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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 580, कुल 654 में से

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पृष्ठ 580
  • उत्तरपर्व *

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लेकर दर-दर भटकता हुआ याचना करता रहता है। अनेक प्रकारके कष्टोंको सहकर प्राणोंसे भी अधिक प्रिय जो धन एकत्र किया गया है, उसकी एक ही सुगति है दान। शेष भोग और नाश तो प्रत्यक्ष विपत्तियाँ ही हैं१। उपभोगसे और दानसे धनका नाश नहीं होता, केवल पूर्व-पुण्यके क्षीण होनेसे ही धनका नाश होता है। मरणोपरान्त धनपर अपना स्वामित्व नहीं रह जाता, इसलिये अपने हाथसे ही सुपात्रको धनका दान कर लेना चाहिये। राजन्! दान देनेके अनेक रूप हैं, इस विषयमें व्यास, वाल्मीकि, मनु आदि महापुरुषोंने पहले ही बतलाया है कि पूर्वजन्ममें किये गये व्रत, दान एवं देवपूजन आदि पुण्यकर्म ही दूसरे जन्ममें फलीभूत होते हैं।

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! भगवान् विष्णु, शिव एवं ब्राह्मणोंकी प्रसन्नताके लिये जो दान जिस विधिसे देना चाहिये आप उस विधिका वर्णन करें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! गौ, भूमि और सरस्वती—ये तीन दान सभी दानोंमें श्रेष्ठ और मुख्य हैं। ये अतिदान कहे गये हैं२। गायोंके दुहने, पृथ्वीको जोतकर अन्न उपजाने तथा विद्याके पढ़ने-पढ़ानेसे सात कुलोंका उद्धार होता है। अब मैं दान देने योग्य गौके लक्षणों और गोदानकी विधि बता रहा हूँ—महाराज! सुपुष्ट, सुन्दर, सवत्सा, पयस्विनी और न्यायपूर्वक अर्जित धनसे प्राप्त गौ श्रेष्ठ ब्राह्मणको देना चाहिये। वृद्धा, रोगिणी, वन्ध्या, अङ्गहीन, मृतवत्सा, दुःशीला और दुःधरहित तथा अन्यायपूर्वक प्राप्त गौका कभी दान नहीं करना

चाहिये। राजन्! किसी पुण्य दिनमें स्नानकर पितरोंका तर्पणकर भगवान् शिव और विष्णुका घी और दुग्धसे अभिषेक करनेके बाद सोनेके सींगयुक्त, रौप्य खुरवाली, कांस्यके दोहन-पात्रसहित सवत्सा गौका पुष्प आदिसे भलीभाँति पूजन करना चाहिये, उसे वस्त्र तथा माला आदिसे अलंकृत कर ले। गौको पूर्व या उत्तराभिमुख खड़ा करना चाहिये। अनन्तर दक्षिणाके साथ ब्राह्मणको गौका दान करना चाहिये और प्रार्थनापूर्वक इस प्रकार प्रदक्षिणा करनी चाहिये—

गावो ममाग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पृच्छतः ॥

गावो मे हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम्।

(उत्तरपर्व १५१।२९-३०)

गायकी पूँछ पकड़कर, हाथीका सँड़, घोड़ेका कान तथा दासीके सिरका स्पर्श कर और मृगचर्मकी पूँछ पकड़कर दान करना चाहिये। जब ब्राह्मण गाय लेकर जाने लगे तो उसके पीछे-पीछे आठ-दस कदमतक जाना चाहिये। इस विधिसे जो व्यक्ति गोदान करता है, उसे सभी प्रकारके अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं और स्वर्गकी प्राप्ति होती है। सात जन्मोंमें किये गये पापका उसी क्षण नाश हो जाता है। राजन्! यह विधि दक्षप्रजापतिके लिये भगवान् विष्णुने कही है। गोदान करनेवाला चतुर्दश इन्द्रोंके समयतक स्वर्गमें निवास करता है। यह गोदान सभी पापोंको दूर करनेवाला है। इससे बढ़कर और कोई प्रायश्चित्त नहीं है। गोदान ही एक ऐसा दान है, जो जन्म-जन्मान्तरतक फल देता रहता है।'

(अध्याय १५१)

१-आयासशतलब्धस्य प्राणेभ्योऽपि गरीयसः। गतिरेकेव वित्तस्य दानमन्या विपत्तयः ॥ (उत्तरपर्व १५१।११)

दानं भोगो नाशस्तिक्षो गतथो भवन्ति धनस्य। यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ॥ (सुभाषितरत्नावली)

सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोऽ पाकी ॥ (रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड)

२-त्रौण्याहुरतिदानानि गावः पृथ्वी सरस्वती। (उत्तरपर्व १५१।१८)

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