भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 574, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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नक्षत्रार्चन-विधि ( रोगावलचक्र )
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! एक बार कौशिकमुनि अग्निकोत्र करनेके बाद सुखपूर्वक बैठे हुए थे। उसी समय महर्षि गगने उनसे पूछा—‘ब्रह्मन्! बंदीगृहमें निरुद्ध हो अथवा विषम परिस्थितियोंमें अवरुद्ध, दस्यु, शत्रु या हिंस्र पशुओंसे घिरा हो तथा व्याधियोंसे पीड़ित तो ऐसे व्यक्तिकी कैसे मुक्ति हो सकती है। इसे आप मुझे बतलायें।’
कौशिकमुनि बोले—गर्भाधानके समय, जन्म-नक्षत्रमें, मृत्यु-सम्बन्धी ज्ञान होनेपर जिसको रोग-व्याधि उत्पन्न हो जाती है, उसे कष्ट तो होता ही है, उसकी मृत्यु भी सम्भाव्य है। यदि कृतिका नक्षत्रमें कोई व्याधि होती है तो वह पीड़ा नौ राततक बनी रहती है। रोहिणीमें तीन राततक, मृगशिरामें पाँच राततक और यदि आर्द्रामें रोग उत्पन्न हो तो वह व्याधि प्राण-वियोगिनी हो जाती है। पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्रमें सात रात, आश्लेषामें नौ रात, मघामें बीस दिन, पूर्वाफाल्गुनीमें दो मास, उत्तराफाल्गुनीमें तीन पक्ष (पैंतालीस दिन), हस्तमें स्वल्पकालिक पीड़ा, चित्रामें आधे मास, स्वातीमें दो मास, विशाखामें बीस दिन, अनुराधामें दस दिन, ज्येष्ठामें आधे मास और मूलमें मृत्यु हो जाती है। पूर्वाषाढ़ामें पंद्रह दिन, उत्तराषाढ़ामें बीस दिन, श्रवणमें दो मास, धनिष्ठामें आधा मास, शतभिषामें दस दिन, पूर्वाभाद्रपदमें नौ दिन, उत्तराभाद्रपदमें पंद्रह दिन, रेवतीमें दस दिन तथा अश्विनीमें एक दिन-रात कष्ट होता है।
मुने! कुछ विशिष्ट नक्षत्रोंमें व्याधि उत्पन्न
होनेपर मनुष्यके प्राणतक भी चले जाते हैं*, इसमें संदेह नहीं। इसकी विशेष जानकारीके लिये ज्योतिषियोंसे भी परामर्श करना चाहिये।
रोगके प्रारम्भिक नक्षत्रका ज्ञान हो जानेपर उस नक्षत्रके अधिदेवताके निमित्त निर्दिष्ट द्रव्योद्धार हवन करनेसे रोग-व्याधिकी शान्ति हो जाती है। व्याधि नक्षत्रके किस चरणमें उत्पन्न हुई है, इसका ठीक पता लगाकर आपत्तिजनक स्थितियोंमें व्याधिसे मुक्तिके लिये उस नक्षत्रके स्वामीके मन्त्रोंसे अभीष्ट समिधाद्धार हवन करना चाहिये। अश्विनी नक्षत्रमें क्षीरी (दूधवाले—वट, पीपल, खिरनी आदि) वृक्षोंकी समिधासे अश्विनीकुमारोंके मन्त्रोंसे हवन करना चाहिये। भरणीमें ‘यमदैवत यमाय स्वाहा०’ इस मन्त्रसे घी, मधु और तिलसे हवन करना चाहिये। इसी प्रकार कृतिकामें भी अग्निके मन्त्रोंसे हवन करना चाहिये। रोहिणीमें प्रजापतिके मन्त्रसे, मृगशिरामें घीसे, पुनर्वसुमें दितिदेवीके लिये दूध और घी-मिश्रित आहुति प्रदान करनी चाहिये। पुष्यमें बृहस्पतिके मन्त्रोंसे घी और दूधद्धार, आश्लेषाके देवता सर्प हैं, अतः बड़के दूध और घीसे मिश्रित आहुति देनी चाहिये। इसी प्रकार स्वाती, मूल आदि सभी नक्षत्रोंमें घी-मिश्रित आहुति देनी चाहिये।
मुने! ब्रह्माजीने यह बतलाया है कि विधिपूर्वक गायत्री-मन्त्रद्धार भी प्रायः एक सहस्र (१,०००) घृतकी आहुतियाँ देनेपर सम्पूर्ण ज्वरों एवं व्याधियोंका सद्यः उपशमन हो सकता है। क्योंकि गायत्रीका अर्थ ही है कि गान, हवन, पूजनद्धार त्राण करनेवाली।
(अध्याय १४५)
- ज्योतिर्निबन्ध आदि ज्योतिष-ग्रंथोंके अनुसार आर्द्रा, आश्लेषा, पू०फा०, स्वाती, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ा और पू०भा० में मृत्युका भय होता है या बीमारी स्थिर हो जाती है। अतः इसकी निवृत्तिके लिये तत्त्वं मन्त्र आदिका जप-हवन करना चाहिये।
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