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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 589, कुल 654 में से

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पृष्ठ 589

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

गोमाताके चतुर्दिक् चमर डुलाना चाहिये। इसी प्रसंगमें मुनियोंने सुवर्णमय नन्दिकेश्वर (वृषभ)-को लवणके ऊपर रखकर अथवा प्रत्यक्ष वृषभके भी दानका विधान बतलाया है। इस प्रकार दस-दस गौके क्रमसे गौसहस्र या गौशत दान करना चाहिये। यदि संख्यामें सम्पूर्ण गौएँ उपलब्ध न हो सकें तो दस गौओंकी पूजा कर शेष गौओंकी परिकल्पना कर उनका दान करना चाहिये१।

तदनन्तर पुण्यकाल आनेपर गीत एवं माङ्गलिक शब्दोंके साथ वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान कराया हुआ यजमान अञ्जलिमें पुष्प लेकर इस प्रकार उच्चारण करे—‘विश्वमूर्तिस्वरूप विश्वमाताओंको नमस्कार है। लोकोंको धारण करनेवाली रोहिणीरूप गौओंको बारम्बार प्रणाम है। गौओंके अङ्गोंमें इक्कीसों भुवन तथा ब्रह्मादि देवताओंका निवास है, वे रोहिणीस्वरूपा२ माताएँ मेरी रक्षा करें। गौएँ मेरे अग्रभागमें रहें, गौएँ मेरे पृष्ठभागमें रहें, गौएँ नित्य मेरे चारों ओर वर्तमान रहें और मैं गौओंके मध्यमें निवास करूँ३। चूँकि तुम्हीं वृषरूपसे सनातन धर्म और भगवान् शिवके वाहन हो, अतः मेरी रक्षा करो!’ इस प्रकार आमन्त्रित कर बुद्धिमान् यजमान सभी सामग्रियोंके साथ एक गौ और नन्दिकेश्वरको गुरुको दान कर

दे तथा उन दसों गौओंमेंसे एक-एक तथा हजार गौओंमेंसे एक-एक सौ, पचास-पचास अथवा बीस-बीस गौ प्रत्येक ऋत्विजको समर्पित कर दे। तत्पश्चात् उनकी आज्ञासे अन्य ब्राह्मणोंको दस-दस या पाँच-पाँच गौएँ देनी चाहिये। एक ही गाय बहुतोंको नहीं देनी चाहिये, क्योंकि वह दोषप्रदायिनी हो जाती है। बुद्धिमान् यजमानको आरोग्यवृद्धिके लिये एक-एकको अनेक गौएँ देनी चाहिये। इस प्रकार एक हजार गोदान करनेवाला यजमान एक दिनके लिये पुनः पयोन्नत करे और इस महादानका अनुकीर्तन स्वयं सुनाये अथवा सुने।

यदि उसे विपुल समृद्धिकी इच्छा हो तो उस दिन ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करना चाहिये। इस विधिसे जो मनुष्य एक हजार गौओंका दान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर सिद्धों एवं चारणोंद्वारा सेवित होता है। वह क्षुद्र घंटियोंसे सुशोभित सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर आरूढ़ होकर सभी लोकपालोंके लोकोंमें देवताओंद्वारा पूजित होता है। इस गौसहस्रदानसे पुरुष अपने इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। गोदानमें गौ, पात्र, काल एवं विधिका विशेषरूपसे विचार करना चाहिये। (अध्याय १५९)

वृषभदानकी महिमा

महाराज युधिष्ठिरने कहा—जनार्दन! आपकी हृदयमें एक कौतूहल है। तीनों लोकोंमें यह प्रसिद्धि अमृतमयी वाणीसे मुझे तृप्ति नहीं हो रही है, मेरे है कि गौओंका स्वामी—गोपति (वृषभ)

१-भविष्यपुराणमें बार-बार गौओंकी अपार महिमा और गौसहस्रदान आदिकी विधिका निर्देश यही सूचित करता है कि भारत गो-भक्त देश था और यहाँ दूध-दहीकी सचमुच नदियाँ बहती थीं। कृष्णके व्रजमें गो-चारणकी कथा और वहाँकी अद्भुत गो-सम्पत्तिकी कथा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। आज जो भारत कंगाल-सा बन गया है तथा रत्नदान, सुवर्णशृङ्खली सहस्र गोदान आदिकी बातें कल्पना-सी लगती होंगी, वह सब शास्त्रोंकी उपेक्षा और गो-भक्ति-शून्यताका ही परिणाम है।

२-वाजसने० ८।४१ आदिमें बार-बार रोहिणीरूपा गौओंको कामधेनु एवं सुरभिरूपा कहा गया है। रोहिणी गौ प्रायः लाल वर्णकी होती है।

३-गावो ममाग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पृष्ठतः। गावो मे सर्वतः सन्तु गावां मध्ये वसाय्यहम्॥ (उत्तरपर्व १५९।३३)

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