भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 576, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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पूजा करनी चाहिये। ये सत्येशभगवान् पद्म, कौमोदकी गदा, पाञ्चजन्य शङ्ख तथा सुदर्शन चक्र धारण किये रहते हैं। इनके चरणकमलके अग्रभागसे पवित्र गङ्गाका प्रादुर्भाव हुआ है। इनकी आठ शक्तियाँ हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—जया, विजया, जयन्ती, पापनाशिनी, उन्मीलनी, वंजुली, त्रिस्पृशा और विवर्धना। वे भगवान् हरि शुक्लाम्बरधारी, सौम्य, प्रसन्नमुख, सभी आभरणोंसे युक्त, शोभायमान और भूक्ति-मुक्तिप्रदाता हैं।
राजन्! उनकी जिस विधिसे प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये, उसे आप सुनें। मार्गशीर्ष आदि बारह मासोंमें द्वादशी, अमावास्या अथवा अष्टमीके दिन शुक्ल या कृष्ण पक्षका विचार किये बिना शुद्ध होकर उपवासपूर्वक व्रत करना चाहिये। शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षोंमें जनार्दनकी पूजा करनेका संकल्प लेना चाहिये। इस प्रकार नियम ग्रहण करके दन्तधायनपूर्वक तडाग, पुष्कर अथवा घरपर ही स्नानकर नित्य-नैमित्तिक कर्म करने चाहिये। एक पल सुवर्णके मानसे लक्ष्मीसहित सत्येशकी प्रतिमा बनवाये जो अष्टशक्तियोंसे समन्वित पद्मासनपर स्थित हो। दुग्धसे पूरित कुम्भपर स्थित सुवर्ण-पद्मके ऊपर उस प्रतिमाको स्थापित करे। उस पद्मकी कर्णिकाओंपर देवाधिदेवकी आठ शक्तियोंकी पूजा करे। अनन्तर भगवान् सत्येश (विष्णु) और सत्या (लक्ष्मी)-की विधिवत् विविध पाद्यादि उपचारोंसे पूजा करे। अनन्तर
इस प्रकार प्रार्थना करे—
कृष्ण कृष्ण प्रभो राम राम कृष्ण विभो हरे। ब्राहि मां सर्वदुःखेभ्यो रमया सह माधव॥ पूजा चेयं मया दत्ता पितामह जगद्गुरो। गृहाण जगदीशान नारायण नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व १४६।४८-४९)
अनन्तर अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणको दान देकर व्रतका समापन करना चाहिये। इस व्रतको दोनों पक्षोंमें करे और वर्ष पूरा होनेपर उद्यापन करे। ब्राह्मणसे प्रार्थना करे कि हे ब्राह्मण देवता! मेरे सभी पाप दूर हो जायें। ब्राह्मण कहें—‘आपके सभी पाप एवं दुःख दूर हो जायें।’ तदनन्तर ब्राह्मणको वह मूर्ति समर्पित कर समापन करना चाहिये।
राजन्! ब्रह्मजीने कहा है कि इस व्रतको करनेसे अनन्त फलकी प्राप्ति होती है। जो फल सभी वेदोंके अध्ययनसे और सभी तीर्थोंमें भ्रमण करनेसे प्राप्त होता है, उससे कोटिगुना फल इस व्रतके आचरणसे होता है और व्रतीको इस लोकमें धन, धान्य, पुत्र, पौत्र, मित्र तथा सुखकी प्राप्ति होती है। व्रतको करनेवाले व्यक्तिको विद्या और आरोग्यकी भी प्राप्ति होती है तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्ति होती है। इसमें कोई संदेह नहीं है। जो इसको पढ़ता अथवा सुनता है, उसके भी सभी पाप दूर हो जाते हैं।
(अध्याय १४६)
काञ्चनपुरीव्रत-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! एक बार विश्वके उत्पत्ति, पालन और संहारकारक अक्षर पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु श्वेतद्वीपमें सुखपूर्वक बैठे हुए थे। उसी समय जगन्माता लक्ष्मीने उनके चरणोंमें पञ्चाङ्ग प्रणाम कर उनसे पूछा—‘भगवन्!
आप भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले हैं। महाभाग! मुझपर भी दया करके आप कोई ऐसा रूप-सौभाग्यदायक सर्वोत्तम व्रत बतलायें, जिसके आचरणसे समस्त तीर्थ आदि पुण्य कर्मोंका फल प्राप्त हो जाय।’
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