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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 591, कुल 654 में से

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पृष्ठ 591

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

प्रातःकाल उठकर जिसने कपिला गौकी प्रदक्षिणा की, उसने मानो सम्पूर्ण पृथ्वीकी प्रदक्षिणा कर ली। वसुन्धरे! कपिला गौकी एक प्रदक्षिणा करनेपर भी दस जन्मके किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। पवित्र व्रतके आचरण करनेवाले पुरुषको कपिला गौके मूत्रसे स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मानो गङ्गा आदि सभी तीर्थोंमें स्नान कर चुका। भक्तिपूर्वक एक बार कपिलाके गोमूत्रसे स्नान करनेपर मनुष्यके जीवनभरके किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। एक हजार गौके दानका फल एक कपिला गौके दानके समान है। गौओंकी यज्ञपूर्वक रक्षा करनी चाहिये। गौके दूध-दही, घृत, गोमूत्र, गोमय आदिको अपवित्र नहीं करना चाहिये। गौओंके शरीरको खुजलाना और उनकी सेवा करना परम श्रेष्ठ धर्म माना गया है। गौके भय एवं रोगकी स्थितिमें उसकी भलीभाँति सेवा करनी चाहिये। जो गौओंके चरनेके लिये हरी-भरी गोचरभूमिका दान करता है, वह दिव्य स्वर्गवासका फल प्राप्त करता है। साक्षात् ब्रह्माजीने कपिला गौके दस भेद बतलाये हैं। इस कपिला गौका जो श्रोत्रिय ब्राह्मणको दान करता है, वह अप्सराओंसे अलंकृत दिव्य विमानपर प्रतिष्ठित होकर स्वर्ग जाता है। सोनेके समान रंगवाली कपिला पहली श्रेणीकी है और गौर पिङ्गलवर्णवाली दूसरी श्रेणीकी। तीसरी लाल-पीले नेत्रवाली, चौथी अग्रिके समान नेत्रवाली, पाँचवीं जुहूके समान वर्णवाली, छठी घीके समान पिङ्गलवर्णवाली, सातवीं उजली-पीली, आठवीं दुग्धवर्णके समान पीली, नवीं पाटलवर्णवाली तथा दसवीं पीले पृच्छवाली*। ये सभी कपिलाएँ संसार-सागरसे उद्धार कर देती हैं, इसमें संशय नहीं। जो शुद्ध होकर कपिलाका

दान लेता है और उसका दूध पीता है, वह पतित होकर चण्डाल हो जाता है और अन्तमें नरकमें जाता है। इसलिये किसी ब्राह्मणेतरको कपिलाका दान नहीं लेना चाहिये। श्रोत्रिय, धनहीन, सदाचारी तथा अग्रिहोत्री ब्राह्मणको एक कपिला गौका दान करनेसे दाता सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है।

गृहस्थ पुरुषको चाहिये कि दान देनेके लिये जल्दी ही प्रसव करनेवाली धेनुका पालन करे। जिस समय वह कपिला धेनु आधा प्रसव करनेकी स्थितिमें हो जाय, उसी समय उसे ब्राह्मणको दान कर देना चाहिये। जब उत्पन्न होनेवाले बछड़ेका मुख योनिके बाहर दीखने लगे और शेष अङ्ग अभी भीतर ही रहें अर्थात् अभी पूरे गर्भका उसने मोचन (बाहर) नहीं किया, तबतक वह धेनु सम्पूर्ण पृथ्वीके समान मानी जाती है। वसुन्धरे! ऐसी गायका दान करनेवाले पुरुष ब्रह्मवादियोंसे सुपूजित होकर ब्रह्मलोकमें उतने करोड़ वर्षांतक निवास करते हैं, जितनी कि धेनु और बछड़ेके रोमोंकी संख्याएँ होती हैं। सोनेसे सींग तथा चाँदीसे खुरको सम्पन्न करके कपिला गौका दान करते समय उस धेनुका पुच्छ ब्राह्मणके हाथपर रख दे। हाथपर जल लेकर शुद्ध वाणीमें ब्राह्मणसे संकल्प पढ़वावे। जो पुरुष इस प्रकार (उभयमुखी गौका) दान करता है, उसने मानो समुद्रसे घिरी तथा पर्वतों, वनों एवं रलोंसे परिपूर्ण समूची पृथ्वीका दान कर दिया—इसमें कोई संशय नहीं। ऐसा मनुष्य इस दानसे निश्चय ही पृथ्वीदानके तुल्य फलका भागी होता है। वह अपने पितरोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक भगवान् विष्णुके परम धाममें पहुँच जाता है। ब्राह्मणका धन छीननेवाला, गोघाती अथवा गर्भपात करानेवाला, दूसरोंको ठगनेवाला, वेदनिन्दक, नास्तिक, ब्राह्मणोंका

  • कपिलाके भेदों एवं उनकी अपार महिमाका वर्णन महाभारतके वैष्णवधर्मपर्वमें हुआ है, जो आश्वमेधिकपर्वका अन्तिम भाग है। पाणिनि-व्याकरण (५।२।९७)-के गणपाठके अनुसार कपि अर्थात् बन्दरके समान वर्णवाली गायको कपिला कहते हैं।

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