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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 584, कुल 654 में से

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पृष्ठ 584
  • उत्तरपर्व *

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जन्म पाकर भी भगवान्की आराधना नहीं करता, उसका मनुष्यके रूपमें जन्म लेना ही व्यर्थ है। ऐसा कौन अभागा व्यक्ति होगा, जो भगवान्की आराधना नहीं करेगा, जबकि भक्तिपूर्वक थोड़ी-सी भी आराधना की जाय तो भगवान् विष्णु इस लोक तथा परलोकमें उसका कल्याण कर देते हैं। भगवान्को धन, वस्त्र, आभूषण आदि कुछ भी नहीं चाहिये। उन्हें तो मात्र हृदयकी भक्ति एवं शुद्ध प्रेम चाहिये१। इसलिये जीव! तुम भगवान्से दूर क्यों रहते हो! हजारों जन्मोंके बाद इस कर्मभूमिमें दुर्लभ मानव-रूपमें जन्म लेकर जो व्यक्ति श्रीविष्णुकी आराधना और जलधेनुका दान

नहीं करता, उस व्यक्ति का यह जन्म ही व्यर्थ है। वह व्यक्ति मायाके जालमें पड़ा रहता है। मुद्गल-ऋषिने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर कहा कि 'मनुष्यो! मैं पुकार-पुकारकर कहता हूँ कि आपलोगोंको दोनों लोकोंमें कल्याण प्राप्त करनेके लिये श्रीविष्णुभगवान्की आराधना और जलधेनुका दान करना चाहिये। नरककी यातना अति दुःखदायिनी है, इसे मैंने स्वयं अपनी आँखोंसे देखा है। विचार करनेपर यह सत्य ही मालूम पड़ता है कि उस दुःखसे बचनेके लिये भगवान् विष्णुमें अपने मनको लगाना चाहिये, यही श्रेयस्कर उपाय है२।' (अध्याय १५३)

घृतधेनुदान-विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं घृतधेनुदान और घृतधेनु-निर्माणकी विधि बता रहा हूँ, इसे आप प्रेमपूर्वक सुनें। गायके घीसे भरे हुए कलशोंको गायकी आकृतिमें बनाकर उन्हें गन्ध, पुष्प आदिसे अलंकृत कर श्वेत वस्त्रसे भलीभाँति ढँक दे और दोहन-स्थानपर कांस्यकी दोहनी रख दे। पैरोंकी जगहपर ईखके डंडे, खुरकी जगहपर चाँदी, आँखके स्थानपर सोना, सींगोंके स्थानपर अगरकाष्ठ, दोनों बगलमें सप्तधान्य, गलकम्बलके स्थानपर ऊनी वस्त्र, नासिकाके स्थानपर तुरस्कदेशीय कपूर, स्तनोंके स्थानपर फल, जिह्वाके स्थानपर शर्करा, मुखके स्थानपर दूधमिश्रित गुड़, पूँछकी जगहपर रेशमी वस्त्र तथा रोओंकी जगहपर सफेद (गौर) सरसों और पीठकी जगहपर ताम्रपात्र स्थापित करे। इस प्रकारसे घृतधेनुकी रचना करे। इसी प्रकार

घृतधेनुके पास ही घृतधेनु-वत्सकी भी कल्पना करे। तदनन्तर विधिपूर्वक घृतधेनुकी प्रतिष्ठा कर भलीभाँति पूजन करे और इस प्रकार कहे— आज्यं तेजः समुद्दिष्टमाज्यं पापहरं परम्। आज्यं सुराणामाहारः सर्वमाज्ये प्रतिष्ठितम्॥ त्वं चैवाज्यमयी देवि कल्पितासि मया किल। सर्वपापापनोदाय सुखाय भव भामिनि॥

(उत्तरपर्व १५४।८-९)

'घृतको तेजोवर्धक तथा पापापहारी बतलाया गया है। देवताओंका आहार घृत ही है, सभी कुछ घृतमें ही प्रतिष्ठित है, इसलिये घृतमयी देवि! तुम मेरे द्वारा घृतकुण्डोंमें कल्पित की गयी हो, मेरे पापोंको नष्टकर मुझे आनन्द प्रदान करो।'

ऐसा कहकर दक्षिणासहित घृतधेनुका दान ब्राह्मणको दे दे और कहे कि ब्राह्मणदेवता! मेरा उपकार करनेके लिये आप इस आज्यमयी धेनुको

१-यो न वितर्द्धिविभवेन वासोभिर्न भूषणैः। तुष्यते हृदयेनैव कस्तमीशं न पूजयेत्॥ (उत्तरपर्व १५३।६५)

२-महर्षि मुद्गलप्रोक्त मुद्गलपुराण सभी उपपुराणोंमें बड़ा है और इनकी धर्मनिष्ठा एवं भक्तिकी विशिष्ट कथा महाभारतके सङ्कप्रस्थीय मुद्गलोपाख्यानमें भी अतीव आकर्षक है। धर्मकी उपेक्षाके कारण मुद्गलपुराण अब प्रायः लुप्त-सा हो रहा है। ऐसे ही गणेशपुराण भी लुप्त-सा हो रहा है। समर्थ व्यक्तियोंको इन दोनोंको प्रकाशित करनेका प्रयत्न अवश्य करना चाहिये।

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