भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 581, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
तिलधेनु-दानकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज ! अब मैं भगवान् वाराहके द्वारा कहे गये तिलधेनु-दानकी विधि बता रहा हूँ। जिससे दाता ब्रह्महत्यादि महापातकों तथा सभी उपपातकोंसे मुक्त हो जाता है और स्वर्गमें निवास करता है।
पहले पृथ्वीको गोबरसे लीपकर उसपर काला मृगचर्म तथा उसके चारों ओर कुश बिछा ले। तदनन्तर उसपर गायकी आकृतिके रूपमें तिलकी राशि फैला ले अर्थात् तिलमयी धेनु बना ले। सफेद, कृष्ण, भूरे तथा गोमूत्रवर्णके तिलोंसे धेनुकी रचना करनी चाहिये। चार आढकके मानकी गाय और एक द्रोण तिलसे बछड़ेका निर्माण करे। गायके खुरके पास चाँदी, सींगके पास स्वर्ण, जिह्वाके पास शक्कर, मुखके पास गुड़, गलकम्बलके पास कम्बल, पैरके स्थानमें ईख, पीठके स्थानपर ताँबा और नेत्रोंके लिये मुक्ता रखनी चाहिये। इसी प्रकार कानके स्थानपर पीपलके पत्ते, दाँतोंके स्थानपर फल, पूँछके स्थानपर माला और स्तनोंके स्थानपर मक्खन रखे। सिरके स्थानपर सफेद वस्त्र, रोमोंके स्थानपर सफेद सरसों रख दे। सुन्दर फलों तथा मणि-मुक्ताओंसे उस तिलमयी कल्पित धेनुको सुसज्जित करे। कांस्यकी दोहनी भी समीपमें रख दे। किसी पुण्य पर्वके दिन उस धेनुका पूजन इत्यादि कर ब्राह्मणको दान कर दे और इस मन्त्रको पढ़ते हुए प्रार्थनापूर्वक प्रदक्षिणा करे—
या लक्ष्मीः सर्वभूतानां या वै देवेष्बवस्थिता।
धेनुरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु॥
(उत्तरपर्व १५२।१५)
दक्षिणासहित गाय ब्राह्मणको दे दे। इस विधिसे जो तिलधेनुका दान करता है, वह व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त होकर परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है।
जो व्यक्ति इस दानका अनुमोदन कर प्रसन्नचित्त होकर प्रशंसा करते हैं तथा विधिपूर्वक जो ब्राह्मण दान ग्रहण करते हैं, वे भी ब्रह्मलोकको प्राप्त करते हैं। प्रशान्त, सुशील, वेदव्रतपरायण ब्राह्मणके लिये तिलधेनुका दान करनेवाले व्यक्तिको अपने कृत-अकृतका शोक नहीं करना पड़ता। तिलधेनु-दान करनेवाले व्यक्तिको तीन दिन अथवा एक दिन तिलका ही भोजन करना चाहिये। दान करनेसे मनुष्यके पाप नष्ट हो जाते हैं और उसके अंदर पवित्रता आ जाती है। तिलका भक्षण करना चान्द्रायणव्रतसे अधिक श्रेष्ठ माना गया है। बाल्य, युवा अथवा वृद्धावस्थामें मन, वचन तथा कर्मसे जो पाप हुआ हो अथवा अभक्ष्य-भक्षण, अगम्यागमन, अपेयपान इत्यादि जो पातक, महापातक और उपपातक किये गये हों, वे सब तिलधेनुके दानसे दूर हो जाते हैं। पवित्र गङ्गा आदि नदियोंमें थूकने तथा नग्न स्नान करनेसे जो पाप होता है, वह भी नष्ट हो जाता है। तिलधेनुका दान करनेवाला व्यक्ति यमलोकके मार्गकी भयंकर यातनाओंका अतिक्रमण कर सुवर्णके विमानमें बैठकर उत्तम लोकमें चला जाता है। राजन् ! नैमिषारण्यमें कथा-प्रसंगके समय मुनियोंने यह विधि सुनायी और नारदजीने मुझे इस विधिकी उपदेश किया, वही तिलधेनु-दानकी विधि मैंने आपसे कही है। तिलधेनुका दान करना पवित्र, पुण्य और माङ्गल्यप्रद तथा कीर्तिवर्धक है। श्राद्धके समय ब्राह्मणोंको इस माहात्म्यका श्रवण करानेसे अनन्त पुण्य प्राप्त होता है। गौ, घर, शय्या और कन्या एक व्यक्तिको ही देनी चाहिये, क्योंकि विभाजनसे दोनोंको अधोगतिकी प्राप्ति होती है और विक्रय करनेसे सात कुल दुर्गतिको प्राप्त करते हैं। इस दानके प्रभावसे दान करनेवाला
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