भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 586, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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सुवर्णधेनुदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं सुवर्णधेनुदानकी विधि बता रहा हूँ, जिससे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। पचास पल (प्रायः तीन किलो), पचीस पल अथवा जितनी भी सामर्थ्य हो उस मानमें शुद्ध सुवर्णसे रत्नजटित सुन्दर कपिला सुवर्णधेनुकी रचना करनी चाहिये। उसके चतुर्थशसे उसका वत्स बनाये। गलेमें चाँदीकी घंटी लगाये, रेशमी वस्त्र ओढ़ाये, इसी प्रकार हीरेके दाँत, वैदूर्यका गलकम्बल, ताँबेके सींग, मोतीकी आँखें और मूँगेकी जीभ बनाये। कृष्णमृगचर्मके ऊपर एक प्रस्थ गुड रखकर उसके ऊपर सुवर्णधेनुको स्थापित करे। अनेक प्रकारके फलयुक्त आठ कलश, अठारह प्रकारके धान्य, छाता, जूता, आसन, भोजन-सामग्री, ताँबेका दोहनपात्र, दीपक, लवण, शर्करा आदि स्थापित करे। तदनन्तर स्नान कर सुवर्णधेनुकी प्रदक्षिणा कर उसकी भलीभाँति पूजा करे। पूजनके अनन्तर प्रार्थनापूर्वक उस सुवर्णधेनुको दक्षिणा तथा सभी उपस्करणोंके साथ ब्राह्मणको दान करे।
राजन्! गौके जिस अङ्गमें जो देवता, मनु एवं तीर्थ निवास करते हैं वे इस प्रकार हैं*—नेत्रोंमें सूर्य और चन्द्रमा, जिह्वामें सरस्वती, दाँतोंमें मरुद्रण, कानोंमें अश्विनीकुमार, सींगके अग्रभागमें रुद्र और ब्रह्मा, ककुदमें गन्धर्व और अप्सराएँ, कुक्षिमें चारों समुद्र, योनिमें गङ्गा, रोमकूपोंमें ऋषिगण, अपानदेशमें पृथ्वी, आँतोंमें नाग, अस्थियोंमें पर्वत, पैरोंमें चतुर्विध पुरुषार्थ, हुंकारमें चारों वेद, कण्ठमें रुद्र, पृष्ठभागमें मेरु और समस्त शरीरमें भगवान् विष्णु निवास करते हैं। इस प्रकार यह सुवर्णधेनु सर्वदेवमयी और परम पवित्र है।
जो व्यक्ति सुवर्णधेनुका दान करता है, वह मानो सभी प्रकारके दान कर लेता है। इस कर्मभूमिमें यह दान बहुत दुर्लभ है। इसलिये प्रयत्नपूर्वक काञ्चनधेनुका दान करना चाहिये। इससे संसारसे उद्धार हो जाता है और कीर्ति तथा शान्तिकी प्राप्ति होती है एवं उसके सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं और अन्तमें उसे शिवलोककी प्राप्ति होती है।
(अध्याय १५६)
रत्नधेनुदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं गोलोक प्राप्त करानेवाले अत्युत्तम रत्नधेनुदानकी विधि बता रहा हूँ। किसी पुण्य दिनमें भूमिको पवित्र गोबरसे लीपकर उसमें धेनुकी कल्पना करे। पृथ्वीपर कृष्णमृगचर्म बिछाकर उसपर एक द्रोण लवण रखकर उसके ऊपर विधिपूर्वक
संकल्पसहित रत्नमयी धेनु स्थापित करे। बुद्धिमान् पुरुष उसके मुखमें इक्यासी पद्मरागमणि तथा चरणोंमें पुष्पराग स्थापित करे। उस गौके ललाटपर सोनेका तिलक, उसकी दोनों आँखोंमें सौ मोती, दोनों भौंहोंपर सौ मूँगा और दोनों कानोंकी जगह दो सीपें लगाये। उसके सींग सोनेके होने चाहिये।
- नेत्रयोः सूर्यशशिनी जिह्वायां तु सरस्वती। दन्तेषु मरुतो देवाः कर्णयोश्च तथाश्चिनी ॥
शुङ्गाग्रयो सदा चास्या देवी रुद्रपितामही। गन्धर्वाप्सरसश्चैव ककुर्देशं प्रतिष्ठिताः ॥
कुक्षौ समुद्राश्चत्वारो योनी त्रिपथगामिनी ॥
ऋषयो रोमकूपेषु अपाने वसुधा स्थिता। अन्नेषु नागा विज्ञेयाः पर्वताश्चास्थिषु स्थिताः ॥
धर्मकामार्थमोक्षास्तु पादेषु परिसंस्थिताः। हुंकारे च चतुर्वेदाः कण्ठे रुद्राः प्रतिष्ठिताः ॥
पृष्ठभागे स्थितो मेरुर्विष्णुः सर्वशरीरगः। एवं सर्वमयी देवी पावनी विश्वरूपिणी ॥ (उत्तरपर्व १५६। १६-२०)
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