सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 587, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 587

५७६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

सिरकी जगह सौ हीरोंको स्थापित करना चाहिये। कण्ठ और नेत्र-पलकोंमें सौ गोमेदक, पृष्ठभागमें सौ इन्द्रनील (नीलम), दोनों पार्श्वस्थानोंमें सौ वैदूर्य (बिल्लौर), उदरपर स्फटिक तथा कटिदेशपर सौ सौगन्धिक (माणिक-लाल) मणि रखना चाहिये। खुरोंको स्वर्णमय, पूँछको मुक्ता (मोतियों)-की लड़ियोंसे युक्तकर तथा दोनों नाकोंकी सूर्यकान्त एवं चन्द्रकान्त मणियोंसे रचनाकर कर्पूर और चन्दनसे चर्चित करे। रोमोंको केसर और नाभिको चाँदीसे बनवाये। गुदामें सौ लाल मणियोंको लगाना चाहिये। अन्य रत्नोंको संधिभागोंपर लगाना चाहिये। जीभको शक्करसे, गोबरको गुड़से और गोमूत्रको घीसे बनाना चाहिये। दही-दूध प्रत्यक्ष ही रखे। पूँछके अग्रभागपर चमर तथा स्तनोंके पास ताँबेकी दोहनी रखनी चाहिये।

इसी प्रकार गौके चतुर्थांशसे बछड़ा बनाना

चाहिये। इसके बाद धेनुको आमन्त्रित करे। उस समय गुड़धेनुकी तरह आवाहन कर यह कहना चाहिये—‘देवि! चूँकि रुद्र, इन्द्र, चन्द्रमा, ब्रह्मा, तथा विष्णु—ये सभी तुम्हें देवताओंका निवासस्थान मानते हैं तथा समस्त त्रिभुवन तुम्हारे ही शरीरमें व्याप्त है, अतः तुम भवसागरसे पीड़ित मेरा शीघ्र ही उद्धार करो।’ इस प्रकार आमन्त्रित करनेके बाद गौकी पूजा तथा परिक्रमा कर भक्तिपूर्वक साष्टाङ्ग प्रणाम करके उस रत्नधेनुका दान ब्राह्मणको दक्षिणाके साथ करे, अन्तमें क्षमा-प्रार्थना करे। इस प्रकार सम्पूर्ण विधियोंको जाननेवाला जो पुरुष इस रत्नधेनुका दान करता है, वह शिवलोक (कैलास या सुमेरुस्थित दिव्य शिवधाम)-को प्राप्त करता है तथा पुनः बहुत समयके बाद इस पृथ्वीपर चक्रवर्ती राजा होता है और उसकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। (अध्याय १५७)

उभयमुखी धेनु-दानका माहात्म्य

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—प्रभो! उभयमुखी अर्थात् प्रसवके समयमें गौका दान किस प्रकार करना चाहिये और उसके दानका क्या फल है। इसे आप बतायें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! उभयमुखी गौ-दानका संयोग बड़े भाग्यसे प्राप्त होता है। जबतक बछड़ेके पैर प्रसवके समय भीतर हों और केवल सिर बाहर दिखलायी दे, उस समय वह गौ मानो साक्षात् सप्तद्वीपवती पृथ्वी है। ऐसी उभयमुखी गौके दानके फलका वर्णन शक्य नहीं। यज्ञ और दान करनेसे जो फल प्राप्त नहीं होता, वह फल

केवल उभयमुखी धेनुके दानसे ही प्राप्त हो जाता है और दाताका उद्धार हो जाता है। सींगोंको स्वर्णसे, खुरोंको चाँदीसे तथा पूँछको मोतीकी मालाओंसे अलंकृतकर जो उभयमुखी धेनुका दान करता है, वह गौ और बछड़ेके शरीरमें जितने रोम हैं, उतने ही हजार वर्षतक स्वर्गमें पूजित होता है तथा अपने पितरोंका उद्धार कर देता है। जो व्यक्ति सुवर्णसहित उभयमुखी धेनुका दान करता है, उसके लिये गोलोक और ब्रह्मलोक सुलभ हो जाता है। दुर्बल, अङ्गहीन गौ और दक्षिणासे रहित दान नहीं करना चाहिये।

(अध्याय १५८)

१-इतने बहुमूल्य रत्नोंका दान करनेके उल्लेखसे लोभ, धूर्तता या असम्भावनाकी कल्पनाकर चकित नहीं होना चाहिये, क्योंकि पूर्ण धर्माचरण, देवाराधन और ईमानदारी तथा परस्पर उपकारकी भावनासे भारत ऐसा ही समृद्ध था कि कोई वस्तु दाम लेकर नहीं बेची जाती थी। इस बातको ‘कल्याण’ के ‘हिन्दू संस्कृति-अङ्क’ से लेकर १९६८ के कई साधारण अङ्कोंमें बार-बार प्रमाणोंद्वारा सिद्ध किया गया है।

२-अन्य पुराणोंमें भी इसका महत्त्व आया है और इसकी परिक्रमासे सप्तद्वीपवती पृथ्वीकी परिक्रमाका पुण्य बतलाया गया है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth