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भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 585, कुल 654 में से

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पृष्ठ 585

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

ग्रहण करें। उस दिन घृतका ही आहार करना चाहिये। इसी विधिसे नवनीत (मक्खन)-धेनुका भी दान करना चाहिये। घृतधेनुका दान करनेवाला व्यक्ति उस लोकमें निवास करता है, जहाँ घी और दूधकी नदियाँ बहती हैं। वह व्यक्ति अपने सात पीढ़ीके लोगोंका भी उद्धार कर देता है। ये

फल तो सकाम दान देनेवाले व्यक्तियोंके हैं, किंतु जो व्यक्ति निष्कामभावसे घृतधेनुका दान करता है, वह निष्कलमष होकर परम पदको प्राप्त करता है। घृत सर्वदेवमय है, इसलिये घृतके दानसे सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं।

(अध्याय १५४)

लवणधेनुदान-विधि

राजा युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! आप इस प्रकारके दानकी विधिका वर्णन करें, जिसे करनेसे सभी दानोंका फल प्राप्त हो जाय एवं सभी पापोंका नाश हो जाय और सभी मनोरथ सिद्ध हो जायँ तथा व्यक्ति शुद्ध हो जाय।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! सभी दानोंमें लवणधेनुका दान उत्तम है। इससे ब्रह्महत्या, गोहत्या, पितृहत्या, गुरुपत्नीगमन, विश्वासघात, क्रूरता आदि अनेक प्रकारके पापोंका आचरण करनेवाला व्यक्ति मुक्त हो जाता है। वह धन, धान्य, पुत्र, पौत्र एवं सुख प्राप्त कर दीर्घायु होकर इस संसारके सुखको भोगकर अन्तमें शिवलोकको प्राप्त कर लेता है। अब मैं इस लवणधेनुदानकी विधिको बता रहा हूँ—

भूमिको गोबरसे लीपकर उसके ऊपर कुश बिछा दे तथा उसके ऊपर मेषका चर्म बिछा दे। उसपर पूर्व दिशाकी ओर मुँह करके बैठे। चाहे कोई मनुष्य धनी हो या गरीब प्रायः एक आदक अर्थात् चार सेर लवण रखकर उसमें धेनुकी कल्पना करनी चाहिये। सुवर्णमण्डित चन्दनकाष्ठके सींग, चाँदीके खुर, ईखके पैर, फलोंके स्तन, शर्कराकी जिह्वा, चन्दनकी नासिका, सीपके कान, मोतियोंकी आँखोंकी कल्पना कर उसके कपोलमें सत्कुपिण्ड, मुखमें जौ, दोनों पार्श्वोंमें तिल और गेहूँ—इस प्रकार

सप्तधान्य उस लवणधेनुके अङ्गोंमें स्थापित करे। इसी प्रकार ताप्रसे पीठ, गुडपिण्डसे अपान-देश, कम्बलसे पूँछका, अंगूरसे चार स्तनोंका, मधुर फलों एवं मधुसे योनिदेशकी रचना करनी चाहिये। इस प्रकार उपर्युक्त सामग्रियोंसे लवणधेनुकी रचनाकर सेरभर नमकके मानसे उसके वत्सकी कल्पना करे। धेनु तथा बछड़ेको वस्त्र-आभूषण आदिसे अलंकृत करे। तदनन्तर स्वयं स्नान कर देवताओं और ब्राह्मणकी पूजा करे। स्त्री-पुत्रके साथ गायकी पूजा एवं प्रदक्षिणा करे और इस मन्त्रको पढ़कर नमस्कार करे—

लवणे वै रसाः सर्वे लवणे सर्वदेवताः।

सर्वदेवमये देवि लवणाख्ये नमोऽस्तु ते॥

(उत्तरपर्व १५५।१८)

‘लवणमें सभी रस निहित हैं। सभी देवताओंका निवास लवणमें रहता है, इसलिये सर्वदेवमयी लवणधेनु! आपको मेरा नमस्कार है।’

अनन्तर दक्षिणाके साथ वह धेनु ब्राह्मणको समर्पित कर दे। राजन्! लवणधेनुका दान करनेसे सम्पूर्ण पृथ्वीकी परिक्रमा और सभी यज्ञों तथा दानोंका भी फल प्राप्त हो जाता है। इस विधिसे जो व्यक्ति रसमयी लवणधेनुका दान करता है, उसे सौभाग्य, सुख, आरोग्य, सम्पत्ति, धन-धान्यकी प्राप्ति होती है तथा वह प्रलयपर्यन्त स्वर्गमें निवास करता है। (अध्याय १५५)

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