भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 582, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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उत्तम विमानमें बैठकर साक्षात् विष्णुभगवान् के समीप पहुँच जाता है। माघ अथवा कार्तिककी पूर्णिमा, चन्द्र-सूर्य-ग्रहण, अयन-संक्रान्ति, विषुव-
योग, व्यतीपात-योग, वैशाख अथवा मार्गशीर्षकी पूर्णिमा और गजच्छाया-योगमें तिलधेनुका दान प्रशस्त माना गया है। (अध्याय १५२)
जलधेनु-दानके प्रसंगमें महर्षि मुद्गलका आख्यान
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं जलधेनु-दानकी विधि बता रहा हूँ, जिससे देवाधिदेव भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। उत्तम जलसे पूर्ण एक कलश स्थापित करे, उसमें पञ्चरत्न, धान्य, दूर्वा, पञ्चपल्लव, कुष्ठसंज्ञक ओषधि, खश, जटामांसी, मुरा, प्रियंगु और आँवला छोड़े। फिर उसे दो श्वेत वस्त्रों, यज्ञोपवीत और पुष्पमालाओंसे अलंकृत करे। कुशके आसनपर कलशको रखकर उसके आस-पास जूता, छाता आदि तथा चारों दिशाओंमें चाँदीके चार पात्रोंमें तिल, दही, घृत और मधु भरकर रखे। कलशमें सवत्सा धेनुकी कल्पना कर उसे गोमयसे उपलिस कर दे। पूँछके स्थानपर माला लटका दे। समीपमें दोहनपात्र भी रख ले। इसके बाद सब उपचारोंसे भगवान् विष्णुकी यथाशक्ति पूजा कर उस कलशमें जलधेनुकी अभिमन्त्रणा करे और इस प्रकार कहे— विष्णोर्वक्षसि या लक्ष्मीः स्वाहा या च विभावसोः। सोमशक्रार्कशक्तिर्था धेनुरूपेण साऽस्तु मे॥
(उत्तरपर्व १५३।८)
‘जो गौमाता भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें लक्ष्मीके रूपमें निवास करती हैं और अग्निदेवकी पत्नी स्वाहा तथा चन्द्रमा, सूर्य एवं इन्द्रकी शक्ति-रूपमें प्रतिष्ठित हैं वे मेरे लिये इस जलरूपी कलशमें अधिष्ठित हों।’
इस मन्त्रसे कलशमें धेनुको प्रतिष्ठितकर वत्स-समन्वित उस जलधेनुका तथा जलशायी भगवान् अच्युत गोविन्दका भलीभाँति पूजन करे। तदनन्तर वीतराग और शान्तचित्त होकर भगवान् विष्णुकी
प्रसन्नताके लिये उस कलशस्थित जलधेनुका ब्राह्मणको दान कर दे और इस प्रकार कहे—
शेषपर्यङ्कशयनः श्रीमाञ्छाङ्गविभूषितः।
जलशायी जगद्योनिः प्रीयतां मम केशवः॥
(उत्तरपर्व १५३।११)
‘शेषनागरूपी शय्यापर शयन करनेवाले, शार्ङ्धनुषसे विभूषित, जलशायी, जगद्योनि, श्रीसम्पन्न भगवान् केशव! आप (इस दानरूपी कर्मसे) मुझपर प्रसन्न हों।’
दान करनेके बाद उस दिन गोव्रत करना चाहिये। इस विधिसे जलधेनुका दान करनेवाला व्यक्ति सभी प्रकारके आनन्दको प्राप्त करता है तथा उसे सार्वकालिक अतुल शान्ति प्राप्त होती है एवं सभी मनोरथोंकी सिद्धि हो जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं।
राजन्! इस विषयमें एक आख्यान सुना जाता है जो इस प्रकार है—किसी समय जातिस्मर महात्मा मुद्गल-ऋषि भ्रमण करते हुए यमलोकमें गये। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि पापी जीव अनेक प्रकारके कुम्भीपाक आदि दारुण नरकमें कष्ट भोग रहे हैं और यमराजके अति भयंकर दूत उन्हें अनेक प्रकारके दुःख दे रहे हैं। मुद्गलमुनिको देखकर नरकके जीवोंकी पीड़ा शान्त हो गयी और उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई तथा वे सुखका अनुभव करने लगे। जीवोंको सुखी देखकर मुनिको बहुत आश्चर्य हुआ, उसपर उन्होंने यमराजसे इसका कारण पूछा। यमराजने कहा—‘मुने! आपको देखकर नरकके जीवोंको जो प्रसन्नता हुई है, उसका
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