सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 575, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 575

५६४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अपराधशतशमन-व्रत

महर्षि वसिष्ठजीने राजा इक्ष्वाकुसे कहा— राजन्! अब आपको एक व्रत बतला रहा हूँ, जिससे महाफलकी प्राप्ति होती है और सैकड़ों दोष—पापोंका शमन हो जाता है।

राजा इक्ष्वाकुने पूछा—ब्रह्मन्! मुख्यरूपसे सौ अपराध या दोष-पाप कौन-कौन हैं और वह व्रत कौन-सा है, जिसके अनुष्ठानमात्रसे उनकी शान्ति हो जाती है। इस व्रतमें किस देवताकी पूजा होती है और किस समय यह व्रत किया जाता है, आप बतलानेकी कृपा करें।

महर्षि वसिष्ठ बोले—महाबाहो! अपराधशतशमन-व्रतको सुनो, जिसका अनुष्ठान करनेमात्रसे मनुष्यको सभी प्रकारकी कामनाएँ और मुक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं। कृत-अकृत सभी गुरुतर पाप रूढ़ीकी राशिके समान जलकर भस्म हो जाते हैं। राजन्! अब आप इन अपराधोंके नाम और लक्षणको सुनें—अनाश्रमित्व—चारों आश्रमोंसे बाहर रहकर स्वच्छन्द नास्तिकवृत्ति अपनाना, अनग्रिता—अग्रिहोत्र, हवन आदि सभी कार्योंका परित्याग, व्रतहीनता—कोई भी सत्य, ब्रह्मचर्य और एकादशी आदि व्रतोंका पालन न करना, अदातुत्व—कभी भी कुछ भी अन्न, धन या आशीर्वाद आदि न देना, अशौच, निर्दयता, लोभ, क्षमाशून्यता, जनपीड़ा, प्रपञ्चमें पड़ना, अमङ्गल, व्रतभङ्ग, नास्तिकता, वेदनिन्दा, कठोरता, असत्यता, हिंसा, चोरी, इन्द्रिय-परायणता, मनको वशमें न रखना, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, दम्भ, शठता, धूर्तता, कटुभाषण, प्रमाद, स्त्री, पुत्र, माता आदिका पालन न करना, अपूज्यकी पूजा करना, श्राद्धका त्याग, जप न करना, बलिवैश्वदेव तथा पञ्चयज्ञका त्याग, संध्या, तर्पण, हवन आदि नित्यकर्मोंका परित्याग, अग्रिका बुझाना, ऋतुकालके बिना ही

स्त्री-सम्पर्क, पर्व आदिमें स्त्री-सहवास, चुगली, दूसरेकी स्त्रीके साथ गमन, वेश्यागामिता, अपात्रको दान देना, अल्पदान, अन्त्यजसङ्ग, माता-पिताकी सेवा न करना, सबसे झगड़ा करना, पुराण और स्मृतियोंका अनादर करना, अभक्ष्य-भक्षण, स्वामि-द्रोह, बिना विचारे कार्य करना, कृषि-कार्य करना, भार्यासंग्रह, मनपर विजय न प्राप्त करना, विद्याकी विस्मृति, शास्त्रका त्याग करना, ऋण लेकर वापस न करना, चित्रकर्म करना, सदा कामनाओंका दास होना, भार्या, पुत्र एवं कन्या आदिका विक्रय करना, पशु-मैथुन, इन्धनार्थ वृक्ष काटना, बिलोंमें पानी आदि डालना, तडागादिके जलको दूषित करना, विद्याका विक्रय, स्ववृत्तिका परित्याग, याचना, कुमित्रता, स्त्री-वध, गो-वध, मित्र-वध, भ्रूण-हत्या, पौरौहित्य, दूसरेका अन्न और शूद्रके अन्नको ग्रहण करना, शूद्रका अग्रिकर्म सम्पन्न करना, विधिविहीन कर्मका निष्पादन, कुपुत्रता, विद्वान् होनेपर याचना करना, वाचालता, प्रतिग्रह लेना, श्रौत-संस्कारहीनता, आर्त व्यक्तिका दुःख दूर न करना, ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्णचोरी, गुरुपत्नीगमन तथा पातकियोंके साथ सम्बन्ध स्थापित करना—ये अपराध हैं। अन्य तत्त्ववेताओंने भी विविध प्रकारके अपराधोंको कहा है।

अनघ! भगवान् सत्येशकी पूजा करनेसे तत्क्षण सभी प्रकारके अपराध नष्ट हो जाते हैं। मनुष्योंद्वारा व्रत और पूजन करनेसे भगवान् स्वयं उसके वशमें हो जाते हैं। ये जगत्पति भगवान् विष्णु लक्ष्मीके साथ सत्यरूपी ध्वजके ऊपर स्थित रहते हैं। इनके पूर्वमें वामदेव, दक्षिणमें नृसिंहभगवान्, पश्चिममें भगवान् कपिल, उत्तरमें वराह तथा ऊर्ध्वमें अच्युत स्थित रहते हैं। इन्हें ही ब्रह्मपञ्चक जानना चाहिये। ये ही सत्येश हैं, इन्हींकी सदैव

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth