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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 590, कुल 654 में से

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पृष्ठ 590
  • उत्तरपर्व *

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गोविन्दस्वरूप है, अतः प्रभो! ऐसे महनीय वृषभदानका फल बतानेकी कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! सुनिये, यह वृषभदान पवित्रोंमें पवित्रतम और दानोंमें सबसे उत्तम दान है। एक स्वस्थ हृष्ट-पुष्ट वृषभके दानका फल दस धेनुओंके दानसे अधिक है। हृष्ट-पुष्ट, युवा, सुन्दर, सुशील, रूपवान् और ककुद्मान् एक ही शुभ लक्षणसम्पन्न वृषभके दानसे उस दान करनेवाले व्यक्तिके सभी कुलोंका उद्धार हो जाता है। पुण्यपर्वके दिन वृषभकी पूछमें चाँदी लगाकर तथा भलीभाँति उसे अलंकृत कर दे, तदनन्तर दक्षिणाके साथ उस वृषका दान ब्राह्मणको देकर इस प्रकार प्रार्थना करे—

धर्मस्त्वं वृषरूपेण जगदानन्दकारकः। अष्टमूर्तरधिष्ठानमतः पाहि सनातन॥

(उत्तरपर्व १६०।९)

इस विधिसे वृषभदान करनेवाले व्यक्तिके सात जन्म पहलेके किये गये समस्त पाप इसके

प्रभावसे उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं और अन्तमें वह व्यक्ति वृषभयुक्त कामचारी दिव्य विमानमें बैठकर स्वर्गलोकमें चला जाता है। महीपते! उस वृषभके शरीरमें जितने रोम हैं, उतने हजार वर्षतक वह गोलोकमें पूजित होता है, इसके बाद गोलोकसे अवतीर्ण होकर इस लोकमें उत्तम कुलीन ब्राह्मणके घरमें जन्म लेता है। वह व्यक्ति यज्ञ करनेवाला, महान् तेजस्वी और सभी ब्राह्मणोंद्वारा पूजित होता है। महाराज! आपने जो यह पूछा कि यह उत्तम वृषभदान किसे करना चाहिये, उसके विषयमें मैं बतला रहा हूँ। जो ब्राह्मण शान्तिचित्त, जितेन्द्रिय, वेदवेत्ता, अहिंसक और प्रतिग्रहसे डरनेवाला, मनुष्योंका उद्धार करनेमें समर्थ तथा गृहस्थ हो। उसे दृढ़, पुष्ट, बलवान्, भारवहन करनेमें समर्थ और सब गुणोंसे युक्त उत्तम वृष प्रदान करना चाहिये। इस प्रकारसे एक वृषभका दान दस धेनुदानसे भी अधिक फलप्रद है। (अध्याय १६०)

कपिलादानकी महिमा

महाराज युधिष्ठिरने कहा—जगत्पते! अब आप कपिलादानका माहात्म्य बतलानेकी कृपा करें, जो समस्त पापोंका नाश करनेवाला एवं दानोंमें परम पुण्यप्रद है।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महामते! इस सम्बन्धमें प्राचीन कालमें विनताश्वने भगवान् वाराह एवं धरणीदेवीके जिस संवादको मुझे बताया था उसे आप सुनें। धरणीदेवीके पूछनेपर भगवान् वाराहने कहा कि 'भद्रे! कपिला गौके दान करनेसे सम्पूर्ण पापोंका नाश हो जाता है तथा यह परम पवित्र है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने सम्पूर्ण तेजोंका सार एकत्र कर यज्ञोंमें अग्निहोत्रकी सम्पन्नताके लिये कपिला गौकी रचना की थी। कपिला गौ पवित्रोंको

पवित्र करनेवाली, मङ्गलोंका मङ्गल तथा परम पूज्यमयी है। तप इसीका रूप है, व्रतोंमें यह उत्तम व्रत, दानोंमें उत्तम दान तथा निधियोंमें यह अक्षय निधि है। पृथ्वीमें गुप्त रूपसे या प्रकट रूपसे जितने पवित्र तीर्थ हैं एवं सम्पूर्ण लोकोंमें द्विजातियोंद्वारा सायंकाल और प्रातःकाल अग्निहोत्र आदि हवनकी जो भी क्रियाएँ हैं, वे सभी कपिला गायके घृत, क्षीर तथा दहीसे होती हैं। भामिनि! कपिलाके सिर और ग्रीवामें सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर उसके गले एवं मस्तकके गिरे हुए जलको श्रद्धापूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम करता है, वह पवित्र हो जाता है और उसी क्षण उसके पाप भस्म हो जाते हैं।

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