनों लोकोंमें यह प्रसिद्धि अमृतमयी वाणीसे मुझे तृप्ति नहीं हो रही है, मेरे है कि गौओंका स्वामी—गोपति (वृषभ)
१-भविष्यपुराणमें बार-बार गौओंकी अपार महिमा और गौसहस्रदान आदिकी विधिका निर्देश यही सूचित करता है कि भारत गो-भक्त देश था और यहाँ दूध-दहीकी सचमुच नदियाँ बहती थीं। कृष्णके व्रजमें गो-चारणकी कथा और वहाँकी अद्भुत गो-सम्पत्तिकी कथा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। आज जो भारत कंगाल-सा बन गया है तथा रत्नदान, सुवर्णशृङ्खली सहस्र गोदान आदिकी बातें कल्पना-सी लगती होंगी, वह सब शास्त्रोंकी उपेक्षा और गो-भक्ति-शून्यताका ही परिणाम है।
२-वाजसने० ८।४१ आदिमें बार-बार रोहिणीरूपा गौओंको कामधेनु एवं सुरभिरूपा कहा गया है। रोहिणी गौ प्रायः लाल वर्णकी होती है।
३-गावो ममाग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पृष्ठतः। गावो मे सर्वतः सन्तु गावां मध्ये वसाय्यहम्॥ (उत्तरपर्व १५९।३३)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sanskrit Peetham 584 Sankshipta Bhavishya Puran_Section_20_1_Back